"सद्दाम हुसैन "/गरीबों का मसीहा-एशिया का गौरव-1991 का अप्र.लेख(2)




सन 1991 मे राजनीतिक परिस्थितिए कुछ इस प्रकार तेजी से मुड़ी कि हमारे लेख जो एक अंक मे एक से अधिक संख्या मे ‘सप्त दिवा साप्ताहिक’,आगरा के प्रधान संपादक छाप देते थे उन्हें उनके फाइनेंसर्स जो फासिस्ट  समर्थक थे ने मेरे लेखों मे संशोधन करने को कहा। मैंने अपने लेखों मे संशोधन करने के बजाए उनसे वापिस मांग लिया जो अब तक कहीं और भी प्रकाशित नहीं कराये थे उन्हें अब इस ब्लाग पर सार्वजनिक कर रहा हूँ और उसका कारण आज फिर देश पर मंडरा रहा फासिस्ट तानाशाही का खतरा है। जार्ज बुश,सद्दाम हुसैन आदि के संबंध मे उस वक्त के हिसाब से लिखे ये लेख ज्यों के त्यों उसी  रूप मे प्रस्तुत हैं-

नेताजी सुभाष चंद्र बॉस ने कहा था-“एशिया एशियाईओ के लिये”। ईराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने साम्राज्यवाद के आगे न झुक कर एशिया का मस्तक ऊंचा किया है। जार्ज वाशिंगटन यदि संयुक्त राज्य अमेरिका का संगठक था तो जार्ज बुश विध्वंसक बन रहा है। अमेरिकी साम्राज्यवाद के खात्मे के साथ ही विश्व से शोषण और दमन का युग समाप्त होगा। यदि राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन सफल रहे तो इसका श्रेय उन्ही को जाएगा।

शोषणवादी-पूंजीवादी लुटेरी मनोवृत्ति के लोग लगातार सद्दाम हुसैन के विरुद्ध विष-वामन किए जा रहे हैं। भाजपा की घोंघावादी नीतियों के समर्थक और प्रशंसक हिन्दू/मुस्लिम के आधार पर और हाल ही मे साम्राज्यवादियों की एजेंट विहिप द्वारा संचालित कमल ‘रथ-यात्रा’से फूल कर कुप्पा हुये विचारक ईराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को तृतीय विश्व महायुद्ध के प्रारम्भ होने का खतरा बता कर दोषी ठहरा रहे हैं और जार्ज बुश का समर्थन कर रहे जो कि,भारत के राष्ट्रीय हितों के सर्वथा विपरीत है ।

संयुक्त राज्य अमेरिका का उदय-

जब स्पेन का कोलंबस भारत की खोज मे भटक कर अमेरिका महाद्वीप पर पहुंचा और इसके पिछड़ेपन के समाचार यूरोप पहुंचे तो यूरोप के साम्राज्यवादी देशों ने अपनी बढ़ती हुई आबादी को नियंत्रित करने के लिये अपने-अपने उपनिवेश कायम करके वहाँ के मूल-आदिवासियों (तथाकथित रेड इंडियन्स)को समाप्त कर दिया।

हालांकि अमेरिका मे कायम उपनिवेश यूरोपीय नस्ल की आबादी के ही थे परंतु उन्होने अपने-अपने मूल राज्यों के विरुद्ध बगावत कर दी और संयुक्त रूप से जार्ज वाशिंगटन के नेतृत्व मे आजादी की लड़ाई लड़ी। लार्डकारनावालिस जो साम्राज्यवाड़ियों की सेना का नायक था जार्ज वाशिंगटन द्वारा कैद कर लिया गया (यही लार्ड कार्नावालिस भारत मे वाईस राय बन कर आया और यहाँ स्थाई बंदोबस्त नाम से किसानों के शोषण के लिये जमींदारी प्रथा लागू कर गया)। चौदह (14) उपनिवेशों ने आजादी पाकर मिल कर एक राष्ट्र ‘संयुक्त राज्य अमेरिका’ की स्थापना की।

अमेरिकी साम्राज्यवाद-

प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जकड़न ढीली पड़ने लगी और इसका स्थान अमेरिका लेता गया । द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब भारत से ब्रिटिश साम्राज्य का उखड़ना प्रारम्भ हुआ तो अमेरिका विश्व के साम्राज्यवादियों के सरगना के रूप मे स्थापित हो चुका था। अमेरिकी गुप्तचर संस्था सी आई ए का मुख्य कार्य लोकतान्त्रिक देशों मे उखाड़-पछाड़ करना और तानाशाहों का समर्थन करना हो गया जिससे अमेरिकी साम्राज्यवाद के हित सुरक्षित  रखे जा सकें। पाकिस्तान,बांग्ला देश आदि के तानाशाह अमेरिकी कठपुतली साबित हो चुके हैं। पश्चिम एशिया मे अरब शेख भी अमेरिकी साम्राज्यवाद के मजबूत पाएदान रहे हैं। इन शेखों ने अपने-अपने देश की पेट्रो -डालर सम्पदा अमेरिकी बैंकों मे विनियोजित कर रखी है।

जो अमेरिका साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष की उपज था वही साम्राज्यवाद का क्रूरत्तम  सरगना बना यह भी विडम्बना और खेद की ही बात है।

सद्दाम का संघर्ष-

सद्दाम हुसैन ने ईराक की सत्ता समहालते ही ईराक मे द्रुत गति से विकास कार्य सम्पन्न किए। जनता को समानता और लोकतन्त्र के अधिकार दिये एवं इस्लामी घोंघावाद का पर्दाफाश 
सऊदी अरब आदि शेखों वाले अरब देश जहां सामाजिक आधार पर आज भी उन्नत्त नहीं हैं। सद्दाम ने ईराक मे स्त्री-पुरुष की समानता पर बल दिया और पर्दा-प्रथा को समाप्त कर दिया। सद्दाम हुसैन ईरान के कठमुल्ला आयतुल्ला रूहैल्ला खोमेनी की नीतियों के सख्त विरोधी रहे और आठ वर्षों तक ईरान से युद्ध किया।

हाल मे ईराक ने ईरान से सम्झौता करके उसका विजित  प्रदेश लौटा दिया और अमेरिका के पिट्ठू कुवैत के शेख को भगा कर पुनः कुवैत का ईराक  मे विलय कर लिया । जार्ज बुश को सद्दाम का यह कार्य अमेरिकी साम्राज्यवाद की जड़ों पर प्रहार प्रतीत हुआ। अमेरिका ने अपने धौंस-बल पर संयुक्त राष्ट्र संघ से 29 नवंबर 1990 को ईराक पर आक्रमण करने का प्रस्ताव पास करा लिया और 15 जनवरी 1991 तक का समय झुकाने के लिए तय किया गया।

वीर ईराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को दाद दी जानी चाहिए की,उन्होने साम्राज्यवादी लुटेरे अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश के समक्ष घुटने नहीं टेके और समस्त एशिया से साम्राज्यवाद का खात्मा करने का बोझ ईराक के कंधों पर उठा लिया। 


भारतीय समयानुसार -17 जनवरी 1991 की प्रातः 03 बज कर 40 मिनट पर खूंखवार अमेरिका ने सोते हुये ईराक पर रात्रि के घुप्प अंधकार मे वीभत्स आक्रमण कर दिया और दोपहर  तक 18 हजार टन  गोला बारूद गिरा कर ईराक को जन-धन से काफी क्षति पहुंचाई है। 


पूर्व घोषणानुसार सद्दाम ने 18 ता .को इज़राईल पर मिसाइलों से आक्रमण कर दिया और लेबनान व फिलीसतीं न  की मुक्ति का संकल्प दोहराया। अमेरिका अरब जगत को धौंस जमाने के लिए इज़राईल को अंतर्राष्ट्रीय गुंडागर्दी के लिए उकसाता रहा है और इज़राईल के विरुद्ध राष्ट्रसंघ के सभी प्रस्तावों को वीटो करता रहा है जबकि,ईराक के विरुद्ध राष्ट्रसंघ प्रस्ताव की आड़ मे बर्बर हमला करके तृतीय विश्वयुद्ध की शुरुआत कराना चाहता है।

विहिप आंदोलन और अमेरिका-


1980 से ही अमेरिका विश्व हिन्दू परिषद को आर्थिक सहायता पहुंचा कर भारत मे अस्थिरता फैलाने का प्रयत्न करता रहा है। अमेरिकी कार निर्माता कंपनी फोर्ड का ‘फोर्ड फाउंडेशन’ खुले रूप मे विहिप को चन्दा देता रहा है। अमेरिकी धन के बल पर 25 सितंबर 1990 से विहिप ने आडवाणी-कमल-रथ यात्रा आयोजित कर समस्त भारत को सांप्रदायिक संघर्ष की आग मे झोंक दिया है।

अमेरिका संभावित युद्ध की विभीषिका के मद्दे नज़र भारत को कमजोर करना चाहता था जिससे एशियाईओ की अस्मिता की रक्षा मे भारत न खड़ा हो सके। कुछ हद तक अमेरिका को अपनी भारतीय शक्तियों -भाजपा/आर एस एस,विश्व हिन्दू परिषद,मौलाना बुखारी,सैयद शहाबुद्दीन,जमाते -इस्लामी,मुस्लिम लीग आदि के सहयोग से सफलता भी मिली। 17 ता को दिल्ली मे बुखारी और शहाबुद्दीन  द्वारा ईराक विरोधी बयान जारी करने और असम मे आडवाणी द्वारा ईराक की कड़ी आलोचना करने से अमेरिकी साजिश की ही पुष्टि होती है।

भारत का दायित्व-


भारत भरसक प्रयास के बावजूद युद्ध नहीं रोक सका है। रूस युद्ध मे अमेरिका का साथ नहीं देगा ,यह घोषणा करके राष्ट्रपति गोर्बाछोव ने एशिया के हित मे कदम उठाया है। चीन ने भी अमेरिका को चेतावनी दी थी कि,वह ईराक पर आक्रमण न करे। भारत का यह दायित्व हो जाता है कि,एशिया की तीनों शक्तियों-भारत,रूस और चीन को एकता -बद्ध करे और साम्राज्यवादी ताकतों के विरुद्ध ईराक को नैतिक समर्थन दे जिससे विश्व से शोशंणकारी शक्तियों को निर्मूल किया जा सके। विश्व की शोषित जनता के मसीहा के रूप मे सद्दाम हुसैन का नाम सदैव अमर रहेगा। 

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3 comments on “"सद्दाम हुसैन "/गरीबों का मसीहा-एशिया का गौरव-1991 का अप्र.लेख(2)

  1. Bhushan says:

    सद्दाम हुसैन ने इराक में विकास का महत् कार्य किया है इसमें संदेह नहीं. लेकिन यदि युद्ध की तकनीक जन की अपेक्षाओं और उसकी भलाई के विरुद्ध कारगर हो जाए तो क्या किया जाए. कई बार लगता है कि परमाणु तकनीक और परमाणु बमों के चोरी होने का भय जो अमेरिका सालता है वह वास्तविक है.

  2. मेरे लिए तो यह सब बिलकुल नई जानकारी है।

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