कुल क्रूर कुरीति तोड़ेंगे,सब दुष्कर्मों को छोड़ेंगे


डा .टी.एस.दराल सा : ने मेरे लेख “परमात्मा क़े विराट स्वरूप क़े दर्शन करें” पर टिप्पणी में मुझे यह सुझाव दिया था :-
 नव -वर्ष २०११ में डा.सा :क़े परामर्शानुसार मैं यह प्रथम लेख आप सब की सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ.इस लेख का शीर्षक मथुरावासी आर्य -भजनोपदेशक श्री विजय सिंह जी क़े भजन से उद्धृत किया गया है,जिसे इसी लेख में आगे आप पढेंगे.अभी एक अन्य विद्वान क़े इस गीत का अवलोकन करें-
जियत पिता से दंगम दंगा,
मरे पिता पहुँचायें गंगा.
जियत पिता को न पूँछी बात,
 मरे पिता को खीर और भात..
जियत पिता को घूंसे लात,
मरे पिता को श्राद्ध करात..
जियत पिता को डंडा,लठिया,
मरे पिता को तोसक तकिया..
जियत पिता को कछू न मान,
मरत पिता को पिंडा दान..
विद्वान कवि का यह कोई व्यंग्य नहीं है,आप समाज में ऐसे वाक्ये नित्य देखते होंगे.हमारे देश समाज में जिसके विश्व -गुरु होने का हम दम्भ भरते हैं ऐसी तमाम घटनाएं आम बात हैं.यह कुछ नहीं,सिर्फ कुरीतियों का बोल-बाला है.इन्हीं कुरीतियों ने हमारे देश-समाज को खोखला कर डाला है.आईये इस नव-वर्ष में हम-सब मिल-जुल कर संकल्प लें कि,इस वर्ष से हम-सब पाखण्ड-ढोंग,कुरीतियों से दूर रह कर समाज व देश क़े हित में कार्य करेंगें.हमारे ऋषियों ने जो मार्ग हमें दिखाया है;जैसाकि विजय सिंह जी ने सुन्दर वर्णन किया है:-
सुखदाई  सत युग लाना है.
 कलि काल कलंक मिटाना है.
नित प्रातः प्रभु गुण गायेंगे.
सिर मात-पिता को नायेंगे
शुचि संध्या यज्ञ रचाएंगे.सुन्दर  सुगन्ध फैलायेंगे.
                                 दुर्गुण दुर्गन्ध मिटाना है..१ ..
कुल क्रूर कुरीति तोड़ेंगे,पापों का भन्दा फोड़ेंगे.
सब दुष्कर्मों को छोड़ेंगे,सत कर्म से नाता जोड़ेंगे.
                              सब को यह पाठ पढ़ाना है..२..
कभी मदिरा मांस न खायेंगे,फल फूल अन्न ही पायेंगे.
भूले भी कुसंग न जायेंगे,मिल मेल मिलाप बढ़ाएंगे.
                                 सत प्रेम की गंग बहाना है..३..
जो निर्बल निर्धन भाई हैं,हरिजन मुस्लिम ईसाई हैं.
इस देश क़े सभी सिपाही हैं,सब एक राह क़े राही हैं.
                                   समता का सूर्य उगाना है..४..
वेदों को पढ़ें पढ़ायेंगे,यज्ञों को करें करायेंगे.
ताप दान शील अपनाएंगे,ऋषियों क़े नियम निभायेंगे.
                                 बन ‘विजय’ वीर दिखलाना है..५
वैदिक-विधान में सभी कार्यों हेतु हवन-यज्ञ का उल्लेख है,यहाँ तक कि-अंतिम संस्कार में भी हवन का ही प्राविधान है.उस समय आबादी कम और वन अधिक थे.आज जनसँख्या-विस्फोट हो रहा है और वनों का क्षरण तीव्रता से हो रहा है.ऎसी सूरत में हम लकीर क़े फ़कीर बन कर नहीं रह सकते.आज मानवता संकट में है,पृथ्वी का अस्तित्व संकट में है. हम आज यज्ञों-हवन आदि को करते हुये भी उसी प्रकार वन-लकड़ी का उपभोग नहीं कर सकते.डा. सा :ने ठीक प्रश्न उठाया है कि,दाह-संस्कार में ४ या ५ क्विंटल लकड़ी फूंकना आज मानव-अस्तित्व को ही मिटा देने का प्रयास है.आज इस संकट का सामना करने हेतु हम को कई प्रयास करने होंगे.यथा-
१ .-दाह संस्कार हेतु इलेक्टिक (विद्युत्)शव-दाह ग्रहों का प्रयोग करना चाहिए,जिससे न तो प्रदूषण होगा न ही ईंधन का अनावश्यक प्रयोग होगा.उसके बाद घर पर छोटा सा हवन -थोड़ी समिधाओं का उपयोग कर,कर  सकते हैं.इस प्रकार हवन की मूल -भावना का निर्वाह भी होगा और लकड़ी का दुरूपयोग भी थमेगा.इस हेतु महर्षि दयानंद सरस्वती ने ७ विशेष आहुतियाँ बतायी हैं जिनसे मृतक की आत्मा की शांति हो जाती है.यह भी ध्यान रखने की बात है कि,रोने-धोने से मृतक की आत्मा को पीड़ा होती है,इसलिए रोना नहीं चाहिए;बल्कि यथा सम्भव मौन धारण कर शोक व्यक्त करना चाहिए.
२ .-एक और विशेष तथ्य यह है कि, देह-दान को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.इस प्रकार तमाम ज़रुरत मंदों को प्रत्यारोपण हेतु आवश्यक मानव अंग सहजता से उपलब्ध हो सकेंगे,साथ-साथ चिकित्सा छात्रों  को व्यवहारिक ज्ञान प्राप्ति में भी ये मानव-शरीर उपयोगी रहेंगे.इस विषय में कानूनी और चिकित्सकीय जानकारी तो डा. दराल सा :ही अच्छी तरह दे पायेंगे.ज्यादातर मेडिकल कॉलेजेस  में ऐसी व्यवस्था होती है और वहां से आवश्यक फार्म भी मिल जाते हैं.चूंकि यह कार्य मृतक क़े आश्रितों को करना है,इसलिए उन्हें भी पहले से ही ऐसा करने क़े लिये तैयार रखना चाहिए.इस व्यवस्था में ढोंग-पाखण्ड से बचाव,लकड़ी की अनावश्यक बर्बादी का बचाव,बिला वजह होने वाले प्रदूषण से बचाव तो होता ही है.बहुत से जीवित लोगों का भला भी होता है.यदि इस व्यवस्था को अपना लें तो मानव अंगों की तस्करी तथा गरीब लोगों का शोषण भी समाप्त हो सकेगा.इस व्यवस्था में भी बाद में घर पर मृतक की आत्मा की शांति हेतु हवन वैदिक पद्धति से किया जा सकता है.
बुद्धीजीवियों,विचारकों,देश-भक्तों और मानवता क़े हितैषियों का यह दायित्व है कि, वे हर-सम्भव प्रयास कर क़े विद्युत्-शव दाह प्रक्रिया तथा देह-दान दोनों का समर्थन व प्रचार करें एवं अपने देश,समाज और सबसे बढ़ कर मानवता क़े प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन करें.डा.टी.एस.दराल साहेब को साधुवाद देना चाहूँगा कि,उन्होंने इस ज्वलंत समस्या की ओर ध्यानाकर्षण करके अपने कर्त्तव्य का सम्यक निर्वाह किया.हम सब को भी उनसे प्रेरणा लेकर अपने -अपने कर्त्तव्य का पालन करना चाहिए.

सम्पादन समन्वय -यशवन्त माथुर

(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)
Advertisements

7 comments on “कुल क्रूर कुरीति तोड़ेंगे,सब दुष्कर्मों को छोड़ेंगे

  1. माथुर साहब , अनाम विद्वान के गीत ने समाज को आईना दिखाया है । काश कि सब समझ सकें ।विजय सिंह का मार्ग दर्शन अत्यंत उपयोगी है ।बेशक पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए विद्धुत शव दाह गृह ही एक विकल्प है जिसे देर सबेर हमें अपनाना ही होगा ।देह दान एक पुण्य का कार्य है । इसके बारे में अभी बहुत सी शंकाएं हैं , जिन्हें मिटाना होगा । मैं भी कोशिश करूँगा इस पर एक लेख लिखने की । इस सार्थक लेख के लिए दिल से आभार ।

  2. विचारोत्तेजक।

  3. डॉ. दराल बधाई के पात्र हैं!

  4. बहुत सार्थक विचार हैं। आपसे और दराल साहिब से पूरी तरह सहमत हूँ। जन चेतना का आपका प्रयास सफल हो। शुभकामनायें।

  5. वीना says:

    आपसे और डा. दराल की बातों से सहमत हूं…संसाधनों की कमी को देखते हुए ये कदम हमें उठाने ही चाहिए…..नव वर्ष मंगलमय हो….

  6. बहुत सुन्दर लेखनी चलाई है माथुर साहब, मन मुग्ध हुआ !

  7. वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित इस महत्वपूर्ण और समाजोपयोगी आलेख के लिए आभार, माथुर जी।साथ में दी गई दोनों कविताएं बहुत प्रेरक हैं।कामना करता हूं कि पाठक वर्ग इस लेख में निहित संदेश को समझ कर इसका अनुकरण करेंगे।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s