ज्योतिष वह विज्ञान है जो मनुष्य क़े अंधवि श्वास रूपी अन्धकार का हरण करके ज्ञान का प्रक ाश करता है—विजय राजबली माथुर


ज्योतिष=ज्योति+ष=प्रकाश +ज्ञान =

ज्योतिष वह विज्ञान है जो मनुष्य क़े अंधविश्वास रूपी अन्धकार का हरण करके ज्ञान का प्रकाश करता है.

लेकिन फैशन या प्रगतिशीलता या साईन्स के नाम पर ‘ज्योतिष’ का विरोध करके विद्वजन जनता को अंधकार मे डुबोए रख कर सत्ता और व्यापार जगत को शोषण-उत्पीड़न के अवसर उपलब्ध कराते रहते हैं।

मैंने शनिवार, 4 दिसम्बर 2010 को इसी ब्लाग मे प्रकाशित लेख "ज्योतिष और अंधविश्वास" द्वारा यह बताया था-
पिछले कई अंकों में आपने जाना कि,ज्योतिष व्यक्ति क़े जन्मकालीन ग्रह -नक्षत्रों क़े आधार पर भविष्य कथन करने वाला विज्ञान है और यह कि ज्योतिष कर्मवादी बनाता है -भाग्यवादी नहीं. इस अंक में आप जानेंगे कि ,अंधविश्वास ,ढोंग व पाखण्ड का ज्योतिष से कोई सरोकार नहीं है.

कुछ निहित स्वार्थी तत्वों ने ज्योतिष -विज्ञान का दुरूपयोग करते हुए इसे जनता को उलटे उस्तरे से मूढ्ने का साधन बना डाला है.वे लोग भोले -भाले एवं धर्म -भीरू लोगों को गुमराह करके उनका मनोवैज्ञानिक ढंग से दोहन करते हैं और उन्हें भटका देते हैं.इस प्रकार पीड़ित व्यक्ति ज्योतिष को अंधविश्वास मानने लगता है और इससे घृणा करनी शुरू कर देता है.ज्योतिष -ज्ञान क़े आधार पर होने वाले लाभों से वंचित रह कर ऐसा प्राणी घोर भाग्यवादी बन जाता है और कर्म विहीन रह कर भगवान् को कोसता रहता है.कभी -कभी कुछ लोग ऐसे गलत लोगों क़े चक्रव्यूह में फंस जाते हैं जिनके लिए ज्योतिष गम्भीर विषय न हो कर लोगों को मूढ्ने का साधन मात्र होता है.इसी प्रकार कुछ कर्मकांडी भी कभी -कभी ज्योतिष में दखल देते हुए लोगों को ठग लेते हैं.साधारण जनता एक ज्योतषीऔर ढोंगी कर्मकांडी में विभेद नहीं करती और दोनों को एक ही पलड़े पर रख देती है .इससे ज्योतिष विद्या क़े प्रति अनास्था और अश्रद्धा उत्पन्न होती है और गलतफहमी में लोग ज्योतिष को अंध -विश्वास फ़ैलाने का हथियार मान बैठते हैं .जब कि सच्चाई इसके विपरीत है.मानव जीवन को सुन्दर,सुखद और समृद्ध बनाना ही वस्तुतः ज्योतिष का अभीष्ट है

इसी प्रकार कान्वेंट शिक्षा प्राप्त लोग प्रतीक चिन्हों का उपहास उड़ाते हैं जबकि छोटा सा चिन्ह भी गूढ़ वैज्ञानिक रहस्यों को समेटे हुए है.उदाहरण स्वरूप इस स्वास्तिक चिन्ह को देखें और इस मन्त्र का अवलोकन करें :-
(कृपया स्कैन को इनलार्ज कर पढ़ें इसी आलेख का भाग है )

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१ .चित्रा-२७ नक्षत्रों में मध्यवर्ती तारा है जिसका स्वामी इंद्र है ,वही इस मन्त्र में प्रथम निर्दिष्ट है.
२ .रेवती -चित्रा क़े ठीक अर्ध समानांतर १८० डिग्री पर स्थित है जिसका देवता पूषा है.नक्षत्र विभाग में अंतिम नक्षत्र होने क़े कारण इसे मन्त्र में विश्ववेदाः (सर्वज्ञान युक्त )कहा गया है.
३ .श्रवण -मध्य से प्रायः चतुर्थांश ९० डिग्री की दूरी पर तीन ताराओं से युक्त है.इसे इस मन्त्र में तार्क्ष्य (गरुण )है.
४ .पुष्य -इसके अर्धांतर पर तथा रेवती से चतुर्थांश ९० डिग्री की दूरी पर पुष्य नक्षत्र है जिसका स्वामी बृहस्पति है जो मन्त्र क़े पाद में निर्दिष्ट हुआ है.

इस प्रकार हम देखते हैं कि धार्मिक अनुष्ठानों में स्वास्तिक निर्माण व स्वस्ति मन्त्र का वाचन पूर्णतयः ज्योतिष -सम्मत है.धर्म का अर्थ ही धारण करना है अर्थात ज्ञान को धारण करने वाली प्रक्रिया ही धर्म है.इस छोटे से स्वस्ति -चिन्ह और छोटे से मन्त्र द्वारा सम्पूर्ण खगोल का खाका खींच दिया जाता हैअब जो लोग इन्हें अंधविश्वास कह कर इनका उपहास उड़ाते हैं वस्तुतः वे स्वंय ही अन्धविश्वासी लोग ही हैं जो ज्ञान (Knowledge ) को धारण नहीं करना चाहते.अविवेकी मनुष्य इस संसार में आकर स्वम्यवाद अर्थात अहंकार से ग्रस्त हो जाते हैं.अपने पूर्व -संचित संस्कारों अर्थात प्रारब्ध में मिले कर्मों क़े फलस्वरूप जो प्रगति प्राप्त कर लेते हैं उसे भाग्य का फल मान कर भाग्यवादी बन जाते हैं और अपने भाग्य क़े अहंकार से ग्रसित हो कर अंधविश्वास पाल लेते हैं.उन्हें यह अंधविश्वास हो जाता है कि वह जो कुछ हैं अपने भाग्य क़े बलबूते हैं और उन्हें अब किसी ज्ञान को धारण करने की आवश्यकता नहीं है.जबकि यह संसार एक पाठशाला है और यहाँ निरंतर ज्ञान की शिक्षा चलती ही रहती है.जो विपत्ति का सामना करके आगे बढ़ जाते हैं ,वे एक न एक दिन सफलता का वरन कर ही लेते हैं.जो अहंकार से ग्रसित होकर ज्ञान को ठुकरा देते हैं,अन्धविश्वासी रह जाते हैं.

अब सवाल उस संदेह का है जो विद्व जन व्यक्त करते हैं ,उसके लिए वे स्वंय ज़िम्मेदार हैं कि वे अज्ञानी और ठग व लुटेरों क़े पास जाते ही क्यों हैं ? क्यों नहीं वे शुद्ध -वैज्ञानिक आधार पर चलने वाले ज्योत्षी से सम्पर्क करते? याद रखें ज्योतिष -कर्मकांड नहीं है,अतः कर्मकांडी से ज्योतिष संबंधी सलाह लेते ही क्यों है ? जो स्वंय भटकते हैं ,उन्हें ज्योतिष -विज्ञान की आलोचना करने का किसी भी प्रकार हक नहीं है. ज्योतिष भाग्य पर नहीं कर्म और केवल कर्म पर ही आधारित शास्त्र है.
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फेसबुक पर एक विद्वान लिखते हैं-

Mishra Saroj

Friday 11-01-2013

देश मे जीतने ज्योतिषी हैं सभी को पकड़ के जेल मे डाल देना चाहिए ये .बेईमान देश को बेवकूफ़ बनाते हैं २०१३ मे सब अच्छा होगा बक रहे थे ..पाकिस्तान क्रिकेट मे मार गया सीमा पर गर्दन काट रहा है .आतंकी और नक्सली जीना हराम किए हैं ,बलात्कारी अपने सबाब पर हैं ..आज इंगलैंड ने भी दो दिया ये चोर इसको अच्छा कहा रहे हैं ..इन पर इनकम टैक्श का छापा पड़ना चाहिए .ये सब रामदेव के वनसाज हैं .टेलीविज़न पर इतना आतंक मचारखा है की पीड़ा होने लगी .

निम्नाकित विचार भी उन विद्वानों के हैं जो खुद ज्योतिष के ज्ञाता होते हुये भी ज्योतिष की आलोचना प्रायः करते रहते हैं-

Jagadishwar Chaturvedi

Thursday 10-01-2013

यद् पिण्डे तत्त्ब्रह्माण्डे, अर्थात जो कुछ भी स्थूल और सूक्ष्म रूप से इस शरीर में विद्यमान है, वही इस विराट ब्रह्माण्ड में स्थित है।

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एक वैज्ञानिक संस्था के उत्तर प्रदेश शाखा के अध्यक्ष ने ज्योतिष को अपने ब्लाग मे 100 प्रतिशत झूठा बताया है तो कारपोरेट चेनल IBN7 के कारिंदा और पूना प्रवासी भ्रष्ट-धृष्ट ब्लागर के खास-उल-खास चमचा ने अपने ब्लाग मे ‘ज्योतिष एक मीठा जहर’ लेख लिख कर जनता को गुमराह करने का दुष्कृत किया।

मैंने फेसबुक पर यह नोट दिया था और ब्लाग-‘कलम और कुदाल’ मे 26-12-2012 को-

वार पाँच गुरुदेव के,नीति न्याय अवरोध

शीर्षक से निम्नाकिंत तथ्य प्रकाशित किए थे—
चंड मार्तंड’ निर्णय सागर पंचांग के पृष्ठ-46 पर स्पष्ट उल्लेख (29 नवंबर से 28 दिसंबर 2012 की अवधी के लिए)मिलता है—-
"चार पाँच ग्रह का बने,युति चार गति चार। वर्षा अथवा द्वंद से आंदोलित संसार। ।
हिम प्रपात -पर्वत पतन,ऋतु कोप अधिचार। निर्णय गणना गोचरी ,लहर शीत संचार। ।
वार पाँच भ्रगुदेव के,भौतिक पंथ अपार। वस्तु सुगंधी-गंध की,भाव तेज उच्चार। ।
देश-दिशा पश्चिम विषय,विग्रह प्रांत विरोध। वार पाँच गुरुदेव के ,नीति न्याय अवरोध। ।
चक्रवात आंधी पवन,सागर देश विदेश । संहारक रचना गति ,जन धन मध्य विशेष। ।
संम सप्तक गुरु शुक्र का,वृषभ वृश्चिकी सार। भाषा मुद्रा न्याय हित ,नहीं सुखद संचार। ।
आरक्षण शिक्षण विषय ,शासन तंत्र प्रहार। आंदोलित जन साधना ,निर्णय कथन विचार। ।
चलन कलन गुरु मंद का,षडष्टाकी अभिसार। पद लोलुप नायक सभी,राज काज व्यापार। ।
शांति विश्व मे न्यूनता,कूटनीति विस्तार। संधि लेख की शून्यता ,अस्त्र शस्त्र प्रतिभार। । "
11 दिसंबर 2012 को शुक्र के वृश्चिक राशि मे प्रवेश के साथ ही चार ग्रहों का जमावड़ा हो गया था जिसके परिणामस्वरूप ‘आरक्षण’ के पक्ष-विपक्ष मे आंदोलन चला। फिर 16 दिसंबर कांड के विरोध मे जनता आंदोलित रही। पाँच ब्रहस्तिवार के योग से दिल्ली व केंद्र सरकारें नीति-न्याय का पालन नहीं कर सकीं।

इसी पंचांग मे पृष्ठ-48 पर 29 दिसंबर 2012 से 27 जनवरी 2013 के समय हेतु स्पष्ट किया गया है कि-
‘युति योग राहू -शनि,नहीं सुखद संयोग। साख पाक मे न्यूनता,ऋतु जनित अभियोग। ।
खेती-खेत विपाक मे,कृषिगण चित्त प्रहार। अर्थ न्यूनता पक्ष से,चिंतन विविध प्रकार। ।
चलन कलन गुरु शुक्र का ,राशि वृष-धनु संचार। गोचर पंथ षडाश्ट्की,नहीं सुखद प्रतिचार। ।
नेता नायक आपदा,कूटनीति अभियोग। शांति सूत्र मे न्यूनता,पद प्रलोभ दुर्योग। ।
भू विवाद सीमा विषय,अस्त्र शस्त्र आदेश। व्यय प्रभार रचना बने,नायक कष्ट विशेष। ।
लहर शीत नभ गर्जना,हिम प्रपात संसार। ऋतु कोप से आपदा,जन धन क्षति प्रहार। ।
षडाश्ट्की गुरु-मंद की,गोचर रचना दक्ष। त्रोटक संधि सूत्र की,देश विदेशी कक्ष। ।
वित्त कोष नव विश्व का ,असंतुलित परिवेश। राज काज व्यापार मे,चिंतन अर्थ विशेष। । ‘
पंचांगों की गणना काफी पहले ग्रह-नक्षत्रों की चाल के आधार पर की जाती है और आगाह कर दिया जाता है फिर महा-विद्वानों द्वारा ज्योतिषियों को जेल मे डालने,ज्योतिष को 100 प्रतिशत झूठा तथा मीठा जहर कहने के पीछे औचित्य क्या है?निश्चय ही ऐसे लोग पोंगापंथियों को लाभ पहुंचाने,लुटेरे कारपोरेट की जेबें भरने और जनता को ठगने वालों की सहायता कर रहे हैं । जनता इन पर विश्वास करके ज्योतिष और ज्योतिषियों से दूर रहती है,सरकारें भी नहीं मानती हैं लेकिन साथ ही साथ जनता व सरकारें ढोंगियों-पाखंडियों के आगे नत -मस्तक होकर जन-सामान्य का नुकसान झेलते हैं।
जब आप यह स्वीकार करते हैं कि-"यद् पिण्डे तत्त्ब्रह्माण्डे, अर्थात जो कुछ भी स्थूल और सूक्ष्म रूप से इस शरीर में विद्यमान है, वही इस विराट ब्रह्माण्ड में स्थित है।"तब आप ज्योतिष जो इस ज्ञान को उद्घाटित करने वाला विज्ञान है को क्यों ठुकराने की बातें करते हैं?

उपरोक्त पंचांग के पृष्ठ-50 पर 28 जनवरी 2013 से 25 फरवरी 2013 के काल खंड हेतु स्पष्ट किया गया है-

‘नायक नेता आपदा आतंक द्वंद विस्तार। चौर्य कर्म रचना विपुल,हरण-कारण प्रस्तार। ।
रक्षा विषयक न्यूनता,लोक विश्व अभिसार।।
गति वक्र शनि देव की संज्ञा तुला विधान।चिंतन मुद्रा अर्थ की,गणना विश्व प्रधान। । ‘

04 जनवरी 2013 को शुक्र के धनु राशि मे प्रवेश से उसका वृष राशि के गुरु से 180 डिग्री का संबंध बना जिसके फल स्वरूप सीमा पर विवाद-गोली चालन,सैनिकों की हत्या आदि घटनाएँ घटित हुईं। यह स्थिति अभी 27 जनवरी तक बनी रहने की है। आतंकवाद का प्रकोप व रक्षा विषयक न्यूनता बनी रह सकती है।
28 जनवरी को शुक्र ग्रह मकर राशि मे सूर्य के साथ आएगा जो 12 फरवरी तक साथ रहेगा तब उसके परिणाम स्वरूप शीत लहरें चलेंगी,हिम प्रपात,नभ-गर्जना के योग होंगे। जन-धन की क्षति होगी। 12 फरवरी से 03 मार्च 2013 तक सूर्य और मंगल कुम्भ राशि मे एक साथ होंगे जिसके परिणाम स्वरूप पूरी दुनिया मे भू-क्रंदन और आपदा के योग रहेंगे।

अब न तो जनता ही और न ही धर्म निरपेक्ष सरकारें ही ग्रह-नक्षत्रों की शांति हेतु ‘हवन’ का सहारा लेती हैं तब फिर समाधान हो तो कैसे?हालांकि ये धर्म निरपेक्ष सरकारें ही हज सबसीडी भी देती हैं और कुम्भ सरीखे ढ़ोंगी आयोजनों पर भी करोड़ों रुपए फूँक देती हैं। कुम्भ मेले मे अरबों रुपयों का व्यापार होने का अनुमान लगाया गया है। ऐसे आयोजन व्यापारिक ही हैं न कि धार्मिक परंतु उनको धार्मिक कह कर सराहा जाता है। यह है आधुनिक प्रगतिशील ज्ञान?तब परिणाम भी वैसे ही होंगे। इस मे कुछ भी संशय नहीं।

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