क्रांति स्वर विनाश के खण्डहर पर पुनर्न िर्माण की पताका —विजय राजबली माथुर


11 मार्च 2013 को प्रकाशित समाचार—

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उपरोक्त समाचारों एवं चेतावनियों से स्पष्ट है कि आज मानवता पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। ज्यों-ज्यों विज्ञान प्रगति करता जा रहा है मनुष्य का नैतिक पतन होता जा रहा है। जहां संचार माध्यमों ने दुनिया में एक-दूसरे को नजदीक लाने का काम किया हैं वहीं इनके द्वारा वैमनस्य फैलाने का कार्य भी तीव्र गति से चलाया जा रहा है। आज मानवता के कल्याण के प्रयास करने वालों को उत्पीड़ित किया जा रहा है उन पर अत्याचार ढाये जा रहे हैं। मानवता का शोषण करने वाले दूसरे मनुष्यों को अपने से हेय समझने वाले लोगों का महिमा मंडन ज़ोर-शोर से किया जाता है उनको जिम्मेदार लोगों का प्रश्रय भी सुगमता से मिल जाता है। दुखद स्थिति तो तब बनती है जब ‘मानव को मानव के शोषण से मुक्त’कराने वाले दलों में भी ऐसे शोषक लोग आसानी से नीति-निर्धारक तत्व बन कर अपने ही कार्यकर्ताओं का शोषण करने लगते हैं। जब गोर्बाचोव रूस मे 70 वर्षों से स्थापित ‘साम्यवाद’ की चूलें कुछ ही वर्षों में हिला कर उसे वहाँ से समाप्त करने का प्रबंध कर सकते हैं तब भारत में उनके जैसे तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रदीप घोटालू ,पी टी सीतापुरिया जैसे लोग अगर आज कामयाब हैं तो आश्चर्य की कोई बात नहीं है। ऐसे लोग शोषण-उत्पीड़न विहीन समाज-व्यवस्था की स्थापना के घोर शत्रु हैं और कालांतर से साम्राज्यवादी/सांप्रदायिक शक्तियों के ही हाथ मजबूत कर रहे हैं। जिस प्रकार सोवियत रूस में भ्रष्ट पार्टी पदाधिकारी आज वहाँ उद्योगपति बन बैठे हैं उसी प्रकार भारत में ऐसे पदाधिकारी समानान्तर रूप से अपना निजी व्यवसाय मजबूत किए हुये हैं जिसके संरक्षण हेतु इनको पद-पोस्ट की सुरक्षा की महती आवश्यकता है। लेकिन जो निस्वार्थ सेवा भाव से श्रम दान करना चाहते हैं ऐसे लोगों को यदि शोषक पदाधिकारी मार्ग से न हटाएँ तो उनकी स्वार्थ लिप्सा की पूर्ती संभव ही नहीं है। परंतु मार्ग से हटाने का मार्ग यदि उस सेवक या उसके परिवारीजनों के जीवन से खिलवाड़ करना हो और फिर भी उसे मान-मर्यादा मिलती जाये तब यह प्रश्न-चिन्ह लगता है कि क्या वास्तव में हम जैसा कहते हैं वैसा ही करना चाहते भी हैं या नहीं?और यही कारण है कि जन पक्षधरता की बात करने वाले दल जनता का समर्थन नहीं प्राप्त कर पाते । एक ओर ये खुद को धर्म विरोधी घोषित करते हैं दूसरी ओर ढोंग-पाखंड-आडंबर को बढ़ाने वाले लोगों को धार्मिकता का प्रमाण पत्र देते हैं।
वस्तुतः धर्म=जो शरीर व समाज को धरण करने हेतु आवश्यक हो जैसे:
सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह,ब्रह्मचर्य।
भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)
चूंकि प्रकृति के ये पांचों तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी इंसान ने बनाया नहीं है इसलिए ये ही ‘खुदा’हैं।
एवं इन तत्वों का कार्य G(जेनरेट )+O(आपरेट)+D(डेसट्राय) है अतः ये ही GOD-गाड हैं।
लेकिन शोषकों,उतपीडकों,लुटेरों (व्यापारी और सत्ताधीश)तथा उनके दलालों (पुरोहित व पुजारी लोगों)ने विश्व में धर्म,भगवान,खुदा,गाड की भ्रामक व्याख्याएँ फैला रखी हैं जिनसे उनकी शोषण और मुनाफे की व्यवस्था बदस्तूर चलती रहे। यही व्यवस्था यदा-कदा,यत्र-तत्र-सर्वत्र त्रासदियाँ व तबाहियाँ उत्पन्न करती है जैसा कि अभी नवीनतम रूप से उत्तराखंड मे हुई।
धर्म का पालन करने के लिए कहीं भागने की आवश्यकता नहीं है। ‘हवन’-यज्ञ के माध्यम से दी गई आहुतियाँ मंत्र शक्ति-ध्वनि (viobretion)द्वारा ‘भगवान’/’खुदा’/गाड तत्वों तक सुगमता से पहुँच जाती हैं क्योंकि अग्नि में डाले गए पदार्थ ,पदार्थ विज्ञान (Material Science) के अनुसार परमाणु (Atoms) में विभाजित हो जाते हैं और वायु द्वारा गंतव्य तक पहुंचा दिये जाते हैं।
तीर्थाटन के नाम पर मुनाफे की व्यापारिक गतिविधियां ही चलाई जाती हैं उनका उद्देश्य धन बटोरना है ,जन-कल्याण नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि,ऐसे ढोंगियों का तो पर्दाफाश किया ही जाये उनके समर्थक जो जन-कल्याण की चाहना वाले दलों में घुस कर बाहर की प्रतिगामी शक्तियों को मजबूत कर रहें हैं उनको भी पहचान कर अलग-थलग किया जाये तभी मानवता की रक्षा हो सकेगी।
मैं जानता हूँ कि मेरे लेखन से शोषक -सांप्रदायिक/साम्राज्यवादी वर्ग को तो ऐतराज है ही साम्यवादी दलों में बैठे उनके पी टी सीतापुरिया सरीखे समर्थकों को भी घोर आपत्ति है और दोनों वर्ग मिल कर मेरे व मेरे परिवार के विरुद्ध घृणित अभियान चलाते रहते हैं। मुझे कोई संशय नहीं है कि मेरे सुझावों पर अमल करने की कोई पहल की जाएगी। निश्चय ही हम लोग ऐसी अनेकों त्रासदियों का सामना अवश्यंभावी रूप से करेंगे। यदि कभी सर्व-विनाश हो गया और मेरे विचार किसी जन-कल्याणकारी /परोपकारी के हाथों में सुरक्शित बच गए तो वह उनका प्रयोग ‘विनाश के खण्डहर पर पुनर्निर्माण की पताका फहराने’ हेतु कर सकेगा।

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