काम के घंटे हों -चार


पहली मई ‘मजदूर दिवस’ पर विशेष 




आज पूरी दुनिया मे हर जाति,संप्रदाय,धर्म के लोग ‘मजदूर दिवस’ के पर्व को अपने -अपने तरीके से मना रहे हैं। लगभग सवा सौ वर्षों पूर्व अमेरिका के शिकागो शहर मे मजदूरों ने व्यापक प्रदर्शन का आयोजन किया था ,तब से ही आज के दिन को प्रतिवर्ष ‘मजदूर दिवस’ के रूप मे मनाने की परिपाटी चली आ रही है। वस्तुतः आज का दिन उन शहीद मजदूरों की कुर्बानी को याद करने का दिन है जिन्हों ने अपने साथियों के भविष्य के कल्याण हेतु अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया था। ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लोभ मे उद्योगपति मजदूरों से 12-12 और 14-14 घंटे काम लेते थे। उनका शोषण -उत्पीड़न तो करते ही थे उन्हें बंधक भी बना लेते थे। समय-समय पर मजदूर संगठित होकर अपने ऊपर हो रहे जुल्मों का विरोध करते थे। व्यापारियो -उद्योगपतियों की समर्थक सत्ता की गोली वर्षा से अनेकों मजदूर शहीद हुये और तभी से मजदूरों का सफ़ेद ‘झण्डा’ ‘लाल’ रंग मे तब्दील कर दिया गया जो इन वीरों की शहादत याद दिलाता है। इसी के फलस्वरूप  बाद मे काम के घंटे -8 नियमित किए गए थे।

मजदूरों ने किसानों को भी अपने साथ मिलाया और दुनिया मे उनको पहली सफलता 1917 मे रूस मे मिली भी। रूसी क्रांति का ही असर था कि, भारत आदि कई उपनिवेशों को साम्राज्यवाद से मुक्ति मिली। 1949 मे चीन मे भी मजदूरों की सत्ता की स्थापना हुई। रूस और चीन मे मजदूरों का नेतृत्व करने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां जिस तरीके से साम्यवाद को लागू करती रहीं वह त्रुटिपूर्ण रहा। यही कारण है कि 1991 मे रूस से कम्युनिस्ट शासन विदा हो गया और अब वहाँ पुनः पूंजीवादी व्यवस्था लागू है। चीन मे भी कम्युनिस्ट पार्टी ने पूंजीवाद पर चलना चालू कर रखा है।

भारत मे भी आज मजदूर आंदोलन बिखरा हुआ है। मजदूरों के नाम पर पूँजीपतियों ने अपने हितैषी संगठन खड़े करवा लिए हैं जो मजदूर एकता मे बाधा हैं। वैसे भी जाति और धर्म भारत मे मजदूरों के संगठित होने मे बाधक रहे हैं। आबादी तेज़ी से बढ़ी है,वैज्ञानिक प्रगति खूब हुई है परंतु रोजगारों मे छ्टनी भी खूब हुई है। बेरोजगारी और गरीबी के कारण मनुष्यों का जीना दूभर हो गया है। जिन को रोजगार मिला भी है उनका शोषण बहुत बढ़ गया है। श्रम क़ानूनों के मौजूद होते हुये भी कामगारों से आज फिर 12-12 घंटे,14-14 घंटे काम लिया जा रहा है। दूसरी ओर अमीर और अमीर हुआ है। उद्योपातियों के मुनाफे मे बेतहाशा वृद्धि हुई है और मजदूरों का जीना मुहाल हुआ है।

मजदूरों का उत्पीड़न और शोषण बरकरार रखने के लिए उद्योगपतियों-पूँजीपतियों के दलाल-तथाकथित पुरोहित जनता को अधर्म का पाठ धर्म के नाम पर पढ़ा रहे हैं। हमारे कम्युनिस्ट मजदूर नेता धर्म के उसी गलत स्वरूप को धर्म मानते हुये धर्म का कडा विरोध करते हैं। नतीजा यह होता है कि मजदूर और गरीब जनता अधर्मिकों के मकड़-जाल मे उलझ कर रह जाती है।

आज इस मजदूर दिवस पर मजदूरों को संकल्प लेना चाहिए कि अधार्मिक पुरोहितों का पर्दाफाश करके वास्तविक ‘धर्म’ के मर्म को समझते हुये अपनी मुक्ति हेतु एकजुट संघर्ष करेंगे। बढ़ती बेरोजगारी पर काबू पाने और बेतहाशा मुनाफा ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए काम के घंटे कम करके ‘चार’ करवाने का संघर्ष प्रारम्भ करना होगा। 8 घंटे के कानूनी प्रविधान को 4 घंटे करने पर तत्काल दुगुने लोगों को रोजगार संभव होगा और वह मुनाफा इस प्रकार चंद हाथों से निकाल कर एक बड़े वर्ग की ज़िंदगी संवार सकेगा।


‘काम के घंटे हों-चार ‘इस आंदोलन को चलाने के लिए हमारे नेता अपने वेदिक विद्वानों के विचारों को साथ लें तो जनता का भला कर सकेंगे।मथुरावासी विजय सिंह जी का लिखा मेरे स्वर मे यह गीत सुनें और स्पष्ट समझें कियह मजदूर आंदोलन को संगठित करने मे बहुत मददगार होगा। काश नेतृत्व स्वीकार कर सके?

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5 comments on “काम के घंटे हों -चार

  1. एकजुट संघर्ष ही कुछ बदलव ला सकता है…..उम्दा सुझाव

  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा-मंच पर |charchamanch.blogspot.com

  3. महत्वपूर्ण प्रस्तुति…

  4. बदलाव लाना जरुरी है..सही कहा.विजय जी आप ने….उपयोगी प्रस्तुति….आभार..

  5. सदा says:

    बिल्‍कुल सही कहा आपने …सार्थक प्रस्‍तुति।

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