क्रांति स्वर काश लोग बतबना पन छोड़ कर सच क ो स्वीकारें व मानवता की रक्षा हेतु तत्पर हों!- –विजय राजबली माथुर


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कुदरत का कहर: महाराष्ट्र में दिखा कश्मीर जैसा नजारा, हजारों किसान हुए बर्बाद

http://www.bhaskar.com/article/MH-PUN-heavy-rain-in-maharashtra-and-pune-4545627-PHO.html?seq=3

भास्कर.कॉम | Mar 10, 2014, 18:31PM IST

पुणे। महाराष्ट्र के पुणे और आसपास के शहरों में पिछले 24 घंटो के दौरान तूफानी बारिश और ओलावृष्टि का कहर देखने को मिला है। भीषण ओलावृष्टि के चलते जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। खेतों में खड़ी फसल बर्बाद हो गई। कहीं पर पेड़ गिरे तो कहीं पर बिजली के खंभे गिर जाने से बिजली चली गई। ओलावृष्टि के कारण कई जानवरों की मौत हो गई। पश्‍चिम विदर्भ में भीषण ओलावृष्टि ने एक युवक की जान ले ली और तीन दर्जन से अधिक लोगों को घायल कर दिया।………………………….

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15 फरवरी से 16 मार्च 2014 हेतु पृष्ठ संख्या-52 ,’निर्णय सागर,चंड-मार्तण्ड’ पंचांग पर पहले ही से आगाह किया हुआ था ।:

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किन्तु वस्तु-स्थिति यह है कि प्रशासनिक अधिकारियों(IAS/PCS) को इस तरफ ध्यान देने की क्या ज़रूरत? और तो और पंडे-पुजारी भी अपना पेट भरने तथा जनता का खून चूसने (खटमल और जोंक की भांति) में ही संलिप्त रहते हैं। उनको ही ज्योतिषी मानते हुये ‘वैज्ञानिकता-प्रगतिशीलता’ का लबादा ओढ़े प्रबुद्ध जन ‘ज्योतिष’ को ही फिजूल और व्यर्थ बताते रहते हैं। तब परिणाम इससे भिन्न कैसे हो सकते हैं?चाहे वह उत्तराखंड त्रासदी हो अथवा कुम्भ -भगदड़ अथवा देवघर आदि मंदिरों की भगदड़। जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ते रहने तथा उनका निर्बाध शोषण-उत्पीड़न करते रहने हेतु व्यापारी/उद्योगपति वर्ग ‘पोंगापंथ-आडम्बर-ढोंग’ को बढ़ावा देता रहता है-फिल्मों के माध्यम से भी और मंदिरों -मेलों -तमाशों के माध्यम से भी। ‘शिवरात्रि’ पर अखबारों में सुर्खियों के साथ छ्पा था कि ब्राह्मण पुजारी ने एक दलित महिला को मंदिर प्रवेश नहीं करने दिया था। क्यों जाते हैं लोग इन मंदिरों में? क्यों नहीं लोगों को समझाया जाता है कि ‘भगवान’ मंदिर में नहीं सर्वत्र व्यापक है। कैसे-

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मानव ही नहीं विश्व के सभी प्राणियों व वनस्पतियों के जीवन हेतु जिन पाँच तत्वों की विशद आवश्यकता है उनका समन्वय ही भगवान-खुदा-गाड है। देखिये कैसे?:

भ(भूमि) +ग(गगन-आकाश)+व (वायु)+I(अनल-अग्नि)+न(नीर-जल)=भगवान।

अध्यात्म=अध्ययन अपनी आत्मा का ।

धर्म=जो शरीर व समाज को धारण करने हेतु आवश्यक हैं ;जैसे-

सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।

लेकिन अफसोस यही है कि लोग सच्चाई को समझना और समझाना तो चाहते ही नहीं हैं बल्कि ऊपर से मखौल और उड़ाते हैं। यदि पंचांग में दी गई चेतावनी पर ध्यान देते हुये प्रशासनिक स्तर पर पहले ही सुरक्षात्मक उपाए कर लिए जाया करें तो इस तरह अपार जन-धन की क्षति को कम तो किया ही जा सकता है।
01 मार्च ,शनिवार के दिन अमावस्या थी और 16 मार्च रविवार को पूर्णिमा है जो कि पर्यावरण हेतु सुखद नहीं है साथ ही निर्धनों,पशुओं व साधारण जनता हेतु पीड़ादायक स्थिति उत्पन्न करने वाली आदि चेतावनी स्पष्ट रूप से उपरोक्त स्कैन डबल क्लिक करके पढ़ी जा सकती हैं।
काश लोग बतबना पन छोड़ कर सच को स्वीकारें व मानवता की रक्षा हेतु तत्पर हों!

~विजय राजबली माथुर ©

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