समाजवाद और वैदिक मत


हिंदुत्व क्या है?-जब अरब आक्रांता भारत आये तो उन्होंने सिंधु के तटवर्ती लोगों को हिंदू कह दिया क्योंकि वे ‘स ‘ को ‘ह ‘ बोलते थे.जब ईरानी हमलावर आये तो उन्होंने ‘हिंदू’शब्द को अपने फारसी भाषा के अर्थों में प्रयोग किया.हमारे देश की गुलाम प्रवृति  देखिये एक संगठन ‘गर्व से हिंदू’होने का नारा लगाता है.कश्मीर को स्वतन्त्र घोषित करने वाले महाराजा हरी सिंह के सुपुत्र डा.कर्ण सिंह ने ‘विश्व हिंदू परिषद ‘का गठन कर लिया.इस संगठन को प्रसिद्द कार निर्माता कं.’फोर्ड’की संस्था -‘फोर्ड फाउन्डेशन’ने अपनी बेलेंस-शीट में उल्लेख करते हुए भारी ‘दान’दिया जिससे वैषम्य पनपाया गया.

आज से नौ लाख वर्ष पूर्व श्री राम के समकालीन महर्षि वाल्मीकी ने अपनी ‘रामायण’में १२६ बार राम को आर्य-पुत्र कह कर संबोधित किया है -हिंदू कह कर नहीं.इसी प्रकार गोस्वामी तुलसी दास ने अपनी ‘राम चरित मानस’में राम के लिए ‘आर्य-पुत्र’कह कर संबोधित किया है-हिंदू कह कर नहीं.क्यों?क्योंकि ‘हिंदू’शब्द विदेशी आक्रांताओं द्वारा दिया हुआ है -भारतीय संबोधन नहीं है.गुलाम भारत में ‘कुरान’की तर्ज पर ‘पुराण’लिखे गए और आज आजादी के ६३ वर्ष बाद भी गुलाम मानसिकता के लोग खुद को हिंदू कहते हैं.क्योंकि पाश्चात्य साम्राज्यवादी ऐसा ही चाहते हैं.

वैदिक मत क्या है?-सृष्टि के प्रारम्भ में पूर्व सृष्टि की मोक्ष प्राप्त आत्माओं के माध्यम से परमात्मा ने मनुष्यों के लिए जिन नियमों का पालन करने का प्राविधान किया वे वेदों में अन्तर्निहित हैं.उनका अभिप्राय’ प्राकृतिक नियमानुसार आचार-विचार’से है.   वेद   राम और कृष्ण की देन नहीं हैं बल्कि राम और कृष्ण ही वेदों के अनुयायी थे.आज हमारे धर्माचार्य जो वस्तुतः पूंजीवाद के प्रष्ठ्पोशक ठेकेदार ही हैं और जिनका आचरण किसी भी दृष्टि से प्रकृति के नियमानुसार नहीं है,वे वैदिक मत की गलत व्याख्या उपस्थित करके आम जनता को उसके वास्तविक स्वरूप को जानने से रोक रहे हैं.क्योंकि उन्हें भय है की यदि आम आदमी वैदिक मत की सही व्याख्या को जान गया जो की आधुनिक समाजवाद का पर्याय ही है तो निश्चय ही देश में एक जबरदस्त क्रान्ति आ जायेगी जिसके तहत सम्पूर्ण ढांचा ही बदल जाएगा.

अगर हम इतिहास की गहराईयों में जाकर तथ्य रूपी मोतियों को चुनें तो हमें ज्ञात हो जाएगा -वास्तविक वैदिक मत वह नहीं है जैसा हिंदू-धर्म के नाम से समाज में कुरीतियों के रूप में व्याप्त है.वैज्ञानिकों ने अब सिद्ध कर दिया है -अंतरिक्ष में पुच्छल तारे का बारम्बार सूर्यादि ग्रहों से टकराना ही अन्यान्य नक्षत्रों के निर्माण का कारण है.जब हमारी प्रथ्वी और चन्द्रमा सूर्य से ठिठक कर अलग हुए तो ये अग्नि-पिंड ही थे.शनैः शनैः हमारी पृथ्वी  का ताप कम होता गया .आक्सीजन और हाईड्रोजन गैसें जो फ़ैल रहीं थीं जब उनका परस्पर विलियन हुआ तो वर्षा हुयी.इस वर्षा का जल गड्ढों आदि में भरता गया जो कालान्तर में अपने आकार के अनरूप सागर ,महासागर,तालाब,झील आदि कहलाये.

पर्वतीय चट्टानों पर जल का बर्फ के रूप में जमना  और ऋतू अनुरूप पिघल कर बहना तमाम नदियों की उत्पत्ति का कारण बना.काफी अरसे बाद जीवोत्पत्ति हुयी जो सर्वप्रथम जल में सम्भवत: मछली सदृश्य रहा होगा.जल से अलग होने पर स्थल में आने पर इनसे रेंगने वाले सर्पों की उत्पत्ति हुयी.जीव-वैज्ञानिक प्रिंस डी लेमार्क ने अपने व्यवहार और अव्यवहार सिद्धांत में बड़े सुन्दर ढंग से निरूपित किया है -जीव के जो अंग व्यवहार में कार्य नहीं करते अग्रिम पीढ़ियों में  उनका लोप और जिनको अत्यधिक कार्यशील होना पड़ता है उनका आगामी पीढ़ियों में विस्तार होता जाता है और इस प्रकार एक नयी नस्ल विकसित होती जाती है.उदाहरण के लिए बत्तख को लें जब इस जीव के पूर्वजों को निरंतर जल में रहना पडा और पानी पर पंजे पटखते रहने से रक्त संचार द्वारा त्वचा का विकास होता रहा और आज बत्तख के पंजों का जो रूप है वह विकसित हो सका.इसी प्रकार ऊँट को रेगिस्तान में विचरण के कारण पैरों के अगले भाग पर जोर देना पडा जिससे आज इस नस्ल के जीवों में पैर के अगले भाग पिछले की अपेक्षा अधिक भारी पाए जाते हैं.जिर्राफ को ऊंचे वृक्षों से पत्तियां खाने के कारण लंबे समय तक गर्दन ऊंची रखनी पडी और एक लंबी गर्दन की नस्ल वाले जीव की उत्पत्ति हो गयी.इस प्रकार उड़ने वाले सर्पों से पक्षी जीव का विकास हुआ जिसके पंख निकल आये.पक्षी से स्तनधारी जीवों की उत्पत्ति हुयी.गुरिल्ला,वानर,वनमानुष आदि नस्लों को पार करता हुआ आज का मानव अपनी नस्ल तक वर्तमान स्वरूप में पहुँच सका है.

आधुनिक वैज्ञानिकों का यह दृष्टिकोण पूर्ण यथार्थ सत्य को उद्घाटित नहीं करता है.इसमें पहले मुर्गी या पहले अंडा का विवाद चलता रहा है.अभी हाल ही में वैज्ञानिकों ने भी यह स्वीकार किया है -पहले मुर्गी ही आयी फिर उसके गर्भ में अंडा आया.हमारा वैदिक मत इस सम्बन्ध में शुरू से ही यह मानता आया है -सृष्टि के प्रारंभ में परमात्मा ने सभी जीवों की उत्पत्ति युवा रूप में नर और मादा की एक साथ की थी.बाद में उन जीवों ने अपनी संततियों को जन्म दिया जिनका विकास ‘व्यवहार और अव्यवहार’सिद्धांत के अनुसार हुआ है.

आज से लगभग १० लाख वर्ष पूर्व त्रिवृष्टि(वर्तमान तिब्बत),मध्य यूरोप और अफ्रीका में एक साथ युवा पुरुष एवं युवा नारी की कई जोड़ों में सृष्टि की गयी थी. इस धरती पर अपने अवतरण के समय मानव भी अन्य जीवों की तरह नग्न ही रहता था. साग -फल-फूल खाकर ही गुजर बसर किया करता था.वह झुण्ड बना कर रहता था.भूख लगने पर उपलब्ध वास्तु खा लेता था.प्यास लगने पर उपलब्ध जल से क्षुधा शांत कर लेता था.यह युग इतिहास में ‘आदिम साम्यवाद ‘ का युग नाम से जाना जाता है.इस युग में मनुष्य को आवश्यकतानुसार वस्तुएं मिल जाती थीं और वह उनसे संतुष्ट रहता था.इस युग में व्यवस्था मातृ -सत्तात्मक थी क्योंकि कामवासना की पूर्ती भी आवश्यकतानुसार ही हो जाती थी और संतान की पहचान उनकी माँ द्वारा ही होती थी.धीरे-धीरे बुद्धी के विकास के साथ-साथ मनुष्य ने जब देखा उसके द्वारा खा कर फेंके गए फलों के बीजों से नए वृक्ष उत्पन्न हो जाते हैं और उनमें पुनः फल लग आते हैं तो उसने एक स्थान पर जम कर रहने और जरूरत की चीजों को बो कर उगाने की व्यवस्था प्रारम्भ की और इस प्रकार मनुष्य यायावर जीवन से निकल कर ‘कृषि-युग’में प्रविष्ट हुआ और यहीं से ‘निजी मिलकियत’की भावना का उदय हुआ.कृषि में मनुष्य अपनी बुद्धी प्रयोग द्वारा पशुओ की सहायता लेने लगा.अब पशुओं के लिए चारे की भी व्यवस्था हुयी और समाज की स्थापना होने से नियम बनने  लगे,अब भूमि के साथ ही नारी पर भी निजी अधिकार के कारण परिवार बनने लगे.परिवार में मुखिया का और समाज में चुने हुए मुखिया का धीरे-धीरे नियंत्रण बढ़ता गया .प्रारम्भ में इतिहास के इस ‘चारागाह युग’-पास्चर एज में जो लोकतांत्रिक व्यवस्था थी वह शिथिल होने लगी.कृषि में सहायता के लिए सहायक यंत्रों का आविष्कार हुआ जो पत्थर और लकड़ी से बनाए जाते थे.अभी तक मनुष्य कच्चा अन्न और मांस ही खाता था.परन्तु मृत जीवों की पडी-सड़ी हड्डियों में जमे फास्फोरस में जब टकराव और वायु की सहायता से चिंगारी उठते देखा तो प्रारंभिक भय के पश्चात मनुष्य ने इस अग्नि पर निजी अधिकार कर लिया और वह अग्नि को प्रज्वलित रख कर उससे प्रकाश लेने और भोजन को पकाने लगा.धीरे-धीरे अग्नि को घर्षण से उत्पन्न करने की कला आ जाने से अग्नि को सतत प्रज्वलित रखने की समस्या अक समाधान हो गया.अब अग्नि से भोजन पकाते समय यदा-कदा,तत्र-तत्र-सर्वत्र धरान्तरगत धातुएं पिघल-पिघल कर ऊपर आने लगीं तो मनुष्य ने उन पर भी अधिकार जमा कर इस नई अविष्कृत धातु से अपने यंत्र बनाने प्रारम्भ कर दिए.

अब पाषाण युग की समाप्ति और धातु युग का प्रादुर्भाव हो चूका था और इस प्रकार धीरे-धीरे निजी पूंजी का प्रभाव भी बढ़ता चल रहा था.पशुओं और नारी पर निजी अधिकार जमाने के बाद मनुष्य अपने ही कमजोर साथियों को दास बनाने लगा था .उनकी म्हणत से अपनी कृषि,उद्योग और व्यवसाय में इन पशुओं ,दासों और नारियों का शोषण करने लगा था.कुछ पूंजीवादी सरमायेदारों ने अपने तथा-कथित धार्मिक ठेकेदारों से यह कहलवा लिया-‘ढोल,गंवार,शूद्र,पशु नारी;ये सब ताडन के अधिकारी’स्पष्टतः यह दास प्रथा को परिपुष्ट रखने वाली सामंती जकड को धार्मिक जामा पहनाने वाली उक्ति है.इन धूर्तों ने अपनी धृष्टता को छिपाने के लिए इस कुरुक्ति का सूत्रधार क्रांतिकारी तुलसी दास की ‘रामचरित मानस’को बता रखा है जो सर्वथा गलत है.यह बाद में उनके नाम पर जोड़ा गया  पूंजीवादी षड्यंत्र है.वस्तुतः तुलसी दास सच्चे मानव-धर्मी और क्रांतिकारी समाज-सुधारक थे.उन्होंने तत्कालीन समाज में प्रचलित कुरीतियों और शोषण के विरुद्ध आवाज बुलंद की.उस समय जब वेद और शास्त्र पढने का अधिकार भी शूद्रों अर्थात मेहनतकश मजदूरों से छीन लिया गया था ताकि वे आजीवन गुलाम ही रहें और अपने शोषण के विरुद्ध वेद -शास्त्रों में दर्शाए मार्ग को वे पकड़ न लें अन्यथा निजी मिल्क्कियत का खात्मा ही हो जाता .आचार्य तुलसी दास ने अपने ‘क्रांतिकारी समाजवादी’ग्रन्थ -रामचरित मानस में गरुण-काग्भुशुंडी सम्वाद द्वारा शूद्रों अर्थात मेहनतकश कामगारों को यह दिखाया है की ,किस प्रकार काग्भुशुंडी अर्थात जो कॉआ पक्षियों में हेय अर्थात शूद्र माना जाता है अपने ज्ञानार्जन गरुड़ जो पक्षी श्रेष्ठ ब्राह्मण वर्ग में माना जाता है से  प्रभावी  हो सका.यह एक सन्देश है जो उन्होंने रामचरित मानस द्वारा उस समय की सार्वजनिक भाषा-अवधी में उस समय की मेहनतकश कामगार जनता को दिया.इसी प्रकार तुलसी दास ने तथाकथित शूद्र वर्ग की नारी शबरी द्वारा अपने झूठे बेर श्री राम को खिलाने कॉ वर्णन देकर यह सन्देश दिया है की कोई नीच या ऊँच जन्म से नहीं होता है और यह कृत्रिम भेद मिटाना होगा,जैसे श्री राम ने मिटाया.रामचरित मानस में वर्णित राम-रावण युद्ध वस्तुतः ‘पूंजीवादी साम्राज्यवाद’ और ‘राष्ट्रवादी समाजवाद’का विश्वव्यापी संघर्ष था.सभ्यता के विकास के साथ हमारे देश में जब संस्कृति का संगठन हुआ तो प्राचीन ऋषियों ने जो (आज के सरमायेदार तथाकथित धार्मिक ठेकेदार नहीं थे बल्कि) सच्चे समतावादी -मानव धर्मी थे.ऋषि-गण ने विश्व को समतावाद का सन्देश देने के लिए शिष्टमण्डल विदेशों में भी भेजे.उन्होंने इस समतावादी मानव धर्म को आर्ष जिसका अपभ्रंश आर्य है घोषित किया.

आर्य का अभिप्राय सर्वश्रेष्ठ से है.जिस प्रकार प्रकृति का नियम है कि जल सदैव निम्न स्तर पर ही बहेगा -नदियाँ पर्वतों से निकल कर सागर में विलुप्त होती हैं;और धुआं सदैव ऊपर ही जाएगा-धुआं हल्की गैसों का समूह ही तो है और हमारा आचरण सदैव हल्का एवं ऊंचा उठने वाला ही होना चाहिए.हमारे ऋषियों ने बताया कि क्या है और क्यों है -यही उनका आर्य-धर्म अर्थात वैदिक मत है.विज्ञान बताता है कि पदार्थ है और वह क्या है लेकिन हमारे ऋषियों ने साथ-साथ यह भी बताया कि वह क्यों है?आज का विज्ञान अभी तक क्यों का उत्तर नहीं खोज पाया है वह शक्ति को मानता है.विज्ञान कहता है कि Energy is Ghost .हमारे ऋषियों ने अणु और परमाणु को मानव से आत्मा और परमात्मा के रूप में निरूपित किया है.इस प्रकार प्रकृति-नियमानुसार आचरण ही मूल वैदिक धर्म है जो अन्तः चेतना के आधार पर ही क्रियाशील होता है.यही अन्तरात्मा की आवाज ही परमात्मा का निर्देश है.मनुष्य निजी स्वार्थवश और अहम् में केन्द्रित होकर जब इसका उल्लंघन करता हैतो वह शोषण और उत्पीडन की राह पर बढ़ जाता है.अपने ‘आतंक और पूंजी बल ‘से फिर भी वह अपना ही जयकारा करवा लेता है जो कि वैदिक मत का पूर्ण उल्लघन है.हमारे ऋषी शिष्ट मण्डल इसी सन्देश को लेकर सम्पूर्ण विश्व में फैले थे.उद्देश्य था-‘वसुधैव-कुटुम्बकम’ जो कि अपने को हिन्दू कहने वालों का नहीं है.(तथाकथित ‘हिन्दू’घृणा-विद्वेष ,उंच-नीच,छुआ-छूत,ढोंग-पाखण्ड के अलमबरदार होते हैं).अतः आर्य शब्द किसी भी रूप में हिन्दू का पर्यायवाची नहीं है.

पूर्व दिशा से ‘मय’और ‘तक्षक ‘नामक आर्य ऋषियों के नेतृत्व में गया शिष्ट मण्डल वर्तमान आसाम ,अरुणाचल को पार करके कोरिया,साईबेरिया के मार्ग से ‘अलास्का ‘ होता हुआ वर्तमान यूं.एस.ए.में प्रविष्ट हुआ था .’तक्षक’ऋषि की स्मृति में आज का टेक्सास और ‘मय’ऋषि की स्थिति वाला स्थान वर्तमान मेक्सिको  उन्हीं के नाम पर है.

पश्चिम से जाने वाले ऋषि वर्तमान अफगानिस्तान को पार करके ‘आर्य नगर’अर्थात ‘ऐर्यान’अर्थात आज के ईरान में गए थे.ईरान के अपदस्थ शाह खुद को ‘आर्य मेहर रजा पहलवी’इसी   परम्परा के कारण लिखते थे.

दक्षिण दिशा से ‘पुलत्स्य’मुनि वर्तमान आस्ट्रेलिया पहुंचे.परन्तु उनके पुत्र विश्रवामुनि ने वहां राज्य कायम कर लिया और व्यापार आदि के पूंजीवादी घेरे में पड़ गए.उन्होंने वर्तमान श्री लंका के तत्कालीन शासक सोमाली को हरा कर भगा दिया और लंका पर आधिपत्य कर लिया.रजा सोमाली भाग कर वहां जा बसा जो उसी के नाम पर अब सोमाली लैंड कहलाता है.इन्हीं विश्रवा मुनि के तीन पत्नियों से तीन पुत्र थे-कुबेर,रावण और विभीषण .उनकी मृत्यु के उपरान्त तीनों में सत्ता और मिलकियत पर कब्जे हेतु संघर्ष हुआ.कुबेर हारने के बाद  भाग कर अपने नाना प्रयाग के भारद्वाज मुनि के पास पहुंचा जिन्होंने उसे स्वर्ग-लोक अर्थात वर्तमान हिमाचल-प्रदेश में एक राज्य बसा दिया.विभीषण ने रावण की प्रभुसत्ता स्वीकार कर ली.

रावण घोर साम्राज्यवादी था.पाताल लोक अर्थात वर्तमान यूं.एस.ए.आदि को कब्जे में लेकर ईरान आदि पर उसने अधिकार कर लिया वह स्वंय को ‘रक्षस ‘अर्थात आर्य सभ्यता और संस्कृति की रक्षा करने वाला कहने लगा क्योंकी वह भारत के चारों और अपना साम्राज्य फैला चूका था और भारत तथा भारतीय संस्कृति का स्वंय को रखवाला समझता था.(विशेष ज्ञातव्य यह है कि जैसा एक सरकारी डा.जो खुद को ‘हिन्दी,हिन्दू,हिंदुस्तान का रखवाला घोषित किये हुए है रावण को भी हिन्दू कहता है.रावण ने खुद को आर्य सभ्यता का रक्षस माना है -हिन्दू शब्द तब तक प्रचलन में था ही नहीं जो विदेशियों द्वारा फैलाया गया उसी को ओढ़ कर एक तबका खुद को खुदा समझ रहा है).इस समय तक भारत के भीतर भी निजी पूंजी काफी फल-फूल चुकी थी और बड़े राजा छोटे राज्यों पर अधिकार करते जा रहे थे.परन्तु भारत के बाहर के आर्यों के विरुद्ध वे एकजुट थे,इसी लिए सप्त-सैन्धव प्रदेश अर्थात आज के पंजाब,सिंध आदि सीमान्त प्रदेशों में सत्ता-संघर्ष होते रहते थे जो देवासुर-संग्राम कहलाते हैं.

मानव-धर्मी समतावादी चिन्तक ऋषियों ने योजनाबद्ध तरीके से श्री राम को राजसिक विलासिता से दूर रख कर मुनि विश्वामित्र के मार्ग-दर्शन में समतावाद का पाठ पढ़ा क्र इसके प्रासार के लिए जुझारू बनाया .समयांतर से वन-वास के माध्यम से श्री राम ने इस देश की मेहनतकश जनता के बीच रह कर उसके दुःख-दर्दों को समझा और उसके हितों की रक्षा के लिए शास्त्र उठाया.उन्होंने रावण के साम्राज्यवादी आधिपत्य को विश्व की कोटि-कोटि गरीब जनता की सहायता से ऋक्ष-प्रदेश वर्तमान महाराष्ट्र और वा-नर प्रदेश वर्तमान कर्नाटक के क्रांतिकारी वीरों के सेनापतित्व में ध्वंस किया.

क्रांतिकारी तुलसी दास जी के काल में मुग़ल शासक पुत्रों के विद्रोह का शिकार थे.अकबर के विरुद्ध सलीम तथा बाद में जहांगीर के विरुद्ध खुर्रम के विद्रोह हो  रहे थे ऐसी परिस्थितियों में राम और भरत का आदर्श उपस्थित कर गो.तुलसीदास ने एक नूतन दृष्टांत प्रस्तुत किया था.तुलसी दास जी का उद्देश्य मुग़ल शासन के विरुद्ध जनता को जाग्रत करना था.श्री राम आज भी कोटि-कोटि भारतीयों के ह्रदय सम्राट हैं क्योंकि उन्होंने अन्तर राष्ट्रीय साम्राज्यवाद  के विरुद्ध भारतीय समता मूलक (समाजवादी)राष्ट्रवाद का कुशल नेतृत्व किया था.मानव द्वारा मानव के शोषण से रहित समता-मूलक समाज की स्थापना करने की भावना ही वास्तविक ‘सनातन-वैदिक दृष्टिकोण है और यही सच्चा ‘समाजवाद’है.

आज फिर सिर-फिरे लोग सच्चाई पर कुठाराघात कर  रहे हैं,शोषण ,उत्पीडन,भ्रष्टाचार का बोल-बाला है. अतः पुनः अपने पुराने वैदिक समाजवाद को अपनाने की महती आवश्यकता है.साम्राज्यवादियों के हिमायती झूठे धर्म के नाम पर इसका विरोध करते हैं,उनसे सावधान रहने की बहुत जरूरत है.

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5 comments on “समाजवाद और वैदिक मत

  1. पृथ्वी एवं संस्कृति के विकास के साथ ही सांस्कृतिक गिरावट की इतिहासबद्ध व्याख्या के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई !

  2. बहुत ही अच्छी व्याख्या की है आपने, साधुवाद.जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

  3. Vijay ji, aapne bahut vistar se jankari di hai, ise save kar liya hai, bad men aaraam se padhunga.

  4. JALES MEERUT says:

    कामरेड, आपके आलेख पढ़कर आचार्य दीपांकर याद आ गए | आर्य संस्कृति के निरंतर शोध की आवश्यकता है | आपका प्रयास महत्वपूर्ण र्है | —-अमरनाथ 'मधुर' मो.न.9457266975

  5. Vijai Mathur says:

    फेसबुक ग्रुप-लाल झण्डा यूनिटी सेंटर पर प्राप्त टिप्पणी-Upendraprasad Singh का श्रीपत अमृत डांगे की श्रंखला को आगे बढ़ाया है …साधुवादUpendraprasad Singh विजय भाई स्वागत है .

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