प्यासा -शिव


विगत नौ अक्तूबर 2011 को कैफी आज़मी एकेदेमी,निशात गंज,लखनऊ मे ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर एक गोष्ठी मे बोलते हुये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव कामरेड अतुल अनजान ने लेखकों को ‘प्यासा’ फिल्म देखने का सुझाव दिया था और सवाल उठाया था कि आज उस प्रकार की फ़िलमे क्यों नहीं बन रही हैं?आज लेखक जन सरोकार के विषयों पर क्यों नहीं लिख रहे हैं?आज उत्तर प्रदेश के चौथे चरण के चुनाव मे अपने क्षेत्र लखनऊ उत्तर मे मतदान के बाद हमने इन्टरनेट पर ‘प्यासा’ फिल्म का अवलोकन किया(19 फरवरी 1957 को ही इसे सर्टिफिकेट जारी हुआ था )। मलीहाबाद क्षेत्र के हमारे प्रत्याशी कामरेड महेंद्र रावत के प्रचार अभियान के दौरान बहुत निकट से ग्रामीण क्षेत्र की समस्याओं को भी समझने का अवसर मिला था। सरकारी दावों ,बुद्धिजीवियों के विचारों और वास्तविकता मे काफी अंतर दीखने को मिला है।

गुरु दत्त साहब द्वारा लिखित,निर्देशित और अभिनीत फिल्म ‘प्यासा’ एक शायर को केन्द्रित करते हुये समाज मे फैले धनाडम्बर का पर्दाफाश करती है। धन लोलुपता के कारण भाई ही शायर भाई को घर छोडने पर मजबूर करते हैं। साथी उसकी गरीबी का उपहास  उड़ाते हैं।धनवान प्रकाशक उसकी मजबूरी का लाभ उठाते हैं। भाइयों द्वारा 10 आना पाने के लिए रद्दी मे बेचीं नज़मों को एक वेश्या ने रद्दी वाले से खरीद लिया और उसकी मौत की अफवाह के बाद अपना गहना बेच कर ‘परछाइयाँ’ शीर्षक से उन नज़मों को छपवाया। गरीब फेरी वाले ने उस शायर को पागलखाने से निकलवाया।

कामरेड अतुल अनजान ने गहन चिंतन-मनन के उपरांत ही प्रगतिशील लेखकों को ‘प्यासा’ फिल्म देखने का सुझाव दिया होगा। आज समाज मे उस स्तर के बुद्धिजीवी नहीं हैं सभी पैसों के पीछे भाग रहे हैं और जो ऐसा नहीं कर सकते वे उस शायर -‘विजय’ की ही भांति उपेक्षित और बदहाल हैं।

कल ‘शिवरात्रि’ है। ‘शिव’ विद्या और विज्ञान का प्रदाता स्वरूप है परमात्मा का। इसी दिन मूलशंकर तिवारी को बोद्ध-ज्ञान प्राप्त हुआ था और वह महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती बन सके। दुर्भाग्य की बात है कि हमारे साम्यवादी विद्वान पोंगापंथियों द्वारा घोषित धर्म के रूप को सच मान कर धर्म का विरोध करते हैं। जागरूक कामरेड कुलदीप सिंह पुनिया  ने सवाल उठाया है-

वामपंथी पार्टिओं का घटता जनाधार , क्या गौर किया है इस पर किसी भी दूकान ने ( मैं इन पार्टियों को दूकान ही कहता हूँ ) हम कामरेड है ;नास्तिक है क्योंकि कामरेड होने के लिए नास्तिक होना जरुरी होता है ना लेकिन भारत की परिस्थिति ऐसी है की यहाँ की 90 प्रतिशत जनता धर्म भीरु है . तो फिर हम कहाँ चीन या क्यूबा से कैडर निकाल कर लायेंगे क्या? धर्म या धार्मिक आस्था व्यक्तिगत प्रश्न है इसलिए आप किसी को कम्युनिष्ट बनाते ही उसे साथ ही नास्तिकता का पाठ पढाने लग जाते है ये सही है या गलत …………..जवाब चाहिए .

हमारे विद्वान बुद्धिजीवी जिनमे बामपंथी भी शामिल हैं ‘धर्म’ का अर्थ ही नहीं समझते और न ही समझना चाहते हैं। पुरोहितवादियो ने धर्म को आर्थिक शोषण के संरक्षण का आधार बना रखा है और इसीलिए बामपंथी पार्टियां धर्म का विरोध करती हैं। जब कि वह धर्म है ही नहीं जिसे बताया और उसका विरोध किया जाता है। धर्म का अर्थ समझाया है ‘शिवरात्रि’ पर बोध प्राप्त करने वाले मूलशंकर अर्थात दयानंद ने। उन्होने ‘ढोंग-पाखंड’ का प्रबल विरोध किया है उन्होने ‘पाखंड खंडिनी पताका’ पुस्तक द्वारा पोंगापंथ का पर्दाफाश किया है। 

दयानन्द ने आजादी के संघर्ष को गति देने हेतु1875 मे  ‘आर्यसमाज’ की स्थापना की थी ,उसे विफल करने हेतु ब्रिटिश शासकों ने 1885 मे  कांग्रेस की स्थापना करवाई तो आर्यसमाँजी उसमे शामिल हो गए और आंदोलन को आजादी की दिशा मे चलवाया।1906 मे अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग स्थापित करवाकर देश मे एक वर्ग को आजादी के आंदोलन से पीछे हटाया। 1920 मे हिन्दू महासभा की स्थापना करवा कर दूसरे वर्ग को भी आजादी के आंदोलन से पीछे हटाने का विफल प्रयास किया। 1925 मे साम्राज्यवादी हितों के पोषण हेतु आर एस एस का गठन करवाया जिसने मुस्लिम लीग के समानान्तर सांप्रदायिकता को भड़काया और अंततः देश विभाजन हुआ। आर्यसमाज के आर  एस एस के नियंत्रण मे जाने के कारण राष्ट्रभक्त आर्यसमाजी जैसे स्वामी सहजानन्द ,गेंदा लाल दीक्षित,राहुल सांस्कृत्यायन आदि 1925 मे स्थापित ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’ मे शामिल हुये जिसका गठन आजादी के क्रांतिकारी आंदोलन को गति देने हेतु हुआ था। सरदार भगत सिंह,राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ सरीखे युवक ‘सत्यार्थ प्रकाश’पढ़ कर ही क्रांतिकारी कम्युनिस्ट बने थे। 

दुर्भाग्य से आज विद्वान कम्यूनिज़्म को धर्म विरोधी कहते हैं और कम्युनिस्ट भी इसी मे गर्व महसूस करते हैं। धर्म जिसका अर्थ ‘धारण करने’से है को न मानने के कारण ही सोवियत रूस मे कम्यूनिज़्म विफल हुआ और चीन मे सेना के दम पर जो शासन चल रहा है वह कम्यूनिज़्म के सिद्धांतों पर नहीं है। ‘कम्यूनिज़्म’ एक भारतीय अवधारणा है और उसे भारतीय परिप्रेक्ष्य मे ही सफलता मिल सकती है। अतः कामरेड कुलदीप की आशंका को निर्मूल नहीं ठहराया जा सकता है। 


‘नास्तिक ‘ स्वामी विवेकानंद के अनुसार वह है जिसका अपने ऊपर विश्वास नहीं है और ‘आस्तिक’ वह है जिसका अपने ऊपर विश्वास है। लेकिन पोंगापंथी उल्टा पाठ सिखाते हैं। परंतु कम्युनिस्ट सीधी बात क्यों नहीं समझाते?यह वाजिब प्रश्न है। 

इस ब्लाग के माध्यम से समय-समय पर धर्म के संबंध मे विद्वानों के विचारों को प्रस्तुत किया है। ज्ञान-विज्ञान के प्रदाता ‘शिव’ की रात्री पर यदि विज्ञान सम्मत धर्म के आधार पर कम्यूनिज़्म को जनता को समझाने का संकल्प लिया जाये तो निश्चय ही भारत मे संसदीय लोकतन्त्र के माध्यम से कम्यूनिज़्म स्थापित हो सकता है। 
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