क्रांति स्वर भ्रष्टाचार के मुद्दे का उ पयोग भ्रष्टाचार की जननी पूंजी और पूंजीवादी व ्यवस्था के सर्वाधिक प्रतिक्रियावादी स्वरुप को आगे बढ़ाने के लिए किया गया—सर्वहारा समाजवा द जिंदाबाद


अण्णा-केजरीवाल के "जनलोकपाल" का सिद्धांत क्या है? इसका राजनीतिक अर्थशास्त्र क्या है?:

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भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के कल के सरताज़ श्री अण्णा हज़ारे तो आज भाजपा-कांग्रेस की गोद में बैठे हैं, लेकिन अरबिंद केजरीवाल अभी भी "जनलोकपाल" के झुनझुने से लोगों को झांसा देने में लगे हुए हैं। भ्रष्टाचार से तंग-तबाह आम जन अण्णा-केजरीवाल के "जनलोकपाल" के झांसे में आ जा रहे हैं, यह स्वाभाविक भी है। "जनलोकपाल" का तथाकथित सिद्धांत क्या है? आइए, इस पर थोडा विस्तार से विचार करें।

अण्णा-केजरीवाल के "जनलोकपाल" के पीछे का तथाकथित व्यवस्थाविरोधी और क्रांतिकारी सिद्धांत यह है कि "भ्रष्टाचार ही हमारी सारी समस्याओं की जड़ है और खासकर अविकास और गरीबी का मूल कारण है।" प्रश्न है, क्या यह विचार अण्णा-केजरीवाल का कोई मौलिक विचार है? हम जैसे ही इस पर विचार करते हैं और कुछ खोजबीन करते हैं तो पाते हैं कि "भ्रष्टाचार ही हमारी सारी समस्याओं की जड़ है" वाला यह सिद्धांत नवउदारवाद के प्रादुर्भाव (जन्म) के समय से ही साम्राज्यवादी थिंक टैंकों (जैसे कि वर्ल्ड बैंक आदि) द्वारा लगातार फैलाई जा रही एक मिथ्या धारणा का भारतीय नवसंस्करण मात्र है। साम्राज्यवादी थिंक टैंकों द्वारा लगातार फैलाई जा रही यह मिथ्या धारणा यह है कि "भ्रष्टाचार आम जनता का दुश्मन नंबर एक है।" लेकिन यह पूरी तरह एक मिथ्या धारणा है, जिसे फ़ैलाने में और इस तरह साम्राज्यवादी थिंक-टैंकों को मदद करने के मामले में अण्णा-केजरीवाल की जोड़ी का कोई जवाब नहीं है। हम जानते हैं कि 1991 के बाद से ही, जब से "नयी आर्थिक नीति" और "नव उदारीकरण-भूमंडलीकरण" की हवा चली, राजकीय-सेक्टर को पूरी तरह से तोड़ देने, पूर्ण निजीकरण-बाज़ारीकरण को आगे बढ़ाने, कृषि, उद्योग और शिक्षा-स्वास्थ्य-बिजली-पानी-सड़क जैसी सामाजिक जरूरतों में निवेश से सरकार द्वारा अपने हाथ पूरी तरह खींच लेने और सभी चीज़ों को पूरी तरह बाज़ार की अंधी और बेरहम शक्तियों के हवाले कर देने की साजिशों को सरंजाम तक पहुंचाने के लिए "राज्य व सरकार के हस्तक्षेप", और "सरकारी उद्यमों व परियोजनाओं" पर भ्रष्टाचार और अक्षमता के हवाले से अँधाधुंध हमले शुरू किये गए। घोषणा की गयी कि सरकारी कार्यालय के भ्रष्टाचार और अक्षमता के कारन ही अविकास और गरीबी बनी हुई है और फैली है। एक सच को (कि सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार है) को एक बहुत बड़े झूठ को आगे बढाने, खुले और नग्न पूंजीवादी लूट पर आधारित और साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण से प्रेरित नवउदारवाद-बाज़ारवाद-उपभोक्तावाद की मज़बूती से नींव रखने के लिए जनमानस को तैयार करने के काम में लगाया गया। साम्राज्यवादी एजेंटों – एनजीओवादियों और छद्म पूंजीवादी-उदारवादी सुधारकों की अनगिनत टोलियों को हरवों-हथियार के साथ मैदान में उतारा गया। ज्ञातव्य हो कि यह हमला आज भी बदस्तूर जारी है। ध्यान देने वाली बात है कि "अविकास, गरीबी और भ्रष्टाचार" के इस पूरे विमर्श में पूंजीवाद-साम्राज्यवाद द्वारा किये जा रहे मानवताविरोधी नृशंष अपराध कहीं भी शामिल नहीं हैं, बिलकुल ही नहीं। वर्ल्ड बैंक ने 1991 से लगातार अपने द्वारा प्रस्तुत किये गए वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट में भ्रष्टाचार को सामने रखकर निजी पूंजी और बाज़ार को खुली छूट देने की वकालत की। World Development Report 1991 में इसे सामने रखते हुए एक टोन सेट किया गया, जो अभी तक जारी है और हम पाते हैं कि अण्णा-केजरीवाला की भ्रष्टाचार-विरोधी भाषा और वर्ल्ड बैंक की भ्रष्टाचार-विरोधी भाषा में कोई अंतर नहीं है। वर्ल्ड बैंक की तरह अण्णा-केजरीवाल भी पूंजीवाद के अपराधों पर चुप्पी साध लेते हैं।

World Development Report 1991 में कहा गया था – "[c]orruption can rarely be reduced unless its large underlying causes are addressed.It flourishes in situations where domestic and international competition is suppressed, rules and regulations are excessive and discretionary, civil servants are underpaid, or
the organization they serve has unclear or conflicting objectives."

हम स्वयं देख सकते हैं कि इस रिपोर्ट में किस टोन (स्वर) में भ्रस्टाचार के विरोध की जरूरत को रेखांकित किया गया था। इसमें खुले तौर पर घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पूंजी के खुले निष्कंटक प्रवाह की जरूरत के साथ, ‘अतिशय’ सरकारी व राजकीय नियंत्रण व नियमन की व्यवस्था को ख़त्म व निरस्त करने की जरूरत के साथ और फिर खुले बाज़ार की शक्तियों के बीच खुली प्रतिस्पर्धा तथा निजीकरण की तथाकथित जरूरत के साथ भ्रष्टाचार विरोध के एजेंडे को जोड़ा गया है, मिलाया गया। भारत में 1991 से लेकर आज तक इसके हुए परिणामो को देखें तो हम पाते हैं कि अक्षरसः यही हुआ और आज भी हो रहा है। इस तरह भ्रष्टाचार के मुद्दे का उपयोग भ्रष्टाचार की जननी पूंजी और पूंजीवादी व्यवस्था के सर्वाधिक प्रतिक्रियावादी स्वरुप को आगे बढ़ाने के लिए किया गया।
हम पाते हैं कि 1991 के बाद से वर्ल्ड बैंक ने लगातार भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर लोगों का ध्यान पूंजीवाद के अपराधों से हटवाया, ताकि बेरोजगारी, गरीबी, भूख, कुपोषण और बदहाली से जूझती अवाम पूंजीवाद को नहीं अपने-अपने देश की सरकारों को निशाना बनाये। हम इसे क्रमवार दिखाते हैं। 1992 में भी, Governance and Development नाम से पेश अपनी रिपोर्ट में एक बार फिर करप्शन विरोध को मुद्दा बनाया गया और टास्क फाॅर्स बनाया गया। 1995 में जब James Wolfensohn इसके अध्यक्ष बने तो 1996 में उन्होंने खुलेआम करप्शन को "कैंसर" कहा और फिर उसके बाद बैंक की बोर्ड में ही इस विषय पर खुलकर बहस होने लगी। जब 1997-98 में East Asian crisis आया, तो फिर वर्ल्ड बैंक ने बड़ी चालाकी से इसका ठीकरा मुख्य रूप से करप्शन पर ही फोड़ा, जब कि यह संकट स्वयं पूंजीवादी-साम्राज्यवादी नीतियों की उपज था।
1997 में ही, वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट एक बार फिर आयी, जिसमें एक बार फिर करप्शन को मुख्य मुद्दा बनाया गया। इसी साल वर्ल्ड बैंक ने "Helping Countries to Combat Corruption" नामक एक पेपर को अपनी स्वीकृति देकर इसे एक बार फिर मुद्दा बना दिया। Anti-Corruption Reforms: Challenges, Effects and Limits of World Bank Support में कहा गया है –

"The OECD and the United Nations have also developed separate anti-corruption programs to assist governments in tackling the problem.3 Several bilateral development agencies have followed and placed anti-corruption high on their development agendas, including DFID, Norad, Sida, and the USAID.4 Improving governance and reducing corruption are today considered essential to helping poor people to escape poverty and countries to achieve the Millennium Development Goals (MDGs). This is an important change in focus of aid policy, but it remains to be seen whether it is possible for donors to find workable policy instruments to fight corruption."

इस तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ जोर-जोर की जा रही चीख पुकार में भ्रष्टाचार की जननी पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था को आम जनता के गुस्से से बचा लेने की छटपटाहट स्पष्ट देखी जा सकती है। हमलोग "जनलोकपाल" की मांग को मनवाने के लिए हुए संघर्ष व आंदोलन के दौरान अण्णा-केजरीवाल के शब्दों पर गौर करें तो ऐसा लगेगा मानो यह अरबिंद केजरीवाल नहीं वर्ल्ड बैंक ग्रुप का चेयरमैन Jim Yong Kim बोल रहा है, जिसने 13 दिसंबर को former World Bank President James D. Wolfensohn, former Chairman of the US Federal Reserve Paul Volcker, Chair of Transparency InternationalHuguette Labelle, and Secretary of Finance for the Philippines Cesar V. Purisima के समक्ष एक मीटिंग में यह कहा –

"the World Bank Group is more committed than ever to continue the fight against corruption — and that will be a critical part of our work to end extreme poverty and to boost shared prosperity,” ऐसा लगता है, मानो यह वर्ल्ड बॅंक ग्रूप का अध्यक्ष किम नहीं, हमारा केजरीवाल बोल रहा है! केजरीवाल को क्या यह कहते हुए नहीं सुनते हैं कि वे भ्रस्टाचार को खत्म कर के गरीबी मिटा देंगे?और क्या यह महज़ यह संजोग है कि केजरीवाल-अण्णा – किम इन तीनों में से कोई भी मानवहन्ता पूंजीवाद के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोलता है ?

https://www.facebook.com/sarwaharasamajwad/posts/786299681399620

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अजय सिन्हा साहब का प्रस्तुत लेख अन्ना हज़ारे/केजरीवाल की पोल खोलने वाला है लेकिन उनका यह मानना कि हज़ारे भाजपा के साथ और केजरीवाल उनसे अब अलग हैं पर्याप्त नहीं है। हज़ारे/केजरीवाल आज भी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और दोनों की डोर RSS से बंधी हुई है। उपरोक्त समाचार में हज़ारे के बयान से भी इसकी पुष्टि हो जाती है बल्कि इनके पीछे वर्तमान पी एम साहब का ज़बरदस्त वरद हस्त है इसे भी ध्यान रखा जाना चाहिए। हज़ारे/केजरीवाल का भ्रष्टाचार आंदोलन RSS/मनमोहन की मिलीभगत का अंजाम था । मनमोहन और मोदी की अलोकप्रियता के मद्देनजर केजरीवाल को उभारा गया है और सारा नाटक देश की साधारण जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ने हेतु खेला जा रहा है।

~विजय राजबली माथुर ©
इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

~विजय राजबली माथुर ©

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