आठ और साठ घर में नहीं


हमारे प्राचीन ऋषियों ने मनुष्य की औसत आयु सौ वर्ष मानते हुए जीवन को चार आश्रमों में विभाजित किया था बाल्यावस्था ,प्रौढ़ावस्था ,वानप्रस्थ और सन्यास.प्रत्येक अवस्था पच्चीस वर्ष की थी और सभी लोग उनका ठीक से परिपालन करके सतुष्ट रहते थे.वानप्रस्थ में बुजुर्ग घर-परिवार का मोह छोड़ कर शहर से दूर वनों में समाज हित के कार्य,शिक्षा दान,आदि करते थे केवल अपने परिवार तक ही सीमित नहीं रहते थे.७५ वर्ष कीआयु प्राप्त करने पर सन्यास ले लेते थे और केवल वनों में रहते थे,अब उनका सरोकार अखिल मानवता से ही होता था उनकी सोच और समझ का दायरा परिवार व समाज से ऊपर रहता था.परन्तु आज है क्या?६२ और उससे अधिक आयु तक सरकारी सेवाओं में डटे रह कर बुजुर्ग युवा पीढ़ी का शोषण और उत्पीडन कर रहे हैं.घर-परिवार समाज और राष्ट्र में पदों व कुर्सियों से चिपके हुए हैं और अपनी ही संतानों के समग्र विकास को बाधित किये हुए हैं.बोया पेड़ बबुल का तो आम कहाँ?जो जैसा बोता  है वैसा ही काटता है परन्तु दोष अपनी ही संतानों को देता है.जैसे संस्कार संतान को दिए गए हैं जैसा व्यव्हार अपने बुजुर्गों के साथ  किया है जब वही कुछ अपने साथ  घटित होता है तो पीड़ा क्यों?
हमारे ऋषि-मुनि तत्व ज्ञानी थे,उन्होंने आज से दस लाख वर्ष पूर्व ही यह निर्धारित कर दिया था की आठ वर्ष का बालक होते ही उसे गुरुकुल में भेज दो और ६० वर्ष से अधिक होते ही हर हालत में परिवार छोड़ दो.जब आठ और साठ का साथ होगा तब संकट आना लाजिमी है.आज न गुरुकुल हैं न ही बुजुर्गों के मध्य त्याग व तप की भावना,आज के बुजुर्ग अपनी ही संतानों के प्रतिद्वंदी बने हुए हैं और अपने एकाधिकार को स्वेच्छा से छोड़ ने को तत्पर नहीं हैं-इसीलिए सामाजिक विसंगतियों का बोलबाला हो गया है।
गलत अवधारणाएं उत्तरदायी -आज हमारे समाज में प्राचीन मान्यताओं की गलत अवधारणा व्याख्यायित की जा रही हैं जिनसे संकट उत्तरोत्तर बढता जा रहा है.उदहारण स्वरुप वर्ष में एक पखवाड़ा मनाये जाने वाले श्राद्ध पर्व को लें.श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है जिसका अर्थ है बड़ों के प्रति आस्था व सम्मान की भावना रखना.तर्पण शब्द की उत्पत्ति तृप्ति से हुई है.इस प्रकार श्राद्ध और तर्पण से अभिप्राय था-जीवित माता-पिता,सास-श्वसुर ,और गुरु की इस प्रकार सम्मान सहित सेवा करना जिससे वे तृप्त अथार्त संतुष्ट हो जाएँ.परन्तु आज ढोंगियों-पाखंडियों ने प्राचीन पद्दति को उलट वर्ष में मात्र एक पखवाडा मृत पूर्वजों के नाम पर पेशेवर कर्मकांडियों की पेट पूजा का विधान बना दिया है.इस प्रकार अन्न केवल फ्लश तक ही रूपांतरित हो कर पहुँचता है न की पितृ आत्माओं तक.वर्ष-वर्शांतर तक चलने वाला श्राद्ध और तर्पण का कार्यक्रम वर्ष में मात्र एक पखवाड़ा तक वह भी केवल मृतात्माओं के लिए सीमित कर देने वाली पाखंडी व्यवस्था ही बुजुर्गों की दुर्दशा के लिए उत्तरदायी है.किसी विद्वान् ने ठीक ही कहा है-
जियत पिता से दंगम दंगा,मरे पिता पहुंचाए गंगा ,
जियत पिता की न पूछी बात,मरे पिता को खीर और भात ,
जियत पिता को घूंसे लात,मरे पिता को श्राद्ध करात ,
जियत पिता को डंडा लाठिया,मरे पिता को तोसक तकिया,
जियत पिता को कछु न मान,मरत पिता को पिंडा दान।
एक ओर तो आप अपनी प्राचीन संस्कृति की गलत व्याख्या कर उन को मानें और दूसरी ओर दुखी हो कर रोयें तो याद रखें—
वीप एंड यू वीप एलोन

मृतात्माओं की तृप्ति के लिए वेदों में विशेष सात मन्त्रों से हवन आहुतियाँ देने का प्राविधान है.इस प्रकार पूर्वज आत्मा चाहे मोक्ष में हो अथवा की पुनर्जनम में उसे धूम्र के रूप में हवन में डाले गए पदार्थों की प्राप्ति हो जाती है उस के स्थान पर किसी दुसरे व्यक्ति को खिलाया गया पदार्थ पूर्वज आत्माओं तक नहीं केवल फ्लश तक पहुँचता है.क्या इस पाखंडी -ढोंगी दुर्व्यवस्था का परित्याग कर हम अपनी प्राचीन परम्परा को बहाल कर पाएंगे? यदि हाँ तो निश्चय ही समाज में बुजुर्गों का मान सम्मान वास्तविकता में बढ़ जायेगा.शाल ओढ़ाना ,पगड़ी बांधना या मोमेंटो भेंट करना महज एक दिखावा है-सम्मान नहीं.आईये अपनी ‘आठ और साठ’ घर में नहीं परम्परा को बहल करें तथा बुजुर्गों को सुखी रख सकें।
——विजय माथुर





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