क्या साम्यवाद दूर की कौड़ी बना रहेगा?—विजय राजबली माथुर


आज जब जनता सत्तारूढ़ दल और मुख्य विपक्षी दल से हताश व निराश है और ऐसे मे सभी प्रकार के साम्यवादी गुटों को एकजुट होकर शोषकों/उतपीडकों का पर्दाफाश करने की आवश्यकता है कुछ साम्यवाद के स्वमभू विद्वानों ने ‘साम्यवाद को दूर की कौड़ी’बनाने का उपक्रम शुरू कर दिया है। 1885 मे स्थापित कांग्रेस के 1977 मे जनता पार्टी मे विलय के बाद ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’ ही सबसे पुराना राजनीतिक दल है।सत्तारूढ़ पार्टी तो 1969 मे स्थापित इन्दिरा कांग्रेस है जो मात्र 44 वर्ष ही पुरानी है और जिसका देश के स्वाधीनता आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है। भाकपा ने भारत के स्वाधीनता आंदोलन मे ‘सत्याग्रह’ व ‘क्रांतिकारी’ दोनों प्रकार की भूमिकाओं मे भाग लिया है। किन्तु देश की जनता से खुद को काटे रखने के कारण आज जनता भी इन जांनकारियों से महरूम है और सभी कम्युनिस्ट तमाम सद्भावनाओं के बावजूद जनता को वास्तविकता से अवगत कराने मे विफल रहे हैं।व्यक्तिगत स्तर पर वास्तविकता को जनता के संज्ञान मे लाने के मेरे प्रयासों पर जातिवादी/ब्राह्मणवादी शोषक-उतपीडकों के समर्थक ही नहीं प्रहार करते हैं बल्कि खुद को साम्यवादी विद्वान बताने वाले भी सबसे आगे -आगे ही रहते हैं। ऐसे दो विद्वानों की टिप्पणियों की फोटो कापी नीचे प्रस्तुत हैं। इनकी ही जाति के एक साम्यवादी विद्वान तो ‘राम’ की तुलना ‘ओबामा’ से करते हैं। ‘राम’ ने तो साम्राज्यवादी रावण का संहार करके वहाँ जनवादी शासन कायम किया था जबकि ओबामा आज साम्राज्यवादियों का सरगना है। राम की तुलना ओबामा से करने वाले ये साम्यवादी विद्वान वस्तुतः जनता को कम्युनिस्टों से दूर रखने का षड्यंत्र कर रहे हैं। सदियों से इन पुरोहितवादी/ब्राह्मण वादियों ने जनता के एक बड़े तबके को उसके ‘प्रकृति-प्रदत्त’ अधिकारों से वंचित करके उसका सतत शोषण किया है और आज भी विभिन्न राजनीतिक दलों मे बिखर कर ये शोषकों के संरक्षक जनता को जागरूक होने देने से रोकने मे ही अपना वर्ग हित देखते हैं। यही कारण है कि जब भी कोई उनकी जाति से अलग का व्यक्ति ‘सत्य’ को उद्घाटित करने का प्रयास करता है ये सम्मिलित रूप से उस पर प्रहार प्रारम्भ कर देते हैं। उनकी जाति मे जन्मा कोई भी व्यक्ति ‘सत्य’ उद्घाटित कर ही नहीं सकता क्योंकि सदियों पुरानी उनकी लूट के खात्मे का भय जो है। नीचे 26 दिसंबर 2012 को पूर्व प्रकाशित लेख का अंश देकर ऐसे लोगों के कृत्य का खुलासा किया जा रहा है—

साम्यवाद भारतीय अवधारणा हैhttp://krantiswar.blogspot.in/2012/12/blog-post_25.html

चाहे जितने तबके व गुट हों सबमे एक ज़बरदस्त समानता है कि वे ‘साम्यवाद’ को खुद भी विदेशी अवधारणा मानते हैं। ‘Man has created the GOD for his Mental Security only’-मार्क्स साहब का यह वाक्य सभी के लिए ‘ब्रह्म वाक्य’ है इस कथन को कहने की परिस्थियों व कारणों की तह मे जाने की उनको न कोई ज़रूरत है और न ही समझने को तैयार हैं। उनके लिए धर्म अफीम है। वे न तो धर्म का मर्म जानते हैं और न ही जानना चाहते हैं। वस्तुतः धर्म=जो मानव शरीर एवं मानव सभ्यता को धारण करने हेतु आवश्यक है जैसे — ‘सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह,ब्रह्मचर्य’। अब इन सद्गुणों की मुखालफत करके हम समाज से शोषण और उत्पीड़न को कैसे समाप्त कर सकते हैं?और यही वजह है कि इन सद्गुणों को ठुकराने के कारण सोवियत रूस मे साम्यवाद उखड़ गया और जो चीन मे चल रहा है वह वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी के संरक्षण मे चल रहा ‘पूंजीवाद’ ही है।
प्रकृति में जितने भी जीव हैं उनमे मनुष्य ही केवल मनन करने के कारण श्रेष्ठ है,यह विशेष जीव ज्ञान और विवेक द्वारा अपने उपार्जित कर्मफल को अच्छे या बुरे में बदल सकता है.कर्म तीन प्रकार के होते हैं-सद्कर्म का फल अच्छा,दुष्कर्म का फल बुरा होता है.परन्तु सब से महत्वपूर्ण अ-कर्म होता है जिसका अक्सर लोग ख्याल ही नहीं करते हैं.अ-कर्म वह कर्म है जो किया जाना चाहिए था किन्तु किया नहीं गया.अक्सर लोगों को कहते सुना जाता है कि हमने कभी किसी का बुरा नहीं किया फिर हमारे साथ बुरा क्यों होता है.ऐसे लोग कहते हैं कि या तो भगवान है ही नहीं या भगवान के घर अंधेर है.वस्तुतः भगवान के यहाँ अंधेर नहीं नीर क्षीर विवेक है परन्तु पहले भगवान को समझें तो सही कि यह क्या है–किसी चाहर दिवारी में सुरक्षित काटी तराशी मूर्ती या नाडी के बंधन में बंधने वाला नहीं है अतः उसका जन्म या अवतार भी नहीं होता.भगवान तो घट घट वासी,कण कण वासी है उसे किसी एक क्षेत्र या स्थान में बाँधा नहीं जा सकता.भगवान क्या है उसे समझना बहुत ही सरल है--अथार्त भूमि,-अथार्त गगन,व्-अथार्त वायु, I -अथार्त अनल (अग्नि),और -अथार्त-नीर यानि जल,प्रकृति के इन पांच तत्वों का समन्वय ही ‘भगवान’ है जो सर्वत्र पाए जाते हैं.इन्हीं के द्वारा जीवों की उत्पत्ति,पालन और संहार होता है तभी तो GOD अथार्त Generator,Operator ,Destroyer इन प्राकृतिक तत्वों को किसी ने बनाया नहीं है ये खुद ही बने हैं इसलिए ये खुदा हैं.
जब भगवान,गाड और खुदा एक ही हैं तो झगड़ा किस बात का?परन्तु झगड़ा है नासमझी का,मानव द्वारा मनन न करने का और इस प्रकार मनुष्यता से नीचे गिरने का.इस संसार में कर्म का फल कैसे मिलता है,कब मिलता है सब कुछ एक निश्चित प्रक्रिया के तहत ही होता है जिसे समझना बहुत सरल है किन्तु निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा जटिल बना दिया गया है.हम जितने भी सद्कर्म,दुष्कर्म या अकर्म करते है उनका प्रतिफल उसी अनुपात में मिलना तय है,परन्तु जीवन

काल में जितना फल भोगा उसके अतिरिक्त कुछ शेष भी बच जाता है.यही शेष अगले जन्म में प्रारब्ध(भाग्य या किस्मत) के रूप में प्राप्त होता है.अब मनुष्य अपने मनन द्वारा बुरे को अच्छे में बदलने हेतु एक निश्चित प्रक्रिया द्वारा समाधान कर सकता है.यदि समाधान वैज्ञानिक विधि से किया जाए तो सुफल परन्तु यदि ढोंग-पाखंड विधि से किया जाये तो प्रतिकूल फल मिलता है.
लेकिन अफसोस यही कि इस वैज्ञानिक सोच का विरोध प्रगतिशीलता एवं वैज्ञानिकता की आड़ मे साम्यवाद के विद्वानों द्वारो भी किया जाता है और पोंगापंथी ढ़ोंगी पाखंडियों द्वारा भी। अतः नतीजा यह होता है कि जनता धर्म के नाम पर व्यापारियो/उद्योगपतियों/शोषकों के बुने जाल मे फंस कर लुटती रहती है। साम्यवाद-समाजवाद के नारे लगते रहते हैं और नतीजा वही ‘ढाक के तीन पात’।

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पहली टिप्पणी कारपोरेट चेनल IBN7 के कारिंदे एक ब्लागर की है जो पूना प्रवासी ‘भ्रष्ट-धृष्ट-ठग’ब्लागर जो शोषण-उत्पीड़न करने वालों का पूज्य है का पृष्ठ-पोषक है। दूसरी और तीसरी टिप्पणिया खुद को ‘साम्यवादी विद्वान’ बताने वाले दिग्गजों की हैं। दो विपरीत विचार धाराओं का संवाहक बताने वालों की तीनों टिप्पणियों मे ज़बरदस्त समानता है कि,वे सच्चाई को सामने नहीं आने देना चाहते क्योंकि उनका उद्देश्य आम जनता को जागरूक होने देने से रोकना और प्रचलित ‘शोषण-उत्पीड़न’ को मजबूत बनाए रखना है। इसलिए एक-दूसरे का विरोधी बताते हुये भी अपने जन-विरोधी कृत्यों मे वे एक-दूसरे के पूरक के रूप मे कार्य करते हैं। एक साम्यवादी विद्वान ने मुझे ब्लाक करके ‘लाल झण्डा’ ग्रुप से हटा दिया तो अब दूसरे साम्यवादी विद्वान को ब्लाक करके उनके द्वारा इंगित दोनों ग्रुपों को मैंने छोड़ दिया जिससे वे निष्कंटक अपनी बातों से साधारण-जन को गुमराह करते रहें और मैं उसमे साझीदार न बनूँ।

मज़ेदार बात यह है कि साम्यवादी विद्वान खुद को स्टालिन विरोधी बताने मे भी गर्व का अनुभव करते हैं। देखिये उनकी टिप्पणी—
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निश्चय ही पूँजीपतियों के हितरक्षक विश्वविद्यालय ने ‘स्टालिन’ विरोधी इन साहब की थीसिस को सिर माथे रखा होगा। ‘स्टालिन’ की सलाह न मानने के कारण ही हमारे देश मे साम्यवाद की दुर्दशा हुई है। किन्तु ऐसे अडियल विद्वानों को आज भी प्रश्रय यदि देना जारी रहा तो आगे भी साम्यवाद का भारत मे सफल होना संदेहास्पद ही बना रहेगा।

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