समझना


पूनम माथुर 

किसे कहें अपना
किसे पराया
कोई खद्दरधारी
कोई चद्दरधारी
कोई दुत्कार करे
कोई सत्कार करे
कोई समझता अपना
कोई समझता पराया
कोई कहे आत्मा
कोई कहे परमात्मा
कौन है सच्चा
कौन है  झूठा
कोई कहे एक
कोई कहे अनेक
कोई देता सजा
कोई लेता मजा
कोई देता दवा
कोई देता दगा
क्या है एकसार
क्या है विस्तार
कौन किसे बिगाड़े
कौन किसे संवारे
एक नैया आना
एक नैया जाना
समझ का फेर माना
सबको एक दिन आना-जाना
सबमे तू  ही समाया
यह किसी ने न जाना।

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12 comments on “समझना

  1. बहुत अच्छी कविता लिखी है मम्मी ने।

  2. Bhushan says:

    "सबमे तू ही समायायह किसी ने न जाना।"जीवन की दौड़-धूप के बाद व्यक्ति इसी निष्कर्ष पर पहुँचता है. पूनम बहन जी ने बहुत सुंदर कविता लिखी है. बहुत बहुत आभार.

  3. बहुत सुन्दर, सार्थक कविता| धन्यवाद|

  4. बहुत बढ़िया |बधाई ||http://dineshkidillagi.blogspot.com/

  5. सच्चाई को बयाँ करती सुन्दर कविता ।समझ का फेर मानासबको एक दिन आना-जानासबमे तू ही समायायह किसी ने न जाना।बस इसी समझ की कमी रहती है ।

  6. समझ का फेर मानासबको एक दिन आना-जानासबमे तू ही समायायह किसी ने न जाना।बहुत गहरी बात लिए पंक्तियाँ…..

  7. सदा says:

    बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

  8. ana says:

    bahut hi satik bate…dil ko chhoo gayi

  9. सार्थक चिंतन पूनम जी…सादर बधाईयां….

  10. सबमे तू ही समायायही तो समझना है!सुंदर !

  11. जो इस बात को जानता है वो चिंता मुक्त रहता है …

  12. Reena Maurya says:

    बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने प्रत्येक पंक्ति भावमय और अर्थपूर्ण है..

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