चुनावी तमाशा और भ्रष्टाचार का रोना


(सभी  स्कैन कापियाँ 04 जनवरी 2012 को हिंदुस्तान ,लखनऊ मे प्राकाशित समाचारों  की हैं )

1947 मे ब्रिटिश साम्राज्यवाद से तकनीकी आजादी प्राप्त करने के बाद भी हमारे देश की विभिन्न सरकारें शुरू मे ब्रिटेन फिर अमेरिकी सरकारों से प्रभावित होती रही हैं। किन्तु फिर भी नेहरू जी की दूरदर्शिता थी जो उन्होने यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो और मिस्र के कर्नल अब्दुल गामाँल नासर से मिल कर ‘गुट निरपेर्क्ष’ नामक एक गुट बना कर कुछ हद तक स्वतंत्र निर्णय  लिए। किन्तु अमेरिकी CIA शुरू से ही सरकार मे घुसपैठ मचाती रही है। इन्दिरा जी के मंत्रिमंडल मे मोरार जी देसाई को उसने अपना एजेंट बताया और माईकल हर्षमेन नामक पत्रकार ने इसका भण्डा-फोड़ किया। तब तक मोरार जी प्रधानमंत्री भी रह चुके थे उन्होने डॉ सुब्रमनियम स्वामी के सुझाव पर अमेरिकी अदालत मे हर्षमेन के विरुद्ध मुकदमा चलाया और केस हार गए।

नेहरू जी के मंत्रीमंडल मे डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी बानिज्य मंत्री थे जिन्होने ‘मिश्रित अर्थ-व्यवस्था’ का सूत्र-पात किया था। वह आर एस एस से संबन्धित थे और जब उन्हे अपनी नीतियो को लागू करने मे दिक्कत हुई तो उन्होने स्तीफ़ा देकर ‘जनसंघ’ बना लिया जो आर एस एस का राजनीतिक विंग था। 1925 मे आर एस एस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्यवाद को सहयोग देने एवं 1925 मे ही स्थापित कम्यूनिस्ट पार्टी के आजादी के आंदोलन मे क्रांतिकारी संघर्ष को विफल करने हेतु की गई थी।

1977 मे यह जनसंघ ‘जनता पार्टी’ मे विलय हो गया था। अतः उससे अलग होकर 1980 मे अटल/आडवाणी ने ‘भाजपा’ की स्थापना की जिसने पहले ‘गांधीवादी समाजवाद’ का नारा उछाल कर जनता को पक्ष मे करना चाहा और असफल रहने पर ‘राम मंदिर’ आंदोलन चला कर ‘मण्डल’ की सिफ़ारिशों पर लागू आरक्षण को धता बता कर 1991 मे यू पी मे अपने बहुमत की सरकार बना ली। फिर दूसरी पार्टियों के सहयोग से 1998 से 2004 तक केंद्र की सत्ता अमेरिकी साम्राज्यवाद के हित मे चलाई। पोखरण विस्फोट की सूचना बाकायदा अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन साहब को भारतीय प्रधानमंत्री बाजपाई साहब ने लिखित मे भेजी।

वर्तमान मनमोहन सरकार भी अमेरिकी साम्राज्यवाद के ही हित मे कार्य कर रही है। जनता के दृष्टिकोण से भाजपा/कांग्रेस की नीतियाँ एक ही हैं। विदेशी शक्तियाँ भारत मे भी ब्रिटेन और अमेरिका की भांति अलग-अलग लेबल वाली दो समान पार्टियों की मौजूदगी चाहती हैं। इसलिए अमेरिका ने पहले मानेका गांधी फिर कांशी राम को आगे करने के प्रयास किए थे। अब अभी हाल मे अन्ना हज़ारे को आगे किया गया था जिन्हें आर एस एस/भाजपा और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का समान समर्थन प्राप्त था।

गरीब-मेहनत कश जनता के अन्ना के छलावे मे न आने के कारण केवल साधन-सम्पन्न और खाते-पीते मद-मस्त शोषक अमीरों के सहारे अन्ना को जन-नेता नहीं बनाया जा सका। इसी कारण अमेरिका को उनसे हाथ खींचना पड़ा। इसका दूसरा कारण यह था कि, CIA का एक सहयोगी संगठन ISCON साईबेरिया की अदालत मे उसके संस्थापक द्वारा व्याख्यायित ‘गीता’  (जो योगीराज श्री कृष्ण के उपदेशों से भिन्न है)पर प्रतिबंध का सामना कर रहा था। अमेरिका ने अपने भारतीय संपर्कों का लाभ उठा कर संसद मे इसका शोर मचवा दिया । सभी दलों के लोगों ने(जिनमे सपा,राजद,बसपा भी शामिल हैं) बगैर कुछ भी समझे-बूझे सरकार पर दबाव बनाया कि वह रूसी अदालत के संभावित निर्णय को बद्ल् वाये और हमारे विदेशमंत्री कृष्णा साहब ने रूसी राजदूत को बुला कर समझा दिया भारत की जनता रूस के खिलाफ हो जाएगी यदि वहाँ की सरकार ने अपनी याचिका वापिस न ली तो। रूसी प्रधानमंत्री अपने देश की जनता द्वारा चुनाव-धांधली के असंतोष का सामना कर रहे थे उन्होने याचिका की कमजोर पैरवी करवाई और अदालत ने सरकारी याचिका खारिज कर दी। इस प्रकार अमेरिकी साम्राज्यवाद के मंसूबों को हमारे देश की सरकार ने यहाँ के विपक्षी दलों के सहयोग से पूरा कर दिया।

आगामी विधान सभा चुनावों मे अपनी आर्थिक  स्थिति सुदृढ़ करने हेतु भाजपा ने बसपा सरकार के भ्रष्टाचार मे निष्कासित नेताओं को अपनाना शुरू कर दिया जैसा कि उपरोक्त स्कैन कापियों से स्पष्ट होता है।बाबरी मस्जिद कांड के समय भाजपा के मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह जी ने बाबू सिंह  कुशवाहा को भाजपा मे शामिल करने को करोड़ों की डील एक प्रेस कान्फरेंस मे बताया है।  केरल,पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के अपने शासन काल मे कम्युनिस्टों ने आम जनता के हितों का ध्यान रखा और वे किसी भ्रष्टाचार मे नहीं फंसे। पंजाब ,उत्तर प्रदेश आदि के इन चुनावों मे जहां जितने भी ‘बामपंथी प्रत्याशी’ हैं उन्हें जितवाने का प्रयास किया जाये तो चुनावों के बाद भ्रष्टाचार पर अंकुश लगने  की संभावना रहेगी वर्ना तो ये चुनाव भी तमाशा ही साबित होंगे और भ्रष्टाचार का रोना वैसे ही रोया जाता रहेगा। 





   
                             (हिंदुस्तान,लखनऊ के 07 जनवरी 2012 अंक मे प्रकाशित)


उपरोक्त दोनों स्कैन कापियों को पढ़ने के बाद अन्ना भक्त ब्लागर्स जिनहोने अपने-अपने ब्लाग्स मे अन्ना और उनकी टीम की तारीफ़ों के पुल बांधे थे और उनकी पोल खोलने वालों को कोसा था अब क्या कहना चाहेंगे?’आज तक डाट काम ‘ मे साहिल जोशी साहब ने लिखा है कि इस संबंध मे प्रश्न पूछने पर अन्ना प्रेस कान्फरेंस छोड़ कर भाग खड़े हुये थे और उसे सब ने लाईव टेलीकास्ट मे देखा था।

शांतिभूषण स्टांप घोटाला मे फंसे हैं तो उनके पुत्र प्रशांत काश्मीर को देश से हटाना चाहते हैं और खुद उन्होने नियम विरुद्ध हिमाचल प्रदेश मे भाजपा सरकार से चाय बागान लिए हैं और नोयडा मे बसपा सरकार से जमीन ले चुके हैं -ये दोनों दल अन्ना के गीत गा रहे थे। किरण बेदी हवाई टिकटों के गोलमाल मे पकड़ी जा चुकी हैं और अरविंद केजरीवाल 09 लाख रुपया अवैध्य वेतन ले चुके थे जिसे प्रधानमंत्री कार्यालय मे अंडर प्रोटेस्ट वापिस किया है। खुद अन्ना को ‘भाजपा/शिव सेना’ सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोप मर जेल भेजा था। महाराष्ट्र की जनता ने अन्ना को आईना साफ-साफ दिखा दिया है। अन्न-भक्त ब्लागर्स/फेसबुकिए अपना चेहरा कब आईने मे देखेंगे?                                                         *                 *                *
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महत्वपूर्ण सूचना –

अन्ना-भक्त ब्लागर्स ने अपने -अपने ब्लाग्स मे टिप्पणियॉ के संबंध मे लिखा है कि जो लोग टिप्पणियों पर निर्भर नहीं करते हैं वे अपने ब्लाग्स मे टिप्पणी बाक्स बंद क्यों नहीं कर देते?उनकी चुनौती सिरोधार्य करके आज से इस ब्लाग मे टिप्पणी बाक्स बंद किया जा रहा है। 

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