कारपोरेट ट्रेड यूनियनिज़्म का खेल/शिकार


“अपने आर्थिक हितों के लिए बनाए गए स्वेच्छिक संघों को श्रम संघ कहते हैं । ” यह है ट्रेड यूनियन्स की सर्वमान्य परिभाषा।

15 मई 1972 से ‘सारू स्मेल्टिंग प्रा.लि.’,मेरठ मे मैंने अकाउंट्स विभाग मे कार्य प्रारम्भ किया था। 11 माह बाद दो और लोगों के साथ मुझसे भी रिज़ाईन करने को कहा गया था,आश्वासन यह था कि दो दिन बाद फिर से नया एप्वाईंट मेंट लेटर मिल जाएगा। उन दो साथियों की सोर्स तब भी मौजूद थी जबकि मुझे जाब दिलवाने वाले फेकटरी इंस्पेक्टर महेश चंद्र माथुर  साहब स्थानांतरित हो चुके थे। मैंने यह सोच कर कि नौकरी यों भी जानी  ही है तो रिज़ाईन क्यों करूँ जब चाहें मेनेजमेंट हटा ही देगा रिज़ाईन करने से इंकार कर दिया। दो दिन के अंतराल दिखा कर उन दोनों को नया एप्वाईंट मेंट लेटर दे दिया गया जबकि कार्य लगातार करते रहे। कुछ दिन बाद फेकटरी मेनेजर बृजेन्द्र कुमार अखोरी साहब द्वारा हस्ताक्षरित ‘शो काज नोटिस’ मुझे दिया गया।

 

पूर्व परसोनल आफ़ीसर डॉ मिश्री लाल झा साहब (जो मेरठ यूनिवर्सिटी मे ए आर हो गए थे ) को मैंने वह पत्र दिखाया जिसका उन्होने उत्तर डिक्टेट कर दिया और हिदायत दी कि लिख कर मैं उसे पूर्व फेकटरी मेनेजर जैन साहब को(जो दूसरी फेकटरी मे चले गए थे) दिखा लूँ। जैन साहब ने झा साहब के लिखाये उत्तर को सही बता कर जमा करने को कह दिया। उत्तर पढ़ते ही अखोरी साहब खुद मेरी सीट पर चल कर आए और अपने साथ गैलरी मे ले जाकर बोले मुझसे क्यों लड़ते हो?मैं भी तो कायस्थ हूँ। मैंने कहा साहब तो आपने फिर यह लेटर मुझे क्यों दिया था?उत्तर देना मेरा फर्ज़ था। वह बोले लगता है तुम उस गधे (यह उन्होने झा साहब के लिए कहा था)के पास चले गए वह पंडित दोनों कायस्थों को लड़ाना चाहता है। खैर अब इसकी कापी जो रिसीव कराई है उसे फाड़ दो ओरिजनल भी फाड़ देते हैं। मैंने उनसे कहा मैं कोई कागज नहीं फाड़ सकता आप अपने लेवल पर उसे रिजेक्ट कर सकते हैं। उन्होने कहा कि ठीक है हम कोई एक्शन नहीं लेंगे तुम भी अब चुप रहना।


बात आई गई हो गई। ‘सारू मजदूर संघ ‘के कोषाध्यक्ष आनंद स्वरूप गुप्ता जी मुझसे बोले जब तुम अकेले अपने लिए लड़ सकते हो तो यूनियन मे शामिल होकर सबके भले के लिए काम करो और इस प्रकार ट्रेड यूनियन मे मेरा पिछली तारीख से प्रवेश हो गया। बाद मे कार्यकारिणी मे भी मैं रहा। किन्तु प्रेसीडेंट सहदेव शर्मा जी को मिला कर जून 1975 मे एमर्जेंसी लागू होने पर मेनेजमेंट ने मुझे बर्खास्त कर दिया।

 

पहले वहाँ ‘मेटल वर्कर्स यूनियन’सक्रिय थी जिसका नेतृत्व एस पी सहगल साहब के पास था,वह जसवंत शुगर मिल के कर्मचारी और यूनियन के महामंत्री रहे थे। किन्तु एक अन स्किल्ड वर्कर ओ पी शर्मा साहब को मेनेजमेंट ने आगे करके ‘सारू मजदूर संघ’ की स्थापना करा दी थी जो शुरू मे एक पपेट यूनियन थी। फिर सहगल साहब के निर्देश पर सभी कर्मचारी इसी मे प्रवेश कर गए थे और अधिकार कर लिया था ,अंततः नियंत्रण भी सहगल साहब के हाथों मे आ गया था। एस डी शर्मा जी भी ओ पी शर्मा जी की राह पर चल निकले थे और पहला शिकार मुझे बनाया गया था। मेरे हटने के कुछ वर्ष बाद यूनियन दो फाड़ होकर भंग हो गई थी।

 

सवा तीन वर्ष के अनुभव के आधार पर निर्माणाधीन ‘होटल मोगूल ओबेराय’,आगरा मे मुझे 22 सितंबर,1975 से  जाब तो मिल गया परंतु बिना एक्सपीरिएन्स सर्टिफिकेट के वेतन कम मिला। बाद मे चालू होने पर यह ‘होटल मुगल शेरेटन’हो गया और मेनेजमेंट को ‘स्टैंडिंग आर्डर्स’ मे ‘होटल एंड रेस्टोरेन्ट वर्कर्स यूनियन’ की ओर से दाखिल आपत्तियों से निपटना था। अतः कुछ सुपरवाईजर्सको आगे करके मेनेजमेंट ने एक ‘स्टाफ फेल्फेयर कमेटी’ का गठन कराने की पहल की। अकाउंट्स विभाग के प्रतिनिधि के रूप मे सुदीपतो मित्रा ने मेरा नाम लिख कर एक कागज पर हस्ताक्षर शुरू कराये थे और तीन हस्ताक्षर हुआ वह कागज जैसे ही मेरे समक्ष आया मैंने उसी पर लिख दिया कि,हम सब सुदीपतो मित्रा को अपना प्रतिनिधि चुनते हैं। शेष 30-35 लोगों ने मेरे कथन का समर्थन कर दिया। बाकी विभागों से सर्व सम्मत एक-एक नाम पहुंचे थे। मित्रा का तर्क था कि बहुमत ने विजय माथुर का समर्थन किया है अतः वही निर्वाचित माना जाए और मेरा तर्क था कि चूंकि मैंने सुदीप्तों मित्रा के लिए समर्थन मांगा है अतः वह निर्वाचित हो चुके हैं -शेर की सवारी कर चुके हैं अब उतर नहीं सकते। पर्सोनेल मेनेजर को मेरा तर्क स्वीकार करना पड़ा। एक तरफ जेनरल मेनेजर की अध्यक्षता वाली यह स्टाफ वेल्फेयर कमेटी कर्मचारियों के हितों की बात उठाती रही दूसरी तरफ स्टाफ के इन कुल  11 सदस्यों ने मेनेजमेंट की शह  पर ‘होटल मुगल कर्मचारी संघ’ नामक यूनियन का गठन प्रारम्भ कर दिया। समस्या सदयस्ता की थी कुछ सुपरवाईजर्स ही इसके सदस्य बने थे। मेरठ मे सारू स्मेल्टिंग के कटु अनुभव के कारण मैं दिलचस्पी नहीं ले रहा था और बाकी स्टाफ मेरी गैर हाज़िरी वाली किसी भी यूनियन मे शामिल नहीं हो रहा था।

 

सुदीप्तों मित्रा का बैंक आफ बरोदा मे DRO के रूप मे सिलेक्शन हो गया। होटल मुगल कर्मचारी संघ का महामंत्री पद रिक्त हो गया। प्रेसीडेंट अशोक भल्ला साहब और ज्वाईंट सेक्रेटरी योगेन्द्र कुमार सिक्का ने कमेटी की बैठक मे महामंत्री पद पर मेरे चुनाव की घोषणा कर दी जबकि हकीकत मे मैं तो साधारण सदस्य भी न था। सार्वजनिक घोषणा हो चुकने के बाद  मेरा इंनकार ‘पलायन’ हो जाता  अतः ‘गले पड़े का ढ़ोल बजाना’ मेरी मजबूरी हो गई। एक सप्ताह मे सदस्यता 250 की संख्या पार कर गई। यूनियन के रेजिस्ट्रेशन हेतु जो इंस्पेक्टर जैन साहब कानपुर से आए थे उनसे मैंने रिटायर्ड  ‘डिप्टी चीफ इंस्पेक्टर आफ फेकटरीज़’ श्री महेश चंद्र माथुर का हवाला देते हुये बताया कि वह हमारे नानाजी के फुफेरे भाई हैं। जैन साहब उनके आधीन काम कर चुके थे उन्होने बगैर कुछ चेक किए ही यूनियन रेजिस्टर्ड करने की सिफ़ारिश कर दी।

 

जेनेरल मेनेजर सरदार चरण जीत सिंह पेंटल ओबेराय ग्रुप मे यूनियन दो फाड़ करने मे कामयाब रहे थे उनको पर्सोनेल मेनेजर हरी मोहन झा साहब ज़्यादातर मेनेजर्स को अपने साथ लामबंद करके तथा स्टाफ फेल्फेयर कमेटी (एवं यूनियन)के सदस्यों को पोट-पाट कर अपने पाले मे करते हुये झुका लेते थे। झा साहब खुद को रिंग मास्टर कहते थे। मेरे यूनियन का महामंत्री बनने पर भी  उन्होने पुराना खेल जारी रखना चाहा जो न चल सका। मैंने यूनियन को पूरी तरह कर्मचारी हितों के साथ जोड़ दिया और मेनेजमेंट की गुटबाजी का मोहरा न बनने दिया। झा साहब ने मुझे चेतावनी  देने के तौर पर अपना पुराना किस्सा सुनाया था जो इस प्रकार है —

 

झा साहब डॉ जगन्नाथ मिश्रा एवं ललित नारायण मिश्रा जी के भतीज दामाद थे और इसी योग्यता के आधार पर कालेज से मात्र बी ए करने बाद जमशेदपुर मे टाटा के यहाँ पर्सोनेल आफ़ीसर बन गए थे। यूनियन का बुजुर्ग घाघ महामंत्री हर मेनेजर को काबू रखता था। इनमे नया जोश था इनहोने एक दिन उसे धक्का देकर अपने आफिस से हटा दिया वह चला भी गया। जेनेरल मेनेजर ने इनको बुला कर हवाई टिकट पकड़ा कर प्रमोशन पर कलकत्ता रवाना कर दिया और हिदायत दी कि सामान भूल जाओ वहाँ कंपनी बंदोबस्त कर देगी ।जब स्टाफ को एकत्र कर वह मजदूर नेता पहुंचा तो जी एम ने उसे झूठ कह दिया कि झा को बर्खास्त करके हटा दिया है अतः वह भाग गया।

 

मैंने झा  साहब की कहानी सुन कर कोई जवाब नहीं दिया लेकिन मन मे दृढ़ निश्चय कर लिया कि चाहे जो हो उनके आगे झुकना नहीं है। बदली परिस्थितियों मे जेनेरल मेनेजर मीटिंग मे मेरे द्वारा प्रस्तुत सुझावों को तत्काल मंजूर करने लगे जिससे झा साहब को झटका लगा और स्टाफ के समक्ष मेरी साख और बढ़ गई। भल्ला साहब एवं सिक्का जी तो पहले ही पंजाबी होने के कारण पेंटल साहब के प्रति सौम्य थे किन्तु झा साहब की किलेबंदी मे फंस जाते थे जो अब नहीं होने से प्रसन्न थे। 03-04-1978 के दिनांक से यूनियन रेजिस्टर्ड होने का पत्र आने पर मेनेजमेंट ने यूनियन को मान्यता भी दे दी। जो चार्टर् आफ डिमांड सुदीप्तों मित्रा पेश कर गए थे उसमे झा साहब रद्दो-बदल करवा कर विवाद खड़ा करना चाहते थे मैंने दृढ़ता पूर्वक किसी भी बदलाव से इंकार कर दिया।झा  साहब ने तब मेंडेट न होने का दांव चल दिया।  हमने यूनियन के चुनाव घोषित कर दिये। भल्ला साहब पर जी एम के पिट्ठू का ठप्पा होने से मैंने उनका समर्थन न करके पी बी सिंह का समर्थन किया। सिंह साहब को झा साहब ने कालांतर मे तोड़ लिया,किन्तु मैं पहले ही जिन दीपक भाटिया साहब को नया ज्वाईंट सेक्रेटरी बनवा चुका था वह मेरे बहुत काम आए। दीपक भाटिया जी पहले जया भादुरी जी के पी ए थे और शादी के बाद अमिताभ जी से कह कर उनका एडीशनल  पी ए जया जी उनको बनवा दिया था। पेंटल साहब से अमिताभ जी ने आगरा मे दीपक भाटिया को  नौकरी देने की सिफ़ारिश की थी और वह पेंटल साहब के मुंह लगे थे। हालांकि उनको ज्वाईंट सेक्रेटरी बनवाने पर लोगों को ताज्जुब भी हुआ था कि मैंने ऐसा क्यों किया। झा साहब की चाल बाजियों को पेंटल साहब तक वह पहुंचा देते थे और पेंटल साहब मुझे समर्थन देकर मेनेजमेंट की गुटबाजी मे झा साहब को झकझोर देते थे। 11-09-1978 को जो सम्झौता हुआ उसमे झा साहब की एक भी दाल न गली। 

 

झा साहब ने पी बी सिंह को भड़का कर यूनियन मे विवाद खड़ा करना चाहा लेकिन मैंने मध्यावधी चुनाव करा दिये। खुद मैंने चुनाव नहीं लड़ा और दीपक सरकार को समर्थन देकर खड़ा करा दिया। झा साहब के इशारे पर मुकेश भटनागर उनके विरोध मे खड़ा हो गया। प्रेसीडेंट का निर्वाचन निर्विरोध करा दिया और भटनागर साहब मेरा समर्थन न होने के कारण हार गए। जी एम पेंटल साहब और पर्सोनेल मेनेजर झा साहब अन्यत्र स्थानांतरित हो गए। नए पर्सोनेल मेनेजर हेमंत कुमार जी ने मुझे एक नई यूनियन खड़ी करने के लिए अनेक प्रलोभन दिखाये किन्तु मैंने कर्मचारी विरोधी कोई भी कदम उठा कर निजी लाभ लेना मंजूर नहीं किया। बाद मे अप्रैल 1984 मे सस्पेंड करके 19-01-1985 से मेरी सेवाएँ समाप्त कर दी गई ,इसी प्रकार होटल मौर्य शेरेटन ,दिल्ली मे यूनियन सेक्रेटरी बी सी गोस्वामी  के कर्मचारी हितैषी होने के कारण सेवाएँ समाप्त कर दी गई थीं।

 

 

आज दिनांक 07-11-2012 के हिंदुस्तान लखनऊ मे नारायण मूर्ती साहब के केजरीवाल संबन्धित खुलासे के बाद कारपोरेट घरानों का यह पुराना खेल याद आ गया कि किस प्रकार कर्मचारियों मे अपने नुमाईन्दे फिट करके कारपोरेट कंपनियाँ मजदूर आंदोलनों को छिन्न-भिन्न करने हेतु कर्मठ कर्मचारी नेताओं को बर्खास्त कर देते हैं। ये कारपोरेट घराने जनता के बीच जन-हितैषी नेताओं की छ्वी धूमिल करने हेतु हज़ारे/केजरीवाल/रामदेव जैसे लोगों को फ़ाईनेन्स करके फर्जी नेता बना कर खड़ा कर देते हैं। मजदूर आंदोलनों की भांति ही जन-आंदोलन भी ध्येय से इन लोगों के कारण भटक जाते हैं और जनता का शोषण बदस्तूर चलता-बढ़ता रहता है।

 

 

 

हिंदुस्तान,लखनऊ,07-11-2012,पृष्ठ 14  

 

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