अधर्म का जय – जयकारा


हिंदुस्तान,लखनऊ,02 -04-2012  

रामनवमी के पावन-पुनीत अवसर पर एक मंदिर मे धर्म के नाम पर हुआ यह तांडव और कुछ नहीं सिर्फ और सिर्फ अधर्म का नग्न तांडव है। कभी सबरी माला के मंदिर मे भगदड़ होती है तो कभी किसी मृत्यु भोज मे। सारा का सारा तमाशा धर्म के नाम पर किया जाता है। जबकि वह धर्म है ही नहीं। अनपढ़ और अज्ञानी लोगों का कोई दोष नहीं है वे तो पढे-लिखे और समृद्ध लोगों को ज्ञानी मान कर उनका अनुसरण मात्र करते हैं। लगभग दो वर्ष से इस ब्लाग के माध्यम से मै ‘धर्म’ का वास्तविक अर्थ और वास्तविक ‘भगवान’ का परिचय देने का प्रयास कर रहा हूँ। लेकिन पढे-लिखे और ज़रूरत से ज्यादा विद्वान इंटरनेटी वीर इंनका उपहास उड़ाते और ‘अधर्म’ का बेशर्म प्रदर्शन करते रहते हैं। पिछली दो पोस्टों मे भी इसी समस्या को मैंने उठाया था और मंदिर/फायरिंग कांड के कारण एक बार फिर इसी ओर ध्यानाकर्षण कर रहा हूँ। 

पोंगा-पंथी ,ढ़ोंगी-पाखंडी पुरोहितों ने अपने विदेशी आकाओं की संतुष्टि हेतु भारतीय वेदिक नियमों एवं सिद्धांतों से अवांछनीय छेड़-छाड़ करके एक अलग हिंदूवाद खड़ा कर दिया था जिस पर आज आजादी के इतने लंबे अरसे बाद भी लोग चलते आ रहे हैं। संत कबीर,रेदास,नानक,आदि ने विदेशी शासन के जमाने मे ही इस घृणित पाखंड का घोर विरोध किया था। आधूनीक युग मे गुलाम भारत मे ही स्वामी दयानन्द’सरस्वती’ और स्वामी विवेकानंद ने इस ढ़ोंगी पाखंड पर ज़बरदस्त प्राहार किया था। किन्तु साम्राज्यवादी शासन के इशारों पर कभी राधा स्वामी तो कभी गायत्री परिवार की स्थापना करके उनके माध्यम से कुप्रचार और ढोंगवाद को बढ़ावा दिया गया। यह मंदिर कांड भी ऐसे ही ढोंग का एक अनिवार्य परिणाम है। 
नौ जड़ी बूटियाँ नवरात्र मे स्वास्थ्य-रक्षा के महत्व के अनुसार चुनी गई थीं। उनका सेवन,उन्हें सम्मिलित करके ‘हवन’ करके मानव जीवन को बदलते मौसम के अनुकूल ढालने का सद्प्रयास था। लेकिन आज (विशेषकर पढे-लिखे उच्चाधिकारी लोग ) सार्वजनिक रूप से महज थोथा ढोंग करके नवरात्र मे नाच-गाना,ऊधम-बवंडर करके जनता को गुमराह कर रहे हैं। अनपढ़ जनता तो उनकी देखा- देखी वैसा ही स्वांग रचती है। 

राम ने अपने समय मे ‘आर्यावृत’ और ‘जंबू द्वीप’ का एकीकरण करके साम्राज्यवादी रावण(जो आर्य विद्वान ही था) को परास्त करके जनोन्मुखी सत्ता की स्थापना की थी। राम और भरत के आर्ष चरित्र श्रेष्ठ राजनीति के दृष्टांत उपस्थित करते हैं। लेकिन आज राजनीति को विकृत करने वाले तथा-कथित राम-भक्त बन कर ऐसे उपद्रवों के हेतु बन रहे हैं। 
कृष्ण ने भी अपने समय मे अत्याचार और अनाचार का प्रतिकार करके जनता को सुशासन उपलब्ध करवाया था। वह एक सफल राजनेता थे। लेकिन आज राम और कृष्ण के भक्त कहलाने वाले लोग राजनीति की कटु निंदा कर रहे हैं,राजनीतिज्ञों की आलोचना कर रहे हैं। वे राम और कृष्ण को अवतारी भगवान घोषित करके उनका अनुसरण करने से जनता को रोक रहे हैं। 
हमे इस दुराग्रह को समझने की नितांत आवश्यकता है। विदेशी शासकों की भांति ही देशी कारपोरेट घरानों का भी हित जनता को मूर्ख बना कर उल्टे उस्तरे से लूटते रहने उसका शोषण और उत्पीड़न करने मे है। इसी लिए ये लोग ढोंग और पाखंड को बढ़ावा देने हेतु मंदिरों आदि मे चढ़ावा चढ़ाते रहते हैं। एक फिल्मी अभिनेता- अभिनेत्री की शादी मे ‘मंगली दोष’ के निवारणार्थ दक्षिण भारत के एक मंदिर मे 50-50-50 लाख रुपए एक कारपोरेट उद्योगपति,एक राजनेता का चोला ओढ़े उद्योगपति और मशहूर अभिनेता ने चढ़ावा चढ़ाया था । इनकी देखा-देखी आम जनता भी पाखंडियों से लुटती रहती है। 
दुख और अफसोस इस बात का है कि आम गरीब,किसान ,मजदूर के हिमायती एक दूसरी हिमाकत करते हैं कि ‘धर्म’ का विरोध करके जनता को अपने से दूर कर लेते हैं जिसका सीधा-सीधा लाभ शोषकों और उतपीडकों को मिलता है। वस्तुतः जनता को वास्तविक ‘धर्म’ समझा कर शोषकों के चंगुल से निजात दिलाने की आवश्यकता है जिस ओर हमारे बाम-पंथी बंधु ध्यान ही नहीं दे रहे हैं और जनता विकल्पहीनता मे बार-बार लुटेरोके चंगुल मे फंस जाती है। इन लुटेरो के प्यादे जनता को राजनीतिज्ञों के प्रति बरगलाते रहते हैं और उनका साथ देते हैं सभी प्रकार के पुरोहितवादी। 

जनता तो बाम-पंथ को चुन सकती है किन्तु बाम-पंथ खुद ही जनता से दूरी बनाए हुये है। CPM ने तो इन चुनावों मे CPI के विरोध मे भी प्रचार किया था और बाम-पंथी मोर्चे मे भी वे थे। हमारे वरिष्ठ नेतागण ‘धर्म’ का विरोध भी करते हैं और व्यक्तिगत-सामाजिक जीवन मे उसी धर्म के अनुसार रसमे भी निभाते हैं जिंन का नियमन संघी पुरोहितों द्वारा होता है। ‘क्रांतिस्वर’के माध्यम से मै’धर्म’ की वास्तविक व्याख्या प्रस्तुत करता आ रहा हूँ यदि बाम-पंथ उसका सहारा ले तो जनता और बाम-पंथ दोनों को लाभ हो सकता है। ‘एकला चलो’के आधार पर मै तो डटा हुआ हूँ भावी बाम-पंथी अवश्य लाभान्वित होंगे इस उम्मीद के साथ ।


 
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