जीवेम शरदः शतम

यजुर्वेद क़े अध्य्याय ३६ क़े मन्त्र २४ में कहा गया है-
ओ ३ म तच्चक्षु…………..पश्येम शरदः शतम जीवेम शरदः शतम ………..भूयश्च शरदः शातात..

एक विद्वान द्वारा किया भावानुवाद इस प्रकार है-

हों आँखों की आँख पिताजी,
देवों क़े महादेव अनादि.
महिमा देखें सौ वर्ष तक ,
सुनें कीर्तन सौ वर्ष तक.
 सुख से जीवें सौ वर्ष तक,
ध्यावें ईश्वर सौ वर्ष तक.
प्रेमलीन हों सौ वर्ष तक,
स्वाधीन हों सौ वर्ष तक.
सौ वर्ष से ज्यादा जीवें,
ओ ३ म नाम रस अमृत पीवें..

आचार्य  हजारी  प्रसाद दिवेदी ने भी इसी शीर्षक से एक निबन्ध लिखा है जो हमने हाई स्कूल में पढ़ा था. उन्होंने बताया है कि,पहले लोग रोजाना यह प्रार्थना करते थे और सुखी थे.अब जब से लोगों ने इसे छोड़ा है ,सुख ने भी उन्हें छोड़ा है.
आज इस शीर्षक क़े अंतर्गत हम आपको नित्य प्रयोग में आने वाले भोजन क़े मसाले और अनाज आदि क़े बारे में बताना चाहते हैं जो जटिल व असाध्य रोगों का इलाज करने में सक्षम हैं.वर्ष २०११ में आप सबके उत्तम स्वास्थ्य और मंगल की कामना करते हुए पेश है -” भारतीय मसलों क़े निराले नुस्खों का चमत्कार” .आप भी  आजमा कर देख सकते और लाभ उठा सकते हैं.:-

ह्रदय रोग में-गेहूं की भूसी को अर्जुन की छाल क़े साथ बराबर की मात्रा में चूर्ण बनाकर घी में भून लें,फिर इस मात्रा का तीन गुना शहद मिला कर रख लें.यह अवलेह छै ग्रामसे दस ग्रा.की मात्रा तक गाय क़े दूध में सेवन करें और भयंकर से भयंकर ह्रदय रोग को दूर भगा कर निश्चिन्त हो जाएँ.

दुबलेपन में-प्रातः सायं तीन-तीन ग्रा.हल्दी क़े चूर्ण को गोदुग्ध क़े साथ सेवन करने से शरीर मोटा हो जाता है.

ताकत क़े लिये -पचास ग्रा.चने की दाल को १०० ग्रा.दूध में रात्रि को भिगो दें.प्रातः काल इस फूली हुई दाल को चबा-चबा कर खाएं,उसके साथ किशमिश या गुड का प्रयोग करें.कम से कम चालीस दिन प्रयोग करने से ताकत बढ़ती है.

नकसीर में-छै ग्रा.फिटकरी को ५० ग्रा.पानी में घोल कर नाक में टपकायें अथवा रुई का फाहा तः करके नाक में लगा दें.इसी पानी में कपडा तः करके माथे पर रखें,नकसीर तुरन्त बन्द हो जायेगी.

नशा-नाशक -आंवले क़े पत्ते १०० ग्रा.लेकर ४०० ग्रा.पानी में ठंडाई की भांति पीस कर पिलाने से अफीम तक का विष दूर हो जाता है.

निमोनिया में-अदरक अथवा तुलसी क़े पत्तों का रस ६ ग्रा.,शहद ६ ग्रा.दोनों को मिलाकर दिन में दो-तीन बार दें.इस प्रयोग से बिना किसी इंजेक्शन प्रयोग क़े खांसी,बलगम,दर्द आदि ठीक हो जाते हैं.

पथरी में-पेठे क़े १०० ग्रा.रस में भवछार(जवाखार)३ ग्रा.तथा पुराना गुड २ ग्रा.मिलाकर पिलाने से कुछ ही दिन में हर प्रकार की पथरी नष्ट हो जाती है.

बदहजमी में-खाने का सोडा ,सोंठ ,काली मिर्च,छोटी पीपल और नौसादर समान मात्रा में लेकर कूट-पीस कर चूर्ण बना लें.डेढ़ ग्रा.दावा दिन में तीन बार पानी से खिलाएं.बदहजमी समाप्त होगी.

बाल काले करना-सूखे हुए आंवले को बारीक पीस लें,फिर नींबू का रस डालकर पीसें.इसे सिर में लगा दें.जब सूख जाये तो सिर को पानी से ढो लें.धन रखें सिर को दही से बिलकुल न धोयें.नारियल का तेल सिर में लगायें.बालों की सफेदी दूर होकर बाल काले,मुलायम और चमकदार हो जाते हैं.

कुत्ता काटने पर-देसी साबुन और शहद दोनों को समान मात्रा में मिलाकर इतना रगड़ें कि,मरहम बन जाये.इसे कुत्ते क़े काटे हुए घाव पर लगायें तत्काल फायदा होगा.

गंजापन दूर करें-पत्ता गोभी क़े रस को लगातार सिर पर मालिश करें तो गंजापन ,बाल ज्घरना,बाल गिरना आदि रोग दूर हो जाते हैं.

सांप का विष उतारें-सांप द्वारा काटने पर एक घंटे क़े भीतर नीला थोथा (तूतिया)लें और तवे पर भून कर मुनक्का में रख कर निगलवा दें तो सांप का विष समाप्त होगा.

हिचकी में-कलौंजी (मगरैला) का चूर्ण ३ ग्रा. लेकर १० ग्रा. ताज़ा मक्खन में मिलाकर खिलने से हिचकी दूर हो जाती है.
मलेरिया – बुखार में-१० ग्रा. दालचीनी का चूर्ण लें उसमें ढाई ग्रा. आक का दूध मिलाकर खुश्क करें.रोगी को एक ग्रेन (आधी रत्ती )दावा पानी क़े साथ दें.यह दावा कुनैन से ज्यादा प्रभाव कारी है.

दस्त में -सौंफ और सफ़ेद जीरा समान मात्रा में लें और तवे पर भून लें.फिर बारीक पीस कर ३ -३  ग्रा.दिन में दो -तीन बार तजा पानी से खिलाएं.यह सरल ,सस्ता और चमत्कारी इलाज है.

उल्टी में-नींबू पर नामक और काली मिर्च लगा कर चूसने से उल्टी में लाभ होता है.
                            
 राम-बाण  औषद्धि

साफ़ सिल-बट्टा लें,जिस पर मसाला न पीसा गया हो.इस पर २५ से ५० तक तुलसी क़े पत्ते खरल कर लें.ऐसे पिसे हुए पत्ते ६ से १० ग्रा. तक लें और ताजा दही अथवा शहद में मिलाकर खिलावें (दूध में भूल कर भी न दें ).यह दवा  प्रातः निराहार एक ही बार लें और तीन -चार मांस तक सेवन करें तो गठिया का दर्द,खांसी,सर्दी,जुकाम,गुर्दे की बीम्मारी,गुर्दे का काम न करना,गुर्दे की पथरी,सफ़ेद दाग का कोढ़,शरीर का मोटापा,वृधावस्था की दुर्बलता,पेचिश,अम्लता,मन्दाग्नि,कब्ज,गैस,दिमागी कमजोरी,याद -दाश्त में कमी,पुराने से पुराना सिर-दर्द,हाई एवं लो ब्लड-प्रेशर,हृदयरोग,शरीर की झुर्रियां,बिवाई और श्वास रोग दूर हो जाते हैं.विटामिन ,’ए’और ‘सी’की कमी दूर होती है,रुका हुआ रक्तस्त्राव ठीक हो जाता है,आँख आने और दुखने तथा खसरा निवारण में यह राम-बाण औषद्धि है.
उपरोक्त नुस्खे आयुर्वेदिक पद्धति क़े अनुसार हैं तथा प्रत्येक घर-परिवार में उपलब्ध अन्न व मसलों पर आधारित हैं.इनका कोई साइड-इफेक्ट या रिएक्शन नहीं होता है.आपके व आपके सम्पूर्ण परिवार क़े लिये मंगल-कामनाओं क़े साथ इन्हें प्रस्तुत किया गया है.
                     
नव-वर्ष मुबारक हो,यह वर्ष आप को सपरिवार दीर्घायुष्य,उत्तम-स्वास्थ्य एवं उज्जवल संभावनाएं प्रदान करें.

(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

विशेष:-

१  वर्ष की समीक्षा और किसी को अच्छा या बुरा बताने वाले कई ब्लाग्स पढने को मिले.ऐसा करने वालों ने किस अधिकार या हैसियत से ऐसा किया यह तो वे ही जानें.हमें ऐसा कोई अधिकार प्राप्त नहीं है,परन्तु जितने ब्लाग्स हम फालो करते हैं,जितने हमारी फेवरिट लिस्ट में हैं,उनमें से जो हमें प्रेरित करते हैं और जिन ब्लागर्स ने जन -हित में ही अधिकांश लिखा है उनका उल्लेख तो हम भी कर ही सकते हैं और इनमें डा.टी.एस.दराल सा :,सलिल वर्माजी(चला ..ब्लागर वाले),विजय कुमार वर्माजी का नाम पूर्ण सम्मान क़े साथ दर्ज करते हैं.

टाइप समन्वय -यशवन्त माथुर

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तुम चाहो तो ……

[श्रीमती पूनम माथुर,द्वारा]

तुम चाहो तो,घृणा को प्यार में बदल दो.
तुम चाहो तो,दुःख को खुशी में बदल दो..
तुम चाहो तो,वीराने को बहार  में बदल दो.
तुम चाहो तो,पतझड़ को बसंत में बदल दो..
तुम चाहो तो,हैवान को इन्सान में बदल दो.
तुम चाहो तो, गरीबी को अमीरी में बदल दो..
तुम चाहो तो,मौत को ज़िंदगी में बदल दो.
तुम चाहो तो,अन्धकार को प्रकाश में बदल दो.
तुम चाहो तो,अज्ञानी को ज्ञानी में बदल दो…

नोट:-यह कविता प्रथम बार ब्रह्मपुत्र समाचार,आगरा क़े २२जन्वरी ०४ _०४ फरवरी २००४ ,अंक में प्रकाशित हुई थी.आज की परिस्थितियों में भी इन्सान की ताकत का एहसास कराती इस कविता को पुनः प्रकाशित करना उचित लगा.

(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

ॐ नमः शिवाय च

“ॐ नमः शिवाय च का अर्थ है-Salutation To That Lord The Benefactor of all “यह कथन है संत श्याम जी पराशर का.अर्थात हम अपनी मातृ -भूमि भारत को नमन करते हैं.वस्तुतः यदि हम भारत का मान-चित्र और शंकर जी का चित्र एक साथ रख कर तुलना करें तो उन महान संत क़े विचारों को ठीक से समझ सकते हैं.शंकर या शिव जी क़े माथे पर अर्ध-चंद्राकार हिमाच्छादित हिमालय पर्वत ही तो है.जटा से निकलती हुई गंगा -तिब्बत स्थित (अब चीन क़े कब्जे में)मानसरोवर झील से गंगा जी क़े उदगम की ही निशानी बता रही है.नंदी(बैल)की सवारी इस बात की ओर इशारा है कि,हमारा भारत एक कृषि -प्रधान देश है.क्योंकि ,आज ट्रेक्टर-युग में भी बैल ही सर्वत्र हल जोतने का मुख्य आधार है.शिव द्वारा सिंह-चर्म को धारण करना संकेत करता है कि,भारत वीर-बांकुरों का देश है.शिव क़े आभूषण(परस्पर विरोधी जीव)यह दर्शाते हैंकि,भारत “विविधताओं में एकता वाला देश है.”यहाँ संसार में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी है तो संसार का सर्वाधिक रेगिस्तानी इलाका थार का मरुस्थल भी है.विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं तो पोशाकों में भी विविधता है.बंगाल में धोती-कुर्ता व धोती ब्लाउज का चलन है तो पंजाब में सलवार -कुर्ता व कुर्ता-पायजामा पहना जाता है.तमिलनाडु व केरल में तहमद प्रचलित है तो आदिवासी क्षेत्रों में पुरुष व महिला मात्र गोपनीय अंगों को ही ढकते हैं.पश्चिम और उत्तर भारत में गेहूं अधिक पाया जाता है तो पूर्व व दक्षिण भारत में चावल का भात खाया जाता है.विभिन्न प्रकार क़े शिव जी क़े गण इस बात का द्योतक हैं कि, यहाँ विभिन्न मत-मतान्तर क़े अनुयायी सुगमता पूर्वक रहते हैं.शिव जी की अर्धांगिनी -पार्वती जी हमारे देश भारत की संस्कृति (Culture )ही तो है.भारतीय संस्कृति में विविधता व अनेकता तो है परन्तु साथ ही साथ वह कुछ  मौलिक सूत्रों द्वारा एकता में भी आबद्ध हैं.हमारे यहाँ धर्म की अवधारणा-धारण करने योग्य से है.हमारे देश में धर्म का प्रवर्तन किसी महापुरुष विशेष द्वारा नहीं हुआ है जिस प्रकार इस्लाम क़े प्रवर्तक हजरत मोहम्मद व ईसाईयत क़े प्रवर्तक ईसा मसीह थे.हमारे यहाँ राम अथवा कृष्ण धर्म क़े प्रवर्तक नहीं बल्कि धर्म की ही उपज थे.राम और कृष्ण क़े रूप में मोक्ष -प्राप्त आत्माओं का अवतरण धर्म की रक्षा हेतु ही,बुराइयों पर प्रहार करने क़े लिये हुआ था.उन्होंने कोई व्यक्तिगत धर्म नहीं प्रतिपादित किया था.आज जिन मतों को विभिन्न धर्म क़े नाम से पुकारा जा रहा है ;वास्तव में वे भिन्न-भिन्न उपासना-पद्धतियाँ हैं न कि,कोई धर्म अलग से हैं.लेकिन आप देखते हैं कि,लोग धर्म क़े नाम पर भी विद्वेष फैलाने में कामयाब हो जाते हैं.ऐसे लोग अपने महापुरुषों क़े आदर्शों को सहज ही भुला देते हैं.आचार्य श्री राम शर्मा गायत्री परिवार क़े संस्थापक थे और उन्होंने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था -“उन्हें मत सराहो जिनने अनीति पूर्वक सफलता पायी और संपत्ति कमाई.”लेकिन हम देखते हैं कि,आज उन्हीं क़े परिवार में उनके पुत्र व दामाद इसी संपत्ति क़े कारण आमने सामने टकरा रहे हैं.गायत्री परिवार में दो प्रबंध समितियां बन गई हैं.अनुयायी भी उन दोनों क़े मध्य बंट गये हैं.कहाँ गई भक्ति?“भक्ति”शब्द ढाई अक्षरों क़े मेल से बना है.”भ “अर्थात भजन .कर्म दो प्रकार क़े होते हैं -सकाम और निष्काम,इनमे से निष्काम कर्म का (आधा क) और त्याग हेतु “ति” लेकर “भक्ति”होती है.आज भक्ति है कहाँ?महर्षि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना धर्म में प्रविष्ट कुरीतियों को समाप्त करने हेतु ही एक आन्दोलन क़े रूप में की थी.नारी शिक्षा,विधवा-पुनर्विवाह ,जातीय विषमता की समाप्ति की दिशा में महर्षि दयानंद क़े योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता.आज उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज में क्या हो रहा है-गुटबाजी -प्रतिद्वंदिता .


काफी अरसा पूर्व आगरा में आर्य समाज क़े वार्षिक निर्वाचन में गोलियां खुल कर चलीं थीं.यह कौन सी अहिंसा है?जिस पर स्वामी जी ने सर्वाधिक बल दिया था. स्वभाविक है कि, यह सब नीति-नियमों की अवहेलना का ही परिणाम है,जबकि आर्य समाज में प्रत्येक कार्यक्रम क़े समापन पर शांति-पाठ का विधान है.यह शांति-पाठ यह प्रेरणा देता है कि, जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में विभिन्न तारागण एक नियम क़े तहत अपनी अपनी कक्षा (Orbits ) में चलते हैं उसी प्रकार यह संसार भी जियो और जीने दो क़े सिद्धांत पर चले.परन्तु एरवा कटरा में गुरुकुल चलाने  वाले एक शास्त्री जी ने रेलवे क़े भ्रष्टतम व्यक्ति जो एक शाखा क़े आर्य समाज का प्रधान भी रह चुका था क़े भ्रष्टतम सहयोगी क़े धन क़े बल पर एक ईमानदार कार्यकर्ता पर प्रहार किया एवं सहयोग दिया पुजारी व पदाधिकारियों ने तो क्या कहा जाये कि, आज सत्यार्थ-प्रकाश क़े अनुयायी ही सत्य का गला घोंट कर ईमानदारी का दण्ड देने लगे हैं.यह सब धर्म नहीं है.परन्तु जन-समाज ऐसे लोगों को बड़ा धार्मिक मान कर उनका जय-जयकारा करता है.आज जो लोगों को उलटे उस्तरे से मूढ़ ले जाये उसे ही मान-सम्मान मिलता है.ऐसे ही लोग धर्म व राजनीति क़े अगुआ बन जाते हैं.ग्रेषम का अर्थशास्त्र में एक सिद्धांत है कि,ख़राब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है.ठीक यही हाल समाज,धर्म व राजनीति क़े क्षेत्र में चल रहा है.

दुनिया लूटो,मक्कर से.
रोटी खाओ,घी-शक्कर से.
   एवं
अब सच्चे साधक धक्के खाते हैं .
फरेबी आज मजे-मौज  उड़ाते हैं.

आज बड़े विद्वान,ज्ञानी और मान्यजन लोगों को जागरूक होने नहीं देना चाहते,स्वजाति बंधुओं की उदर-पूर्ती की खातिर नियमों की गलत व्याख्या प्रस्तुत कर देते हैं.राम द्वारा शिव -लिंग की पूजा किया जाना बता कर मिथ्या सिद्ध करना चाहते हैं कि, राम क़े युग में मूर्ती-पूजा थी और राम खुद मूर्ती-पूजक थे. वे यह नहीं बताना चाहते कि राम की शिव पूजा का तात्पर्य भारत -भू की पूजा था. वे यह भी नहीं बताना चाहते कि, शिव परमात्मा क़े उस स्वरूप को कहते हैं कि, जो ज्ञान -विज्ञान का दाता और शीघ्र प्रसन्न होने वाला है. ब्रह्माण्ड में चल रहे अगणित तारा-मंडलों को यदि मानव शरीर क़े रूप में कल्पित करें तो हमारी पृथ्वी का स्थान वहां आता है जहाँ मानव शरीर में लिंग होता है.यही कारण है कि, हम पृथ्वी -वासी शिव का स्मरण लिंग रूप में करते हैं और यही राम ने समझाया भी होगा न कि, स्वंय ही  लिंग बना कर पूजा की होगी. स्मरण करने को कंठस्थ करना कहते हैं न कि, उदरस्थ करना.परन्तु ऐसा ही समझाया जा रहा है और दूसरे विद्वजनों से अपार प्रशंसा भी प्राप्त की जा रही है. यही कारण है भारत क़े गारत होने का.


जैसे सरबाईना और सेरिडोन क़े विज्ञापनों में अमीन सायानी और हरीश भीमानी जोर लगते है अपने-अपने उत्पाद की बिक्री का वैसे ही उस समय जब इस्लाम क़े प्रचार में कहा गया कि हजरत सा: ने चाँद क़े दो टुकड़े  कर दिए तो जवाब आया कि, हमारे भी हनुमान ने मात्र ५ वर्ष की अवस्था में सूर्य को निगल लिया था अतः हमारा दृष्टिकोण श्रेष्ठ है. परन्तु दुःख और अफ़सोस की बात है कि, सच्चाई साफ़ करने क़े बजाये ढोंग को वैज्ञानिकता का जामा ओढाया जा रहा है.


यदि हम अपने देश  व समाज को पिछड़ेपन से निकाल कर ,अपने खोये हुए गौरव को पुनः पाना चाहते हैं,सोने की चिड़िया क़े नाम से पुकारे जाने वाले देश से गरीबी को मिटाना चाहते हैं,भूख और अशिक्षा को हटाना चाहते हैंतो हमें “ॐ नमः शिवाय च “क़े अर्थ को ठीक से समझना ,मानना और उस पर चलना होगा तभी हम अपने देश को “सत्यम,शिवम्,सुन्दरम”बना सकते हैं.आज की युवा पीढी ही इस कार्य को करने में सक्षम हो सकती है.अतः युवा -वर्ग का आह्वान है कि, वह सत्य-न्याय-नियम और नीति पर चलने का संकल्प ले और इसके विपरीत आचरण करने वालों को सामजिक उपेक्षा का सामना करने पर बाध्य कर दे तभी हम अपने भारत का भविष्य उज्जवल बना सकते हैं.काश ऐसा हो सकेगा?हम ऐसी आशा तो संजो ही सकते हैं.

(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

Clinging to Delusion in Soltitude

                                                            [By Shaily Sahay]
Some where in the midst of Darkness
I was lost
Alone Alone in the mob
Howling and Shouting for  existence and
attention 
My prayers and pleas echoed in that 
Big      arena,
Lost,unheared,unnoticed   and   ignored 
in   Vioelence,
Apparently, in  that feggy  season 
 Some  one unknown,held my  hands 
Which  were  stuiched  out  for  help
 we  sailed  through   the   crowd,
Some where, Some where   away  from  that
lost  world
My  angel led  me   to  the  door  from
where  brightness  of  light  piered
My  eyes ,slowly it  enlightened
My dreams,   I started living  my
dreams, trying to  make  there  true
Approaching     with   passion  and
leest   towards  the  door ,     I wished
to  cross  it  , before  ,before  …..
I   was  bowed    down
Alas  !  The Angel  was  lost ,the  door
was  closed   for ever   and   ever .
Emptiness  gazed, Silence  prevailed
every  where ,
I  ,I   was  sturned  and  lost  again ,
I  am  lost  till   now  ,
Clinging  to  the  delusion  that  the
angel   will   come   again…….
(शैली अपनी बुआ श्रीमती पूनम माथुर क़े साथ)

(इस कविता की हस्तलिखित प्रति जो शैली ने पूनम को भेंट की थी )

शैली सहाय (सुपुत्री श्री राजीव रंजन सहाय एवं श्रीमती सविता सिन्हा) मेरी पत्नी की  बड़ी  भतीजी है जो अब तो Mass  Comunication क़े द्वितीय वर्ष में है,परन्तु उसने यह कविता उस समय सन २००८ ई.में लिखी थी जब इन्टर मीडीएट की छात्रा थी. वस्तुतः उसके यहाँ बर्तन मांजने वाली की बेटी को धर्माचार्य जी क़े आश्रम द्वारा संचालित पटना क़े स्कूल में फ्री शिक्षा हेतु कम्पटीशन में सफल रहने क़े बावजूद वायदे क़े अनुसार एडमीशन न मिलने पर शैली क़े मस्तिष्क पर जो प्रभाव पड़ा;उसी की प्रतिक्रिया की अभिव्यक्ति है यह कविता.

आज क्रिसमस क़े अवसर पर जब सान्ताक्लाज़ द्वारा गरीब बच्चों को उपहार देने की चर्चा होगी तो हमारे देश क़े पूज्य धर्माचार्य जी का चरित्र -चित्रण करती यह कविता पुनः प्रकाशित करना मैंने अपना कर्त्तव्य समझा.इससे पूर्व इसी कविता को “जो मेरा मन कहे” पर यशवन्त द्वारा भी प्रकाशित किया गया था.
क्या इनकम टैक्स की बचत हेतु धर्माचार्यों को धन देने वालों  द्वारा उनके इस आचरण की ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है अथवा नहीं ?

(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

परमात्मा क़े विराट स्वरूप क़े दर्शन करें

२५ दिसंबर को ईसामसीह का जन्म दिन मनाया जाता है.महात्मा ईसा ने हिमालय पर आकर गहन अध्ययन करने क़े उपरांत ही उस देश-काल क़े अनुसार प्रवचन दिए हैं.पूरी की पूरी बाईबल “टेन सरमन आन द माउनट्स” का ही विस्तार है.ये हमारे ५ यम और ५ नियम का ही रूपांतरण हैं.

(अमर बलिदानी स्वामी श्रद्धानंद)

आज २३ दिसंबर को स्वामी श्रद्धानंद जी का बलिदान दिवस है.स्वामी दयानंद जी क़े बाद स्वामी श्रद्धानंद जी ही थे जिन्होंने पूरी दक्षता एवं क्षमता से उनके सिद्धांतों को प्रचारित -प्रसिरित किया.उन्होंने भारत में फिर से गुरुकुलों की स्थापना की. कांगड़ी में स्थापित प्रथम गुरुकुल में उन्होंने अपने पुत्र-पुत्री को भेज कर एक दृष्टान्त उपस्थित किया.वह कायस्थ परिवार से थे तथा पुलिस अधिकारी भी रह चुके थे .उस नौकरी को छोड़ कर आर्य समाज और स्वाधीनता आन्दोलन में उन्होंने अग्रणी भूमिका निभायी.उन्होंने साम्प्रदायिक -एकता की भी मिसाल कायम की. वह पहले गैर मुस्लिम थे जिसने दिल्ली की जामा मस्जिद से वेद मन्त्रों का सफल पाठ किया था.यह ब्रिटिश सरकार को नागवार गुजरा तथा एक पुलिस दरोगा( जिसका सम्बन्ध इस्लाम से था )को मोहरा बना कर स्वामी श्रधानंद की निर्मम हत्या करा दी.आज उनके बलिदान-दिवस पर उनके बताये मार्ग का दिग्दर्शन इस पोस्ट में करने का प्रयास कर रहे हैं.

यहाँ हम अथर्व वेद क़े आधार पर परमात्मा क़े विराट स्वरूप पर प्रकाश डालना चाहते हैं,जिन  तथ्यों का उल्लेख आप को बाईबल में भी अपने तरीके से मिल जायेगा.हमारी यह पृथ्वी परमात्मा क़े चरण हैं,सूर्य और चन्द्र परमात्मा की आँखें हैं,अंतरिक्ष परमात्मा का उदर है,द्विलोक परमात्मा का मस्तिष्क है और अग्नि परमात्मा का मुख है.सर्वत्र व्याप्त वायु परमात्मा का प्राण है.लेकिन आप ऐसे परमात्मा का चित्र या मूर्ती नहीं बना सकते-न वह कभी नस -नाडी क़े बंधन में बंधता है और न ही अवतरित होता है क्योंकि पृथ्वी तो उसका चरण है ही.वह तो ब्रह्माण्ड में स्थित है तथा वहीं से सम्पूर्ण सृष्टी का सञ्चालन कर रहा है.हमारे मनुष्य शरीर में भी मस्तिष्क द्विलोक है,आँखों का प्रत्यक्ष सम्बन्ध सूर्य क़े प्रकाश से है.यदि सूर्य का प्रकाश न मिले तो मनुष्य की आँखें काम नहीं कर सकतीं.चंद्रमा मानव मस्तिष्क का प्रमुख सूत्रधार है.इसका प्रमाण हमारे ज्योतिष विज्ञान से मिलता है.ज्योतिष में हम चंद्रमा की गति से ही जन्मांग बनाते हैं,राशिफल निकालते हैं और पाखंडियों की कुधारणा क़े विपरीत परमात्मा क़े जिस विराट स्वरूप की व्याख्या करते हैं वह सर्वथा ज्योतिष-सम्मत है.आर्य समाज समेत जिन मतों क़े प्रचारक ज्योतिष की आलोचना करते हैं उन्हें सबक मिलता है- महर्षि दयानंद की श्रेष्ठ पुस्तक ‘संस्कार विधि’से जिसमें उन्हों ने प्रत्येक तिथि और उस तिथि के देवता हेतु आहुतियाँ देने का विधान बताया है.नक्षत्रों और उनके देवता हेतु भी आहुतियाँ देने का विधान है.महर्षि द्वारा बताई तिथियों एवं नक्षत्रों की गणना केवल और केवल ज्योतिष -विज्ञान द्वारा ही संभव है.संसार में प्रचलित कोई भी अन्य पूजा-पद्धति परमात्मा तक लगाया गया भोग पहुँचाने में समर्थ नहीं है.केवल और केवल हवन(यज्ञ) ही वह वैज्ञानिक पद्धति है जिसमें दी गई आहुतियाँ अग्नि (अर्थात परमात्मा का मुख)द्वारा सम्पूर्ण अंतरिक्ष व ब्रहमांड में फ़ैल कर सभी ग्रह-नक्षत्रों और देवताओं तक पहुंचतीं हैं.चूंकि परमात्मा क़े चरण ही यह धरती है और हमारे चरण सदा धरती पर ही टिके रहते हैं -इस प्रकार परमात्मा क़े चरणों में ही हमारा अस्तित्व टिका है.हम जब नींद या विश्राम क़े लिए लेटते हैं हमारा मस्तिष्क अदा हो जाता है और तब उसका सम्बन्ध परमात्मा क़े द्विलोक से विच्छेद हो जाता है.इसलिए पढने और साधना करने क़े लिए बैठने का विधान है ताकि हमारे मस्तिष्क का सम्बन्ध परमात्मा क़े मस्तिष्क से बना रहे और हम अधिकत्तम ज्ञानार्जन कर सकें.डा.लोग (चिकित्सक गण )भी बैठ कर पढने को ही उचित बताते हैं.

खेद एवं नितांत वेदना की बात है कि,मनुष्य ने व्यर्थ स्वार्थवश पहाड़ों को काट डाला,वनों को उजाड़ दिया और विश्व क़े पर्यावरण क़े संतुलन को बिगाड़ दिया है.चंद अमीरों क़े प्रासादों को संगमरमर से धवल करने हेतु,उनके  ड्राईंग -रूमों की शोभा बढ़ने हेतु सोफासेट व बेड निर्माण हेतु पर्वतों व वनों को नेस्तनाबूद कर दिया गया है.(अफ़सोस है कि,आगरा से आने पर मजबूरी में हमें जो मकान खरीदना पड़ा वह ऐसे संगमरमरी फर्श का ही है,जिसमें हम असहज महसूस करते हैं).यह पृथ्वी केवल मनुष्यों क़े आज क़े उपभोग क़े लिए ही नहीं है.यह प्राणी -मात्र क़े लिए है और हमारी आने वाली संतानों क़े भोग क़े लिए भी है.आज चंद मनुष्यों क़े सतही सुख क़े लिए पर्यावरण से की गई छेड़-छाड़ आने वाली पीढ़ियों को दंश देती रहेगी और हमारी आत्माएँ इस पाप का फल भोगती रहेंगीं.

तुलसी,पीपल और आंवला क़े वृक्ष दिन और रात आक्सीजन ही छोड़ते हैं जो प्राणी -मात्र क़े जीवन क़े लिए आवश्यक है;अतः प्रत्येक मनुष्य को इंका संरक्षण व संवर्धन करना चाहिए.इसी प्रकार हम आम की समिधा का प्रयोग हवन में करते हैं जो हमारे पूर्वजों द्वारा लगाये गये वृक्षों से हमें प्राप्त होती है ,अतः हमें भी आने वाली पीढ़ियों क़े प्रयोग हेतु समिधा प्रदान करने क़े वास्ते कम से कम जीवन में एक आम का पौधा अवश्य लगाना चाहिये ,अन्यथा हम यज्ञ -विध्वंस क़े भागीदार होकर उस पाप का फल भोगने को बाध्य होंगें.(हम आगरा का मकान छोड़ते समय ३ -४ आम क़े पौधे ,दर्जन भर या अधिक तुलसी क़े पौधे,नीम क़े ३ पौधे ,बेल-पत्र का एक फलदार -वृक्ष,फल लगे दो अनार क़े पेड़ ,फलदार ३ पपीते क़े पेड़  वहां छोड़ कर आये हैं ,परन्तु यहाँ मुट्ठी भर भी कच्ची जमीन न मिलने क़े कारण गमले में तुलसी व एलोवेरा ही रख सके हैं.)

यदि हमें मानवता की रक्षा करनी है तो हवन को दिनचर्या का अंग बनाना ही होगा तभी परमात्मा क़े प्राण-वायु की रक्षा होगी जो जो मानव सहित प्राणी-मात्र क़े जीवन का मूलाधार है.पृथ्वी की रक्षा करना हमारा प्रथम कर्त्तव्य है.इस वर्ष की चला-चली में आज स्वामी श्रधानंद जी क़े बलिदान दिवस पर उन्हें श्रधान्जली स्वरूप  – आने वाले वर्ष से वनों की रक्षा व हवन पद्धति अपनाने का संकल्प लिया जा सकता है.       

(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

श्रीराम की सफल कूट नीति

हाराज दशरथ क़े पुत्र मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम का आविर्भाव एक ऐसे समय में हुआ था जब भारत क़े आर्यावर्त और जम्बू द्वीप खंडों में विभिन्न छोटे छोटे राज्य परस्पर संघर्षरत थे और महा साम्राज्यवादी रावण सम्पूर्ण विश्व में एक छत्र वर्चस्व स्थापित करने को लालायित था.जैसाकि पाश्चात्य इतिहासकारों ने कुप्रचारित किया है कि रावण द्रविड़ संस्कृति का वाहक था वह सर्वथा गलत है.वस्तुतः रावण वेदों का प्रकांड पंडित और आर्य संस्कृति का ध्वजा वाहक था और प्रवासी आर्यों का सिरमौर भी इसलिए वह अपने को रक्षस कहता था.रक्ष धातु का अर्थ है रक्षा और रक्षस का अभिप्राय हुआ आर्य सभ्यता और संस्कृत की  रक्षा करने वाला.कालांतर में यही रक्षस अपभ्रंश होकर राक्षस कहा जाने लगा.त्रिवृष्टि(वर्तमान तिब्बत) से आर्ष-आर्य श्रेष्ठ संस्कृति का उद्भव व विकास हुआ और उत्तर भारत में विंध्यांचल तक क़े क्षेत्रों में फ़ैल गयी जिस कारण इस क्षेत्र को आर्यावर्त कहा जाने लगा.दक्षिण भारत का त्रिभुजाकार क्षेत्र जो जम्बू द्वीप कहलाता था समुद्र क़े पटाव से और प्राकृतिक परिवर्तनों क़े आधार पर आर्यावर्त से जुड़ गया और यहाँ भी आर्य संस्कृति का प्रचार एवं विकास हो गया.इस प्रकार सम्पूर्ण भारत को आर्य बनाने क़े बाद आर्य मनीषियों क़े प्रचारक दल विदेशो में भी आर्य सभ्यता और संस्कृति का प्रसार करने हेतु भेजे गये.कामरूप आसाम स्वर्ण देश (बर्मा या म्यांमार ) होते हुए साईबेरिया -अलास्का मार्ग से मय और तक्षक ऋषि क़े नेतृत्व में उत्तर पूर्व से एक दल गया.तक्षक ऋषि ने जहाँ पड़ाव डाला वह स्थान आज भी उनके नाम पर टेक्सास कहलाता है,यहीं पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जान ऍफ़.कैनेडी की ह्त्या की गयी थी. मय ऋषि अपने दल क़े साथ दक्षिण अमरीका क़े उस क्षेत्र में रुके जो आज भी मैक्सिको कहलाता है.पश्चिम क्षेत्र से गये ऋषियों का पहला पड़ाव  आर्यनगर ऐर्यान वर्तमान ईरान था.(ईरान का अपदस्थ शाह तक स्वयं को आर्यमेहर रजा पहलवी लिखा करता था.जो उसके पूर्वजों क़े आर्य होने का संकेत है.)यह दल मैसोपोटामिया (ईराक )होते हुए यूरोप में जर्मन तक पहुंचा.(एडोल्फ हिटलर तो स्वयं को शुद्ध आर्य कहा करता था और यूरोपीय इतिहासकारों ने मध्य एशिया अथवा जर्मन को ही आर्यों का उद्भव प्रदेश बता कर हमारे देश को विकृत इतिहास परोस दिया है) दक्षिण प्रदेश से पुलस्त्य मुनि क़े नेतृत्व में गया आर्य दल उस क्षेत्र में जा पहुंचा जो आज आस्ट्रेलिया कहलाता है.इनके पुत्र विश्र्वा मुनि में राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं जाग उठीं और उन्होंने वहां शासन स्थापित कर लिया.उनके तीन पुत्र थे-कुबेर,रावण,और विभीषण.रावण ने विभीषण को मिलाकर सत्ता पर अधिकार करके कुबेर को भगा दिया जो प्रयाग क़े भारद्वाज मुनि (जो उसके नाना थे)क़े पास पहुंचा.भारद्वाज मुनि ने कुबेर को स्वर्ग लोक  (वर्तमान हिमाचल प्रदेश) का शासक बना दिया.रावण ने व्यापारिक साम्राज्य फैलाते हुए वर्तमान लंका प्रदेश पर अधिकार कर लिया और सत्ता का केंद्र इसे ही बना दिया.(विश्व व्यापार हेतु यह क्षेत्र उत्तम सफलता का है और इसी कारण अमरीका ने डियागोगर्शिया में अपना सैन्य अड्डा कायाम किया है) यहाँ क़े शासक सोमाली को भगा दिया गया जो आस्ट्रेलया क़े पास पड़े उस निर्जन प्रदेश में बस गया जो अब उसी क़े नाम पर सोमाली लैंड कहा जाता है.छः माह क़े लम्बे संघर्ष क़े बाद रावण ने वानर-प्रदेश (आंध्र) क़े शासक बाली से यह फ्रेंडली एलायंस किया कि एक दूसरे पर आक्रमण होने की दशा में वे परस्पर सहयोग करेंगे और उसने दक्षिण भारत से हो कर सीढी बना कर स्वर्ग लोक (हिमाचल) पहुँचने का विचार त्याग दिया,अब रावण ने कुबेर को पकड़ने हेतु कांधार क्षेत्र से आर्यावर्त में घुसने का प्रयास किया और यहाँ भीषण देवासुर संग्राम चले.हमारे आर्य ऋषि मुनियों ने परस्पर संघर्षरत आर्य राज्यों क़े एकीकरण व सहयोग का बीड़ा उठाया और उसमे उन्हें सफलता भी मिली.अयोध्या क़े शासक दशरथ भी इस संग्राम में पहुंचे और कैकेय प्रदेश की राजकुमारी कैकयी से उनका विवाह सम्पन्न कराकर आर्य ऋषियों ने दो आर्य राज्यों को रिश्तों क़े सूत्र में बाँध दिया.जनक मिथिला क़े शासक थे और उनका भी दशरथ से शत्रुत्व था जिसे उनकी पुत्री सीता से दशरथ पुत्र राम का विवाह कराकर दूर किया गया.आर्यावर्त को एकीकरण क़े सूत्र में पिरोकर दक्षिण को भी मिलाने हेतु ऋषि योजना क़े अनुकूल राष्ट्रवादी कैकेयी क़े माध्यम से राम को वनवास दिलाया गया.इस वनवास काल का प्रयोग श्री राम ने जम्बू द्वीप क़े आर्यों को उत्तर भारत क़े आर्यावर्त से जोड़ने का कार्य किया.एक बाधा सिर्फ बाली की रह गयी जिसका रावण से पूर्व में ही फ्रेंडली एलायंस हो चुका था.श्री राम ने कूटनीति (DIPLOMACY) का सहारा ले कर बाली क़े भाई सुग्रीव को अपनी ओर मिलाया और छिपकर बाली का वध कर दिया.(यदि घोषित युद्ध होता तो रावण बाली की मदद को आ जाता और तब संघर्ष भारत भू पर ही होता).सुग्रीव को किष्किन्धा का शासक बना कर उसके विरूद्ध बाली पुत्र अंगद की संभावित बगावत को टालने हेतु बाली की विधवा तारामती (जो सुषेन वैद्य की पुत्री और विदुषी थी) से करा दिया जो की नियोग की वैदिक पद्दति क़े सर्वथा अनुकूल था और देवर से भाभी का विवाह कराकर श्री राम ने कोई अनर्थ नहीं किया था बल्कि आर्य संस्कृति का ही निर्वहन किया था.इसके बाद रावण क़े भाई विभीषण को श्री  हनुमान की मदद से मिलाकर और लंका की फ़ौज व खजाना ध्वस्त करने क़े बाद लंका पर चढ़ाई की.रावण क़े संहार क़े साथ साम्राज्यवाद का उन्मूलन किया और यहाँ भी विभीषण को सत्ता सौपने क़े उपरान्त रावण की विधवा मंदोदरी से विभीषण का विवाह नियोग पद्दति से करा दिया.श्री राम ने एक सफल कूटनीतिक प्रयोग करते  हुए भारत भूमि को साम्राज्यवाद क़े चंगुल से  भी मुक्ति दिलाई तथा सम्पूर्ण भारत का एकीकरण किया इसीलिए आज नौ लाख वर्षों बाद भी वह हमारे देश में पूजनीय हैं,वन्दनीय हैं,स्तुत्य हैं और उनका जीवन अनुकरणीय है.प्रत्येक राष्ट्रवादी को श्री राम का चरित्र अपनाना चाहिए.      

Typed by-Yashwant

(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

मानव क्या है ?

                             जब तक जियो ,मौज से जियो.
                            घी पियो,चाहे उधार लेके  पियो..

महर्षि चार्वाक का यह कथन आज क़े मानव ने शतशः अपना लिया है.चारों ओर एक -दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ मची हुई है.हर किसी का धर्म बन चुका है कि,-

                              दुनिया लूटो मक्कर से.
                              रोटी खाओ घी-शक्कर से..

क्या यही मानवता है ?मनुष्य होने का अर्थ क्या मौज -मस्ती ही है ? जी नहीं .यह न तो मानवता है और न ही मनुष्यत्व का यह धर्म है.वस्तुतः जैसा कि,गोस्वामी तुलसीदास जी ने राम चरित मानस में कहा भी है कि –“बड़ भाग मानुष तन पावा “ -यह मनुष्य जीवन आत्मा को यों ही नहीं मिल गया है,कुल -खानदान,माता -पिता और उनके जीन्स यों ही नहीं मिला करते हैं बल्कि पूर्वजन्मों क़े संचित शुभ कर्मों क़े आधार पर प्रारब्ध निर्माण हो कर ही यह मनुष्य शरीर मिला करता है.आत्मा स्वंय में चेतन होते हुए भी जड़ शरीर क़े बगैर कुछ नहीं कर सकता.आत्मा और शरीर का सम्बन्ध अन्धे और लंगड़े जैसा है ;एक क़े बगैर दूसरा कार्य नहीं कर सकता .मनुष्य जन्म मोक्ष का द्वार है,यदि  इसमें चूक गये तो फिर अनन्त योनियों क़े चक्र में पुनः फंसना पड़ेगा और कर्मों का भोग भोगना होगा.लेकिन आज मनुष्य तन पाकर लोग अहंकार में भरे पड़े हैं.येन -केन प्रकारेण   पद -पैसा -बुद्धि बटोर कर स्वंय को उच्च और दूसरों को तुच्छ समझने की एक अजीब मानसिकता बन चुकी है.जो लोग स्वंय को उच्च उठाने में नाकामयाब रह जाते हैं,दूसरों को गिराने की युक्तियाँ चलते रहते हैं और इनका सहयोग करते हैं -स्वार्थी पोंगापंथी तथाकथित ज्योतषी,पंडित आदि-आदि.क्योंकि गाँठ क़े पूरे और अक्ल क़े अधूरे लोगों को उलटे उस्तरे से मूढ्ना ऐसे फरेबी  लोगों क़े बाएँ हाथ का खेल होता है,इसलिए आज क़े मार्केटिंग युग में उन्होने दावों की पुष्टि  में गारंटी कार्ड देना शुरू कर दिया है.लोग यह नहीं समझते कि,परमात्मा से ऊपर कोई नहीं है,अतः किसी कार्य को सम्पन्न करने का न तो कोई दावा करना उचित है और न ही गारंटी दी  जा सकती है.फिर सवाल उठता है कि तब ज्योतिष का क्या लाभ ?ज्योतिष मानव जीवन को सुन्दर ,सुखद व समृद्ध बनाने का विज्ञान है.ज्योतिष क़े माध्यम से मनुष्य अपने पूर्व जन्मों क़े संचित कर्म-अकर्म आदि का फल ज्ञात कर सकता है और ग्रह -नक्षत्रों क़े प्रकोप को शांत करा सकता है.इसके लिए परमात्मा से स्तुति,प्रार्थना की जाती है,परमात्मा द्वारा प्रस्तुत वेदों क़े ज्ञान का लाभ उठाते हुए मन्त्रों से हवन में आहुतियाँ देकर ग्रह नक्षत्रों क़े दुष्प्रभाव को कम या समाप्त भी किया जा सकता है.

अग्नि परमात्मा का तथा सभी देवताओं का मुख होती है.अग्नि में  गई आहुति बोले गये मन्त्रों की शक्ति से देवताओं तथा ग्रह -नक्षत्रों तक वायु द्वारा तत्काल पहुंचा डी जाती है.इस प्रकार यदि मनुष्य श्रद्धा और पूर्ण भक्ति भाव से हवन करता हैऔर ज्योतिषी अथवा सुविज्ञ पंडित समुचित विधि-विधान से ग्रह -नक्षत्रों की शांति हेतु निर्धारित मन्त्रों से हवन करता है तो लाभ अवश्य ही मिलता है.परमात्मा इस मनुष्य जीवन की शेष अवधि क़े लिए कष्टों को स्थगित कर देता है और मनुष्य सुख पूर्वक जीवन व्यतीत कर सकता है.बुद्धि और विवेक का प्रयोग करते हुए मनन करना ही मानव का गुण है और यही मनुष्यत्व है जो धारण करना सिखाता है.

                                         यदि हम अपने कष्टों को शांत करना
                                        चाहते हैं तो हमें दूसरों को कष्ट देने
                                         की प्रवृति को छोड़ना होगा अन्यथा
                                       हम चाहे जितनी प्रार्थनाएं और ढोंग
                                        करें फल कुछ नहीं निकलेगा..

सिर्फ वही ढाक क़े तीन पात रह जायेंगे.जो लोग दूसरों को नीचा दिखाने हेतु अपनी भव्यता का प्रदर्शन करने हेतु ढोंगी -फरेबी लोगों का सहारा लेते हैं ,तात्कालिक रूप से भले ही अपने को लाभान्वित समझें कुल मिलकर अपने कर्मों को बिगाड़ लेते हैं;अपना मानवीय धर्म नष्ट कर लेते हैं और इनके दुष्परिणाम अन्ततः उन्हें भोगने ही पड़ते हैं.इसलिए उत्तम यही है कि,सही निदान किये जाएँ,सही व्यक्ति से संपर्क किया जाये और सिर्फ ऊपर उठने की बात सोची जाये;किसी दूसरे को नीचा दिखाने या /तथा गिराने का न तो प्रयास करना चाहिए और न ही ऐसी दुर्भावना रखनी चाहिए,फिर देखिये कि मनुष्य जीवन कितना सार्थक,कितना सफल रहता है.मनुष्य -मनुष्य में भेद न करना ही मानव धर्म है.यही मानवता है.   

एक विद्वान् का कहना है–

त्याग-तपस्या से पवित्र -परिपुष्ट हुआ जिसका ‘तन’ है
भद्र भावना -भरा स्नेह -संयुक्त शुद्ध जिसका ‘मन’ है
होता है नित्य-प्रति पर -हित में,जिसका शुचि संचित ‘धन’ है
वही श्रेष्ठ -सच्चा ‘मानव’ है,धन्य उसी का ‘जीवन’ है 

[टाइप समन्वय-यशवन्त ]

(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)