क्रांति स्वर जनतंत्र नहीं यह धन-तंत्र ह ै :जनता क्या करे?—विजय राजबली माथुर


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जब बहस होते-होते नौबत हाथापाई तक आ गयी और टीना शर्मा ने ‘आप’ के प्रवक्ता एजाज खान को एक जबरदस्त थप्पड़ रसीद कर दिया. दरअसल इंडिया न्यूज़ पर बहस चल रही थी कि केजरीवाल जाति-जुगाड़ की राजनीति कर रहे हैं?
http://www.youtube.com/watch?v=gLMcKHkIhYM

नई लोकसभा के गठन हेतु चुनाव होने ही वाले हैं। परंतु स्थिति कुछ भिन्न होगी ऐसी कोई संभावना नहीं है। राज्यसभा सांसद तरुण विजय जी ने बातें तो सटीक कही हैं लेकिन उनको मानने वाले कहाँ हैं?
1978 मे होटल मुगल कर्मचारी संघ के हम छह -सात लोग दिल्ली में होटल मौर्या के ट्रेड यूनियन साथियों से मिल कर आगरा ट्रेन से वापिस लौट रहे थे। एक सज्जन ने दो सीटों पर अवैध कब्जा कर रखा था उनसे हमारे साथियों का विवाद हुआ तो उन्होने सांसद राजेन्द्र कुमारी बाजपेयी (जो यू पी की पूर्व मंत्री भी थीं) की सिक्यूरिटी से सम्बद्ध होने का हवाला दिया और अड़ गए। जब मैंने उनसे बात की तो वह एक सीट छोडने पर राज़ी हो गए और हम लोग एडजस्ट हो गए। दरअसल वह राजेन्द्र कुमारी जी के भांजे अजिताभ बाजपेयी को छोडने आए थे। गाड़ी चलने पर अजिताभ जी अपनी सीट पर आए तब उनसे वार्तालाप हुआ। उनका कहना था अभी वह बिजनेस पर ध्यान दे रहे हैं और पैसा एकत्र करने के बाद राजनीति में उतरेंगे। वह राजनीति में आए या नहीं परंतु उन्होने जो बताया वह महत्वपूर्ण है। उनका कहना था कि आज राजनीति में दो तरह के लोग ही सफल हैं –
1)-एक वे जो खुद पैसे वाले हैं और समर्थक व कार्यकर्ता खरीद सकते हैं।
2)-वे जो खुद फक्कड़ हैं और पैसे वालों के आगे खुद को बेच देते हैं।
उनके कथन की व्यवहारिक सत्यता मैंने काफी निकट से देखी है,नामोल्लेख जानबूझ कर नहीं कर रहा हूँ। यही कारण है कि मेरे जैसा ईमानदारी पर चलने वाला साधारण इंसान राजनीति में पिछड़ा ही रहता है। न तो हम किसी को खरीद सकते हैं न इस बात को पसंद करते हैं और न ही हम बिक सकते हैं इसलिए हमारी बात नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बन कर रह जाती है।
जब पैसे वाले खुद या उनके नुमाईन्दे संसद में पहुंचेंगे तो वही होगा जो आजकल हो रहा है। अपने-अपने बिजनेस के हित में सांसद भिड़ते रहेंगे क्योंकि जनहित तो उनके लिए मुद्दा है ही नहीं। जो नए-नवेले आम आदमी के नुमाइंदे हैं वे तो और भी अधिक निकृष्ट एवं भ्रष्ट हैं जैसा कि प्रस्तुत वीडियो से स्पष्ट होता है।
जनता के सामने यदि संसदीय लोकतन्त्र राहत देने में विफल रहता है तो सशस्त्र क्रान्ति के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है। किन्तु सशस्त्र क्रांति को देश-द्रोह के नाम पर कुचलना इन धनिकों के लिए और भी सुगम होता है जैसा कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है। इसलिए बेहतर यही है कि सभी जनहितैषी वामपंथी दल परस्पर एकजुट होकर संसदीय चुनावों में भाग लें न कि धनिकों के ही इस या उस गुट के साथ तालमेल करें जैसा कि किया गया है।

~विजय राजबली माथुर ©

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