क्रांति स्वर….. इन्कम टैक्स ट्रिब्यूनल धर्म और भगवान—विजय राजबली माथुर


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(हिंदुस्तान,लखनऊ,दिनांक-17 मार्च,2013)

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(‘धर्म’ के संबंध मे उपरोक्त विचार ‘दैनिक जागरण,आगरा,दिनांक-17 नवंबर 2001,पृष्ठ-11’पर प्रकाशित श्री रवि बिहारी माथुर साहब द्वारा विशेष रूप से चित्रगुप्त जयंती विशेषांक के लिए दिये गए थे।)

‘धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य’। इनको ठुकरा कर जब ‘ढोंग-पाखंड-आडंबर’ को धर्म का नाम दिया जाएगा और शोषकों -लुटेरों -व्यापारियों- उद्योगपतियों के दलालों को साधू-सन्यासी माना जाएगा एवं पूंजी (धन)को पूजा जाएगा तो समाज वैसा ही होगा जैसा चल रहा है। आवश्यकता है उत्पीड़नकारी व्यापारियों/उद्योगपतियों तथा उनके दलाल पुरोहितों/पुरोहित् वादियों का पर्दाफाश करके जनता को उनसे दूर रह कर वास्तविक ‘धर्म’ का पालन करने हेतु समझाने की।
‘देवता=जो देता है और लेता नहीं है जैसे-वृक्ष,नदी,समुद्र,आकाश,मेघ-बादल,अग्नि,जल आदि’ और ‘भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)’चूंकि ये प्रकृति तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी ने बनाया नहीं है इसीलिए ये ही ‘खुदा’ हैं। इन प्रकृति तत्वों का कार्य G(जेनरेट-उत्पत्ति)+O(आपरेट-पालन)+D (डेसट्राय-संहार)। अतः झगड़ा किस बात का?यदि है तो वह व्यापारिक/आर्थिक हितों के टकराव का है अतः ‘शोषण/उत्पीड़न’को समाप्त कर वास्तविक ‘धर्म’ के ‘मर्म’ को समझना और समझाना ही एकमात्र हल है।

आजकल ब्लाग और फेसबुक पर बेवजह कुराफ़ातों को धर्म का सम्बोधन देते हुये आपस मे कलह की बातें करते देखा जा सकता है या फिर प्रगतिशीलता/वैज्ञानिकता की आधारहीन बातों के आधार पर ‘धर्म’ और ‘भगवान’ की आलोचना करते। ये पढे-लिखे लोग खुद भी यथार्थ-सत्य को समझने व मानने को तैयार नहीं हैं तब जनता को कौन समझाएगा?

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