गांधीजी/शास्त्रीजी के ग्रह-नक्षत्र (पुनर् प्रकाशन)


गांधी-शास्त्री जयंती पर विशेष स्मरण

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

"गांधी को महात्मा बनाने वाले ग्रह -नक्षत्र"

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यद्यपि महात्मा गांधी ने सरकार में कोई पद ग्रहण नहीं किया;परन्तु उन्हें राष्ट्रपिता की मानद उपाधि से विभूषित किया गया है.गांधी जी क़े जन्मांग में लग्न में बुध बैठा है और सप्तम भाव में बैठ कर गुरु पूर्ण १८० अंश से उसे देख रहा है जिस कारण रूद्र योग घटित हुआ.रूद्र योग एक राजयोग है और उसी ने उन्हें राष्ट्रपिता का खिताब दिलवाया है.गांधी जी का जन्म तुला लग्न में हुआ था जिस कारण उनके भीतर न्याय ,दया,क्षमा,शांति एवं अनुशासन क़े गुणों का विकास हुआ.पराक्रम भाव में धनु राशि ने उन्हें वीर व साहसी बनाया जिस कारण वह ब्रिटिश सरकार से अहिंसा क़े बल पर टक्कर ले सके.

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गांधी जी क़े सुख भाव में उपस्थित होकर केतु ने उन्हें आश्चर्यजनक ख्याति दिलाई परन्तु इसी क़े कारण उनके जीवन क़े अंतिम वर्ष कष्टदायक व असफल रहे.(राजेन्द्र बाबू को भी ऐसे ही केतु क़े कारण अंतिम रूप से नेहरु जी से मतभेदों का सामना करना पड़ा था.)एक ओर तो गांधी जी देश का विभाजन न रुकवा सके और दूसरी ओर साम्प्रदायिक सौहार्द्र भी स्थापित न हो सका और अन्ततः उन्हें अंध -धर्मान्धता का शिकार होना पड़ा.

गांधी जी क़े विद्या भाव में कुम्भ राशि होने क़े कारण ही वह कष्ट सहने में माहिर बने ,दूसरों की भलाई और परोपकार क़े कार्यों में लगे रहे और उन्होंने कभी भी व्यर्थ असत्य भाषण नहीं किया.गांधी जी क़े अस्त्र सत्य और शास्त्र अहिंसा थे.गांधी जी क़े सप्तमस्थ गुरु ने ही उन्हें विद्वान व राजा क़े तुल्य राष्ट्रपिता की पदवी दिलाई.

गांधी जी क़े भाग्य भाव में मिथुन राशि है जिस कारण उनका स्वभाव सौम्य,सरस व सात्विक बना रहा.धार्मिक सहिष्णुता इसी कारण उनमें कूट -कूट कर भरी हुई थी.उन्होंने सड़ी -गली रूढ़ियों व पाखण्ड का विरोध किया अपने सदगुणों और उच्च विचारों क़े कारण अहिंसक क्रांति से देश को आज़ाद करने का लक्ष्य उन्हें इसी क़े कारण प्राप्त हो सका.गांधी जी क़े कर्म भाव में कर्क राशि की उपस्थिति ने ही उनकी आस्था श्रम,न्याय व धर्म में टिकाये रखी और इसी कारण राजनीति में रह कर भी वह पाप-कर्म से दूर रह कर गरीबों की सेवा क़े कार्य कर सके.गांधी जी का सर्वाधिक जोर दरिद्र -नारायण की सेवा पर रहता था और उसका कारण यही योग है.गांधी जी क़े एकादश भाव में सिंह राशि एवं चन्द्र ग्रह की स्थिति ने उन्हें हठवादी,सादगी पसन्द ,सूझ -बूझ व नेतृत्व की क्षमता सम्पन्न तथा विचारवान बनाया.इसी योग क़े कारण उनके विचार मौलिक एवं अछूते थे जो गांधीवाद क़े नाम से जाने जाते हैं.अस्तु गांधी जी को साधारण इन्सान से उठ कर महात्मा बनाने में उनके जन्म-कालीन ग्रह व नक्षत्रों का ही योग है.

(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

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5 टिप्‍पणियां:

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    पी.सी.गोदियाल "परचेत"28 जनवरी 2011 4:03 pm
    वाह जी , माथुर साहब बहुत खूब ! महात्मा गांधी की पूरी जन्मपत्री बांच डाली आपने ! बस, यही एक क्षेत्र है जिसमे हम गांधी से कोई प्रेरणा नहीं ले सकते,:) क्योंकि जन्मपत्री अथवा भाग्य बदला ही नहीं जा सकता ! हमारे पास जो है, सदा वही रहना है !
  2. salil.JPG
    चला बिहारी ब्लॉगर बनने28 जनवरी 2011 8:25 pm
    डॉ. बी. वी. रामन की पुस्तक में पढ़ा था जब मैं ज्योतिष का अध्ययन कर रहा था!आपकी विवेचना प्रशंसनीय है!!
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    डॉ॰ मोनिका शर्मा29 जनवरी 2011 5:32 am
    बहुत गहरी और सुंदर विश्लेष्णात्मक विवेचना …..
  4. ranjana-2%2Bset%2Bphoto%2Bedited.jpg
    रंजना29 जनवरी 2011 4:13 pm
    वाह..एकदम नवीन ढंग की विवेचना पढने को मिली यहाँ…

    बड़ा अच्छा लगा…

    आभार…

  5. scan0001.jpg
    अनामिका की सदायें ……20 दिसम्बर 2011 7:43 pm
    ye janmpatriyan kabhi bhi hamari samajh me nahi aayi. 😦

    सोमवार, 10 जनवरी 2011

    शास्त्री जी प्रधान मंत्री कैसे बने ?

    Lal_Bahadur_Shastri.jpg

    एक उच्च कोटि क़े विद्वान् का कथन है कि,मनुष्य और पशु क़े बीच विभाजन रेखा उसका विवेक है.जहाँ यह विवेक छूता है ,वहां मनुष्य और पशु में कोई भेद नहीं रह जाता है.१९६५ क़े भारत-पाक संघर्ष क़े दौरान जब लिंडन जॉन्सन ने शास्त्री जी को पाकिस्तानी क्षेत्र में न बढ़ने की चेतावनी दी तो शास्त्री जी ने अमेरिकी पी.एल.४८० को ठुकरा दिया था और जनता से सप्ताह में एक दिन सोमवार को सायंकाल क़े समय उपवास रखने का आह्वान किया था ;जनता ने सहर्ष शास्त्री जी की बात को शिरोधार्य कर क़े उस पर अमल किया था.यह दृष्टांत शास्त्री जी की लोकप्रियता को ही दर्शाता है और यह शास्त्री जी क़े स्वाभिमान का भी प्रतीक है.

    सब की सुनने वाले -शास्त्री जी जितने दबंग थे और गलत बात को कभी भी किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करते थे ,उतने ही विनम्र और सब की सुनने वाले भी थे.जब शास्त्री जी उ.प्र.क़े गृह मंत्री थे तो क्रिकेट मैच क़े दौरान पुलिस ने स्टेडियम में छात्रों पर लाठी चार्ज कर दिया था.उस समय पुलिस की टोपी लाल रंग की हुआ करती थी.लखनऊ विश्वविद्यालय क़े छत्र संघ क़े अध्यक्ष क़े नेतृत्व में छात्रों का एक प्रतिनिधिमंडल शास्त्री जी से मिला और पुलिस को हटाने क़े सम्बन्ध में आग्रह किया और कहा -मंत्री जी कल से लाल टोपी खेल क़े मैदान में नहीं दिखाई देनी चाहिए.शास्त्री जी ने नम्र भाव से उत्तर दिया ठीक है ऐसा ही होगा.शास्त्री जी ने लखनऊ क़े सारे दर्जियों को लगा कर रात भर में खाकी टोपियाँ सिलवा दीं और जब अगले दिन छत्र पुनः शिकवा लेकर शास्त्री जी से मिले तो शास्त्री जी ने सहज भाव से कहा -तुम लोगों ने लाल टोपी न दिखने की बात कही थी,हमने उन्हें हटा कर खाकी टोपियाँ सिलवा दीं हैं.

    नितांत गरीबी व अभावों में पल-बढ़ कर शास्त्री जी इतने बुलंद कैसे हुए और ऊपर कैसे उठते गये ,आईए जाने उनके ग्रह -नक्षत्रों से. शास्त्री जी की हथेली में मणिबंध से प्रारम्भ और शनि तथा बृहस्पति पर द्विविभाजित भाग्य रेखा ने लाल बहादुर शास्त्री जी को उच्च पद पर पहुँचाया और निर्भीक, साहसी,लोकप्रिय व देशभक्त बनाया,जिसकी पुष्टि उनके जन्मांग से स्पष्टतः
    हो जाती है.

    शास्त्री जी की कुंडली में बुध अपनी राशी में राज्य-भाव में बैठा है और भद्र-योग निर्मित कर रहा है.इस योग का फल यह होता है कि,इसमें उत्त्पन्न मनुष्य सिंह क़े समान पराक्रमी और शत्रुओं का विनाश करने वाला होता है .शास्त्री जी ने सन१९६५ ई.क़े युद्ध में पहली बार शत्रु की धरती पर धावा बोला और पाकिस्तान से सरगोधा व सियालकोट छीन लिये थे तथा लाहौर में प्रवेश करने ही वाले थे जब रूस क़े अनुरोध पर युद्ध -विराम करना पड़ा.भद्र-योग रखने वाला व्यक्ति पेचीदा से पेचीदा कार्य भी सहजता से कर डालता है.यह शास्त्री जी की ही सूझ-बूझ का परिणाम था कि,विश्व-व्यापी विरोध क़े बावजूद भारत शत्रु क़े पांव बांध सका.बुध क़े द्वारा निर्मित भद्र-योग क़े कारण ही शास्त्री जी -प्रधान मंत्री पद जितना ऊंचा उठ सके तभी तो कन्हैय्या लाल मंत को गाना पड़ा :-

    दहल उठे इस छोटे कद से बड़े-बड़े कद्दावर भी,
    ठहर उठे रण-हुंकारों से बड़े-बड़े हमलावर भी.
    दुश्मन ने समझा,भारत की मिट्टी में गर्मायी है,
    सत्य,अहिंसा क़े हामी ने भी तलवार उठाई है..

    (२८ सितम्बर,१९६९ ई. ,दैनिक हिंदुस्तान में छपी कविता से ये पंक्तियाँ उद्धृत हैं.)

    सम्पादन समन्वय-यशवन्त माथुर

    (इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

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    6 टिप्‍पणियां:

    1. msv%2B3.png
      mahendra verma10 जनवरी 2011 5:28 pm
      एकमात्र बेदाग प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री जी के यशस्वी जीवन से संबंधित प्रसंग पढ़कर गौरव की अनुभूति हुई।

      आज के राजनीतिज्ञों को शास्त्री जी के जीवन और व्यक्तित्व से प्रेरणा लेनी चाहिए।

      ज्योतिषीय विश्लेषण से ज्ञानवृद्धि हुई।

    2. salil.JPG
      चला बिहारी ब्लॉगर बनने10 जनवरी 2011 7:38 pm
      श्रद्धावनत हो उस सच्चे सपूत के चरणों की वंदना करता हूँ, जिनका त्याग, बलिदान, पराक्रम, ईमानदारी आदि गुण आज इतिहास का अंग हो चुके हैं, कदाचित् लुप्तप्राय!
      इस सपूत का जन्मदिन तो किसी को याद नहीं होता, पुण्यतिथि पने याद दिलाई यही क्या कम है!!
    3. Canada%25252B%2525252709%25252B896.jpg
      डॉ टी एस दराल10 जनवरी 2011 9:02 pm
      छोटे कद के लाल बहादुर शास्त्री ऊंचे चरित्र और आत्मविश्वास वाले व्यक्ति थे । उनका जीवन किसी भी गरीब और गाँव में रहने वाले युवक के लिए एक उदाहरण हो सकता है ।
      आज शहर में रहकर हम अपनी मूल वास्तविकता को भूलकर भ्रष्टाचार में लिप्त ऐसे महापुरुषों को भुला दे रहे हैं ।
      सार्थक और समसामयिक लेख के लिए बधाई एवम आभार स्वीकारें ।
    4. DSC00050.JPG
      राज भाटिय़ा11 जनवरी 2011 2:02 am
      आज तक भारत मे एक ही प्रधानमंत्री हुये हे, जिन पर हम गर्व कर सकते हे,शिक्षा ले सकते हे, ओर वो हे…मेरे सब से प्रिय स्व. लाल बहादुर शास्त्री जी, उन्हे प्रणाम
    5. Rohit.jpg
      boletobindas11 जनवरी 2011 4:43 am
      वहा क्या बात है। देशभकत क्या होती है ये कोई शास्त्री जी से सीखें। पर क्या करे चाय के प्यालों में तूफान उठाते-उठाते हकीकत के धरातल से इतना दूर हो चुका है हमारा राजनेतुत्व की कुछ भी कहना मुहाल है। आशा फिलहाल किसी नेता में नहीं दिखती।
    6. 34245.jpg
      पी.सी.गोदियाल "परचेत"11 जनवरी 2011 5:37 pm
      बढ़िया प्रस्तुती ! इसमें यह बात भी देखने लायक है कि एक वो शास्त्री थे जिन्होंने देश में साधनों की कमी की वजह से लोगो का आव्हान किया था कि हफ्ते में एक दिन भूखे रहकर हम अपनी कमजोर और पाकिस्तान के साथ युद्ध की वजह से गिरती अर्थव्यवस्था को सुधारेंगे, उन्होंने यह भी कहा था कि दस साल से कम उम्र के बच्चों को उपवास के लिए न कहें , फिर भी लोगों ने खुसी-खुसी अपने बच्चो को भी हफ्ते में एक दिन के उपवास पर रखा था! और एक ये आज के अर्थशास्त्री है मन मोहन सिंह जी , जो देश में साधनों की भरमार होते हुए भी जबरन लोगो को भूखों मरने पर विवश कर रहे है !

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