महाभारत क्यों होता?

फ़ौज में कभी-कभी परेड को आदेश मिलता है कि,पीछे मुड और सारी परेड आगे चलते-चलते एकदम से पीछे लौट चलती है.पी.एस.डी.एवं एन.सी.सी.की ट्रेनिंग क़े दौरान हवलदार सा :क़े आदेश पर हम लोगों ने भी ऐसा किया है. आज अपने पुराने कागजात पलटते -पलटते १९६९ -७० क़े दौरान लिखी अपनी यह लघु तुक-बन्दी जिसे २६ .१० १९७१ को हिन्दी टाईप सीखते समय टाईप किया था नज़र आ गई ,प्रस्तुत है-

जो ये भीष्म प्रतिज्ञा न करते देवव्रत ,
 तो यह महाभारत क्यों होता?
 होते न जन्मांध धृतराष्ट्र ,
 तो यह महाभारत क्यों होता?
 इन्द्रप्रस्थ क़े राजभवन से होता न तिरस्कार कुरुराज का,
तो यह महाभारत क्यों होता?
 ध्रूत-भवन में होता न चीर -हरण द्रौपदी का,
 तो यह महाभारत क्यों होता?
 होता न यदि यह महाभारत,
 तो यह भारत,गारत क्यों होता?
 होता न यदि यह महाभारत,
 तो यह गीता का उपदेश क्यों होता?
 होता न यदि यह गीता का उपदेश,
 तो इन वीरों का क्या होता?
मिलती न यदि वीर गति इन वीरों को,
तो इस संसार में हमें गर्व क्यों होता?
*               *              *

 (इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

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गाँधी जी की हत्या –साम्राज्यवादी साजिश (बलिदान दिवस ३० जनवरी पर विशेष )

१५ अगस्त,१९४७ को प्राप्त राजनीतिक आज़ादी और ३० जन.१९४८ को गाँधी जी की हत्या को सांप्रदायिक देन बताया जाता है. परन्तु भारत से बर्मा को १९३५ में अलग किये जाने के बाद नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के वक्तव्य की मीमांसा की जाये तो स्पष्ट हो जायेगा की भारत-विभाजन और गाँधी जी की हत्या दोनों ही साम्राज्यवादी साजिश के परिणामस्वरूप घटित घटनाएँ हैं.नेता जी सुभाष ने स्पष्ट कहा था कि जिस प्रकार आयेरलैंड से अलस्टर को अलग किया गया था उसी प्रकार बर्मा को भारत से अलग किया गया है और यह आने वाले समय में देश का खंडन किये जाने का संकेत है.खेद की बात है कि क्योंकि स्वयं गाँधी जी ही नेता जी के विरोधी थे;इसलिए नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की बात को गंभीरता से नहीं लिया गया. नेता जी बोस की बात को समझने के लिए इतिहास को पलट कर देखने की आवश्यकता है. १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में मराठों ने मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के नेतृत्व  में अंग्रेजों के छक्के छुडाये थे. रानी विक्टोरिया के अधीन शासन सँभालने के बाद पहले पहल ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने अपनी नीव मज़बूत करने हेतु भारत में मुस्लिमों का दमन किया और वे आर्थिक-शैक्षिक क्षेत्र में पीछे हो गए.लेकिन आज़ादी के आन्दोलनों में मुस्लिम बढ़ चढ़ कर भाग लेते रहे.१९०५ में धार्मिक आधार पर बंगाल का विभाजन कर मुस्लिमों को अलग करने की चाल चली गयी.बंग-भंग को रद्द करने हेतु जार्ज पंचम को भारत आना पड़ा. शातिर दिमाग साम्राज्यवादियों ने १९२० में ढाका के नवाब को मोहरा बना कर मुस्लिम लीग की स्थापना करायी.साम्राज्यवादी शासकों की प्रेरणा से ही १९२५ में हिन्दू महासभा तथा आर एस.एस. का गठन किया गया और खुलकर धार्मिक वैमनस्य का खेल खेला गया .भारत का राष्ट्रीय आन्दोलन भी इसी साजिश का शिकार हुआ और १९४० में पहली बार पाकिस्तान के निर्माण की बात सामने आई.दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने आई.अन.ऐ.के माध्यम से ब्रिटिश सरकार से सेन्य संघर्ष किया जिस के परिणाम स्वरुप वायु सेना व नौ सेना में भी विदेशी सरकार के प्रति छुट-पुट बगावत हुई.अतः घबरा कर ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने भारत का विखंडन कर पाकिस्तान व भारत दो स्वतंत्र देशों का निर्माण कर दिया.पाकिस्तान में तो साम्राज्यवादी अपने पसंद की सरकारें गठित करने में कामयाब हो जाते हैं,परन्तु भारत में साम्राज्यवादी पूरे कामयाब नहीं हो पते हैं.गाँधी जी की हत्या पाकिस्तान को अनुदान दिए जाने की गाँधी जी की सिफारिश के विरोध में की गयी-ऐसा हत्यारे ने अपने मुक़दमे के दौरान कहा.आशय साफ था देश में पुनः सांप्रदायिक तनाव पैदा कर विकास को अवरुद्ध किया जाना. तमाम साम्राज्यवादी सांप्रदायिक साजिशों के भारत आज प्रगति पथ पर अग्रसर तो है,परन्तु इसका लाभ समान रूप से सभी देश वासियों को प्राप्त नहीं है.सामाजिक रूप से इंडिया और भारत में अंतर्द्वंद चल रहा है और यह साम्राज्यवादियों की साजिश का ही हिस्सा है.आज आवश्यकता है भारत-विभाजन और गाँधी जी की हत्या को साम्राज्यवादियों की साजिश का परिणाम स्वीकार कर लेने की तथा देश के आर्थिक विकास में उत्पन्न असमानता को दूर करने की ,वर्ना साम्राज्यवादी शक्तियां भारत को अन्दर से खोखला करने हेतु विद्द्वेश के बीज बोती रहेंगी और नफरत के शोले भड़कते रहेंगे और इस प्रकार का विकास बेमानी ही रहेगा.जिसका लाभ देश की अधिकांश जनता को नहीं,कुछ मुट्ठी भर लोगों को ही मिलता रहेगा.जनतंत्र में देश के विकास का लाभ जनता को दिलाना है तो साम्राज्यवादी साजिशों को विफल करना ही होगा .इसके लिए आज की पीढ़ी और नौजवानों को जागरूक करना ही होगा.



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"गांधी को महात्मा बनाने वाले ग्रह -नक्षत्र"

यद्यपि  महात्मा गांधी ने सरकार में कोई पद ग्रहण नहीं किया;परन्तु उन्हें राष्ट्रपिता की मानद उपाधि से विभूषित किया गया है.गांधी जी क़े जन्मांग में लग्न में बुध बैठा है और सप्तम भाव में बैठ कर गुरु पूर्ण १८० अंश से उसे देख रहा है जिस कारण रूद्र योग घटित हुआ.रूद्र योग एक राजयोग है और उसी ने उन्हें राष्ट्रपिता का खिताब दिलवाया है.गांधी जी का जन्म तुला लग्न में हुआ था जिस कारण उनके भीतर न्याय ,दया,क्षमा,शांति एवं अनुशासन क़े गुणों का विकास हुआ.पराक्रम भाव में धनु राशि ने उन्हें वीर व साहसी बनाया जिस कारण वह ब्रिटिश सरकार से अहिंसा क़े बल पर टक्कर ले सके.

गांधी जी क़े सुख भाव में उपस्थित होकर केतु ने उन्हें आश्चर्यजनक ख्याति दिलाई परन्तु इसी क़े कारण उनके जीवन क़े अंतिम वर्ष कष्टदायक व असफल रहे.(राजेन्द्र बाबू को भी ऐसे ही केतु क़े कारण अंतिम रूप से नेहरु जी से मतभेदों का सामना करना पड़ा था.)एक ओर तो गांधी जी देश का विभाजन न रुकवा सके और दूसरी ओर साम्प्रदायिक सौहार्द्र  भी स्थापित न हो सका और अन्ततः उन्हें अंध -धर्मान्धता का शिकार होना पड़ा.

गांधी जी क़े विद्या भाव में कुम्भ राशि होने क़े कारण ही वह कष्ट सहने में माहिर बने ,दूसरों की भलाई और परोपकार क़े कार्यों में लगे रहे और उन्होंने कभी भी व्यर्थ असत्य भाषण नहीं किया.गांधी जी क़े अस्त्र सत्य और शास्त्र अहिंसा थे.गांधी जी क़े सप्तमस्थ  गुरु ने ही उन्हें विद्वान व राजा क़े तुल्य राष्ट्रपिता की पदवी दिलाई.

गांधी जी क़े भाग्य भाव में मिथुन राशि है जिस कारण उनका स्वभाव सौम्य,सरस व सात्विक बना रहा.धार्मिक सहिष्णुता इसी कारण उनमें कूट -कूट कर भरी हुई थी.उन्होंने सड़ी -गली रूढ़ियों व पाखण्ड का विरोध किया अपने सदगुणों और उच्च विचारों क़े कारण अहिंसक क्रांति से देश को आज़ाद करने का लक्ष्य उन्हें इसी क़े कारण प्राप्त हो सका.गांधी जी क़े कर्म भाव में कर्क राशि की उपस्थिति ने ही उनकी आस्था श्रम,न्याय व धर्म में टिकाये रखी और इसी कारण राजनीति में रह कर भी वह पाप-कर्म से दूर रह कर गरीबों की सेवा क़े कार्य कर सके.गांधी जी का सर्वाधिक जोर दरिद्र -नारायण की सेवा पर रहता था और उसका कारण यही योग है.गांधी जी क़े एकादश भाव में सिंह राशि एवं चन्द्र ग्रह की स्थिति ने उन्हें हठवादी,सादगी पसन्द ,सूझ -बूझ व नेतृत्व की क्षमता सम्पन्न तथा विचारवान बनाया.इसी योग क़े कारण उनके विचार मौलिक एवं अछूते थे जो गांधीवाद क़े नाम से जाने जाते हैं.अस्तु गांधी जी को साधारण इन्सान से उठ कर महात्मा बनाने में उनके जन्म-कालीन ग्रह व नक्षत्रों का ही योग है.

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देश का दुर्भाग्य

मानव जीवन की भांति ही देश क़े जीवन में भी कभी -कभी कुछ घटनाएँ घट  जाया करती हैं.मानव जीवन की कहानी एक निरन्तर संघर्ष की कहानी है.जहाँ-जहाँ प्रकृति ने उसे राह दी  वहां-वहां वह आगे बढ़ गया और जहाँ प्रकृति की विषमताओं ने रोका वहीं वह रुक गया.आज भी कई जातियां काफी पिछड़ी हुई तथा आदिम अवस्था में रहती हैं.जिस प्रकार जंगल में धुंए को देख कर हम कह सकते हैं कि कहीं ज़रूर आग लगी है.इसी प्रकार इन पिछड़ी हुई जातियों को देख कर हम यह अंदाज़ लगा सकते हैं कि संसार की सभी जातियां पहले ऐसे ही रही होंगी.प्रकृति क़े साथ सतत संघर्षों क़े परिणाम स्वरूप आज वे इस अवस्था को पहुँच सकी हैं.विकसित सभ्य और सुसंस्कृत होते हुए भी मानव दुःख रहित नहीं है.उसका समस्त जीवन दुखों से घिरा पड़ा हुआ है.महात्मा बुद्ध का कथन है कि जन्म ही दुःख है ,ज़रा भी दुःख है.जब मानव जीवन दुखमय है तो उनसे बने देश या राज्य का दुःख रंजित होना ,आश्चर्य की बात नहीं है.विशेष कर हमारा भरत देश अत्यंत दुखी है और यही उसका दुर्भाग्य है.देश क़े दुर्भाग्य का रोना लेकर महात्माओं,समाजवेत्ताओं ,राजनीतिक चिंतकों ने साहित्य को इससे भर दिया है.अनेक महात्मा गण देश क़े इस दुर्भाग्य को दूर करने क़े लिये कृत-कृत उपाय  पेश कर रहे हैं.इसी सम्बन्ध में १६ फरवरी १९६९ क़े “धर्मयुग ” में आचार्य रजनीश क़े उदगार प्रस्तुत किये गये थे और ०२ मार्च क़े “साप्ताहिक हिंदुस्तान”में उन्हीं क़े विचार पुनः प्रस्तुत किये गये .इनके द्वारा देश में एक नवीन-क्रांति क़े विचारों को प्रोत्साहित किया गया ,जीवन को आधुनिकता से पूर्ण करने की बात कही गई.आचार्य रजनीश जीवन में क्रांति लाकर देश क़े दुर्भाग्य को दूर करना चाहते हैं.समझ में नहीं आता कि आचार्य जी का क्रांति से क्या तात्पर्य है?उनके उद्गारों से यह पता चलता है कि वह पाश्चात्य नमूने क़े जीवन दृष्टिकोण को भरत में प्रसरित करना चाहते हैं.किन्तु यह नहीं पता कि वह क्रांति से क्या समझते हैं?

क्रांति की बात करने से पहले हमें यह सोच लेना चाहिए कि “विद्रोह”या “क्रांति”ऐसी कोई चीज़ नहीं जिसका विस्फोट एकाएक होता है.बल्कि इसके अनन्तर समाज की अर्ध- जाग्रत अवस्था में अन्तर क़े तनाव को बल मिलता रहता है.मानव ह्रदय शंका और समाधान क़े विचारों क़े मध्य मंडराता रहता है और कोई छोटी सी घटना उस सजे-सजाये बारूद क़े ढेर में चिंगारी का काम करती है.बस लोग इसी को क्रांति कह देते हैं.आचार्य रजनीश जिस क्रांति की बात कहते हैं उसके अन्तराल में अन्तर क़े तनाव को बल न मिल रहा हो ऐसी कोई बात नहीं.लोग आज नहीं बहुत पहले से जीवन क़े वर्तमान दृष्टिकोण को परिवर्तित करने को उद्यत रहे हैं और समय-समय पर यह आन्दोलन तीव्र गति होता गया है जो ब्रह्म समाज,आर्य समाज,राम-कृष्ण मिशन क़े रूप में प्रस्फुटित हुआ है.परन्तु किसी भी आन्दोलनकारी ने यह नहीं कहा कि भरत का अतीत वर्तमान को निष्क्रय  बना रहा है.आचार्य रजनीश इसके विपरीत अपना अलग राग अलापते हैं ,वह कह रहे हैं कि,भरत अतीत की ओर लौट रहा है.वह प्रगति नहीं कर पा रहा है.यथार्थ में भरत का अतीत(यदि उसे वास्तविक रूप में देखा जाये)वर्तमान को वह प्रेरणा दे सकता है जो आचार्य रजनीश का पश्चात्य्वादी दृष्टिकोण स्वप्न में भी नहीं दे सकता है जो सूर्य हमेशा पूर्व में निकलता है और पश्चिम में अस्त होता है ,आचार्य रजनीश देश को पश्चिम में ले जाकर डुबाने नहीं जा रहे हैं क्या? यदि उन्हीं की विचारधारा पर चल कर देश लुढ़क पड़े तो निस्संदेह यह समूल नष्ट हो जायेगा.पश्चिम क़े अन्न ,वस्त्र और शस्त्र ने ही देश की मिट्टी पलीद कर रखी है तब तो उसका नामोनिशान ही मिट जायेगा.अभी सन १८९० ई. तक भरत परतंत्र होते हुए भी,हमारा सितारा बुलंद था.पाश्चात्य वादी  सत्याग्रह,आन्दोलन और अहिंसा ने देश क़े नौजवानों को पंगु,कायर और भीरु बना दिया है.इसी क़े कारण उसके मस्तिष्क का हनन हुआ है.स्वतंत्रता क़े बाईस वर्षों में (अब ६३ वर्ष) पश्चिम पर निर्भर रह कर देश क़े कर्णधारों ने दुर्भाग्यपूर्ण पतन की गहराई को समीप ला दिया है.यदि हवा पश्चिम से पूर्व की ओर चलती रही तो निश्चय ही प्रलय हो जायेगी.

आचार्य रजनीश ने भरत क़े अतीत को आँखें खोल कर नहीं देखा ,पश्चिम की सुरा  ने उनके मस्तिष्क को विकृत कर दिया है,और विकृत कर दिया है नौजवान मानस पटलों को.आचार्य रजनीश जी डाक्टर. मजुमदार की भांति गर्व क़े साथ कहते हैं कि भारत  ने इतिहास को कोई महत्त्व नहीं दिया.सही ह्रदय से वे यह कह सकें कि इतिहास को भारत  में पंचम-वेद का स्थान नहीं दिया गया तो उनकी बात नशीली दुनिया क़े लिये ठीक हो सकती है.आज हमारे देश का इतिहास वेदोपनिषद,पुरानों और स्मृतियों में सुरक्षित है.यह बात अलग है कि निरन्तर अवांतर घटनाओं क़े समावेश से उनका नियमबद्ध एवं क्रमबद्ध तारतम्य टूट गया है.स्वामी दयानंद सरस्वती ने तो दृढ विश्वास क़े साथ नारा दिया था-‘वेदों की ओर चलो’-वेद हमारे अतीत की देन नहीं हैं क्या?जो वेद हमें यह उपदेश देते हैं कि –

अभि वर्धतां पयत्वअभि राष्ट्रेण वर्धताम .
रय्यां सहस्रका से मौ स्तामनु  पक्षितौ..
                              (अथर्व वेद ६/७८ /२)
अर्थात-“ये वर वधु दूध पी कर पुष्ट हों,वे अपने राष्ट्र क़े साथ उन्नत होते रहें.वे अनेक तरह की संपत्तियों से युक्त होकर तेजस्वी बन कर कभी भी अवनत  न हों.”

वे वेद पतन उन्मुख  नहीं हो सकते हैं.वे ‘एकला चलो रे’ की शरारत नहीं सिखाते.अतीत की देन वेद कहते हैं राष्ट्र क़े साथ चलो ,व्यक्तित्व का विकास राज्य क़े विकास में रोड़ा न बने.राष्ट्र मनुष्यों से बनता है.अर्थात वेद सिखाते हैंकि मानव-धर्म का पालन करो.वे सिखाते हैं मनुष्य को मनुष्य से मिल कर चलना.वे बताते हैं राज्य की उन्नति में -मनुष्यों को सामूहिक उन्नति में व्यक्ति की उन्नति का मार्ग.तब आचार्य रजनीश क्या सोच कर यह कहने का दम्भ करते हैं कि भारत का मनुष्य अपने विकास में ‘स्व’पर केन्द्रित है और यह अतीत क़े कारण है.वह अहिंसा की जो बात कहते हैं वह भी अतीत की देन न होकर ,वह है किसी पाश्चात्य वादी  महात्मा क़े दिमाग का फितूर जो उसने ‘अहिंसा’क़े माने ‘नान-वायेलेंस’ बतलाये.हमारे अतीत की देन वेद कभी भी नहीं कहते कि शत्रु क़े समक्ष भीरुता प्रदर्शन करो;दूसरा गाल भी चांटा खाने क़े लिये प्रस्तुत करो.वेद कहते हैं कि निर्भीकता पूर्वक शत्रु का सामना करो.अतीत अहिंसा क़े नाम पर कायर बनने की प्रेरणा नहीं देता-

आततायिनमायान्तुं हन्यदिवा विचारयन.
नाततायो वधे दोषों हन्तुर्भवती कश्चन*
                (मनुस्मृति)
अर्थात – “यदि कोई आततायी को सामने से आता हुआ देखे तो बिना किसी सोच-विचार क़े उसे मार दे.उसके वध से वध करने वाले को कोई पाप नहीं लगता.”

हमारा अतीत हमें भीरु अहिंसा की सीख नहीं देता ;वह हमें ‘स्व’पर केन्द्रित नहीं करता .अतीत कहता है-
‘सर्वभूत हिते रतः’ और कहता है-‘वसुधैव कुटुम्बकम’
वस्तुतः आचार्य रजनीश आचार्यत्व क़े महत्त्व को भी घटा रहे हैं.सच तो यह है कि जिस दिन हमारा देश पश्चिम की ओर न बह कर अपने पूर्व की ओर -अतीत की ओर कदम बढ़ने लगेगा तो हमारे जीवन दृष्टिकोण में स्वतः नवीन आभा मुखरित हो उठेगी.और हमारे देश का यह कल्पित दुर्भाग्य हवा क़े महल की भांति धाह जायेगा.पश्चिम को तिलांजली देकर पूर्व में अतीत में देखें तभी देश का मनुष्यमात्र का कल्याण होगा.-
‘पाछे पछताए होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गईं खेत’
इसलिए देश क़े नौजवानों और महानुभावों वक्त रहते समय क़े भीतर वस्तुस्थिति को समझो ,पाश्चात्य क़े झोंके में मत उड़ो अपने पूर्व को पहचानो अतीत को देखो तभी देश क़े कल्पित दुर्भाग्य का अंत होगा.
———————————————————————————————-
यह लेख सन १९७० ई. में बी.ए.की पढ़ाई क़े दौरान लिखा गया था और मुझे आज भी यह सटीक ही लगता है,इसलिए इस अप्रकाशित लेख को अब दे रहा हूँ.
* १३ जन २०११ का डा.मोनिका शर्मा का आलेख  मुझे मनुस्मृति क़े इस श्लोक क़े सन्दर्भ में पूर्ण न्यायोचित प्रतीत होता है.
(भारतीयता की भ्रामक व्याख्या प्रस्तुत करने वाली पार्टी क़े उस विधायक क़े साथ किया गया सलूक मनु महाराज की व्याख्या क़े अनुसार सही था)

राष्ट्र गान एवं राष्ट्र गीत से सभी परिचित हैं यहाँ हम आप को आज ६१ वें गणतंत्र की चला चली तथा ६२ वें गणतंत्र दिवस की पूर्व बेला पर   अपनी प्राचीन राष्ट्रीय प्रार्थना जो  यजुर्वेद अध्याय २२ क़े २२ वें मन्त्र द्वारा ऋषियों ने की है उसके भवानी दयाल संन्यासी  द्वारा किये गये भावानुवाद से परिचित करा रहे हैं-

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स्वतंत्रता दिलाने में नेताजी का योगदान-(जन्म दिवस पर एक स्मरण)

‘नेताजी’ का मतलब सुभाष चन्द्र बोस से होता था.(आज तो लल्लू-पंजू ,टुटपूंजियों क़े गली-कूंचे क़े दलाल भी खुद को नेताजी कहला रहे हैं) स्वतन्त्रता -आन्दोलन में भाग ले रहे महान नेताओं को छोड़ कर केवल सुभाष -बाबू को ही यह खिताब दिया गया था और वह इसके सच्चे अधिकारी भी थे.जनता सुभाष बाबू की तकरीरें सुनने क़े लिये बेकरार रहती थी.उनका एक-एक शब्द गूढ़ अर्थ लिये होता था.जब उन्होंने कहा “तुम मुझे खून दो ,मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा” तब साधारण जनता की तो बात ही नहीं ब्रिटिश फ़ौज में अपने परिवार का पालन करने हेतु शामिल हुए वीर सैनिकों ने भी उनके आह्वान  पर सरकारी फ़ौज छोड़ कर नेताजी का साथ दिया था. जिस समय सुभाष चन्द्र बोस ने लन्दन जाकर I .C .S .की परीक्षा पास की ,वह युवा थे और चाहते तो नौकरी में बने रह कर नाम और दाम कम सकते थे.किन्तु उन्होंने देश-बन्धु चितरंजन दास क़े कहने पर आई.सी.एस.से इस्तीफा  दे दिया तथा स्वतंत्रता आन्दोलन में कूद पड़े.  जब चितरंजन दास कलकत्ता नगर निगम क़े मेयर बने तो उन्होंने सुभाष बाबू को उसका E .O .(कार्यपालक अधिकारी )नियुक्त किया था और उन्होंने पूरे कौशल से कलकत्ता नगर निगम की व्यवस्था सम्हाली थी.

वैचारिक दृष्टि से सुभाष बाबू वामपंथी थे.उन पर रूस की साम्यवादी क्रांति का व्यापक प्रभाव था. वह आज़ादी क़े बाद भारत में समता मूलक समाज की स्थापना क़े पक्षधर थे.१९३६ में लखनऊ में जब आल इण्डिया स्टुडेंट्स फेडरशन की स्थापना हुई तो जवाहर लाल नेहरु क़े साथ ही सुभाष बाबू भी इसमें शामिल हुये थे.१९२५ में गठित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उस समय कांग्रेस क़े भीतर रह कर अपना कार्य करती थी.नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ,जवाहर लाल नेहरु तथा जय प्रकाश नारायण मिल कर कांग्रेस को सामाजिक  सुधार तथा धर्म-निरपेक्षता की ओर ले जाना चाहते थे.१९३८ में कांग्रेस क़े अध्यक्षीय चुनाव में वामपंथियों ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को खड़ा किया था और गांधी जी ने उनके विरुद्ध पट्टाभि सीतारमय्या को चुनाव लड़ाया था. नेताजी की जीत को गांधी जी ने अपनी हार बताया था और उनकी कार्यकारिणी का बहिष्कार करने को कहा था.तेज बुखार से तप रहे नेताजी का साथ उस समय जवाहर लाल नेहरु ने भी नहीं दिया.अंत में भारी बहुमत से जीते हुये (बोस को १५७५ मत मिले थे एवं सीतारमय्या को केवल १३२५ )नेताजी ने पद एवं कांग्रेस से त्याग पत्र दे दिया और अग्र-गामी दल
(फॉरवर्ड ब्लाक) का गठन कर लिया.ब्रिटिश सरकार ने नेताजी को नज़रबंद कर दिया.क्रांतिवीर विनायक दामोदर सावरकर क़े कहने पर नेताजी ने गुप-चुप देश छोड़ दिया और काबुल होते हुये जर्मनी पहुंचे जहाँ एडोल्फ हिटलर ने उन्हें पूर्ण समर्थन दिया. विश्वयुद्ध क़े दौरान दिस.१९४२ में जब नाजियों ने सोवियत यूनियन पर चर्चिल क़े कुचक्र में फंस कर आक्रमण कर दिया तो “हिटलर-स्टालिन “समझौता टूट गया.भारतीय कम्युनिस्टों ने इस समय एक गलत कदम उठाया नेताजी का विरोध करके ;हालांकि अब उन्होंने स्वीकार कर लिया है कि यह भारी गलती थी और आज उन्होंने नेताताजी क़े योगदान को महत्त्व देना शुरू कर दिया है.हिटलर की पराजय क़े बाद नेताजी एक सुरक्षित पनडुब्बी से जापान पहुंचे एवं उनके सहयोग से रास बिहारी बोस द्वारा स्थापित आज़ाद हिंद फ़ौज (I .N .A .) का नेतृत्व सम्हाल लिया.कैप्टन लक्ष्मी सहगल को रानी लक्ष्मी बाई रेजीमेंट का कमांडर बनाया गया था. कैप्टन ढिल्लों एवं कैप्टन शाहनवाज़ नेताजी क़े अन्य विश्वस्त सहयोगी थे.

नेताजी ने बर्मा पर कब्ज़ा कर लिया था.आसाम में चटगांव क़े पास तक उनकी फौजें पहुँच गईं थीं.”तुम मुझे खून दो,मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा”नारा इसी समय नेताजी ने दिया था. नेताजी की अपील पर देश की महिलाओं ने सहर्ष अपने गहने आई.एन.ए.को दान दे दिये थे,जिससे नेताजी हथियार खरीद सकें.नेताजी की फौजें ब्रिटिश फ़ौज में अपने देशवासियों पर बम क़े गोले नहीं तोपों से पर्चे फेंक्तीं थीं जिनमें देशभक्ति की बातें लिखी होती थीं और उनका आह्वान  करती थीं कि वे भी नेताजी की फ़ौज में शामिल हो जाएँ.इस का व्यापक असर पड़ा और तमाम भारतीय फौजियों ने ब्रिटिश हुकूमत से बगावत करके आई .एन .ए.की तरफ से लडाई लड़ी.एयर फ़ोर्स तथा नेवी में भी बगावत हुई.ब्रिटिश साम्राज्यवाद  हिल गया और उसे सन १८५७ की भयावह स्मृति हो आई.अन्दर ही अन्दर विदेशी हुकूमत ने भारत छोड़ने का निश्चय कर लिया किन्तु दुर्भाग्य से जापान की पराजय हो गई और नेताजी को जापान छोड़ना पड़ा.जैसा कहा जाता है प्लेन क्रैश में उनकी मृत्यु हो गई जिसे अभी भी संदेहास्पद माना जाता है. (यहाँ उस विवाद पर चर्चा नहीं करना चाहता ).

मूल बात यह है कि,१९४७ में प्राप्त हमारी आज़ादी केवल गांधी जी क़े अहिंसक आन्दोलन से ही नहीं वरन नेताजी की “आज़ाद हिंद फ़ौज ” की कुर्बानियों,एयर फ़ोर्स तथा नेवी में उसके प्रभाव से बगावत क़े कारण मिल सकी है और अफ़सोस यह है कि इसका सही मूल्यांकन नहीं किया गया है.आज़ादी क़े बाद जापान सरकार ने नेताजी द्वारा एकत्रित स्वर्णाभूषण भारत लौटा दिये थे;ए.आई.सी.सी.सदस्य रहे सुमंगल प्रकाश ने धर्मयुग में लिखे अपने एक लेख में रहस्योदघाटन किया था कि वे जेवरात कलकत्ता बंदरगाह पर उतरने तक की खबर सबको है ,वहां से आनंद भवन कब और कैसे पहुंचे कोई नहीं जानता.आज आज़ादी की लडाई में दी गई नेताजी की कुर्बानी एवं योगदान को विस्मृत कर दिया गया है.क्या आज क़े नौजवान नेताजी का पुनर्मूल्यांकन करवा सकेंगे?उस समय नेताजी तथा अन्य बलिदानी क्रांतिकारी सभी नौजवान ही थे.यदि हाँ तभी प्रतिवर्ष २३ जनवरी को उनका जन्म-दिन मनाने की सार्थकता है,अन्यथा थोथी रस्म अदायगी का क्या फायदा ?
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रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना (पुनर्प्रकाशन भाग-3)

प्रस्तुत  आलेख मूल रूप से आगरा से प्रकाशित साप्ताहिक सप्तदिवा क़े २७ अक्तूबर १९८२ एवं ३ नवम्बर १९८२ क़े अंकों में दो किश्तों में पूर्व में ही प्रकाशित हो चुका है  तथा इस ब्लॉग पर भी पहले प्रकाशित किया जा चुका है.पूर्व में प्रकाशित इस आलेख की अशुद्धियों को यथासम्भव सुधारते हुए तथा पाठकों की सुविधा क़े लिये यहाँ ४ किश्तों में पुनर्प्रकाशित किया जायेगा.

प्रस्तुत है ३  सरी किश्त (प्रथम किश्त देखने  क़े लिये यहाँ क्लिक करें व दूसरी किश्त यहाँ क्लिक करके  देख सकते हैं)

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राम के विवाह के दो वर्ष पश्चात् प्रधानमंत्री वशिष्ठ ने दरबार (संसद) में राजा को उनकी वृद्धावस्था का आभास कराया और राम को उत्तराधिकार सौपकर अवकाश प्राप्त करने की  ओर संकेत दिया.राजा ने संसद के इस प्रस्ताव का स्वागत किया;सहर्ष ही दो दिवस की अल्पावधि में पद त्याग करने की  घोषणा की .एक ओर तो राम के राज्याभिषेक (शपथ ग्रहण समारोह) की  जोर शोर से तैय्यारियाँ आरंभ हो गयीं तो दूसरी ओर प्रधान मंत्री ने राम को सत्ता से पृथक  रखने की  साजिश शुरू की.मन्थरा को माध्यम बना कर कैकयी को आस्थगित वरदानों में इस अवसर पर प्रथम तो भरत के लिए राज्यद्वितीय राम के लिए वनवास १४ वर्ष की  अवधि के लिए,दिलाने के लिए भड़काया,जिसमे उन्हें सफलता मिल गयी.इस प्रकार दशरथ की मौन स्वीकृति  दिलाकर राज्य की अंतिम मोहर दे कर राम-वनवास का घोषणा पत्र  राम को भेंट किया.राम,सीता  और लक्ष्मण को गंगा  पर (राज्य कि सीमा तक) छोड़ने  मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्य सुमंत (विदेश मंत्री) को भेजा गया. अब राम के राष्ट्रीय कार्य-कलापों का श्री गणेश हुआ.सर्वप्रथम तो आर्यावर्त के प्रथम डिफेंस सेण्टर प्रयाग में भरद्वाज ऋषि के आश्रम पर राम ने उस राष्ट्रीय योजना का अध्ययन किया जिसके अनुसार उन्हें रावण  का वध करना था.भरद्वाज ऋषि ने राम को कूटनीति  की प्रबल शिक्षा दी.क्रमशः अग्रिम डिफेंस सेंटरों (विभिन्न ऋषियों के आश्रमों) का निरीक्षण  करते हुए राम ने पंचवटी में अपना दूसरा शिविर डाला जो आर्यावर्त से बाहर वा-नर प्रदेश में था जिस पर रावण के मित्र बाली का प्रभाव था.चित्रकूट में राम को अंतिम सेल्यूट  दे कर पुनीत कार्य के लिए विदा दे दी गयी थी.अतः अब राम ने अस्त्र (शस्त्र भी) धारण कर लिया था .पंचवटी में रहकर उन का कार्य प्रतिपक्षी को युद्ध के लिए विवश करना था.यहाँ रहकर उन्होंने लंका के विभिन्न गुप्तचरों तथा एजेंटों का वध किया.इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर राष्ट्रद्रोही जयंत का गर्व चूर किया खर-दूषण नामक  रावण  के दो बंधुओं का सर्वनाश किया.सतत अपमान के समाचारों को प्राप्त करते-करते रावण का खून खुलने  लगा उसने अपने मामा को (जो भांजे के प्रति भक्ति न रखकर स्वार्थान्धता वश  विदेशियों के प्रति लोभ पूर्ण  आस्था रखता था) राम के पास जाने का आदेश दिया और स्वयं वायुयान द्वारा गुप्तरूप से पहुँच गया.राम को मारीच की लोभ-लोलुपता तथा षड्यंत्र की सूचना लंका स्थित उनके गुप्तचर ने बे-तार के तार से दे दी थी अतः उन्होंने मारीच को दंड देने का निश्चय किया.वह उन्हें युद्ध में काफी दूर ले गया तथा छल से लक्ष्मण को भी संग्राम में भाग लेने को विवश किया.अब रावण ने भिक्षुक  के रूप में जा कर सीता को लक्ष्मण द्वारा की गयी इलेक्ट्रिक वायरिंग (लक्ष्मण रेखा) से बाहर  आकर दान देने के लिए विवश किया और उनका अपहरण कर विमान द्वारा लंका ले गया.

जारी …


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सुख और दुःख ज्योतिष क़े आईने में

सुख और दुःख परस्पर विरोधी अवस्थाओं का भान कराने वाले शब्द हैं.वैसे यदि दुःख न हो तो सुख की अनुभूति या उसे प्राप्त करने की इच्छा भी नहीं हो सकती.मर्यादा पुरुषोत्तम राम व जानकी माता तथा योगीराज श्री कृष्ण को भी दुखों का सामना करना ही पड़ा था.यहाँ एक ऐसे शख्स का उल्लेख कर रहे हैं,जिन्हें एक ही ग्रह मंगल ने सुख और दुःख दोनों अलग-अलग प्रकार से प्रदान किये.ऐसा न केवल उनके जन्म-कालीन ग्रहों क़े आधार पर हुआ बल्कि,गोचर-कालीन मंगल की कुद्रष्टि ने भी उन्हें पीड़ित किया.

उनके जन्मांग में चतुर्थ भावस्थ मंगल उनको भूमि व वाहन लाभ दिलाने में पूर्ण समर्थ रहा है,उनके कई अपने निजी मकान हैं और कई उत्तम वाहनों क़े भी वह स्वामी हैं;जहाँ इतनी सुख-सुविधाएं उन्हें मंगल ग्रह क़े कारण मिल रही हैं-वहीं यही मंगल उन्हें पीड़ा देने में भी अग्रणी है.पत्नी भाव का स्वामी होकर सुख भाव में प्रबल शत्रु-ग्रह शुक्र क़े साथ मंगल की उपस्थिति ही उनकी पत्नी क़े स्वास्थ्य को क्षीण करने का कारण बनी है.विवाह क़े बाद लगातार उनकी पत्नी कुछ न कुछ रुग्ण रही हैं और लगभग ७ वर्ष पूर्व उन्हें बड़ा आपरेशन कराना पड़ा है.ऐसा मंगल क़े गोचर-कालीन प्रभाव और जातक क़े जन्मांग में स्थिति  दोनों क़े फलस्वरूप घटित हुआ है.जातक को स्वंय २० जूलाई २००३ को दुर्घटना का शिकार होना पड़ा-पटना में रात्री पौने आठ क़े उपरान्त उनको बदमाशों ने किसी दूसरे क़े धोखे में गोली मार दी जो उनके पेट में घुस कर पीछे कमर से निकल गई.जातक को आपरेशन कराना पड़ा और लम्बे समय तक चिकित्सा-अवकाश पर रहना पड़ा.जातक क़े जन्मांग तथा गोचर काल में जब गोली दोनों स्थितियों में शनि उनके शत्रुओं क़े लिये संहारक स्थिति में था.शनि मंगल का प्रबल शत्रु भी है,अतः स्पष्ट है कि,शनि ने मंगल क़े आघात से जातक की प्राण-रक्षा की है,परन्तु ऊँची दुकान फींका पकवान वाले पं.जी ने जातक को शनि ग्रह घातक बताया था और गोली लगने का हेतु भी शनि को बताया था.जबकि अध्ययन काल में भी जातक वाहन दुर्घटना का शिकार मंगल क़े प्रकोप से हो चुके थे और तब भी उन्हें शनि गृह ने ही बचाया था.अन्ततः जातक ने मुझसे संपर्क किया और तब मैंने उन्हें समझाया कि उन्हें मंगल गृह की शांति करानी चाहिए तथा जो रत्न उन पं.जी ने पहनाया है उन्हें उतार देना चाहिए .जातक ने मेरे बताये अनुसार वैसा ही किया और राहत प्राप[त की.उनके घर का माहौल भी पहले की अपेछा ठीक हो गया.जातक क़े जन्मांग में सिर्फ मंगल का ही कोप नहीं था,वरन जहाँ वह तब निवास कर रहे थे उस सरकारी मकान में ईशान में रसोई-घर बना हुआ था.जातक और उनकी पत्नी दोनों ही ब्लड प्रेशर से ग्रसित थे और इस वस्तु-दोष ने भी उन्हें दुर्घटना का शिकार बनाया .उन्हें वास्तु-दोष क़े निराकरण हेतु भी सुझाव व उपाय दिये जिन्हें उन्होंने स्वीकार व अंगीकार किया तथा उसका लाभ भी उन्हें मिला और जो भय व कष्ट उन्हें सता रहे थे उनसे राहत मिल गई.यह जातक रसायन शास्त्र(केमिस्ट्री)में पी. एच.डी.हैं.अतः इन्हें हवन की वैज्ञानिक पद्धति से उपचार की बात तर्क सांगत लगी और उन्होंने उसका सहारा लेकर लाभ भी प्राप्त किया.परन्तु ऐसे इंजीनियर परिवारों से भी साबका पड़ा जिन्हें विज्ञान-सम्मत तर्क समझ में नहीं आते और वे उन उपायों को करने की बजाये पोंगा-पंडितों क़े बताये उल-जलूल उपायों को ही अपनाते हैं.एक इं.सा :अपने घर क़े वास्तु-दोष क़े कारण अपनी बाईपास सर्जरी करा चुके थे. उनके पहले किरायेदार की मौत इसी दोष क़े कारण हो गई,तीसरे किरायेदार क़े बड़े पुत्र का दुर्घटना में दुखांत हो गया,उनके दूसरे और चौथे किरायेदार दिवालिया हो गये.पांचवां किरायेदार एक फ्राड था जो कुछ दिन रह कर भाग गया.लेकिन इंजीनियरी क़े नशे में उन साहब को अपने मकान क़े वास्तु-दोषों का निराकरण करने की आवश्यकता नहीं है.एक और परिवार में तीन सदस्य इंजीनियर हैं यह भी एक आधुनिक परिवार है इनके ईशान में शौचालय और उत्तर में रसोई बनी हुई है.तमाम वास्तु दोष इन्हें परेशान तो कर रहे हैं परन्तु ये लोग इस तथ्य को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं.वैज्ञानिक विधि क़े उपायों का भी उनकी निगाह में कोई महत्त्व नहीं है.इं दोषों का ही परिणाम था कि परिवार क़े मुखिया को हार्ट प्राब्लम का भी सामना करना पड़ा था और इसी परिवार में रहने वाले बालक को दो बार एक ही कक्षा में रुकना पड़ा और तीसरी बार प्रयास करना पड़ा.इस बालक को मेरे द्वारा जो उपाए बताये गये थे उन्हें इन लोगों ने नहीं माना और न ही अमल किया गया .इस बालक को भी मंगल ग्रह की शांति करने को कहा गया था,परन्तु साईंसदा परिवार ने वैज्ञानिक उपायों को ठुकरा दिया और इस प्रकार अपना ही अहित कर डाला.इस बुद्धि विपर्याय का कारण भी इस परिवार का वास्तु-दोष को ठुकरा कर उनका परिष्कार न करना ही है.जब ईशान में शौचालय होते हैं तो सबसे पहले बुद्धि ही भ्रष्ट होती है,उसके बाद धीरे-धीरे अन्य विकार जन्म लेते जाते है. वैसे ग्रहों ने धन-सम्पदा भी प्रदान की है जिसका वे दुरूपयोग ही करते हैं.एक अन्य परिवार जो धन-संपत्ति की दृष्टि से सम्पन्न है ऐसे निवास में रह रहा है जिसके नैरित्य(South West) में रसोई है और आग्नेय (South East) में शौचालय .इस परिवार क़े बच्चे व गृहणी रुग्ण चलते रहते हैं.परिवार क़े मुखिया उच्च शिक्षित ,उच्चाधिकारी और ठाकुर परिवार से सम्बंधित हैं.उन्होंने हमसे संपर्क किया ,उन्हें भी वैज्ञानिक विधि क़े उपाए बताये.उन्होंने सहर्ष समझा और स्वीकार ही नहीं किया वरन उन पर अमल भी शुरू कर दिया.वास्तु-दोष का निवारण तथा हवन-विधि से ग्रहों को शान्त कराया.स्वभाविक रूप से वैज्ञानिक उपायों क़े महत्त्व को समझा और सबसे पहले वास्तु-दोष का निरावरण कराया और लाभ उठाया.उनके विपरीत इंजीनियर सदस्यों वाले ठाकुर परिवार में वैज्ञानिक उपायों को दकियानूसी व बेकार का समझा गया,जिस कारण वे उनका लाभ उठाने से वंचित रहे.परिणाम स्वरूप बुद्धि-विभ्रम भी नहीं समझ सके-यही है ग्रहों का वैज्ञानिक खेल जो सुख और दुःख दोनों प्रदान कर रहा है.


सुख और दुःख -स्वास्थ्य क़े पैमाने से

                 
              सुख की इच्छा करने से ,सुख न पावे कोय.
                 तन की रक्षा करने से,दुःख भी सुखमय होय..

A  Healthy Mind In a Healthy Body
विद्वानों क़े ये कथन निरर्थक नहीं हैं .हमारे यहाँ पहले एक प्रार्थना प्रचलित थी ‘जीवेम शरदः शतम’ जो अब विलुप्त प्राय हो गई है और यही कारण है कि अब हमारे यहाँ स्वस्थ मनुष्य नहीं हैं.किसी को कुछ तो किसी को कुछ समस्या परेशान किये हुये है.तेज जिन्दगी में खां-पान की ओर किसी का ध्यान नहीं है और अधिकाँश रोग उदर संबंधी हैं जिनसे फिर और नयी-नयी बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं.एक प्रमुख समस्या है गैस बनने की जो घुटनों ,कमर,रीढ़ और यहाँ तक कि सिर दर्द का कारण भी बनती है. भोजन क़े उपरान्त ढाई- तीन मिनट की यदि कसरत कर ली जाये तो नियमित करने पर गैस रोग से मुक्ति मिल जाती है और गठिया रोग भी दूर भाग जाता है.इसमें भोजन क़े बाद और भोजन क़े मध्य जल न पीयें.भोजनोपरान्त घुटनों क़े बल इस प्रकार बैठें कि पंजों पर कूल्हे तिक जाएँ,कमर सीधी रखें दोनों हथेलियों को दोनों घुटनों पर उन्हें ढकते हुये  टिकाएं .पानी भोजन क़े आधे घंटे बाद ही पियें.ऐसा करने पर जेलोसिल,गैसेक्स और गैस पिल्स सेवन करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी.

अक्सर काम की अधिकता या अधिक बैठे रहने क़े कारण कमर में दर्द हो जाता है .कमर दर्द की कभी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए.इसके लिये छोटी सी कसरत दिन में कभी भी जब भोजन न किये हों अथवा भोजन किये हुये तीन -चार घंटे व्यतीत हो चुके हों तब ही करनी चाहिए .कमर सीधी करके दोनों पैर विपरीत दिशाओं में फैला लें.अब दायाँ हाथ फैला कर बायीं ओर तथा इसी प्रकार बयान हाथ फैला कर दायीं ओर ले जाएँ.
पांच -सात मिनट तक इस प्रक्रिया को दोहरायें.नियमित यह कसरत करने से कमर का दर्द स्वतः ठीक हो जाता है.शरीर में चुस्ती रहती है और आलस्य दूर होता है.परन्तु आवश्यकता है अपने शरीर पर ध्यान देने की,यह शरीर परमात्मा की अनुपम भेंट है और इसकी रक्षा करना भी परमात्मा की सेवा करने का ही अंग है.अतः तन की रक्षा करके दुःख को भी सुखमय बनाने का प्रयास करना चाहिए.

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 (इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)
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