क्रांति स्वर नेहरू की नीतियों पर था टैग ोर का असर-हिंदुस्तान 22/नवंबर/2008(आगरा संस्करण)


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07 मई टैगोर जयंती पर विशेष:

उपरोक्त स्कैन कापी मे सुप्रसिद्ध इतिहासकार द्वारा आधुनिक भारत के निर्माण में कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर के प्रभाव को बेहतर तरीके से समझाया गया है जो किसी भी स्पष्टीकरण का मोहताज नहीं है। हमारा राष्ट्र गीत भी कवीन्द्र रवीन्द्र लिखित ही है।

‘काबुली वाला’,’गीतांजली’ आदि रवीन्द्र नाथ टैगोर की अमर कृतियाँ है।

1967 में इंटर की पढ़ाई के दौरान ‘इंगलिश एडीशनल आप्शनल’की एक पुस्तक में रवीन्द्र नाथ टैगोर जी द्वारा लिखी हुई कहानी के कुछ अंशों का भावानुवाद इसलिए देना चाह रहा हूँ कि,विगत दिनों ‘भ्रष्ट’ लोगों द्वारा ‘भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन’ बड़े ज़ोर-शोर से चलाये गए थे जिसके बाद भ्रष्टाचार मे बेशर्मी हद से भी ज़्यादा बढ़ गई है। अभी हाल ही में रेल मंत्री के भांजे को सी बी आई ने 90 लाख की रिश्वत के साथ रंगे-हाथों पकड़ा है।

उक्त कहानी मे रवीन्द्र नाथ जी ने बताया है कि,एक परिवार में पानी मिला दूध आने पर लाने वाले नौकर पर निगरानी के लिए एक पर्यवेक्षक को रखने का नतीजा यह रहा कि हिस्सेदारों के बढ़ जाने से दूध की गुणवत्ता और घट गई तथा पानी और अधिक मिलाया जाने लगा। जितने निरीक्षक बढ़ाए गए मिलावट उतनी ही बढ़ती गई। उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से रवीन्द्र नाथ जी के तब के आंकलन की सच्चाई ही परिपुष्ट होती है।
नेहरू जी पर टैगोर जी के ही प्रभाव के कारण एक कर्तव्यनिष्ठ व ईमानदार केंद्रीय मंत्री रफी अहमद किदवई साहब के बाराबंकी में बनने वाले मकबरे हेतु नेहरू जी ने एस्टिमेट से दुगुनी धन राशि की स्वीकृति दी थी। पूछने पर उनका उत्तर था कि हम जैसा मकबरा बनवाना चाहते हैं वैसा मांगी गई रकम से 50 प्रतिशत भ्रष्टाचार के चलते नहीं बन पाएगा। अतः रकम दुगुनी करने पर आधी रकम तो मकबरे पर खर्च होगी ही तभी वह ठीक बन पाएगा।

आज उदारीकरण की शासन-व्यवस्था में सब कुछ भ्रष्टाचार मय हो चुका है। NGOs भ्रष्टाचार को वैधता प्रदान करने के उपकरण हैं। 40 प्रतिशत की रकम विभागीय कर्मचारी/अधिकारी अपने हिस्से के रूप मे काट लेते हैं जिनके लिए एन जी ओ संचालकों को ‘फर्जी’ बिल दाखिल करने पड़ते हैं। मुश्किल से 10 प्रतिशत रकम ज़रूरतमन्द जनता पर खर्च हो पाती है।

ये घटना-क्रम सुनने से 46 वर्ष पूर्व कोर्स में पढ़ी रवीन्द्र नाथ टैगोर जी की कहानी की यादें ताजा हो जाती हैं। उस कहानी का रचना काल तो और भी पहले का है। कितना दूरदर्शी थे हमारे गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर जी!

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