रावण वध एक पूर्वनिर्धारित योजना


आज से दो अरब वर्ष पूर्व हमारी पृथ्वी और सूर्य एक थे.अस्त्रोनोमिक युग में सर्पिल,निहारिका,एवं नक्षत्रों का सूर्य से पृथक विकास हुआ.इस विकास से सूर्य के ऊपर उनका आकर्षण बल आने लगा .नक्षत्र और सूर्य अपने अपने कक्षों में रहते थे तथा ग्रह एवं नक्षत्र सूर्य की परिक्रमा किया करते थे.एक बार पुछल तारा अपने कक्ष से सरक गया और सूर्य के आकर्षण बल से उससे टकरा गया,परिणामतः सूर्य के और दो टुकड़े चंद्रमा और पृथ्वी उससे अलग हो गए और सूर्या की परिक्रमा करने लगे.यह सब हुआ कास्मिक युग में.ऐजोइक युग में वाह्य सतह छिछली अवस्था में,पृथ्वी का ठोस और गोला रूप विकसित होने लगा,किन्तु उसकी बहरी सतह अर्ध ठोस थी.अब भरी वायु –मंडल बना अतः पृथ्वी की आंच –ताप कम हुई और राख जम गयी.जिससे पृथ्वी के पप्ड़े का निर्माण हुआ.महासमुद्रों व महादीपों की तलहटी का निर्माण तथा पर्वतों का विकास हुआ,ज्वालामुखी के विस्फोट हुए और उससे ओक्सिजन निकल कर वायुमंडल में HYDROGEN से प्रतिकृत हुई जिससे करोड़ों वर्षों तक पर्वतीय चट्टानों पर वर्षा हुई तथा जल का उद्भव हुआ;जल समुद्रों व झीलों के गड्ढों में भर गया.उस समय दक्षिण भारत एक दीप था तथा अरब सागर –मालाबार तट तक विस्तृत समुद्र उत्तरी भारत को ढके हुए था;लंका एक पृथक द्वीप था.किन्तु जब नागराज हिमालय पर्वत की सृष्टि हुई तब इयोजोइक युग में वर्षा के वेग के कारन उससे अपर मिटटी पिघली बर्फ के साथ समुद्र ताल में एकत्र हुई और उसे पीछे हट जाना पड़ा तथा उत्तरी भारत का विकास हुआ.इसी युग में अब से लगभग तीस करोड़ वर्ष पूर्व एक कोशिए वनस्पतियों व बीस करोड़ वर्ष पूर्व एक कोशिए का उद्भव हुआ.एक कोशिकाएं ही भ्रूण विकास के साथ समय प्रत्येक जंतु विकास की सभी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं.सबसे प्राचीन चट्टानों में जीवाश्म नहीं पाए जाते,अस्तु उस समय लार्वा थे,जीवोत्पत्ति नहीं हुई थी.उसके बाद वाली चट्टानों में (लगभग बीस करोड़ वर्ष पूर्व)प्रत्जीवों (protojoa) के अवशेष मिलते हैं अथार्त सर्व प्रथम जंतु ये ही हैं.जंतु आकस्मिक ढंग से कूद कर(ईश्वरीय प्रेरणा के कारन)बड़े जंतु नहीं हो गए,बल्कि सरलतम रूपों का प्रादुर्भाव हुआ है जिन के मध्य हजारों माध्यमिक तिरोहित कड़ियाँ हैं.मछलियों से उभय जीवी (AMFIBIAN) उभय जीवी से सर्पाक (reptile) तथा सर्पकों से पक्षी (birds) और स्तनधारी (mamals) धीरे-धीरे विकास कर सके हैं.तब कहीं जा कर सैकोजोइक युग में मानव उत्पत्ति हुई।

अपने विकास के प्रारंभिक चरण में मानव समूहबद्ध अथवा झुंडों में ही रहता था.इस समय मनुष्य प्रायः नग्न ही रहता था,भूख लगने पर कच्चे फल फूल या पशुओं का कच्चा मांस खा कर ही जीवन निर्वाह करता था.कोई किसी की समपत्ति(asset) न थी,समूहों का नेत्रत्व मात्रसत्तात्मक (mother oriented) था.इस अवस्था को सतयुग पूर्व पाशान काल (stone age) तथा आदिम साम्यवाद का युग भी कहा जाता है.परिवार के सम्बन्ध में यह ‘अरस्तु’ के अनुसार ‘communism of wives’ का काल था (संभवतः इसीलिए मात्र सत्तामक समूह रहे हों).इस समय मानव को प्रकृति से कठोर संघर्ष करना पड़ता था.मानव के ह्रास –विकास की कहानी सतत संघर्षों को कहानी है.malthas के अनुसार उत्पन्न संतानों में आहार ,आवास,तथा प्रजनन के अवसरों के लिए –‘जीवन के लिए संघर्ष’ हुआ करता है जिसमे लेमार्क के अनुसार ‘व्यवहार तथा अव्यवहार’ के सिद्दंतानुसार ‘योग्यता ही जीवित रहती है’.अथार्त जहाँ प्रकृति ने उसे राह दी वहीँ वह आगे बढ़ गया और जहाँ प्रकृति की विषमताओं ने रोका वहीँ रुक गया.कालांतर में तेज बुद्धि मनुष्य ने पत्थर और काष्ठ के उपकरणों तथा शस्त्रों का अविष्कार किया तथा जीवन पद्धति को और सरल बना लिया.इसे ‘उत्तर पाशान काल’ की संज्ञा दी गयी.पत्थारोंके घर्षण से अग्नि का अविष्कार हुआ और मांस को भून कर खाया जाने लगा.धीरे धीरे मनुष्य ने देखा की फल खा कर फेके गए बीज किस प्रकार अंकुरित होकर विशाल वृक्ष का आकर ग्रहण कर लेते हैं.एतदर्थ उपयोगी पशुओं को अपना दास बनाकर मनुष्य कृषि करने लगा.यहाँ विशेष स्मरणीय तथ्य यह है की जहाँ कृषि उपयोगी सुविधाओं का आभाव रहा वहां का जीवन पूर्ववत ही था.इस दृष्टि से गंगा-यमुना का दोआबा विशेष लाभदायक रहा और यहाँ उच्च कोटि की सभ्यता का विकास हुआ जो आर्य सभ्यता कहलाती है और यह छेत्र आर्यावर्त.कालांतर में यह जाती सभ्य,सुसंगठित व सुशिक्षित होती गयी.व्यापर कला-कौशल और दर्शन में भी यह जाती सभ्य थी.इसकी सभ्यता और संस्कृति तथा नागरिक जीवन एक उच्च कोटि के आदर्श थे.भारतीय इतिहास में यह कल ‘त्रेता युग’ कें नाम से जाना जाता है और इस का समय ६५०० इ. पू. आँका गया है.आर्यजन काफी विद्वान थे.उन्होंने अपनी आर्य सभ्यता और संस्कृति का व्यापक प्रसार किया.इस प्रकार आर्य जाती और भारतीय सभ्यता संस्कृति गंगा-सरस्वती के तट से पशिम की और फैली.लगभग चार हजार वर्ष पश्चात् २५०० इ.पू.आर्यों ने सिन्धु नदी की घटी में एक सुद्द्रण एवं सुगठित सभ्यता का विकास किया.यही नहीं आर्य भूमि से स्वाहा और स्वधा के मन्त्र पूर्व की और भी फैले तथा आर्यों के संस्कृतिक प्रभाव से ही इसी समय नील और हवांग हो की घाटियों में भी समरूप सभ्यताओं का विकास हो सका.भारत से आर्यों किएक शाखा पूर्व में कोहिमा के मार्ग से चीन,जापान होते हुए अलास्का के रस्ते राकी पर्वत श्रेणियों में पहुच कर पाताल लोक(वर्तमान अमेरिका महाद्वीपों) में अपनी संस्कृति एवं साम्राज्य बनाने में समर्थ हुई.माय ऋषि के नेत्रतव में मायाक्षिको (मेक्सिको) तथा तक्षक ऋषि के नेत्रत्व में तक्शाज़ (टेक्सास) के आर्य उपनिवेश विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं कालांतर में कोलंबस द्वारा नयी दुनिया की खोज के बाद इन के वंशजों को red indians कहकर निर्ममता से नष्ट किया गया.

पशिम की और हिन्दुकुश पर्वतमाला को पार कर आर्य जाती आर्य नगर (ऐर्यान-ईरान)में प्रविष्ट हुई.कालांतर में यहाँ के प्रवासी आर्य,अ-सुर (सूरा न पीने के कारन)कहलाये.दुर्गम मार्ग की कठिनाइयों के कारन इनका अपनी मात्रभूमि आर्यावर्त से संचार –संपर्क टूट सा गया,यही हाल धुर-पशिम-जर्मनी आदि में गए प्रवासी आर्यों का हुआ.एतदर्थ प्रभुसत्ता को लेकर निकत्वर्ती प्रवासी-अ-सुर आर्यों से गंगा-सिन्धु के मूल आर्यों का दीर्घकालीन भीषण देवासुर संग्राम हुआ.हिन्दुकुश से सिन्धु तक भारतीय आर्यों के नेत्रत्व एक कुशल सेनानी इंद्र कर रहा था.यह विधुत शास्त्र का प्रकांड विद्वान और hydrojan बम का अविष्कारक था.इसके पास बर्फीली गैसें थीं.इसने युद्ध में सिन्धु-छेत्र में असुरों को परस्त किया,नदियों के बांध तोड़ दिए,निरीह गाँव में आग लगा दी और समस्त प्रदेश को पुरंदर (लूट) लिया.यद्यपि इस युद्ध में अंतिम विजय मूल भारतीय आर्यों की ही हुई और सभी प्रवासी(अ-सुर) आर्य परंग्मुख हुए.परन्तु सिन्धु घटी के आर्यों को भी भीषण नुकसान हुआ।

आर्यों ने दक्षिण और सुदूर दक्षिण पूर्व की अनार्य जातियों में भी संस्कृतिक प्रसार किया.आस्ट्रेलिया (मूल द्रविड़ प्रदेश)में जाने वाले संस्कृतिक दल का नेत्रत्व पुलस्त्य मुनि कर रहे थे.उन्होंने आस्ट्रेलिया में एक राज्य की स्थापना की (आस्ट्रेलिया की मूल जाती द्रविड़ उखड कर पशिम की और अग्रसर हुई तथा भारत के दक्षिणी -समुद्र तटीय निर्जन भाग पर बस गयी.समुद्र तटीय जाती होने के कारन ये-निषाद जल मार्ग से व्यापर करने लगे,पशिम के सिन्धी आर्यों से इनके घनिष्ठ व्यापारिक सम्बन्ध हो गए.) तथा लंका आदि द्वीपों से अच्छे व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित कर लिए उनकी मृत्यु के पश्चात् रजा बन्ने पर उन के पुत्र विश्र्व मुनि की गिद्ध दृष्टि लंका के वैभव की ओरे गयी.उसने लंका पर आक्रमण किया और रजा सोमाली को हराकर भगा दिया(सोमाली भागकर आस्ट्रेलिया के निकट एक द्वीप पोस्ट नेक्स्ट इन कोन्तिनुएद बे उसी के नाम पर सोमालिया कहलाता है.)इस साम्राज्यवादी लंकेश्वर के तीन पुत्र थे-कुबेर,रावण,और विभीषण -ये तीनों परस्पर सौतेले भाई थे.पिता की म्रत्यु के पश्चात् तीनों में गद्दी के लिए संघर्ष हुआ.अंत में रावण को सफलता मिली.(आर्यावर्त से परे दक्षिण के ये आर्य स्वयं को रक्षस – राक्षस आर्यावर्त और आर्य संस्कृति की रक्षा करने वाले ,कहते थे;परन्तु रावण मूल आर्यों की भांति सूरा न पीकर मदिरा का सेवन करता था इसिलए वह भी अ-सुर अथार्त सूरा न पीने वाला कहलाया)विभीषण ने धैर्य पूर्वक रावण की प्रभुसत्ता को स्वीकार किया तथा उस का विदेश मंत्री बना और कुबेर अपने पुष्पक विमान द्वारा भागकर आर्यावर्त चला आया.प्रयाग के भरद्वाज मुनि उसके नाना थे.उनकी सहायता से वेह स्वर्गलोक (वर्तमान हिमांचल प्रदेश) में एक राज्य स्थापित करने में सफल हुआ.किन्तु रावण ने चैन की साँस न ली,वह कुबेर के पीछे हाथ धो कर पढ़ गया था.उसने दक्षिण भारत पर आक्रमण किया अनेक छोटे छोटे राजाओं को परस्त करता हुआ वह राम को भेंट किया राम सेता.और लक्ष्मण को गनगा पर राज्य कि सीमा तक चोदने मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्य सुमंत विदेश मंत्री को भेजा गया अब राम के राष्ट्रीय कार्य कलापों का श्री गणेश हुआ सर्वप्रथम तो आर्यावर्त के प्रथम डिफेंस सन्तेरे प्रयाग.में भरद्वाज ऋषि के आश्रम पर राम ने उस राष्ट्रीय योजना का अध्ययन किया जिसके अनुसार उन्हें रावन.का वध करना था भरद्वाज,ऋषि,आदि १६ प्रमुख जनपद थे.कहा जाता है की एक बार रावण ईरान,कंधार आदि को जीतता हुआ पात्र राज्य वर्तमान गंधार प्रदेश(रावलपिंडी के निकट जो अब पाकिस्तान में है) तक पहुच गया.यही राज्य स्वर्गलोक (हिमाचल प्रदेश) अंतिम सीढ़ी (आर्य राज्य) था.किन्तु रावण इस सीढ़ी को बनवा (जीत) न सका.कैकेय राज्य को सभी शक्तिशाली राज्यों से सहायता मिल रही थी.उधर का के प्रवासी अ-सुर आर्यों से आर्यावर्त के आर्यों का वनवास चल ही रहा था राम रावण को उनका समर्थन प्राप्त कर सहज और स्वाभाविक था.अतः दे भू पर ही खूब जम कर देवासुर संग्राम हुआ.इस संघर्ष में कोशल नरेश दशरथ ने अमित योग दिया.उन्हीं का सीम शौर्य पराक्रम से किका राज्य की स्वतंत्रता मोहर रही और अंतिम को वापस लौटना पड़ा जिसका उसे म्रत्यु पर्यंत खेद राज्य वरदानों में आस्तःगित अवसर पर प्रथम तो भारत के लिए राज्य व द्वितीय राम के लिए;को १४ वर्ष कि अवधि के लिए दिलाने के लिए भड़काया जिसमे उन्हें सफलता मिल कैकयी इसप्रकार दशरथ कि मौन स्वीक्रति दिलाकर।

बस यहीं से रावण के वध के निमित्त योजना तैयार की जाने लगी.कुबेर के नाना भरद्वाज ऋषि ने आर्यावर्त के समस्त ऋषियों की एक आपातकालीन बैठक प्रयाग में बुलाई.दशरथ के प्रधान मंत्र वशिष्ठ मुनि भी विशेष आमंत्रण से इस सभा में भाग लेने गए थे.ऋषियों ने एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया जिसके अनुसार जो दशरथ का प्रथम पुत्र उत्पन्न हो उसका नामकरण ‘राम’हो तथा उसे राष्ट्र रक्षा के लिए १४ वर्ष का वनवास करके रावण के साम्राज्यवादी इरादों को नेस्तनाबूत करना था.इस योजना को आदि कवी वाल्मीकि ने जो इस सभा राम के विवाह,के दो वर्ष पश्चात् प्रधानमंत्री वशिष्ठ ने दरबार.संसद में रजा को उनकी वृद्धावस्था का आभास कराया और राम को उत्तराधिकार सौपकर अवकाश प्राप्त करने कि ओरे संकेत दिया रजा ने संसद के इस प्रस्ताव ग्रहण स्वागत.किया सहर्ष ही दो दिवस कि अल्पावधि में पद त्याग करने कि घोषणा कि एक ओरे तो राम के.राज्याभिषेक शपथ ग्रहण समारोह कि जोर शोरे.से तैय्यारियाँ आरंभ हो गयीं तो दूसरी (ओरे-प्रधान-मंत्र)ने राम को सत्ता से प्रथक रखने कि साजिश शुरू कि मंत्र को माध्यम बना कर।

सौभाग्यवश दशरथ के चार पुत्र हुए जिनके नाम क्रमशः राम,भारत,लक्ष्मण,शत्रुहन ऋषियों की योजना के अनुरूप ही वशिष्ठ ने रखे.राम और लक्ष्मण को कुछ बड़े होने पर युद्ध,दर्शन,और राष्ट्रवादी धार्मिकता की की दीक्षा देन एके लिए विश्वामित्र अपने आश्रम ले गए.उन्होंने राम को उन के निमित्त तैयार ऋषियों की राष्ट्रिय योजना का परिज्ञान कराया तथा युद्ध एवं दर्शन की शिक्षा दी.आर्यावर्त की यौर्वात्य और पाश्चात्य दो महान शक्तियों में चली आरही कुल्गत शत्रुता का अंत करने के उद्देश्य से विश्वमित्र राम और लक्ष्मण को अपने साथ जनक की पुत्री sita के स्वयंवर में मिथिला ले गए.उन्होंने राम को ऋषि योज्नानुकूल जनक का धनुष तोड़ेने की प्रतिज्ञ का परिज्ञान कराकर उसे तोड़ेने की तकनिकी कला समझा दी.इस प्रकार राम-सीता के विवाह द्वारासमास्त आर्यावर्त एकता के सूत्र में आबद्ध हो गया।

To be continued in next post…………………………………………

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s