क्रांति स्वर साप्रदायिक एकता के लिए स् वामी श्रद्धानन्द का बलिदान —विजय राजबली माथु र


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पुलिस विभाग के उच्चाधिकारी लाला नानकचन्द जी के पुत्र मुंशीराम जी का जन्म फाल्गुन की कृष्ण पक्ष त्रियोदशी, संवत 1913 विक्रमी अर्थात सन 1854 ई को हुआ था। बचपन में अत्यधिक लाड़-प्यार-दुलार एवं अङ्ग्रेज़ी शिक्षा-संस्कृति से बिगड़ कर वह निरंकुश हो गए थे एवं मांस,शराब,जुआ,शतरंज,हुक्का व दुराचार आदि व्यसनों में लिप्त हो गए थे। परंतु 1879 ई में बरेली में स्वामी दयानंद सरस्वती के प्रवचन सुन कर ‘नास्तिक’ से ‘आस्तिक’ बन गए ।
बरेली के कमिश्नर ने 1880 ई में उनको नायाब तहसीलदार के पद पर नियुक्त कर लिया था। एक दिन वह कमिश्नर से मिलने गए हुये थे और चपरासी ने उनको प्रतीक्षा में बैठा रखा था लेकिन उनके ही सामने बाद में आए अंग्रेज़ सौदागर को तुरंत कमिश्नर से मिलने भेज दिया। मुंशीराम जी ने तत्काल नायब तहसीलदारी से त्याग-पत्र दे दिया। फिर वकालत करने के विचार से पढ़ने 1881 ई में लाहौर पहुंचे और ज़रूरी मुखत्यारी करके मुखत्यारी परीक्षा पास की। जालंधर में उन्होने वकालत शुरू की जो खूब चली। 2 कन्याएँ और 2 पुत्र रत्न उनको प्राप्त हुये। जब छोटा पुत्र मात्र दो साल का ही था तभी उनकी पत्नी का निधन हो गया। दोबारा उन्होने विवाह नहीं किया और समाजसेवा हेतु आर्य प्रतिनिधिसभा के प्रधान बन गए। अंततः मित्रों,हितैषियों के सभी दूरदर्शितापूर्ण परामर्शों को ठुकराते हुये वकालत को तिलांजली देकर आर्यसमाज के प्रचार-प्रसार में लग गए।
प्रारम्भ में उन्होने स्वामी दयानन्द की स्मृति में लाहौर में स्थापित डी.ए.वी.कालेज की संचालन व्यवस्था में सहयोग दिया। मार्च 1902 ई में गंगा किनारे ‘काँगड़ी’ग्राम में गुरुकुल प्रारम्भ किया। अपने पुत्रों को भी गुरुकुल में ही शिक्षा दी तथा अपनी जालंधर की कोठी भी गुरुकुल को सौंप दी। उन्होने जाति-बंधन तोड़ कर अपनी पुत्री का विवाह किया। उनके पिताश्री भी उनके प्रयास से ही आर्यसमाजी बने थे।

देश की आज़ादी के आंदोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी थी। अनेक स्थानों पर देश की जनता का नेतृत्व किया। कांग्रेस के अमृतसर अधिवेन्शन में हिन्दी में अपना स्वागत भाषण देकर हिन्दी को राष्ट्र-भाषा बनाए जाने का संदेश दिया था। गुरु का नामक —सिखों के सत्याग्रह में भी उन्होने नेतृत्व किया था। दिल्ली के चाँदनी चौक में "चलाओ गोली पहले मेरे पर उसके बाद दूसरे लोगों पर चलाना" की सिंह गर्जना करके उन्होने अंग्रेज़ सिपाहियों को भी काँपते कदमों से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था।23 दिसंबर 1926 को ‘जामा मस्जिद’ से हिन्दू-मुस्लिम एकता का आह्वान करने एवं संस्कृत श्लोकों का पाठ करने वाले वह पहले आर्य सन्यासी थे। किन्तु इससे ब्रिटिश साम्राज्यवाद को आघात पहुंचता और उस आघात से बचने के लिए एक पुलिस अधिकारी ने उनको निशाना बना कर गोली चला दी जिससे उनका प्राणान्त हो गया एवं सांप्रदायिक एकता के लिए यह असहनीय झटका साबित हुआ।

(‘निष्काम परिवर्तन पत्रिका’,दिसंबर 2001 ई वर्ष:12,अंक:12 में प्रकाशित ‘यशबाला गुप्ता’जी एवं ‘सोमदेव शास्त्री’जी के विचारों पर आधारित संकलन एवं श्रद्धानंद जी के बलिदान पर विभिन्न विभूतियों की श्रद्धांजालियाँ):

महात्मा गांधी-स्वामी श्रद्धानंद जी एक सुधारक थे। कर्मवीर थे,वाक शूर नहीं। उनका जीवित-जागृत विश्वास था। इसके लिए उन्होने अनेक कष्ट उठाए थे। वे संकट आने पर कभी घबराये नहीं थे। वे एक वीर सैनिक थे। वीर सैनिक रोग-शय्या पर नहीं,किन्तु रनांगण में मरना पसंद करता है।

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