अपना हाथ जगन्नाथ—विजय राजबली माथुर


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कायस्थसभा,आगरा के अध्यक्ष श्री चंद्र मोहन शेरी के आग्रह पर मैंने यह लेख "जागृति"-स्मारिका-सन2002 ,कायस्थसभा,आगरा के लिए संक्षिप्त रूप मे लिखा था।
इसे और स्पष्ट करने हेतु ऊपर एक ‘हस्त’चित्र भी यहाँ दिया जा रहा है। इसमे सातों ग्रहों को आसानी से देखा व समझा जा सकता है। प्रथ्वी के उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों को छाया ग्रहों के रूप मे ज्योतिष मे अध्यन हेतु ‘राहू’ व ‘केतू’ के रूप मे गणना मे लिया जाता है। ‘केतू’ का स्थान हथेली मे नीचे ‘मणिबंध’पर होता है तथा ‘राहू’ का स्थान बीच मे ‘मस्तिष्क’रेखा के नीचे होता है।

‘कनिष्ठा’ उंगली के नीचे व चंद्र पर्वत से ऊपर स्थित ‘निम्न मंगल’साहस-पराक्रम आदि का द्योतक होता है। शुक्र पर्वत के ऊपर स्थित उच्च मंगल ,ज्ञान-विज्ञान,शिक्षा आदि को दर्शाता है।

तर्जनी उंगली के नीचे स्थित ब्रहस्पति पर्वत आध्यात्मिक रुझान,प्रशासनिक क्षमता,शिक्षा – योग्यता आदि के बारे मे बताता है।
बीच की मध्यमा उंगली के नीचे स्थित शनि पर्वत से प्रवृति,कर्म,आदि का पता चलता है।
इसके बाद की अनामिका उंगली के नीचे सूर्य पर्वत स्थित होता है जो यश,शिक्षा का स्तर व बुद्धि आदि के बारे मे बताता है।
सबसे छोटी कनिष्ठा उंगली के नीचे बुध पर्वत होता है जो स्वास्थ्य,व्यवसाय आदि का ज्ञान देता है।
अंगूठे के नीचे स्थित शुक्र पर्वत दया,प्रेम,शारीरिक स्थिति आदि की सूचना देता है।
राहू और केतू की स्थितियों का जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ता है क्योंकि वे हमारी प्रथ्वी के ही कोण हैं।
शनि पर्वत पर पहुँचने वाली रेखा को ‘भाग्य रेखा’ कहा जाता है परंतु यह बहुतेरे हाथों मे होती ही नहीं है जिसका अभिप्राय है कि वे मनुष्य अपने भाग्य के स्व-निर्माता हैं(SELF MADE MEN)।

यह जानकारी देने का आशय यह है कि,प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह स्त्री हो अथवा पुरुष अपने हाथों मे सम्पूर्ण ब्रह्मांड को समेटे हुये है और उसे परमात्मा-भगवान,खुदा,गाड आदि को खोजने के लिए कहीं भी भटकने की आवश्यकता नहीं है। प्रातः काल बिस्तर छोडने से पहले अपने दोनों हाथों को फैला कर परस्पर मिला लें और उनको देखें तो अखिल ब्रह्मांड के दर्शन हो जाएँगे। यदि कोई अडचन आ रही हो तो ऐसा करते समय मन ही मन मे उसे दूर करने की कल्पना करें जिससे उससे छुटकारा मिल जाएगा।
हमे ये हाथ ‘कर्म’ करने हेतु ही मिले हैं और कर्म ही धर्म है। अकर्म व दुष्कर्म से दूर रहते हुये सदैव सदकर्म ही करने चाहिए। शोषकों-उतपीडकों द्वारा विभिन्न नामों से जो धर्म बताए जाते हैं और जिनके नाम पर मनुष्य-मनुष्य के खून का प्यासा हो जाता है वे सब वस्तुतः अधर्म है जो केवल दुष्कर्म ही कराते हैं और जिंनका प्रतिकूल प्रतिफल वैसा करने वाले को ही भुगतना पड़ता है।
मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध बनाना ही धर्म है और उसी का पालन करना चाहिए। सृष्टि मे सभी मानव समान हैं और समान आचरण की अपेक्षा सृष्टा सबसे करता है। जो विषमता व वैमनस्यता फैलते हैं उनको भी अपने कुकर्मों का फल देर-सबेर इस जन्म नहीं तो आगामी जन्मों मे भुगतना ही पड़ता है। जन्म-जन्मांतर को न मानने से कर्मफल पर कोई अन्तर नही पड़ता है। अपना हाथ ही जगन्नाथ है और उस पर विश्वास रखें ।

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One comment on “अपना हाथ जगन्नाथ—विजय राजबली माथुर

  1. kripya aap apne blog par comment ke liye yashwant ji ki tarah hi form ka istemal karen bahut afsos hota hai jab main post to poori padh leti hun kintu vichar vyakt nahi kar pati ..सार्थक जानकारी भरी पोस्ट आभार हाय रे .!..मोदी का दिमाग ………………. .महिलाओं के लिए एक नयी सौगात आज ही जुड़ें WOMAN ABOUT MAN

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