नई बोतल मे पुरानी शराब


होली के रंग मे भंग 

लोगो ने होली को मस्ती और मनोरंजन का त्योहार बना डाला है जबकि यह वैज्ञानिक आधार पर मानव को ‘हेल्थ एंड हाईजीन’द्वारा चुस्त-दुरुस्त रखने का पर्व होता था। नई बात न कह कर पुरानी दोहरा कर इस मस्ती के रंग मे भंग घोल रहा हूँ-

बुधवार, 26 अक्तूबर 2011

विकृत होते दीपावली/होली पर सकारात्मक पहल

पावर कार्पोरेशन के स्पेशल  डाइरेक्टर जेनेरल शैलजाकान्त मिश्र साहब ने अपने साथियों के साथ पटाखे छोडने के स्थान पर ‘टेसू’ के वृक्ष लगाने की जो मुहिम शुरू की है वह न केवल सराहनीय वरन अनुकरणीय भी है। ‘टेसू’ या ‘पलाश’ अब उत्तर-प्रदेश का राजकीय वृक्ष तो है ही पर्यावरण संरक्षा मे भी सहायक है। ‘टेसू’ के फूलों से पहले होली मे रंग एक-दूसरे पर डाला जाता था। इसका रंग कच्चा होने के साथ-साथ जो आसानी से छूट जाता है,चर्म-रोगों से त्वचा की रक्षा भी करता है। पटाखे केवल ध्वनि-प्रदूषण ही नहीं करते बच्चों-बड़ों सभी  के लिए घातक भी होते हैं।

प्रतिवर्ष दीपावली पर करोड़ों रुपए पटाखों पर फूँक दिये जाते हैं। इनसे सिर्फ पर्यावरण ही नहीं प्रदूषित होता। इनके निर्माण के पीछे असंख्य बच्चों के शोषण की कहानी भी छिपी हुई है जिस पर विगत वर्ष मे कुछ ब्लागर्स ने अपने-अपने ब्लाग्स पर खुलासा भी किया था। सुप्रसिद्ध आर्य सन्यासी (अब दिवंगत) स्वामी स्वरूपानन्द  जी के प्रवचन कमलानगर,आगरा मे सुनने का अवसर मिला है। उन्होने बड़ी बुलंदगी के साथ बताया था कि जिन लोगों की आत्मा हिंसक प्रकृति की होती है वे ही पटाखे छोड़ कर धमाका करते हैं। उनके प्रवचनों से कौनकितना प्रभावित होता था या बिलकुल नहीं होता था मेरे रिसर्च का विषय नहीं है। मै सिर्फ इतना ही बताना चाहता हूँ कि यशवन्त उस समय 13 या 14 वर्ष का रहा होगा और उसी दीपावली से उसने पटाखे छोडना बंद कर दिया है क्योंकि उसने अपने कानों से स्वामी जी के प्रवचन को सुना और ग्रहण किया। वैसे भी हम लोग केवल अपने पिताजी द्वारा प्रारम्भ परंपरा निबाहने के नाते प्रतीक रूप मे ही छोटे लहसुन आदि उसे ला देते थे। पिताजी ने अपने पौत्र को शुगन के नाम पर पटाखे देना इस लिए शुरू किया था कि औरों को देख कर उसके भीतर हींन भावना न पनपे। प्रचलित परंपरा के कारण ही हम लोगों को भी बचपन मे प्रतीकात्मक ही पटाखे देते थे। अब जब यशवन्त ने स्वतः ही इस कुप्रथा का परित्याग कर दिया तो हमने अपने को धन्य समझा।

स्वामी स्वरूपानन्द जी  आयुर्वेद मे MD  थे ,प्रेक्टिस करके खूब धन कमा सकते  थे लेकिन जन-कल्याण हेतु सन्यास ले लिया था और पोंगा-पंथ के दोहरे आचरण से घबराकर आर्यसमाजी बन गए थे। उन्होने 20 वर्ष तक पोंगा-पंथ के महंत की भूमिका मे खुद को अनुपयुक्त पा कर आर्यसमाज की शरण ली थी और जब हम उन्हें सुन रहे थे उस वक्त वह 30 वर्ष से आर्यसमाजी प्रचारक थे। स्वामी स्वरूपानन्द जी स्पष्ट कहते थे जिन लोगों की आत्मा ‘तामसिक’ और हिंसक प्रवृति की होती है उन्हें दूसरों को पीड़ा पहुंचाने मे आनंद आता है और ऐसा वे धमाका करके उजागर करते हैं। यही बात होली पर ‘टेसू’ के फूलों के स्थान पर सिंथेटिक रंगों,नाली की कीचड़,गोबर,बिजली के लट्ठों का पेंट,कोलतार आदि का प्रयोग करने वालों के लिए भी वह बताते थे। उनका स्पष्ट कहना था जब प्रवृतियाँ ‘सात्विक’ थीं और लोग शुद्ध विचारों के थे तब यह गंदगी और खुराफात (पटाखे /बदरंग)समाज मे दूर-दूर तक नहीं थे। गिरते चरित्र और विदेशियों के प्रभाव से पटाखे दीपावली पर और बदरंग होली पर स्तेमाल होने लगे।

दीपावली/होली क्या हैं?

हमारा देश भारत एक कृषि-प्रधान देश है और प्रमुख दो फसलों के तैयार होने पर ये दो प्रमुख पर्व मनाए जाते हैं। खरीफ की फसल आने पर धान से बने पदार्थों का प्रयोग दीपावली -हवन मे करते थे और रबी की फसल आने पर गेंहूँ,जौ,चने की बालियों (जिन्हें संस्कृत मे ‘होला’कहते हैं)को हवन की अग्नि मे अर्द्ध – पका कर खाने का प्राविधान  था।  होली पर अर्द्ध-पका ‘होला’ खाने से आगे आने वाले ‘लू’के मौसम से स्वास्थ्य रक्षा होती थी एवं दीपावली पर ‘खील और बताशे तथा खांड के खिलौने’खाने से आगे शीत  मे ‘कफ’-सर्दी के रोगों से बचाव होता था। इन पर्वों को मनाने का उद्देश्य मानव-कल्याण था। नई फसलों से हवन मे आहुतियाँ भी इसी उद्देश्य से दी जाती थीं।

लेकिन आज वेद-सम्मत प्रविधानों को तिलांजली देकर पौराणिकों ने ढोंग-पाखंड को इस कदर बढ़ा दिया है जिस कारण मनुष्य-मनुष्य के खून का प्यासा बना हुआ है। आज यदि कोई चीज सबसे सस्ती है तो वह है -मनुष्य की जिंदगी। छोटी-छोटी बातों पर व्यक्ति को जान से मार देना इन पौराणिकों की शिक्षा का ही दुष्परिणाम है। गाली देना,अभद्रता करना ,नीचा दिखाना और खुद को खुदा समझना इन पोंगा-पंथियों की शिक्षा के मूल तत्व हैं। इसी कारण हमारे तीज-त्योहार विकृत हो गए हैं उनमे आडंबर-दिखावा-स्टंट भर  गया है जो बाजारवाद की सफलता के लिए आवश्यक है। पर्वों की वैज्ञानिकता को जान-बूझ कर उनसे हटा लिया गया है ।

इन परिस्थितियों मे चाहे छोटी ही पहल क्यों न हो ‘पटाखा-विरोधियों’का ‘टेसू’के पौधे लगाने का यह अभियान आशा की एक किरण लेकर आया है। सभी देश-भक्त ,जागरूक,ज्ञानवान ,मानवता-हितैषी नागरिकों का यह कर्तव्य है कि वे इस अभियान की सफलता मे अपना भी योगदान दें। हम इन समाज-हितैषियों की सफलता की कामना करते हैं।

महिला दिवस क्यो?

इत्तिफ़ाक से कल होली पर ही 08 मार्च 2012 को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस भी पड़ रहा है। गत वर्ष एक ब्लागर साहब ने आपत्ति की थी कि महिला दिवस 365 दिन क्यों नही?क्या वे और उन जैसे लोग बताएँगे कि यू एन ओ  डे सिर्फ 24 अक्तूबर को क्यो पूरे 365 दिन क्यो नहीं। 08 मार्च को यू एन ओ ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस घोषित किया है। 15 अगस्त को ही हमारा स्वतन्त्रता दिवस क्यो?पूरे 365 दिन क्यो नही?क्या जवाब है ?खैर गत वर्ष के ही लेख को दोबारा पेश कर रहा हूँ। 

सोमवार, 7 मार्च 2011

वेद में नारी

महिला दिवस ८ मार्च के उपलक्ष्य में यह संकलन प्रस्तुत है:-


२७ .१२ १९९७ के राष्ट्रीय सहारा ,लखनऊ में  प्रकाशित  सुश्री अंशु नैथानी के विचार सर्वप्रथम देखें इस स्कैन कापी में-

भ्रामक भारतीयता के मसीहा नरेंद्र मोदी के गुजरात में देखें महिलाओं की यह दुर्दशा-

  


                     हिंदुस्तान लखनऊ-२७/फरवरी/2011


०६ .०३ २०११ के हिंदुस्तान रीमिक्स में प्रकाशित का.शबाना आजमी के यह विचार –





-(सार्वदेशिक साप्ताहिक,११ अक्टूबर १९९८ से साभार  ) यह लेख  प्रस्तुत है-
“भूमिर्माता द्यौ :न पिता ” (अथर्व.६ -१२०- २)
समाज में पुरुष और स्त्री का वही कार्य है,जो भू मंडल में प्रथ्वी और सूर्य का.,सूर्य प्रथिवी के बिना कोई सृजन नहीं कर सकता.
वेद में स्त्री के लिये उषा शब्द का प्रयोग हुआ है-“उषा वै सूर्यस्य पुरोगवी “.उषा सूर्य के आगे चलने वाली है.पुरुष सूर्य है और स्त्री पुरुष की पुरोगवी उषा है.तभी तो विवाह संस्कार में यज्ञ  वेदी की परिक्रमा करते हुए वधू आगे-आगे चलती है और वर पीछे-पीछे .
“स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ “  (ऋग.८ -३३ -१६ )

स्त्री-गृह,समाज,राष्ट्र एवं विश्व की ब्रह्मा है.मानव की जन्मदात्री,निर्मान्कत्री,संरक्षिका,शिक्षिका तथा संचालिका है.”यथा ब्रह्मा तथा रचना”.यदि स्त्री का अपना जीवन श्रद्धा,लज्जा,संयम,धैर्य,त्याग,स्नेह,सुशीलता,पवित्रता आदि श्रेष्ठ गुणों से युक्त होगा तो उसकी संतान भी शुद्ध,संयमी,धर्मात्मा,आस्तिकेवं कर्तव्य परायण होगी,और इसके विपरीत यदि नारी अक्षम,अबोध,अज्ञानी,असंयमी है,तो उसकी रचना भी त्रुटिपूर्ण होगी.अतः जिस राष्ट्र की नारी आदर्श ब्रह्मा औए शिक्षिका होगी,वही राष्ट्र आदर्श राष्ट्र बनेगा.

आर्य सभ्यता में नारी का सतीत्व सर्वोपरि है,तथा सतीत्व रक्षा का अचूक और श्रष्ट उपाय है,नारी का स्वंय सबला और सशस्त्र होना.महिला सम्मलेन करके,अधिकार मांगने,पुरुषों के आगे गिडगिडाने से कुछ भी मिलने वाला नहीं है.इसके लिए वेद माता का दिव्य-सन्देश नारी समाज ध्यान से सुने,समझे और फिर आचरण/व्यवहार में लाये तभी उसकी समस्याओं का समाधान हो जायेगा.

आलाक्ता ……वृह्न्नमः.. (ऋग .६ -७५ -१५)

भावार्थ-नारियां सुन्दर सुशील हों,पर साथ ही वीरांगना,सबला और सशस्त्रा भी हों.सतीत्व पर वार होने पर भयंकर,विकराला,विष से बुझी कटारियां हों तथा राष्ट्र पर संकट आने पर शास्त्रों और शरों की वर्षा करने वाली दुर्गा-लक्ष्मीबाई भी हों.समाज में ऐसी नारियों का सर्वाधिक सम्मान होना चाहिए.

राजपूत महिला किरण बाई ने ‘मीना बाजार’से अपह्रत हो जाने पर साक्षात दुर्गा बन कर बादशाह अकबर की छाती पर चढ़ कर कटार तान दी थी और उसके प्राणों की भीख मांगने पर तथा भविष्य में मीना बाजार न लगाने का वचन लेकर उसे जीवन दान देकर -इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया.इसी प्रकार झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई ने राष्ट्र रक्षा के लिए साक्षात दुर्गा बन कर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे.

वैदिक संस्कृति में नारी का स्थान पुरुष से एक हजार गुना ऊंचा है तथा उसका कार्य क्षेत्र गृह है.अपने घर की सुव्यवस्था करना दिव्यगुणी संततियों को जन्म देके उनका सुसंस्कारों से युक्त करके निर्माण करना प्रमुख दायित्व है.गृहस्थ रूपी गाडी के दो पहिये हैं-स्त्री व पुरुष .यदि दोनों ही अपनी -अपनी लीक (मर्यादा)में चलेंगे तभी घर स्वर्ग-धाम बनेगा.दोनों के ही सर्विस या धनोपार्जन में लग जाने से अनेक समस्यायें उत्पन्न होंगी .संतानों को आयाओं पर छोड़ कर सुयोग्य नहीं बनाया जा सकता.

वैदिक संस्कृति में नारी शक्ति की अधिष्ठात्री –‘दुर्गा,’धन की ‘लक्ष्मी’ तथा ज्ञान की ‘सरस्वती’के रूप में मानी , गयी है.कन्याएं साक्षात ‘दुर्गा’हैं,वही विवाह के पश्चात ‘गृह लक्ष्मी एवं साम्राज्ञी’बन जाती हैं तथा प्रौढ़ावस्था में ज्ञान व अनुभवों से संपन्न होकर ‘सरस्वती’बन जाती हैं.हमने अज्ञानवश इनकी कल्पित -फर्जी मूर्तियाँ बनाकर पूजना आरम्भ करके अपने असली स्वरूप को भुला दिया.

विवाह से पूर्व कन्या दो हाथ वाली है,विवाह हो जाने पर चार भुजाधारी और बेटा होने पर छः भुजाधारी तथा पुत्र-वधु आ जाने पर अष्ट भुजाधारी तथा वीर पुत्रों-पुत्रों की मान व दादी मान बन कर सिंह-वाहिनी बन जाती है.

जिस अष्ट-भुजाधारी व सिंह वाहिनी ‘दुर्गामाता’की कल्पित मूर्ती की हम पूजा करते हैं-वह किसी चित्रकार ने ‘भारत-माता’के रूप में अपनी कल्पना के आधार पर एक चित्र बनाया है.राष्ट्र की सामजिक व्यवस्था में उसके चारों अंगों -ब्राह्मन,क्षत्रिय ,वैश्य एवं शूद्र सभी का सहयोग रहता है.राष्ट्र पर शत्रु का आक्रमण होने पर चारों वर्णों के दो-दो हाथ मिला कर भारत माता ‘अष्ट भुजाधारी’चारों के सिंह सदृश्य वीर पुत्रों के सहयोग से ‘सिंह वाहिनी’बन जाती है.’वाहिनी’शब्द सेना के लिए भी प्रयोग होता है.

घर एक विश्वविद्यालय
संसार के महान  पुरुषों का प्रारंभिक शिक्षण अपने घर में ही हुआ है.बच्चे की सर्व प्रथम आचार्या उसकी माता है.है .हमारा अपना घर ही संसार का लघु संस्करण है.जैसे परिवार के स्त्री-पुरुष होंगे ,वैसा ही समाज बनेगा,जैसा समाज बनेगा,वैसा ही राष्ट्र होगा और जैसे राष्ट्र होंगे,वैसा ही विश्व होगा.

स्वामी विवेकानंद से किसी अमेरिकन महिला ने पूछा-स्वामी जी आपने कौन से विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की है,मैं भी अपने एक बेटे को उसी में पढाना चाहती हूँ.स्वामी जी ने उत्तर दिया-“वह विश्वविद्यालय तो अब टूट चूका है”.कौन सा था वह विश्वविद्यालय ?यह पूछने पर स्वामी जी ने कहा-वह विश्वविद्यालय था-मेरी जन्मदात्री माँ-जो अब इस संसार में नहीं है.’माता निर्माता भवति’.

गृहस्थ विज्ञानं

गृहस्थ विज्ञानं संसार का सबसे बड़ा विज्ञानं है,जिसकी सर्वथा उपेच्छा  की जा रही है.उस विज्ञानं को भली भांति’संस्कार चन्द्रिका’पुस्तक में समझ कर आचरण में लाने पर माताएं बच्चे को संत,महात्मा,ऋषी,वीर,राजा अथवा चोर व डाकू जैसा चाहे बना सकती हैं.विधाता ने यह सामर्थ्य नारी को ही दिया है.वीर अभिमन्यु ने माँ के पेट में ही चक्रव्यूह भेदन क्रिया सीख ली थी.नेपोलियन की माता गर्भावस्था में नित्य सैनिक परेड देखती थी.अष्टावक्र ने गर्भ काल में ही वेदान्त की शिक्षा प्राप्त कर ली थी.महारानी मदालसा ने अपने तीन बेटों को ऋषी और चौथे को श्रेष्ठ राजा बना दिया था.

वैदिक विवाह

विवाह शब्द का अर्थ है-विवहनार्थ -विविध कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों के पालन हेतु दो आत्माओं और दो जीवनों का आजीवन अभिन्न मिलन.जहाँ दोनों मिल कर परिवार,समाज,राष्ट्र एवं विश्व की उन्नति में अपना योगदान करेंगे तथा लोक व परलोक की सुसाधना करेंगे.

वैदिक विवाह में तलाक का कोई स्थान नहीं है.आजीवन साथ रहने का विधान है.जैसे दो स्थानों का जल मिला देने पर संसार का बड़े से बड़ा वैज्ञानिक भी उन्हें अलग नहीं कर सकता .यह है वैदिक विवाह की श्रेष्ठता एवं विशेषता.विवाह से पूर्व ही केवल चरम नेत्रों से नहीं बल्कि ज्ञान नेत्रों से भी वर एवं कन्या के वंश ,गुण ,शील,स्वभाव,रूप-रंग,चरित्र आदि की परख कर लेनी आवश्यक है.केवल बाह्य रूप,रंग,कार-कोठी,पैसा,सर्विस आदि को प्राथमिकता नहीं देनी चाहिए.विवाह संस्कार वैदिक रीति से -वर एवं वधु स्वंय वेद मन्त्र बोल कर उनके अर्थ समझ कर प्रसन्नतापूर्वक आजीवन एक साथ रहने की प्रतिज्ञा करें.

आजकल विदेशियों की नक़ल करके जो प्रेम विवाह हो रहे हैं,उनमें से अधिकाँश का १ -२ वर्ष के भीतर तलाक हो जाता है.और अब तो विदेशों में यह मान कर कि जब विवाह का अंत तलाक में होना है,तो क्यों न विवाह को ही बीच में निकाल दिया जाए.परिणाम स्वरूप वहां हजारों स्त्री-पुरुष बिना विवाह्किये ही साथ -साथ रह रहे हैं-जिसके कारण वहां की सरकारों के सामने उनके बच्चों के पालन-पोषण ,शिक्षा व उत्तराधिकार जैसी समस्याएं उत्पन्न हो गयी हैं.उनका गृहस्थ जीवन पशुओं जैसा बन गया है.

भारत में भी यह बीमारी तेजी से बढ़ रही है.दूरदर्शन व सिनेमा के माध्यम से विवाहोंतर संबंधों एवं बिन विवाह किये बच्चे को जन्म देने का हवाला अब शान के साथ दिया जाने लगा है.जो शीघ्र ही एक भयंकर त्रासदी की और देश को ले जायेगा
वैदिक संस्कृति के अभाव में नारी के अपने दिव्य स्वरूप,अपनी छमताओं,परिवार,समाज एवं राष्ट्र निर्माण में अपनी उज्जवल भूमिका  को  भुला  दिया  है .पुरुष  जो  उसी  की कृति है  –  नारी को एक  अभिशाप  के रूप  में चित्रित कर रहा है.आज का पुरुष यदि शैतान हैतो इसका मूल कारण यही है कि  नारी ने उसे संत बनाने की चिंता नहीं की.आज नारी ही नारी की शत्रु बन रही है.दहेज़ के कारण होने वाली अधिकाँश हत्याओं तथा कन्याओं की भ्रूण हत्याओं एवं गर्भपात में मूल रूप से सास व ननदें ही दोषी पाई जाती हैं.

हे मातृ शक्ति !वैदिक संस्कृति संसार की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति है.जैसे आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण हो जाता है,उसी प्रकार अपनी संस्कृति के बिना आपका जीवन,परिवार,समाज व राष्ट्र निष्प्राण होकर अनेकों समस्याओं व संकटों से घिर गया है,तथा विनाश के कगार पर खड़ा है.
हे मानव की जन्मदात्री व निर्माण कर्त्ती माता !वैदिक संस्कृति को अपना कर ‘सृष्टि की ब्रह्मा’ बन कर वेदमाता के आदेश -‘जनया दैव्यं जनम ‘का पालन करके दिव्य-श्रेष्ठ गुणों से युक्त पुत्र व पुत्रियों को ही जन्म दो,तभी आपकी ,समाज,राष्ट्र एवं विश्व की समस्त समस्याओं का समाधान होकर नवयुग-निर्माण होकर संसार स्वर्ग धाम बन जायेगा.आज संसार को ‘मिस इण्डिया’या ‘मिस यूनिवर्स’की नहीं बल्कि हजारों लाखों मदाल्साओं एवं दुर्गों की आवश्यकता है.

मथुरा के आर्य भजनोपदेशक श्री विजय सिंह जी के अनुसार-

हमें उन वीर माओं की कहानी याद आती है
मरी जो धर्म की खातिर कहानी याद आती है
बरस चौदह रही वन में पति के संग सीता जी
पतिव्रत धर्म मर्यादा निभानी याद आती है
कहा सरदार ने रानी निशानी चाहिए मुझ को
दिया सर काट रानी ने निशानी याद आती है
हज़ारों जल गयीं चित्तोड़ में व्रत धर्म का लेकर
चिता पद्मावती तेरी सजानी याद आती है
कमर बाँध कर बेटा लड़ी अंग्रेजों से डट कर
हमें वह शेरनी झांसी की रानी याद आती है. 
                                —*—
विश्व महिला दिवस पर समस्त नारी समाज को मंगलकामनाएं.

तो यह रहा नई बोतल मे पुरानी शराब =होली पर रंग मे भंग। आप सब को सपरिवार होली मंगलमय हो।


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