क्रांति स्वर विज्ञान के नाम पर अवैज्ञा निकता का प्रचार :यही है प्रगतिशीलता?—विजय राज बली माथुर


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प्रिंस डी लेमार्क और डार्विन सरीखे जीव विज्ञानियों के ‘विकास’ एवं ‘व्यवहार और अव्यवहार’ सिद्धान्त के विपरीत यूजीन मैकार्थी द्वारा सूअर और चिम्पाजी को मानव का पूर्वज घोषित किया जाना ‘विज्ञान’ को हास्यास्पद ही बना रहा है। ‘विज्ञान’ सिर्फ वह ही नहीं है जिसे किसी प्रयोगशाला में बीकर और रसायनों के विश्लेषणात्मक अध्यन से समझा जा सकता है। मेरठ कालेज,मेरठ में 1970 में ‘एवरी डे केमिस्ट्री’ की कक्षा में प्रो.तारा चंद माथुर साहब के प्रश्न के उत्तर में मैंने उनको विज्ञान की सर्वसम्मत परिभाषा सुना दी थी-"विज्ञान किसी भी विषय के नियमबद्ध एवं क्रमबद्ध अध्यन को कहा जाता है" और उन्होने इस जवाब को सही बताया था।
वैज्ञानिकों के मध्य ही यह विवाद चलता रहा है कि ‘पहले मुर्गी या पहले अंडा?’ इस संबंध में मैं आप सब का ध्यान इस बात की ओर खींचना चाहता हूँ कि, पृथ्वी की सतह ठंडी होने पर पहले वनस्पतियाँ और फिर जीवों की उत्पत्ति के क्रम में सम्पूर्ण विश्व में एक साथ युवा नर एवं मादा जीवों की उत्पति स्वम्य परमात्मा ने प्रकृति से ‘सृष्टि’ रूप में की और बाद में प्रत्येक की वंश -वृद्धि होती रही। डार्विन द्वारा प्रतिपादित ‘survival of the fittest’सिद्धान्त के अनुसार जो प्रजातियाँ न ठहर सकीं वे विलुप्त हो गईं;जैसे डायनासोर आदि। अर्थात उदाहरणार्थ पहले परमात्मा द्वारा युवा मुर्गा व युवा मुर्गी की सृष्टि की गई फिर आगे अंडों द्वारा उनकी वंश-वृद्धि होती रही। इसी प्रकार हर पक्षी और फिर पशुओं में क्रम चलता रहा। डार्विन की रिसर्च पूरी तरह से ‘सृष्टि’ नियम को सही ठहराती है।
मानव की उत्पति के विषय में सही जानकारी ‘समाज विज्ञान’ द्वारा ही मिलती है। समाज विज्ञान के अनुसार जिस प्रकार ‘धुएँ’को देख कर यह अनुमान लगाया जाता है कि ‘आग’ लगी है और ‘गर्भिणी’को देख कर अनुमान लगाया जाता है कि ‘संभोग’हुआ है उसी प्रकार समाज विज्ञान की इन कड़ियों के सहारे ‘आर्य’ वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि अब से लगभग दस लाख वर्ष पूर्व मानव की उत्पति -‘युवा पुरुष’ और ‘युवा स्त्री’ के रूप में एक साथ विश्व के तीन विभिन्न क्षेत्रों -अफ्रीका,मध्य यूरोप और त्रिवृष्टि=तिब्बत में हुई थी और आज के मानव उनकी ही सन्तानें हैं। प्रकृति के प्रारम्भिक रहस्य की सत्यता की पुष्टि अब तक के वैज्ञानिक दृष्टिकोणों से ही होती है।
आज से नौ लाख वर्ष पूर्व ‘विश्वमित्र ‘जी ने अपनी प्रयोगशाला में ‘गोरैया’-चिड़िया-चिरौंटा,नारियल वृक्ष और ‘सीता’ जी की उत्पति टेस्ट ट्यूब द्वारा की थी। ‘त्रिशंकू’सेटेलाईट उनके द्वारा ही अन्तरिक्ष में प्रस्थापित किया गया था जो आज भी सुरक्षित परिभ्रमण कर रहा है।

वस्तुतः आज का विज्ञान अभी तक उस स्तर तक पहुंचा ही नहीं है जहां तक कि अब से नौ लाख वर्ष पूर्व पहुँच चुका था। उस समय के महान वैज्ञानिक और उत्तरी ध्रुव-क्षेत्र(वर्तमान-साईबेरिया)के शासक ‘कुंभकर्ण’ने तभी यह सिद्ध कर दिया था कि ‘मंगल’ग्रह ‘राख़’ और ‘चट्टानों’का ढेर है लेकिन आज के वैज्ञानिक मंगल ग्रह पर ‘जल’ होने की निर्मूल संभावनाएं व्यक्त कर रहे हैं और वहाँ मानव बस्तियाँ बसाने की निरर्थक कोशिशों में लगे हुये हैं। इस होड़ा-हाड़ी में अब हमारा देश भी ‘मंगलयान’ के माध्यम से शामिल हो चुका है। सभ्यताओं एवं संस्कृतियों के उत्थान-पतन के साथ-साथ वह विज्ञान और उसकी खोजें नष्ट हो चुकी हैं मात्र उनके संदर्भ स्मृति(संस्मरण) और किस्से-कहानियों के रूप में संरक्षित रह गए हैं। आज की वैज्ञानिक खोजों के मुताबिक ‘ब्रह्मांड’ का केवल 4 (चार)प्रतिशत ही ज्ञात है बाकी 96 प्रतिशत अभी तक अज्ञात है-DARK MATTER-अतः केवल 4 प्रतिशत ज्ञान के आधार पर मानव जाति को सूअर और चिम्पाजी का वर्ण -संकर बताना विज्ञान की खिल्ली उड़ाना ही है प्रगतिशीलता नहीं।विज्ञान का तर्क-संगत एवं व्यावहारिक पक्ष यही है कि युवा नर और युवा नारी के रूप में ही परमात्मा-ऊर्जा-ENERGY द्वारा मनुष्यों की भी उत्पति हुई है और आज का मानव उन आदि मानवों की ही संतान है न कि सूअर और चिम्पाजी का वर्ण-संकर अथवा ‘मतस्य’से विकसित प्राणी।

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