क्रांति स्वर रसोई गैस और रिलायान्स की ल ूट जनता की कमर गई टूट —विजय राजबली माथुर


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government had not withdrawn the notification on price hike……. "Reliance is arm-twisting fertiliser companies to sign agreements with it based on the increased price of $8.4 per mmbtu from April 1". He said the government is "conveniently looking the other way, even as fertiliser companies are being brow-beaten to sign this patently illegal agreement".

रिलायंस इंडस्ट्रीज समानांतर सरकार है : गोपालकृष्ण गांधी

ऊपर दिये गए दोनों लिंक्स पर दो ब्लाग्स में वे तथ्य सम्मिलित किए गए हैं जिनसे रिलायंस द्वारा जनता की लूट को समझने में आसानी होगी।

लखनऊ चिल्ड्रेन्स एकेडमी की प्राचार्या पारुल सिंह जी का यह कथन कितना यथार्थपरक है जिस पर ध्यान अवश्य ही दिया जाना चाहिए-"सरकार को निम्न वर्ग के बारे में भी सोचना चाहिए कि वह सिलेन्डर की तय संख्या से अधिक लेने पर रु 1300/-का सिलेन्डर कैसे लेगा?"

अभी भी सरकार ने ‘आधार कार्ड’ योजना को रद्द नहीं किया है और मामला सर्वोच्च न्यायालय में चल रहा है। इस देशद्रोही योजना के विरुद्ध केवल पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी ने ही आवाज़ उठाई है।

Mamata Banerjee
Petroleum Ministry has created a confusion to deprive the poor people. They have made AADHAAR CARD mandatory for disbursement of subsidy on LPG cylinder purchase. I am shocked with this decision.

रिलायंस तथा विदेशी कंपनियों को लाभ पहुंचाने हेतु बढ़ती लागत के आधार पर रसोई गैस के दाम लगातार बढ़ाए जाते रहे हैं दूसरी ओर कोयला तथा लकड़ी का प्रयोग ‘पर्यावरण प्रदूषण’ के नाम पर वर्जित किया गया है। आखिरकार गरीब वर्ग किस प्रकार अपनी रसोई में भोजन पकाएगा? इस ओर कौन सोचेगा? सरकार का कार्य क्या उद्योगपति/व्यापारी की सेवा करना और गरीब जनता का उत्पीड़न व शोषण करना है?

2009 तक हम लोग आगरा में थे और अक्सर बस द्वारा मथुरा जाना होता था। फरह में मथुरा रिफायनरी के सामने से जब बस गुजरती थी तो साफ-साफ दिखाई देता था कि रिफायनरी में लगी चिमनी से लगातार आग की लपटें निकल रही हैं। ज्ञात यह हुआ कि सिलेंडरों के आभाव में लगभग 300 (तीन सौ) सिलेंडरों में भरने लायक गैस जला दी जाती है। वर्ष में 109500 (एक लाख नौ हज़ार पाँच सौ ) सिलेन्डर गैस अकेले मथुरा रिफायनरी से ही फूंकी जाती रही है। इस प्रकार देश की अन्य रिफायनरियों में भी गैस की बरबादी को जोड़ लिया जाये तो जितना ईंधन व्यर्थ नष्ट किया जा रहा है क्या उसे संचित करके ज़रूरतमन्द जनता को मुहैया नहीं कराया जा सकता है? रिफायनरियों के इंजीनियर अपने कमीशन के चक्कर में नई दूसरी कंपनियों को सिलेन्डर निर्माण की अनुमति नहीं देते हैं तथा पुरानी कंपनिये क्षमतानुसार ही तो निर्माण कर सकती हैं लेकिन नई कंपनियों को आने न देने में इंजीनियरों को प्रोत्साहित करती हैं। इस प्रकार ईंधन की अनावश्यक बरबादी,लूट खसोट जनता पर भारी पड़ती जा रही है।

‘बुभिक्षुतम किं न करोति पापं’ । यदि जनहित को यों ही नज़रअंदाज़ किया जाता रहेगा तो एक दिन भूखी जनता रिलायंस इंडस्ट्रीज पर टूट पड़ेगी और उसके समानान्तर साम्राज्य को उखाड़ फेंकेगी। अतः समय रहते सरकार को कम से कम रिलायंस की रिफायनरियों का राष्ट्रीयकरण करके,ईंधन की बरबादी रोक कर गैस की कीमतों में तत्काल कमी करनी चाहिए।

~विजय राजबली माथुर ©

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