क्रांति स्वर भारत-पाक घनिष्ठता होने नह ीं दी जाएगी —विजय राजबली माथुर


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यों तो उपरोक्त समाचारों की स्कैन कापियाँ ही यह बताने में सक्षम हैं कि,यू एस ए कभी भी भारत और पाकिस्तान के मध्य घनिष्ठता नहीं होने देगा;फिर भी एक बार और स्पष्ट कर देने में कोई हर्ज नहीं है।
1857 ई की प्रथम ‘क्रांति’ की पारस्परिक फूट से हुई असफलता ने ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति अपनाने को प्रेरित किया था। दूसरी तरफ स्वामी दयानन्द सरस्वती ने 1875 ई में ‘आर्यसमाज’ की स्थापना द्वारा अहिंसक स्वतन्त्रता आंदोलन प्रारम्भ कर दिया था। उसे गतिहीन करने हेतु ब्रिटिश वाईसराय लार्ड डफरिन ने अपने चहेते पूर्व ICS एलेन आकटावियन हयूम के सहयोग से 1885 ई में ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ की स्थापना कारवाई जो तब ब्रिटिश साम्राज्य के ‘सेफ़्टी वाल्व’ के रूप में कार्य करती थी। अतः महर्षि दयानंद की प्रेरणा से आर्यसमाजी गण इस कांग्रेस में शामिल हो गए और उसे स्वाधीनता आंदोलन चलाने के लिए बाध्य किया गया। ‘कांग्रेस का इतिहास’ के लेखक डॉ पट्टाभि सीता रम्मईया ने स्वीकार किया है कि सत्याग्रह आंदोलनों में जेल जाने वाले 85 प्रतिशत लोग आर्यसमाजी थे।
अतः 1905 में बंगाल का सांप्रदायिक विभाजन करके ब्रिटिश सरकार ने 1906 में ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन के माध्यम से ‘मुस्लिम लीग’ की स्थापना मुस्लिमों में सांप्रदायिकता भरने हेतु करवाई। 1920 में लाला लाजपत राय और मदन मोहन मालवीय के माध्यम से ‘हिन्दू महासभा’ की स्थापना तथाकथित हिंदुओं में सांप्रदायिकता भरने हेतु करवाई जो मुस्लिम लीग की भांति सफल न हो सकी। राम प्रसाद ‘बिस्मिल’,चंद्र शेखर’आज़ाद’,भगत सिंह’आज़ाद’ आदि क्रांतिकारियों द्वारा स्थापित ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ क्रांति द्वारा ब्रिटिश शासन को उखाड़ने हेतु कटिबद्ध हो गई थी। अतः पूर्व क्रांतिकारी दामोदर विनायक सावरकर को आगे करके ब्रिटिश सरकार ने RSS की स्थापना 1925 में करवाई जिसे जमींदारों व व्यापारियों का समर्थन हासिल हो गया और इस संगठन ने मुस्लिमों के विरुद्ध हिंदुओं को लामबंद करके देश को सांप्रदायिक दंगों की भट्ठी में झोंक दिया। 1940 में मुस्लिम लीग ने भारत से अलग देश ‘पाकिस्तान’ की मांग रखी जिसे ब्रिटिश सरकार का समर्थन हासिल था। 1947 में ‘भारत’ और ‘पाकिस्तान’ दो देश तो बन गए किन्तु ब्रिटिश साम्राज्य भी टूट चुका था और उसका स्थान USA ने ले लिया था।
कश्मीर-लद्दाख क्षेत्र में ‘प्लेटिनम’ जो ‘यूरेनियम’ के निर्माण में सहायक होता है की प्रचुरता के कारण यू एस ए की निगाह ‘काश्मीर’ पर लग गई और उसने ब्रिटिश वाईसराय रहे भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड माउंट बेटेन के सहयोग से पाकिस्तान को उकसा कर काश्मीर पर आक्रमण करवा दिया था। तब से अमेरिकी साम्राज्यवाद के इशारे पर पाकिस्तान कई युद्ध भारत से लड़ चुका है लेकिन 1/4 भाग हथियाने के बावजूद वह काश्मीर नहीं ले सका है। चीन का भी समर्थन पाकिस्तान को है और रूस ने भी कभी भी भारत को शक्ति-सम्पन्न नहीं होने देना चाहा है। दूसरी तरफ रफी अहमद किदवई और सरदार पटेल ने मिल कर संविधान में धारा 370 के अंतर्गत गैर काश्मीरियों के उस क्षेत्र में भूमि खरीदने को प्रतिबंधित करा दिया जिससे अमेरिकी मंसूबे ध्वस्त हो गए।
एक तरफ पाकिस्तान से सैन्य आक्रमण तो दूसरी तरफ RSS से धारा 370 पर सांप्रदायिक आक्रमण यू एस ए करवाता रहता है ताकि वह काश्मीर के ‘प्लेटिनम’ पर अधिकार करके उससे ‘यूरेनियम’ हासिल कर सके जो परमाणू बम और ऊर्जा दोनों के काम आता है। पाकिस्तान मे पूर्व अमेरिकी राजदूत कैमरन मंटेर ने पाकिस्तान के मनोनीत प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ साहब को भारत के प्रति नर्म रुख न रखने को इसी हेतु कहा गया है। अमेरिकी इशारे पर ही वहाँ के सेनाध्यक्ष ने भी उनको ऐसा ही संकेत दिया है। अतः स्पष्ट है कि,अपने तमाम नेक इरादों के बावजूद भी नवाज़ शरीफ साहब भारत के साथ सौम्य संबंध न रख सकेंगे।

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