बदलल रूप खुशी के

(श्रीमती पूनम माथुर )

हमार घर के सामने मकान बन रहल बा सूबेरे से साँझ तक मजदूर मकान बनावे मे लागल रहेला। ओकर मालिक खड़ा होकर निगरानी करे ला काम  करि त पईसा मिली सबेरे से साँझ बिता लेवे ला । ओकर त दिमाग औरु देह दूनों लागल रहे ला। अफसर  लोग त इहै मजदूर के बनावल बड़का-बड़का आफिस मे कांम करेलन और तनखाह औरु जी पी एफ हर चीज के सुविधा बा। लाखों मे खेल रहल बाड़न -गाड़ी ,मोटर,बंगला सब कुछ उन  लोगन के खातिर लेकिन जे हाड़ -पीट के मकान बनावे ला मजदूर ओकर कोनों कदर नई खे यीहे समाज बा ओकरा के गोड़ के धूर समझल जा ला। समानता,एकता ,भाई -चारा ,ऊंच-नीच ,जाति-पांत मिटावे खातिर संत-म्हातमा पैदा लेलन लेकिन यी सब बात पर कोई के असर भईल? घर के नीचे सड़क पर एगो आदमी बतियावत जात रहे-“जब हम सम्पन्न तो खुदा भी प्रसन्न” जब इन्सान के अंदर यीहे भावना आ गईल तअ समाज के उठान कहाँ से होई। यी तो संमाज ऊंच-नीच पईसा औरु बेपईसा बालन के बीच बट गईल बा। एगो के बोरा मे पईसा रखे के जगह नई खे एगो के हाथ खाली । येही से शोषक औरु शोषित शुरू हो रहल बा।

एगो साइंटिस्ट हमार घर के बगल मे रहेलन ऊ मजदूर लोग की झोंपड़ी पुलिस के द्वारा जलावे के पर कहलन -“आप के घर के आगे झोंपड़ियाँ होतीं तो आपके घर की रौनक नहीं खराब होती क्या?पुलिस ने इन झोंपड़ियों को जला कर अच्छा ही किया”। कीचड़ मे जब गाड़ी के पहिया फंस जाई यीहे मजदूर हांथ लगा के गाड़ी के पहिया निकाल देवे ला ओकर इनके दिल मे यीहे जगह बा। सच्चे  मे  शरम से गड़ जाये के चाँही अइसन मानुष के त ।
तू आदमी हव की जानवर ।

एगो सिनेमा के कलाकार के पूर्वज लोग डाकू रहन ऊ डाकू लोग अइसन रहन की गरीब-मजलूम  बेसहारा मजदूर वर्ग के लोग के अमीरन से पईसा लूट के ई  तरह के लोगन के मदद करत रहन । आज की परिस्थिति मे  ओइसन लोगन के बहुत जरूरत बाटे। तभी समाज के ई पईसा के ठेकेदारन की ऐसी-की -तैसी हो जाई,  ओइसन  दुष्ट लोग थर-थर काँपे लागी। हम त ऐसे डाकू लोगन के श्रद्धा से प्रणाम कर अ तानी । अइसन लोग समाज मे आकर उच्च्श्रंखलता बंद करे ताकि एक सभ्य औरु बढ़ियाँ समाज के निर्माण हो सके ।

का कहीं दिल मे तो बहुत बात बा। सोंचते-सोंचते लागे ला की दिमाग फट जाई यी दुनिया के लोगन के देखला पर एगो स्लोगन  याद आवे ला -“हम दो ,हमारे दो” ई जगह मे होये के चांही ” हम दो -बांटेगे खुशियाँ दसियों को”। ई तरह के लोगन के मालिक शराब पिया के पिये वाला बना देवे ला ताकि अगर ऊ जागरूक होई तो हमार बात न मानी औरु हम ओकरा ऊपर राज न कर सकब । बेचारा जब एक प्याली चाय के ऊपर दिन भर काम करे ला औरु साँझ के जब पईसा मिली तब थोड़े-थोड़े समान खरीद के खाना बनावे ला तीस दिन के राशन-पानी त ओकरा पास नई खे । सुबह और साँझ भर के बा। देखि ला बहुत मजदूर काम न मिले ला तो लौट जाला । हमार बाबू जी त दिवंगत हो गइल रहलन कुछ बरस के बाद जब हम अपना नैहर गइनी त हमार माई ई कहलस  जान त रे बेटा थोड़े दूर पर एगो मजदूर के परिवार साँझ के नहा-धो के खाना खाय खातिर बईठर रहे की घर के मालिक आवे त खाना शुरू होवे। ओकरा घरे मछरी औरु भात बनल रहे बच्चा सब के खुशी के कोई ठिकाना न रहे की आज बड़ी दिन बाद माई-बाबू के संग मछरी औरु भात मिल के खाइब। ओकर घर मे डिबरी जरत रहे ओही से घर मे रोशनी हॉत  रहे सब बड़ी खुश ,एतने देर मे एगो बिलैया मछरी खाय के खातिर कड़ाही पर कूदल डिबरी गिर गईल औरु किरासन तेल बिखरा गइल आग लग गइल अब त सारे घरे मे आग फ़ेल गइल औरु विकराल रूप  ले लेलस हाय-पुकार मच गइल के खा ल मछरी औरु भात ?बचावा -बचावा आवाज कान मे आ गइल गर्मी के दिन आग इतना भयंकर रूप ले लेलस थोड़े देर मे काम तमाम । हो गइल सब के सब स्वाहा । हमार बूढ माई कहअते-कहअते एतना रोये  लागल की ओकर तबीयत खराब हो गइल। सोंची ल त लागे ल की यीहे जिंदगी मजदूर औरु गरीब वर्ग के बा ?रउआ सब बतायीं की एकर का उपाय होये के चांही?


(29 तारीख के ‘हिंदुस्तान’ अखबार मे 40 झोपड़ी मे आग लागे के खबर छापल पढ़ के हम्ररा एक बैग दिमाग मे पुरान घटना -दुर्घटना जे कहीं ऊ याद पड़ गईल ,एही से यी  लिख रहल  बानी ; पढ़ के त मन अजीब हो जाला लेकिन इंसान का करे?—पूनम माथुर)  

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1991 के अप्रकाशित लेख-(3 )/ ‘मानवता का हत्यारा -जार्ज बुश’

सन 1991 मे राजनीतिक परिस्थितिए कुछ इस प्रकार तेजी से मुड़ी कि हमारे लेख जो एक अंक मे एक से अधिक संख्या मे ‘सप्त दिवा साप्ताहिक’,आगरा के प्रधान संपादक छाप देते थे उन्हें उनके फाइनेंसर्स जो फासिस्ट  समर्थक थे ने मेरे लेखों मे संशोधन करने को कहा। मैंने अपने लेखों मे संशोधन करने के बजाए उनसे वापिस मांग लिया जो अब तक कहीं और भी प्रकाशित नहीं कराये थे उन्हें अब इस ब्लाग पर सार्वजनिक कर रहा हूँ और उसका कारण आज फिर देश पर मंडरा रहा फासिस्ट तानाशाही का खतरा है। जार्ज बुश,सद्दाम हुसैन आदि के संबंध मे उस वक्त के हिसाब से लिखे ये लेख ज्यों के त्यों उसी  रूप मे प्रस्तुत हैं-

‘मानवता का हत्यारा -जार्ज बुश’

वह दिन अब दूर नहीं जब आज के नौनिहालों की संताने डाक्ट्रेट हासिल करने के लिए अपने शोध-ग्रन्थों मे अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश को मानवता का निर्मम संहार करने वाला एक जघन्य अपराधी और क्रूरतम -हत्यारा लिख कर वर्तमान काल का ऐतिहासिक मूल्यांकन करेंगी। काश साम्राज्यवादी लूट के सौदागरों का सरगना अमेरिका शोषण-प्रवृत्ति के लोभ को त्याग सकता और अपने राष्ट्रपति की भावी छीछालेदर को बचा सकता! 


आज नहीं तो कल वर्ना परसों तो तृतीय विश्वमहायुद्ध अब छिड़ने ही जा रहा है। पूंजीवादी प्रेस और आंध्राष्ट्रीयतावादी ईराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को इसके लिए उत्तरदाई ठहरा रहे हैं। पश्चिम के साम्राज्यवादी प्रेस ने तो प्रेसीडेंट सद्दाम की तुलना नाजी हिटलर से की है। परंतु वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है।

सिक्किम ने वैधानिक रूप से भारत मे अपना विलय कर लिया था परंतु पुर्तगाली साम्राज्य से मुक्त कराने के लिए 1961 मे हमे भी गोवा मे बल -प्रयोग करना पड़ा था। इसी प्रकार कुवैत जो मूलतः ईराकी गणराज्य का अभिन्न अंग था,पाश्चात्य साम्राज्यवादी लुटेरे देशों की दुरभि संधि से ईराक से अलग किया गया था और तथाकथित स्वतन्त्रता के लबादे मे साम्राज्यवाड़ियों का ही उपनिवेश था। अतः 02 अगस्त 1990 को ईराक ने  बलपूर्वक  पुनः कुवैत का ईराक मे विलय कर लिया। एक प्रकार से यह पुराने षड्यंत्र को विफल किया गया था।

संयुक्त राष्ट्रसंघ दोषी-

जिस प्रकार लीग आफ नेशन्स की गलतियों से 1939 मे जर्मनी द्वारा पोलैंड पर आक्रमण करने से द्वितीय विश्वमहायुद्ध भड़का था;ठीक उसी प्रकार आज भी संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा ईराक को कुवैत न छोडने पर युद्ध का आल्टीमेटम देने और अमेरिका द्वारा उस पर अमल करने की आड़ मे ईराक पर हमला करने से तृतीय विश्वमहायुद्ध महाप्रलय लाने हेतु छिड़ने की संभावना प्रबल है।

जब लीबिया पर अमेरिकी राष्ट्रपति बमबारी की ;राष्ट्रसंघ मौन रहा,जब पनामा मे हमला कर वहाँ के राष्ट्रपति को कैद करके अमेरिका ले जाया गया,राष्ट्रसंघ मौन रहा। इससे पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री मारग्रेट थैचर ने फाकलैंड द्वीप पर हमला करके उसे अर्जेन्टीना से छीन लिया राष्ट्रसंघ मौन रहा। इज़राईल लगातार राष्ट्रसंघ प्रस्तावों की अवहेलना करके जार्डन के गाजा पट्टी इत्यादि इलाकों को जबरन हथियाए बैठा है-राष्ट्रसंघ नपुसंक बना रहा। सिर्फ ईराक का राष्ट्रीय एकीकरण राष्ट्रसंघ की निगाह मे इसलिए गलत है कि,अमेरिका के आर्थिक और साम्राज्यवादी हितों को ठेस पहुँच रही है।

बाज़ारों की लड़ाई है-

ब्रिटेन ,फ्रांस,पुर्तगाल और हालैण्ड सम्पूर्ण विश्व पर अपने कुटिल व्यापार और शोषण के सहारे प्रभुत्व जमाये हुये थे। यूरोप मे भी और अपने उपनिवेशों मे भी अपने-अपने बाजार फैलाने के लिए ये परस्पर सशस्त्र संघर्ष करते रहते थे। परंतु जर्मनी द्वारा प्रिंस बिस्मार्क के प्रधान् मंत्रित्व और विलियम क़ैसर द्वितीय के शासन मे तीव्र औद्योगिक विकास कर लेने के बाद उसे भी अपना तैयार माल बेचने के लिए ‘बाजार’ की आवश्यकता थी। इसलिए वह पहले से स्थापित साम्राज्यवाड़ियों का साझा शत्रु था। ‘प्रशिया ‘प्रांत को जर्मनी से निकाल देने पर समस्त साम्राज्यवादी प्रतिद्वंदी इकट्ठे हो कर जर्मनी पर टूट पड़े और 1914 मे प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ गया। पराजित जर्मनी को बाँट डाला गया। विश्व शांति के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति विल्सन की पहल पर ‘लीग आफ नेशन्स’की स्थापना हुई।


द्वितीय विश्व महायुद्ध भी बाजारू टकराव था-

अमेरिका स्वंय लीग का सदस्य नहीं बना। पराजित जर्मनी मे हर एडोल्फ़ हिटलर,इटली मे बोनीटो मुसोलिनी और जापान मे प्रधानमंत्री टोजो के नेतृत्व मे द्रुत गति से औद्योगिक विकास हुआ और ये तीनों अमेरिका,ब्रिटेन व फ्रांस के समकक्ष आ गए परंतु बाज़ारों पर कब्जा न कर पाये। इटली ने ‘अबीसीनिया’ पर आक्रमण कर अपने साम्राज्य मे मिला लिया। लीग लुंज-पुंज रहा। 1939 मे जर्मनी ने अपने पुराने भाग पोलैंड पर आक्रमण कर दिया और द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया जिसकी समाप्ती 1945 मे जापान के हीरोशिमा और नागासाकी पर अणु-बमों द्वारा अमेरिकी प्रहार से हुई। पुनः विश्व शांति के लिए ‘संयुक्त राष्ट्रसंघ’ की स्थापना हुई जिसमे विजेता पाँच राष्ट्रों -अमेरिका,ब्रिटेन,फ्रांस,रूस और चीन को विशेषाधिकार -वीटो दे कर व्यवहार मे इसे पंगु बना दिया गया। इज़राईल के विरुद्ध यू एन ओ का कुछ न कर पाना अमेरिकी वीटो का ही करिश्मा हा।

तृतीय विश्वयुद्ध का प्रयास भी साम्राज्यवादी बाजार की रक्षा का प्रयास है-

ईराक द्वारा विश्व के पांचवे भाग का तेल उत्पादक क्षेत्र वापिस अपने देश मे मिलाने से साम्राज्यवादी लुटेरे देशों और उनके आका अमेरिका को अपने हाथ से विश्व बाजार खिसकता नज़र आया और उसी बाज़ार को बचाने के असफल प्रयास मे अमेरिका समस्त मानवता को विनष्ट करने पर तुला हुआ है। पैसा नहीं तो जी कर क्या करेगा पैसों वाला और अकेला क्यों मारे सभी को ले मरेगा अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश।

खाड़ी देशों से प्राप्त होने वाला तेल एक ऐसा ऊर्जा स्त्रोत है जिस पर आज का सम्पूर्ण औद्योगिक विकास व आर्थिक प्रगति निर्भर हो गई है। कल-कारखानों के लिए ईधन हो या विद्युत जेनेरेटर के लिए अथवा खेतों के पंप सेटों के लिए तेल ही की आवश्यकता है। रेलें,यान,पोत सभी को तो तेल चाहिए। अब तक साम्राज्यवादी देश तेल का अधिकांश भाग अपने दबदबे से हड़प लेते थे। राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने ईराक की सत्ता समहालते ही साम्राज्यवाड़ियों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया और ईराक को एक प्रगतिशील-समृद्ध -सुदृढ़ राष्ट्र का स्वरूप प्रदान किया जबकि,अन्य खाड़ी देश अब भी साम्राज्यवाड़ियों के पिछलग्गू हैं। कुवैत लेकर सद्दाम ने साम्राज्यवाड़ियों का बाजार छीन लिया अतः उन पर युद्ध थोपा जा रहा है,उद्देश्य है ईराक मे तख़्ता पलट अथवा पराजय से साम्राज्यवाड़ियों का विश्व बाजार चंगुल मे फंसाए रखा जाये। (मेरा 1991 मे यह आंकलन गलत नहीं था ,बाद मे ऐसा ही हुआ और अभी-अभी लीबिया मे भी गद्दाफ़ी के खात्मे से इसकी पुष्टि होती है। )


महा विनाश होगा-

विश्व मे अब तक उपलब्ध परमाणु भंडार मे इतनी संहारक क्षमता है कि सम्पूर्ण प्रथ्वी को छप्पन (56)बार समूल विनष्ट किया जा सकता है। शायद परमाणु युद्ध अपने पूरे यौवन के साथ न भी खेला जाये । परंतु युद्ध प्रारम्भ हो जाने पर ईराक समर्थक जारदन,अल्जीरिया आदि राष्ट्र व विरोधी सऊदी अरब,मिश्र और उनके गुरुघंटाल अमेरिका,ब्रिटेन आदि शत्रु देशों के तेल-कूपों पर प्रहार करेंगे। समस्त खाड़ी क्षेत्र जन-संख्या से वीरान तो हो ही जाएगा उनका भूमिगत तेल-भंडार ज्वालामुखी के विस्फोटों के साथ जल उठेगा। वैज्ञानिकों के अनुसार तब कई वर्षों तक वर्षा नहीं होगी और जब होगी तो अम्लीय जिससे भूमि ऊसर हो जाएगी। अकाल और महामारियों से जन-विनाश होगा। अनुमान है कि,तृतीय महायुद्ध जब भी होगा उसकी समाप्ती होते-होते विश्व की एक चौथाई आबादी ही बचेगी। यदि परमाणु युद्ध भी हुआ तो वायु मण्डल मे ओज़ोन गैस की परतें फट जाएंगी जिससे सूर्य का प्रकाश सीधे प्रथ्वी पर पद कर समस्त जीवों का दहन कर देगा और बचेगा ज्वालामुखी का लावा,खंधर,वीरान प्रथवी मण्डल तब कहाँ साम्राज्यवाद होगा?कहाँ बाजार?और कहाँ जार्ज बुश और उनका अमेरिका। क्या प्रथवी पर मानवता का संचार होने की कोई संभावना है?

पूनम की दो कवितायें

तीन 

(श्रीमती पूनम माथुर )

सम से समता

निज से निजता  
एक से एकता
लघु से लघुता
प्रभु से प्रभुता 
मानव से मानवता
दानव से दानवता
सुंदर से सुंदरता 
जड़ से जड़ता
छल से छलता
जल से जलता
दृढ़ से दृढ़ता  
ठग से ठगता
कर्म से कर्मठता
दीन से दीनता
चंचल से चंचलता
कठोर से कठोरता
समझ से समझता
खेल से खेलता
पढ़ से पढ़ता
इस का विधाता
से रिश्ता होता
ये दिल जानता
ये गहरा नाता
गर समझना आता
अपना सब लगता
मन हमारा मानता
दर्द न होता
जग अपना होता
विधाता का करता
गुणगान शीश झुकाता
मानवधर्म का मानवता
से सर्वोत्तम रिश्ता
सेवा प्रार्थना होता
सबसे अच्छा होता
ये गहरा रिश्ता
अगर सबने होता
समझा ये नाता
दिलों मे होता
रामकृष्ण गर बसता
संसार सुंदर होता
झगड़ा न होता
विषमता से समता
आ गया होता
विधाता से निकटता
तब हो जाता
जग तुमसा होता
जय भू माता 


        * * *
(नोट- यह कविता ‘जो मेरा मन कहे ‘ पर प्रकाशित हो चुकी है)


 देखा एक बच्चा 

हमने एक छोटा बच्चा देखा 
उसमे पिता का नक्शा देखा 
दादा दादी का राजदुलारा देखा 
उसकी माँ ने उसमे संसार का नजारा देखा 
अपनों ने उसमे अपना बचपन देखा 
बच्चों का उसमे सजीव चित्रण देखा 
इनकी मस्तानी और निराली दुनिया को देखा 
प्रेम मोहब्बत की दुनिया को देखा 
सबसे अच्छी दुनिया को देखा 
इनकी भोली सूरत के आगे दुश्मनों को भी झुकते देखा 
दुश्मनों को भी इनको चूमते देखा 
इनको गैरों को भी अपना बनाते देखा 
इस फरिश्ते के आगे सबको नमन करते देखा 
सुख-दुख भूल सबको इनमे घुल मिल जाते देखा 
(यशवन्त के जन्मदिन पर उसको माता पूनम का आशीर्वाद)

धर्म,ज्योतिष और साम्यवाद

‘धर्म’ के सम्बन्ध मे निरन्तर लोग लिखते और अपने विचार व्यक्त करते रहते हैं परंतु मतैक्य नहीं है। ज़्यादातर लोग धर्म का मतलब किसी मंदिर,मस्जिद/मजार ,चर्च या गुरुद्वारा अथवा ऐसे ही दूसरे स्थानों  पर जाकर  उपासना करने से लेते हैं। इसी लिए इसके एंटी थीसिस वाले लोग ‘धर्म’ को अफीम और शोषण का उपक्रम घोषित करके विरोध करते हैं । दोनों दृष्टिकोण अज्ञान पर आधारित हैं। ‘धर्म’ है क्या? इसे समझने और बताने की ज़रूरत कोई नहीं समझता।

धर्म=शरीर को धारण करने के लिए जो आवश्यक है वह ‘धर्म’ है। यह व्यक्ति सापेक्ष है और सभी को हर समय एक ही तरीके से नहीं चलाया जा सकता। उदाहरणार्थ ‘दही’ जो स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है किसी सर्दी-जुकाम वाले व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता। ऐसे ही स्वास्थ्यवर्धक मूली भी ऐसे रोगी को नहीं दी जा सकती। क्योंकि यदि सर्दी-जुकाम वाले व्यक्ति को मूली और दही खिलाएँगे तो उसे निमोनिया हो जाएगा अतः उसके लिए सर्दी-जुकाम रहने तक दही और मूली का सेवन ‘अधर्म’ है। परंतु यही एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए ‘धर्म’ है।

मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध बनाने के लिए जो प्रक्रियाएं हैं वे सभी ‘धर्म’ हैं। लेकिन जिन प्रक्रियाओं से मानव जीवन को आघात पहुंचता है वे सभी ‘अधर्म’ हैं। देश,काल,परिस्थिति का विभेद किए बगैर सभी मानवों का कल्याण करने की भावना ‘धर्म’ है।

ऋग्वेद के इस मंत्र को देखें-


सर्वे भवनतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया :
सर्वे भद्राणि पशयनतु मा कश्चिद दु : ख भाग भवेत। ।


इस मंत्र मे क्या कहा गया है उसे इसके भावार्थ से समझ सकते हैं-


सबका भला करो भगवान ,सब पर दया करो भगवान।
सब पर कृपा करो भगवान,सब का सब विधि हो कल्याण। ।
हे ईश सब सुखी हों ,कोई न हो दुखारी।
सब हों निरोग भगवान,धन धान्य के भण्डारी। ।
सब भद्र भाव देखें,सन्मार्ग के पथिक हों।
दुखिया न कोई होवे,सृष्टि मे प्राण धारी । ।


ऋग्वेद का यह संदेश न केवल संसार के सभी मानवों अपितु सभी जीव धारियों के कल्याण की बात करता है। क्या यह ‘धर्म’ नहीं है?क्या इसकी आलोचना करके किसी वर्ग विशेष के हितसाधन की बात नहीं सोची जा रही है। जिन पुरोहितों ने धर्म की गलत व्याख्या प्रस्तुत की है उनकी आलोचना और विरोध करने के बजाये धर्म की आलोचना करके शोषित-उत्पीड़ित मानवों की उपेक्षा करने वालों (शोषकों ,उत्पीड़को) को ही लाभ पहुंचाने का उपक्रम है।


भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)।
 क्या इन तत्वों की भूमिका को मानव जीवन मे नकारा जा सकता है?और ये ही पाँच तत्व सृष्टि,पालन और संहार करते हैं जिस कारण इनही को GOD कहते हैं  …

GOD=G(generator)+O(operator)+D(destroyer)।
खुदा=और चूंकि ये तत्व’ खुद ‘ ही बने हैं इन्हे किसी प्राणी ने बनाया नहीं है इसलिए ये ही ‘खुदा’ हैं।

‘भगवान=GOD=खुदा’ – मानव ही नहीं जीव -मात्र के कल्याण के तत्व हैं न कि किसी जाति या वर्ग-विशेष के।

पोंगा-पंथी,ढ़ोंगी और संकीड़तावादी तत्व (विज्ञान और प्रगतिशीलता के नाम पर) ‘धर्म’ और ‘भगवान’ की आलोचना करके तथा पुरोहितवादी ‘धर्म’ और ‘भगवान’ की गलत व्याख्या करके मानव द्वारा मानव के शोषण को मजबूत कर रहे हैं। ऐसे तथा-कथित प्रगतिशीलों का मखौल सुधीश पचौरी जी ने ‘हिंदुस्तान,लखनऊ,के 20 नवंबर 2011 के इस लेख मे उड़ाया है जिसका स्कैन आप ऊपर देख रहे हैं।

‘ज्योतिष’=वह विज्ञान जो मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध ‘ बनाने मे सहायक है। अखिल ब्रह्मांड मे असंख्य तारे,ग्रह और नक्षत्र हैं जिनसे निकलने वाला प्रकाश समस्त जीवधारियों तथा वनस्पतियों सभी को प्रभावित करता है। मानव जीवन पर इस प्रभाव का अध्यन करके लाभकारी स्थिति बताना ‘ज्योतिषी’ का कर्तव्य होता है और जो इस से हट कर गलत कार्य करता है वह ज्योतिषी नहीं है केवल उसी की आलोचना और विरोध होना चाहिए। परंतु प्रगतिशीलता के नाम पर ढ़ोंगी व्यक्ति का विरोध न करके ज्योतिष का विरोध करने का मतलब है ‘मानव’ को प्रकृति सुलभ ज्ञान से वंचित करना और यह भी उतना ही गलत और बुरा है जितना ज्योतिष के नाम पर ठगना।

‘साम्यवाद’=समष्टिवाद है जिसमे व्यक्ति विशेष का नहीं समाज का सामूहिक कल्याण सोचा और किया जाता है। अतः साम्यवाद ही परम मानव-धर्म है। साम्यवाद के तत्व वेदों मे मौजूद हैं। ऋग्वेद के अंतिम सूक्त मे मंत्रों  द्वारा दिशा-निर्देश दिये गए हैं।

‘सं ……. वसून्या भर’ अर्थात-

हे प्रभों तुम शक्तिशाली हो बनाते सृष्टि को ।
वेद सब गाते तुम्हें हैं कीजिये धन वृष्टि को। ।

‘संगच्छ्ध्व्म ……. उपासते’ अर्थात-

प्रेम से मिल कर चलें बोलें सभी ज्ञानी बने।
पूर्वजो की भांति हम कर्तव्य के मानी बने। ।

‘समानी मंत्र : ……. हविषा जुहोमि’ अर्थात-


हो विचार समान सबके चित्त मन सब एक हो।
ज्ञान पाते हैं बराबर भोग्य पा सब नेक हों। ।

‘समानी व आकूति: ….. सुसहासति’

हो सभी के दिल तथा संकल्प अविरोधी सदा।
मन भरे हो प्रेम से जिससे बढ़े सुख संपदा। ।

कोई भी प्रगतिशीलता के नाम पर यदि उपरोक्त मानव-कल्याण के संदेशों की उपेक्षा करता है और उससे दूर रहने की बात करता है तो स्पष्ट है कि वह समष्टिवादी-साम्यवादी नहीं है। ‘साम्यवाद’ मूलतः भारतीय अवधारणा है जिसका उल्लेख सम्पूर्ण वेदिक साहित्य मे है। जर्मनी के मैक्स मूलर साहब भारत आए 30 वर्ष यहाँ रह कर संस्कृत का अध्यन करके ‘मूल पांडुलिपियाँ’ लेकर जर्मनी रवाना हो गए और वहाँ जाकर उनका जर्मनी भाषा मे अनुवाद प्रकाशित करवाया। ‘परमाणु विज्ञान’ पर जर्मनी मे ही खोज हुई थी और द्वितीय महायुद्ध मे जर्मनी की पराजय पर उसके वैज्ञानिकों को रूस एवं अमेरिका अपने-अपने देश ले गए थे जिनहोने उन देशों को ‘परमाणु बम’ उपलब्ध करवाए थे -यह अभी 70 वर्ष ही पुरानी बात है।

इसी प्रकार मानव कल्याण के तत्वों को सहेज कर ‘मानव-विज्ञानी’ महर्षि कार्ल मार्क्स ने ‘दास कैपिटल’ ‘एवं ‘कम्यूनिस्ट मेनीफेस्टो’ नामक ग्रंथ दिये। उस समय जर्मनी और इंग्लैंड के समाज मे जैसा धर्म प्रचलित था उसका तीव्र विरोध महर्षि  मार्क्स ने किया है जो बिलकुल वाजिब है । वस्तुतः वह धर्म था ही नहीं वह तो पुरोहितवाद था किन्तु लोग उसे धर्म कहते थे इसलिए मार्क्स ने भी उसे धर्म कह दिया। इसका यह मतलब नहीं है कि मार्क्स ने मानव-कल्याण हेतु प्रपादित ‘धर्म’ का विरोध किया है। दुर्भाग्य से अहंकार ग्रस्त नेता लोग मार्क्स के मर्म को न समझ कर शब्दजाल मे उलझाना चाहते और मनुष्य कल्याण की धर्म की भावना का सतत विरोध करके अंततः शोषकों का ही हितसाधन करते हैं। यह तो शोषकों की ही चाल है कि उन्होने ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा हेतु RSS को धर्म का अलमबरदार बना कर खड़ा कर दिया जो ‘धर्म’ पर ही प्रहार करके ‘ढोंग व पाखंड’ को धर्म के नाम पर परोसता है। प्रगतिशील तथा साम्यवादी चिंतकों का यह नैतिक दायित्व है कि वे ‘धर्म’ की वास्तविक अवधारणा से जनता को अवगत कराकर उन्हें शोषण और उत्पीड़न से बचाएं। किन्तु विज्ञान और प्रगतिशीलता का नाम लेकर वे धर्म का ही विरोध करते हैं और इस प्रकार पुरोहितवाद को संरक्षण प्रदान कर देते हैं। 

1857 की क्रांति विफल होने पर 1875 मे महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा ‘आर्यसमाज’ की स्थापना जनता को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध जाग्रत करने हेतु की गई थी और शुरू-शुरू मे इसके केंद्र छावनियों मे स्थापित किए गए थे। इसकी सफलता से भयभीत होकर रिटायर्ड ICS एलेन आक्टावियन हयूम (A .O. HUME) की सहायता से W.C.(वोमेश चंद्र) बनर्जी की अध्यक्षता मे इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना कराई गई जो प्रारम्भ मे ब्रिटिश साम्राज्य हेतु ‘सेफ़्टी वाल्व’ का काम करती थी। स्वामी दयानन्द के निर्देश पर आर्यसमाजियों ने राजनीतिक रूप से कांग्रेस मे प्रवेश करके इसे स्वाधीनता आंदोलन की ओर मोड दिया। खुद पट्टाभिसीता रमईय्या ने ‘कांग्रेस का इतिहास’ पुस्तक मे स्वीकार किया है कि स्वाधीनता आंदोलन मे जेल जाने वाले सत्याग्रहियों मे 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे। कांग्रेस के द्वारा आजादी की मांग करने पर 1906 मे मुस्लिम लीग और  1920 मे कुछ कांग्रेसी नेताओं को लेकर हिन्दू महासभा का गठन कांग्रेस को कमजोर करने हेतु ब्रिटिश साम्राज्य ने करवाया था। मुसलिम लीग की भांति हिन्दू महासभा शासकों के अनुकूल कार्य न कर पाई तब RSS का गठन 1925 मे करवाया गया जिसने विदेशी शासकों को खुश करने हेतु मुस्लिम लीग की तर्ज पर विद्वेष की आग को खूब भड़काया (जिसकी अंतिम परिणति देश विभाजन के रूप मे हुई)।

1925 मे ही राष्ट्र वादी कांग्रेसियों ने भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी की स्थापना स्वाधीनता आंदोलन को गति प्रदान करने हेतु की थी। किन्तु 1930 मे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना भारत मे कम्यूनिस्ट आंदोलन को रोकने हेतु करवा दी गई। लेनिन और बाद मे स्टालिन की सलाह को ठुकराते हुये उस समय के कम्यूनिस्ट नेताओं ने हू- ब-हू सोवियत रूस की तर्जपर पार्टी को चलाया जिसका परिणाम यह हुआ कि वे जनता की नब्ज पर अपनी उंगली न रख सके। सोवियत रूस मे भी ‘धर्म’ की अवधारणा के आभाव मे साम्यवाद का वह स्टाईल असफल हो गया और चीन मे भी जो चल रहा है वह मूल साम्यवाद नहीं है। हमारे देश मे अभी भी कुछ दक़ियानूसी विद्वान ‘धर्म’ और ‘साम्यवाद’ मे अंतर मानते हैं क्योंकि वे पुरोहितवाद को ही धर्म मानने की गलती छोडना नहीं चाहते । कुल मिला कर नुकसान शोषित-पीड़ित जनता का ही है। धर्म के नाम पर उसे मिलता है पोंगावाद जो उसके शोषण को ही मजबूत करता है। पाखंडी तरह तरह से जनता को ठगते हैं और जन-हितैषी कहलाने वाले कम्यूनिस्ट धर्म -विरोध के नाम पर अडिग रहने के कारण ‘धर्म’ की वास्तविक व्याख्या बताने से परहेज करते हैं। चूंकि मै सत्य को समझाने का प्रयास करता हूँ इसलिए कुछ बड़े विद्वान अपने अहम के कारण उसका विरोध करते हैं और प्रकारांतर से ‘साम्यवाद’ विरोधियों का ही पृष्ठ-पोषण करते हैं। पश्चिम बंगाल के ऐसे ही नेताओं के कारण 34 वर्ष का बामपंथी शासन समाप्त हो गया क्योंकि उन्होने ‘पश्चिम बंगाल के बंधुओं से एक बेपर की उड़ान’ की ओर ध्यान ही नहीं दिया। सी पी एम के लोग अपने व्यक्तिगत मामलों का ज्योतिषीय समाधान मुझ से करवाते हैं और अपने बड़े नेताओं को उकसा कर ‘ज्योतिष’ एवं ‘धर्म’ पर कटाक्ष भी करवाते हैं यह दोहरी नीति ‘जनहित’ की विरोधी है और साम्यवाद की अवधारणा से जनता को दूर करने वाली है। 

नाच न आवे आँगन टेढ़ा

आज कल बैठे ठाले कुछ लोग ‘ज्योतिष’ की आलोचना करना अपना कर्तव्य और बड़प्पन समझ रहे हैं। बे सिर पैर की बातों को लेकर आधार हींन  और अतार्किक प्रश्न उठा कर ज्योतिष को चेलेंज देना तो कोई इनसे बड़ी सरलता से सीख सकता है। वस्तुतः ‘काला अक्षर भैंस बराबर’ इंनका ज्योतिष ज्ञान है और फुटपाथ पर बैठे ‘तोता ‘वाले या सड़क पर घूमते ‘बैल’वाले को ही ये ज्योतिषी मानते हैं और ज्योतिष की ‘धुआंधार आलोचना’ करने लग जाते हैं।                                                                                                                                          

‘ढोंग पाखंड और ज्योतिष’  मे मैंने ऐसे लोगों की पोल खोल कर सावधान रहने का जनता से आह्वान किया था। परंतु भाषा और साहित्य के ये प्रचंड विद्वान मुझ जैसे अज्ञात व्यक्ति के विचारों को कैसे स्वीकार कर सकते हैं?

मैंने ‘ज्योतिष और हम’  द्वारा मानव जीवन पर पड़ने वाले ग्रह-नक्षत्रों के प्रभाव को सरलतम ढंग से स्पष्ट करने का भी प्रयास किया था। जो लोग जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ते हैं उन्हें तो सच्चाई कभी स्वीकार हो ही नहीं सकती परंतु खेद का विषय यह है कि जो लोग खुद को प्रगतिशील और जनता का हमदर्द बताते हैं वे भी झूठ को ही बल प्रदान करते हैं । अफसोसजनक ही है कि जिस ‘ज्योतिष’ का उद्देश्य ‘मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध’बनाना है उसे ही तथाकथित प्रगतिशील विद्वान त्याज्य बताते हुये भर्त्सना  करते हैं।

ज्योतिष = ज्योति अर्थात प्रकाश का ज्ञान। ‘ज्योतिष’ का विरोध करके प्रकाश और ज्ञान से जनता को वंचित करके ये विद्वान किसका हितसाधन कर रहे हैं यह स्वतः स्पष्ट है। इसी प्रकार ‘धर्म’ का विरोध भी एक प्रगतिशील फैशन के तहत किया जा रहा है। ‘धर्म’वह नहीं है जिसे पुरोहितवादी उत्पीड़न और लूट को पुख्ता बनाने के लिए घोषित करते हैं परंतु ये विद्वान उसी ढोंग को ही ‘धर्म’ माने बैठे है । वे  ढोंगियों और ढोंगवाद की तो भर्त्सना करते नहीं ,उनका विरोध करते नहीं और बिना जाने-बूझे ‘धर्म’ पर हमला करते हैं। अधर्म के अलमबरदारों और इनमे कोई मौलिक अंतर नहीं है।


‘धर्म और विज्ञान’ शीर्षक से लिखे लेख मे मैंने ‘धर्म’ का वैज्ञानिक अर्थ स्पष्ट करने की चेष्टा की है,परंतु सुधी विद्वजन उस पर कोई ध्यान ही नहीं देना चाहते और अपनी गलत धारणाओं को जबरिया सब पर थोप देना चाहते हैं। यही नहीं ‘श्रद्धा,विश्वास और ज्योतिष‘ तथा ‘ज्योतिष और अंध विश्वास’ के माध्यम से मैंने वैज्ञानिक तर्क सहित ‘ज्योतिष’ और ढोंग के अंतर को भी स्पष्ट किया है। ढोंग और पाखंड किसी भी रूप मे ज्योतिष नहीं हैं और उनका न केवल विरोध बल्कि उन्मूलन भी होना चाहिए। लेकिन थोथे  वक्तव्यों द्वारा ज्योतिष की आलोचना करने वाले कई ऐसे कामरेड्स को मै जानता हूँ जो प्रत्येक ब्रहस्पतिवार को मजार पर जाकर दीप जलाते है। धर्म और ज्योतिष की आलोचना करने वाले सी पी एम के एक नेता ने तो मुझ से अपनी पुत्री तथा पुत्र की जन्म-पत्री बनवाकर उनका भविष्य इन्टरनेट के जरिये मंगवाया था।  एक बड़बोले आर्यसमाजी ( जो अब अपने पुत्र के पास बेंगलोर चले गए हैं)ने आगरा मे अपनी पुत्री की शादी हेतु जन्म-पत्र आर्यसमाज के ही पूर्व मंत्री से बनवाकर भेजी थी। सरला बाग (दयाल बाग),आगरा मे राधास्वामी मत के अनुयायियों ने मुझसे जन्म-पत्र बनवाए और अपने बच्चों का भविष्य ज्ञात किया लेकिन प्रवचनों मे ज्योतिष की आलोचना करते रहे। जिनकी कथनी और करनी मे अंतर है ऐसे लोग जनता और समाज के शत्रु ही हैं ,हितैषी नहीं। अतः ऐसे लोगों की ‘ज्योतिष’ अथवा ‘धर्म’ संबंधी आलोचना को ‘जन-विरोधी’ समझा जाना चाहिए। 

कुछ लोग

श्रीमती पूनम माथुर 

कुछ लोग अपने को बड़ा मानते हैं ।
श्रवण कुमार को सब लोग जानते हैं।
सारे लोग उस पुत्र का लोहा मानते हैं।
यह सब लोग जानते हैं।
इनको किस्सा-कहानियाँ मानते हैं।
आज कल लोग  ऐसा करना नहीं जानते हैं।
तभी तो वृद्धाश्रम ,बूढ़े लोग जाने को मानते हैं।
हर कोई बूढ़ा होता ,क्या लोग नहीं जानते हैं।
संसार एक रहट है,क्या लोग नहीं मानते हैं।
हर सुबह के बाद शाम होती है,
क्या लोग नहीं जानते हैं।
पर अपने को सब बड़ा ही मानते है।
आना-जाना है,सब जानते हैं।
सब मिट्टी है,सब मानते हैं।
यह सब लोग जानते हैं।
परंतु अच्छी सीख नहीं मानते हैं।
बाद मे पछताना जानते हैं।
अच्छे कर्म होते हैं मानते हैं।
पर उन्हें करना नहीं जानते हैं।
कुछ लोग दूसरों को आंधी मे उड़ाना सही  मानते हैं।
कुछ लोग दूसरों को लोहे का चना चबवाना जानते हैं।

(पूनम माथुर)

बाल दिवस तो मनाते हैं पर बच्चो की परवाह नहीं करते

Hindustan-Lucknow-12/10/2011

उपरोक्त स्कैन से स्पष्ट हो जाएगा कि भीड़-भरी ,प्रदेश की राजधानी की सड़क पर गिरी साहब के बेटे का दर्दनाक एक्सीडेंट हुआ जिसमे उसे अपनी जान गवानी पड़ी। अपराधी को गिरफ्त मे लाने हेतु उन्हे खुद किस प्रकार जनता की गुहार करनी पड़ी और किसी भी प्रत्यक्ष-दर्शी  का सहयोग न मिला। पुलिस तो अपनी ड्यूटी कभी भी पूरी करती ही नहीं है। मैंने एक लेख-‘युवाओ जीवन अनमोल है इसकी रक्षा करो’ शीर्षक से इसी हादसे को इंगित करते हुये इसी ब्लाग मे दिया था और यात्रा के दौरान सुरक्षा हेतु ‘सप्तजीवी स्तुति’ भी प्रस्तुत की थी।
किन्तु लगता है ब्लागर्स बंधु इन स्तुतियों से लाभ उठाना नहीं चाहते क्योंकि बेंगलोर के एक इंजीनियर ब्लागर साहब के सुझाव पर मैंने ‘जन हित मे’ शीर्षक से एक ब्लाग प्रारम्भ किया है जिसमे जीवनोपयोगी स्तुतिया जो प्राचीन ऋषि-मुनियो द्वारा रचित है अपनी आवाज मे देता जा रहा हू ,परंतु ब्लागर्स उनकी उपेक्षा कर रहे हैं।

इस एक्सीडेंट के बाद वाराणासी मे एक और छात्र का बाईक से एक्सीडेंट हुआ कामा मे रहने के बाद उसका भी निधन हो गया। वह छात्र हमारे एक क्लाइंट जो यू पी सेक्रेटेरिएट मे अधिकारी हैं का भांजा था मैंने उनके द्वारा ‘सप्तजीवी स्तुति’ इन्टरनेट के माध्यम से भिजवाई थी परंतु उससे पूर्व ही उसने संसार छोड़ दिया। जब युवा इस प्रकार समाज से उऋण हुये ही संसार छोड़ देते हैं तो वह स्थिति संसार के लिए उत्तम नहीं है। परंतु हमारे देश मे ढोंग -पाखंड और पोंगा-पंडितवाद इतना प्रबल है कि लोगोंकों सच्चाई स्वीकार नहीं होती।

फिर भी अपना कर्तव्य समझ कर मै प्रयास करता रहता हूँ कि शायद जैसे रस्सी की रगड़ से कुएं की घिर्री और मन  तक घिस जाती है कभे-न-कभी मानव मन भी घिसे और सत्य को स्वीकार कर सन्मार्ग पर चल कर अपना तथा समाज का भला कर सके।

आज ‘बाल-दिवस’ पर मै कुछ बालको (लड़का-लड़की दोनों) के हित की रचनाएँ प्रस्तुत कर रहा हू जो ‘ नित्य कर्म विधि’ पुस्तक से साभार ली गई हैं। ‘आर्य कुमार गीतांजली’ शीर्षक से तीन गीत ‘तपोभूमि’,मथुरा के संपादक प्रेम भिक्षुक वानप्रस्थ जी ने प्रस्तुत किए हैं ,उन्हे ही उद्धृत किया जा रहा है-


 (1)

बाल विनय

हे प्रभी! आनंद-दाता  ज्ञान हमको दीजिये।
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये। ।
लीजिये हमको शरण मे,हम सदाचारी बने।
ब्रह्मचारी धर्म-रक्षक ,वीर व्रतधारी बने। ।
कार्य जो हमने उठाए आपकी ही आस से ।
 ऐसी कृपा करिए प्रभों!सब पूर्ण होवे दास से। ।


धर्म-रक्षक=वह नही है जैसा पुरोहितवादी बताते हैं। बल्कि इसका अभिप्राय ‘धारण करने’ से है। उसके बाद-

(2)


 तब वन्दन हे नाथ करे हम ।


तब चरणों की छाया पाकर,शीतल सुख उपभोग करे हम। ।
भारत माता की सेवा का  व्रत भारी हे नाथ!करे हम।
माँ के हित की रक्षा के हित न्योछावर निज प्राण करे हम। ।
पाप-शैल को तोड़ गिरावे वेदाज्ञा निज शीश धरे हम।
राग-द्वेष को दूर हटा कर प्रेम-मंत्र का जाप करे हम । ।
फूले दयानंद फुलवारी विद्द्या-मधु का पान करे हम।
प्रातः साँय तुझको ध्यावे तेरा ही गुणगानकरे हम। ।


अब देखिये गलत  उपासना पद्धतियों ने टकराव और द्वेष को धर्म के नाम पर भड़का रखा है और भारत-माता की चिंता कहाँ और कैसे हो आजकल तो अपने माता-पिता की ही चिंता नहीं हो रही है। पहले तो बालक भगवान से क्या प्रार्थना करते थे ज़रा गौर फरमाये-

(3)


हम बालकों की ओर भी भगवान तेरा ध्यान हो ।


हो दूर सारी मूर्खता कलयांणकारी ज्ञान हो। ।
हम ब्रह्मचारी,वीर,व्रतधारी,सदाचारी बने।
हमको हमारे देश भारत पर सदा अभिमान हो। ।
होकर बड़े कुछ कर दिखाने के लिए तैयार हो।
मन मे हमारे देश सेवा का भरा अरमान हो। ।
हो नौजवानो की कभी जो मांग प्यारे देश को।
तो मातृवेदी पर प्रथम रखा हमारा प्राण हो । ।
संसार का शिरमौर होकर ‘देश’ हमसे कह सके-
हे वीर बालक!धन्य तुम मेरे सफल संतान हो। ।

पहले हमारे देशवासी ऐसी शिक्षा अपनी-अपनी संतानों को दिलवाते थे और आज -माता -पिता अपने बच्चों को भूत-प्रेतों के मेले मे घुमाते हैं। मंहगी और ढकोसले वाली शिक्षा ग्रहण कराते है फिर अपने व देश के लिए उनसे बड़ी-बड़ी अपेक्षाएँ रखते हैं। भला बच्चों का क्या दोष वे कहाँ से और कैसे इन अपेक्षाओं को पूरा करे? जबकि उनके अभिभावकों ने उन्हे उचित शिक्षा से खुद ही वंचित रखा है। सरकार ने शिक्षा बजट को बेहद कम करके बाजारू बना दिया है। यदि समय रहते देशवासी नहीं चेते तो, देश के भावी कर्ण धार आज के बालक आने वाले समय मे आज की पीढ़ी को जम कर कोसेंगे।

http://vidrohiswar.blogspot.com/2011/11/blog-post.html—––‘लखनऊ के अपने मकान मे दो वर्ष’