क्रांति स्वर क्रन्तिकारी सुरेश भट्ट की पत्नी की आत्मकथ्य —सरस्वती भट्ट


(यह आलेख असीमा भट्ट जी की माता जी का है और जैसा कि असीमा जी ने प्रेषित किया है वैसा ही प्रकाशित किया जा रहा है-विजय राजबली माथुर )

मेरी शादीअप्रैल, १९५५ में हुई. मैं ११ साल की और मेरे पति (सुरेश भट्ट) २४ साल के थे जब हमारी शादी हुई. शादी क्यूँ और किसलिए होती है, मैं नहीं जानती थी. मेरी विदाई के साथ एक ‘दाई माँ’ भी साथ आई थी. जिस रात मैं ससुराल पहूँची जो कुछ रस्म होता था हुआ. थकी थी इसलिए जल्दी सो गयी. सुबह उठी तो अपने पलंग पर किसी मर्द को देखकर रोने लगी कि यहाँ मेरा अपना कोई नहीं है तो मुझे मर्द के साथ सुला दिया, मेरी दाई ने समझाते हुए कहा – “यह कोई गैर मर्द नहीं, आपका पति हैं लेकिन मैं पति-वति कुछ नहीं समझती थी. मुझे रोज़ वो सजा-धजा कर नयी साड़ी पहना कर मेरे पति के कमरे में ले जाना चाहती और मैं उसकी साड़ी का आँचल पकड कर जोर जोर से रोने लगती – “कुत्ती, मुझौसी…हम बाबु जी से कह देव कि हमरा मरदाना के कमरा में सुतेलय भेजे छय…” मुझे रोते देखकर यही (मेरे पति) बोले – “जाने दीजिये ना, काहे बच्चा को तंग करते हो, जहाँ उसका मन है, वहाँ सोने दो”
पांच दिन वहां किसी तरह से कटा फिर मेरे नयैहर से मेरे बड़े भाई के साथ एक नौकर मुझे वापस लिवा ले जाने आये. मैं बहुत ख़ुशी ख़ुशी वापस नयहर आ गई. यह बात अप्रैल, १९५५ की है. शादी के कुछ ही दिनों बाद अगस्त १९५५ में पटना में छात्र आन्दोलन हुआ. वो बनारस में पढ़ रहे थे, आन्दोलन की खबर सुनते ही पटना आ गए. पुलिस फायरिंग हुई. कई लोग घायल हुए. उसी में गोली कांड में दीनानाथ पाण्डे शहीद हुए. नवादा के उनके एक और साथी महेंद्र कुमार शहीद हो गए. दरअसल वो गोली इनपर चली थी. ‘महेंद्र भाई जी’ ने इन्हें धक्का देकर दूर धकेल दिया और इनकी गोली खुद अपने सीने पर झेल ली. पूरे नवादा में खबर फ़ैल गई – “सुरेश भट्ट को पुलिस ने गोली मार दी.” मेरे ससुराल में भट्ट जी की दादी-बुआ–बहन थीं सब का रोना- पीटना शुरु हो गया
मेरे ससुराल में भट्ट जी दादी-फुaaआ (उनकी माँ का देहांत हो चुका था और पिता जी ने दूसरी शादी कर ली थी) सबका रोना पीटना शुरू हो गया. उन दिनों टेलीफोन की सुविधा नहीं थी. तुरंत मेरे ससुर ने दो आदमी मेरे घर भेजा. खबर सुनकर हमारे यहाँ भी सब लोग रोने-पीटने लगे. मैं उस समय खेल रही थी .मेरी दादी भगवान को कोस कोस कर रो रही थी- “हे भगवान! इस छोटी सी बच्ची ने आपका क्या बिगाड़ा था. ऐसा अन्याय क्यों किया.” गांव घर की औरतें जमा हो गई. और मुझे पकडकर मेरा मांग धुलवा दिया गया. मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि यह मेरे साथ क्या हो रहा है. एक हफ्ते बाद भट्ट जी घर (नवादा) आ गए. उनकी दादी उनसे गले लगाकर रोने लगी और तुरंत मेरे ससुर से कहा- “बडकी को घर बुलवा लो. वो सीता है, आज उसी की वजह से मेरा राम (भट्ट जी) जिंदा है.” मेरे ससुर जी ने तुरंत आदमी मेरे घर भेजा. मेरे घर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई और मेरे घर वालों ने मुझे दुबारा मेरे छोटे भाई के साथ विदा कर दिया.
उसी केस के सिलसिले में गणेश शंकर विद्यार्थी, बृजनन्दन लाल और भट्ट जी तीनों को सात साल की सजा हो गई. बृजनन्दन भाई जी और गणेश शंकर विद्यार्थी तो साल दो साल में छूट गए लेकिन भट्ट जी पर काफी कड़ा केस लगा था. इसलिए वो पूरे सात साल बाद ही जेल से वापस आये .
जेल से आने के बाद कुछ दिन अपने बाबूजी के सिनेमा हॉल चलाने में हाथ बटाने लगे और सामाजिक काम भी चलता रहा.
भट्ट जी की दादी और बुआ ने ही बताया था कि इनके क्रान्तिकारी स्वभाव के कारण इनके पिता जी इनसे क्षुब्ध रहा करते थे. मेरे ससुर शहर के सबसे नामी और धनी व्यक्ति थे इसलिए अँगरेज़ अफसरों का मेरे ससुर जी के घर पर आना जाना था. भट्ट जी को लगता की उनके पिता अंग्रेजों के मुखबिर हैं. उन्हें अपने पिता पर इस बात के लिए बहुत गुस्सा था लेकिन पिता से डर की वजह से कुछ नहीं कहते थे लेकिन एक दिन जब अँगरेज़ अफसर मेरे ससुर जी से मिलने आये और वो लोग बैठक खाने में बातें कर रहे थे भट्ट जी, जो अंग्रेजों की जीप दरवाज़े पर खड़ी थी उसमें आग लगा कर भाग गए .
अंग्रेजो के लिये इनके मन में इतना आक्रोश भरा था कि पोस्टआफिस जला दिया था और रेलवे लाइन की पटरी उखाड़ दी थी ताकि अँगरेज़ नवादा से भाग ना सके. अंग्रेजों को सड़क पर खदेड़ खदेड़ कर मारा था, जिसके कारण उस कम उम्र में उन्हें जेल जाना पड़ा. जो आज़ादी के बाद ही जेल से बाहर आये.
उनके इसी स्वभाव की वजह से उनके पिता जी चाहते थे कि इनकी शादी जल्दी करा दें. लेकिन भट्ट जी खुद के लिए आये रिश्ते और मेहमानों को खुद अपने बारे में उलटी – पुलटी मनगढ़त कहानियां सुना कर भगा देते. यहाँ तक कह दिया कि लड़का भांग-गांजा पीता है और लड़का पागला भी है.
मेरे पिता जी जब इन्हें देखने आये तो मेरे मौसा जी भी साथ आये थे. उनको भट्ट जी वही सब बताना शुरू कर दिया लेकिन मेरे पिता जी सब सुनकर बस हंस रहे थे क्योंकि उन्होंने पहले ही सबकुछ पता करा लिया था कि लड़का बनारस हिन्दू विश्वविद्दालय में पढता है. और बहुत ही तेज़ और होनहार छात्र है. ज्ञान इतना है कि किसी भी विषय पर बहस करा लो. बाबूजी को लगा बाकी सब शादी के बाद ठीक हो जायेगा. इसलिए मेरे पिता जी ने तुरंत बात पक्की कर दी. और १९५५ के अप्रैल में हमारी शादी हो गई. लेकिन शादी के बाद भी इनकी हरकतों में बदलाव नहीं आया. लगातार या तो जुलूस – आन्दोलन में उलझे रहते या फिर जेल में रहते….
मैं रोती कि मेरे बाप ने किससे शादी करा दी. एक-दो बार बाबूजी से कहा भी कि – आपने मेरी शादी सही नहीं करायी. वो कहते – “देखना सब ठीक हो जायेगा. लड़का हीरा है, बस थोड़ा भटक गया है. एक बच्चा हो जायेगा तो सब ठीक हो जायेगा.”
शादी के दस साल हो गए हमारा बच्चा नहीं हुआ. ससुराल में सबको हमसे शिकायत होने लगी. लोग मुझे ‘बाँझ’ कहने लगे. ससुरजी को अपने वंश की चिंता होने लगी. अपने बेटे को बुलाकर कहा – ‘इसको बच्चा नहीं हो रहा. बाँझ है. आपको दूसरी शादी करनी पड़ेगी.’ इन्होने बाबूजी से साफ साफ कह दिया. ‘मुझे पहले भी शादी की ज़रूरत नहीं थी, आज भी नहीं है. मेरा तो पूरा देश ही बच्चा है.’ लेकिन इनके पिता जी नहीं माने और घर पर रिश्तेदारों का आना शुरू हो गया. एक दिन जब एक मेहमान आये तो भट्ट जी अपने पिता जी के सामने ही मुझे उन लोगों के सामने बुला कर उनसे कहा –‘यह मेरी पत्नी है, आपको पता है ना. इसे बच्चा नहीं हो रहा है तो मैं इसके घर में रहते दूसरी शादी कर लूँ. इसकी क्या गारंटी है कि आपकी बेटी से बच्चा हो ही जायेगा और नहीं हुआ तो दोनों को घर में बिठाकर तीसरी शादी करूंगा तो आपको कैसा लगेगा?“
१३ साल हो गए मुझे बच्चा नहीं हुआ. कोई दवा नहीं, इलाज नहीं. अचानक मुझे लगा कि मैं पेट से हूँ. लेकिन पूरी तरह यकीन नहीं हो रहा था क्योंकि मेरे ससुर जी दावा करते थे कि अगर इसे बच्चा हो गया तो मैं डाक्टरी छोड़ दुंगा. मुझे भी लगता, इतने बड़े ‘वैद्य’ हैं, भला यह कैसे गलत हो सकते हैं. डर से मैं तीन महीने चुप ही रही. फिर अचानक ४ महीने में मेरी सौतेली सास को ही कुछ शक सा हुआ उन्होंने पूछा – “कोई बात है क्या बड़की?”
मैंने उन्हें बताया तो उन्होंने मेरे ससुर जी को बताया. ससुर जी बोले – “हो ही नहीं सकता ऐसा कई बार होता है कि कभी कभी औरतों को लगता ही कि वो पेट से है लेकिन वो भरम होता हैं. असल में पेट में पानी भरा होता है”
मेरी माँ मेरी शादी के दो साल बाद ही मर गयी थी. मेरी दादी थी जो कि सौतेली थी लेकिन सगी से भी बढ़ कर थी. मेरी माँ के मर जाने के बाद हम पांच भाई बहन को माँ से भी बढ़कर प्यार दिया. उन्हें जैसे ही मेरे माँ बनने की खबर मिली वो मेरे बड़े भाई को मुझे लिवा लाने भेजा क्योंकि वो जानती थीं की मेरी सौतेली सास है, जिनका बर्ताब मेरे साथ ठीक नहीं. वो खुद हर साल एक बच्चे को जन्म देती थी और चूँकि मुझे बच्चा नहीं होता था. मैंने अपने देवर और ननद को अपने बच्चों जैसे ही प्यार से पाला. मेरी सौतेली सास कहती भी थी- ‘हम कुछ जानते हैं कि हमारा बच्चा कैसे पतला है. हम तो खाली जन्म देते हैं. बाकी तो मेरा सब बच्चा बडकी के हाथ से ही पलता है.” कुल ९ बच्चे उनके हुए जिनमें कुछ की असमय मृत्यु हो गई पर चार बच्चों को मैंने ही बड़ा किया. सारे बच्चे अपनी माँ से कम और मुझसे ज़यादा घुले मिले थे. इन्हीं बच्चों को देख देखकर मैं अपने माँ बनने का अरमान पूरा करती.
जब मेरे भैया मुझे लेने आये तो ससुर कहने लगे – ‘क्या झूठ-मूठ तमाशा लगा रखा है? इसको ऐसे ही लग रहा है कि इसको बच्चा होगा और आप लोग भी बेवकूफ़ की तरह बात मान रहे हो. कहीं नहीं जाएगी. मैंने कहा ना इसके पेट में बस पानी है.”
भैया कुछ नहीं बोल पाये. मैंने सास से कहा – “माय, जाने दीजिये न हमको नहरा. भैया आये हैं तो चले जाते हैं कुछ दिन के लिए. बच्चा हो चाहे ना हो.”
वो बोली – ‘अरे बाप रे. हमको मरना है तुमरे ससुर का हुकूम टालके.’
मैं रोने लगी. मैं जानती थी कि इतने दिनों बाद भगवान ने मेरी सुनी है. यह मेरा भरम नहीं हो सकता. भट्ट जी से कहा – देखिये, आप बाबूजी से बात कीजिये, हमको जाने दीजिये. जानते हैं कि हमको यहाँ एकदम आराम नहीं मिलता. यहाँ हम पूरा दिन खटते रहते हैं, एक तो इतना दिन पर मेरा अचरा भरा है. यहाँ ठीक से देखभाल नहीं होगा तो कुछ भी हो सकता है. वहां नहरा में दादी है. बडकी भाभी है, छोटी बहन. सब मेरा देखभाल करेगी.’
भट्ट जी बोले – ‘तुम जानो, तुम्हारा काम. हम मैया- बाबूजी से कुछ नहीं कहेंगे.’
अपने माँ बाबूजी को तो यह भगवान मानते थे. उनकी आज्ञा ऐसे ही निभाते थे जैसे भगवान राम.
मैं बहुत रोयी, ऐसे भी तो पहला बच्चा नहरा में होता है. मुझे जाने दीजिये लेकिन मेरे ससुर बोले – ‘हमारे खानदान में ऐसा नहीं होता. देखती नहीं तुम्हारी सास का सब बच्चा यहीं होता है.’ .
बात कुछ और ही थी. सास को चिंता थी कि मैं मायके चली गई तो इनके इतने सारे बच्चे कौन सम्हालेगा. क्योंकि सारे बच्चे मेरे साथ ही सोते थे. बल्कि बहने तो बड़ी हो गई थी तब तक अपने भाई (भट्ट जी) में सटकर ही सोती थी. भट्ट जी अपने सौतेले भाई-बहन को अपने बच्चों से बढ़कर मानते थे. और ससुर जी को लगता था कि बच्चा-बच्चा हैं नहीं. ढोंग कर रही है. कहीं ऐसा ना हो कि नैहरा से किसी दूसरे का बच्चा लेकर चली आये.

दिन-रात ये सिनेमा में ही पड़े रहते थे. बस पैसे पंहुचाने घर आते थे. पूरे दिन भर का जो सिनेमा के टिकट की कमाई होती वो अलग अलग थैलियों में करके अपनी माँ (सौतेली माँ, अपनी माँ का तो देहांत हो चुका था) को दे जाते. और कहते -"लाओ मईया! चार आना दो, सिगरेट पीयेंगे." अपने बाबूजी से बहुत डरते थे. उनके सामने कभी सिगरेट नहीं पीते थे. सिगरेट पीना तो दूर की बात हैं, कभी अपने बाबूजी के सामने खड़े भी नहीं होते. वो जितना कहते, सर झुकाकर सुन लेते. हाँ, हूँ में जवाब देकर खिसक लेते. कभी सिगरेट पीते सामने पाए जाते तो जलती सिगरेट हाथों में दावा लेते. और अगर तब भी नहीं छुप पाता तो बाबूजी खड़ाऊ उतरकर पीटना शुरू कर देते और ये कुछ नहीं बोलते. इनकी दादी कहती – "अरे; घर में दुल्हिन है. इसकी शादी हो गयी है, अब तो रहने दो. जवान शादी सुदा बेटे पर ऐसे कोई हाथ उठाता है ?." यह चुप चाप वहां से कट लेते.
जिस दिन मेरी बेटी हुई. उस दिन भी वो सिनेमा में ही थे. श्यामलाल बाबा (घर के सबसे बुजुर्ग और पुराने नौकर, बहुत जिद्दी और खूद्दार, उनके गुस्से से मेरे ससुर जी भी डरते थे). वे ख़ुशी ख़ुशी सिनेमा भागे, इन्हें बताने. -"अरे बड़े बाबू, घर में लक्ष्मी आयी." यह दौड़े-भागे घर आये. जब तक यह घर पंहुचते, तब तक बाबूजी बच्ची को गोद में लेकर पंचांग (वे खुद ज्योतिष भी थे) देख चुके थे. खुश होकर बोले – "बहुत भाग्यशाली बच्ची है. साक्षात् ‘माँ भवानी’ का रूप हैं. उन्होंने नाम भी ‘भवानी’ रख दिया. पर सतैसा (kind of ritual for 27 th days) में पड़ी है, बाप पर भारी होगी. इसलिए २७ दिन बाद ही बड़े बाबु इसको देखेंगे.
अब बड़े बाबु को कौन समझाए, वो तो बेटी को देखने के लिए उतावले हो रहे थे. इसपर मेरे देवर बोले – "इतना क्या है. इतने सालों (हमारी शादी के १४ साल हुई थी) बाद हुई भी तो बेटी." तुरंत अपने भाई को डांटते हुए बोले – "बेटी नहीं. क्रांति हैं."
बाबूजी के हुक्म टालने की इनकी हिम्मत तो नहीं थी लेकिन सिनेमा विनेमा छोड़ कर घर में ही दिन भर घुर घुर करते रहते. और मौका देखकर मेरे कमरे की खिड़की के पास आकर गिगगिड़ाते. – ‘एक बार ‘बाबु’ को देखने दो ना, मुझे लगता भी कि एक बार दिखा दें, इतने सालों बाद खुद की बच्ची हुई है, दूसरों के बच्चों को बहुत प्यार करते थे, खूब खेलते थे. आज खुद की बेटी को देख नहीं पा रहे, मन तो बेचैन होता ही होगा. लेकिन मेरे कमरे में हमेशा एक दाई रहती थी. वो बोली – "हमरा बाबूजी मार के ज़मीन में गाड़ देंगे."
बेटी को देखने के लिए इनका २७ दिन बड़ी कठिनाई से कटा. आखिर सतैसा हो गया. बेटी को गोद में लेकर ऐसे खुश थे जैसे सारी दुनिया की दौलत मिल गई हो. बेटी में तो जैसे जान बसती थी इनकी. छोटी सी बच्ची को भी सिनेमा में ही लेकर पड़े रहते थे. बच्ची बहुत प्यारी मगर कमज़ोर थी. कई औरतें जो देखने आती, वे मेरे मुंह पर ही कह देतीं – "चूहे के बच्चे जैसी है, बचेगी नहीं." मैं रोने लगती. – "इतने दिनों बाद गोद भरी भी तो लोग ऐसी बातें करते हैं, हे भगवान! बच्चा देकर, छीन मत लेना."
ये कहते -"पागल! रोती क्यूँ हो? यह क्रांति है. देखना इसको कुछ नहीं होगा."
बेटी होने बाद यह बेटी में ही खोये रहने लगे. बेटी को लेकर बहुत खुश रहते, दिन-रात बस बेटी को लेकर सोना. बेटी को लेकर ही जागना. लोगों से कहते मेरी बेटी इंदिरा गांधी की तरह नाम करेगी. यह देखकर सौतेली माँ जल भून गयी. तुरंत ही बातें बनाने लगी और ताने देने लगीं. बेटी होते ही उन्हें लगने लगा कि सम्पत्ति का हिस्सेदार आ गया. घर में सौतेली सास का बर्ताव बिगड़ने लगा. घर के तनाव को देखते हुए ससुरजी ने हमें अलग कर दिया. घर से हमें ये बिलकुल खाली हाथ लेकर निकल आये. उन दिनों खुद सिनेमा हॉल चलाते थे. वहीँ सिनेमा हॉल के ऊपर वाले पुराने केबिन में लाकर हमें रख दिया. हम नहाकर कर क्या पहनेगे, क्या खायेंगे, इसका कुछ इंतजाम नहीं था. मैंने कहा भी भट्ट जी से कि कुछ सामान घर से मंगवा लेते. ये मुझे डाँटते हुए बोले – ‘तुम एकदम चुप रहो. जब माँ –बाबूजी नहीं सोच रहे हैं या सामान नहीं भिजवा रहे हैं. उनको यही सही लग रहा तो लगने दो. तुम चुप रहो.’ माँ-बाबूजी ने कुछ भी सामान भिजवाना ज़रूरी नहीं समझा. छह महीने तक हम छोटी सी बच्ची को लेकर ज़मीं पर सिनेमा के पुराने पोस्टर बिछाकर सोते रहे. और सिनेमा के होटल से खाना खाते रहे. बच्ची को देर रात कभी भूख लगती तो ना दूध का इंतजाम था न घर में कोई बर्तन की हम किसी तरह कुछ गर्म करके उसे दें. उस रोती हुई बच्ची को कंधे पर लेकर ये बाहर निकल जाते. कई बार देर रात को बंद होटल खुलवा कर दूध या कुच्छ मिठाई खिला देते. मुझसे बेटी का तकलीफ नहीं देखा जा रहा था. आखिर इसमें इस छोटी सी बच्ची का क्या कसूर. मैंने दुबारा इनसे कहा कि माँ बाबूजी से बात करके घर का ज़रूरत का कुछ सामान ले आते है. इन्होंने मुझे दुबारा सख्त मना कर दिया. ‘देखते जाओ अभी, यह लोग और क्या क्या करते हैं.’ बच्ची की परेशानी मुझसे देखी नहीं जा रही थी. मैंने कहा ऐसे तो मेरी बेटी मर जाएगी. आप मुझे नैहर भेज दीजिये, वह नहीं माने क्योंकि बेटी के बिना एक मिनट नहीं रह सकते थे. मैंने कहा- ‘ठीक है, फिर सिनेमा से जो इतना पैसा कमाते हैं उसमें से कुछ दीजिये. आखिर इस पैसे पर इस बच्ची का भी हक है.’ यह बोले – ‘बिलकुल नहीं.’ और रोज सिनेमा की जो कमाई होती श्यामलाल बाबा (जो हमारे घर के सबसे भरोसेमंद, पुराने और बुजुर्ग नौकर थे) के हाथों घर भिजवा देते. कई बार शायमलाल बाबा भी गुस्सा करते- ‘बड़े बाबु आप सही नहीं कर रहे हैं तनिक बच्चा का मुंह देखिये.’ लेकिन भट्ट जी अपने सिद्धांतो से कहाँ हटने वाले थे. उन्होंने मुझे भी सास-ससुर के घर जाने से सख्त मनाही कर दी.
देखते देखते छह महीने बीत गये. मेरे गांव की एक बेटी की शादी नवादा में ही हुई थी. उसका बाप अपनी बेटी से मिलने आया था. वह आदमी मेरे घर भी आया. हमारी दशा देखकर जाकर मेरे बाबूजी को बताया. बाबूजी तुरंत भागे आये. पहले तो मुझे जी भर कर डांटा कि मैंने उन्हें कुछ क्यों नहीं बताया. बाद में मेरे ससुर जी से बात की. उन्होंने साफ़-साफ़ कहा कि- ‘समधी जी, आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी. आपको तो मैं विद्द्वान समझता था. इतने सालों बाद मेरी बेटी को एक बच्चा हुआ है और आप ऐसा कर रहे हैं आपको अपनी फूल सी मासूम पोती पर भी तरस नहीं आया.’
मेरे ससुरजी ने जवाब दिया- ‘यह मेरे घर का मामला है. जब मेरा बेटा-बहु कुछ नहीं बोल रहा तो आप कौन होते हैं.’
उस समय मेरे दादा ससुर जी का २५ करोड़ की सम्पत्ति थी. पर ना भट्ट जी ने माँगा और ना मेरे ससुर जी ने दिया. फिर इमरजेंसी में यह जेल चले गए मैं अकेली छोटी सी बच्ची को लेकर वहां क्या करती. इसलिए नैहरा चली आयी लेकिन वहां भी कितने दिनों तक रहती. भट्ट जी का कहीं कोई पता नहीं. मायके में एक बड़ी भाभी और और एक छोटी भाभी थी. मैंने बाबूजी से कहा- मुझे जाने दीजिये. परायी घर की भाभियाँ हैं. कब तक यहाँ रहूँगी, उन्हें बोझ लगूंगी. आप मुझे जाने दीजिये. जो भाग्य में होगा, देखेंगे.
बाबूजी मुझसे बहुत नाराज़ हुए. –जब तक मैं जिंदा हूँ किसी को भी कुछ बोलने का हक नहीं है. भट्ट जी का कहीं कुछ पता नहीं है. छोटी सी बच्ची को लेकर वहां जाकर क्या करोगी? कैसे रहोगी?’
अब जो होगा, जैसे भी हो हम वहीँ रहेंगे. अपना घर अपना होता है, भाभी लोग कुछ बोले ना बोले. मन में तो सोचेगी. मेरी क्या इज्जत रहेगी अगर मैं पूरी जिंदगी यहीं बैठी रहूंगी.
गांव-समाज भी चार बातें बनायेगा. किस किस का मुंह पकड़ेंगे आप. जाने दीजिये बाबूजी. दादी ने भी मुझे समझाया, कि बहुत छोटी बच्ची है. कम से कम दामाद बाबु का कुछ पता चले तो चली जाना. लेकिन मेरा मन नहीं लग रहा था. भट्ट जी को चिट्ठी लिखने की भी आदत नहीं कि पता लगे की जेल में हैं कि भूमिगत हैं. खैर मैं जिद्द करके वापस नवादा आ गई. बाबूजी से कहा अगर आप मेरी मदद करना चाहते हैं तो मुझे एक सिलाई मशीन दे दीजिये. मैं सिलाई करके कुछ कमा लूंगी.
बाबूजी मेरी बात मान गए. उन्होंने एक सिलाई मशीन खरीद कर दे दी और हम वापस नवादा आ गए. साथ में चावल, दाल, चुड़ा. बड़ी, सब खाने का सामान भी भिजवा दिया. बाबूजी अपने जीते जी हमेशा खाने का पूरा सामान और कपडे हर त्योहारों पर भिजवाते रहे.
नवादा आकर हम मुह्ल्ले की एक गरीब विधवा चाची थी, उसे साथ लेकर घर घर जाकर लोगों से सिलाई का कपडा मांग कर सिलाई करने लगे. जब यह बात मेरे ससुर जी को पता चली तो उन्हें लगा की इस तरह से उनके घर की बहू दूसरों का सिलाई करके गुज़ारा करेगी तो उनकी इज्ज़त जाएगी. गुस्से में आकर उन्होंने मेरे घर की बिजली कटवा दी. हम उनसे कहने गए कि बाबूजी बिजली कट गई है. अकेले बच्चे को लेकर अँधेरे में रहने से डर लगता है. वे बोले तो “हम क्या करें.”
सास से मैंने कहा – ‘मायजी आप ही कुछ समझाइये ना बाबूजी को. एकदम वीरान है चारो तरफ. उस समय सिनेमा के आस-पास कुछ भी नहीं था. एकदम शहर से बाहर सिनेमा हॉल था और पीछे नदी. जब तक सिनेमा चलता रौनक रहती. उनके बाद चारों तरफ सायं सायं करता. हम अकेले बच्चे को लेकर रात भर हनुमान चालीसा जपते हुए गुजार देते. एक बार श्यामलाल बाबा से बोले – बाबा बहुत, डर लगता हैं आप यहीं सोया कीजिये. और तब से वे वहीं मेरे घर के नीचे ठीक दरवाज़े के सामने सोने लगे. जब तक वो जिंदा रहे, वहीं सोते रहे. कई बार उन्हें गुस्सा आता तो जाकर मेरे ससुरजी से झगड़ा करते. ‘वे भी इसी घर की बहु है. इज्जत है इस घर की, लाज है आपकी. ब्याह कर लाये हैं ना आप. वो खुद उठ कर नहीं चली आई है कहीं से, आप जो इस तरह कर रहे हैं ठीक नहीं हैं. भगवान सब देखता है. यह शनिचरी (मेरी सास के बारे में) की वजह से जो आप पागल हो गए हैं. यह शनिचरी सबको खा जाएगी. देख लीजिये. सबको बरबाद कर देगी एक दिन.’
मेरी सास ने साफ़ मना कर दिया कि बाबूजी से बात नहीं करेगी. वे बोली. वो क्या मेरा कहना में हैं? .
सच तो यही था कि ससुरजी वही करते जो वो कहती थी, एक तरह से वो पत्नी के हाथ की कठपुतली बनकर रह गये थे. मेरी सास को लगता बेटा (भट्ट जी) इधर-उधर भागा ही रहता है या जेल में ही रहता. वे किसी दिन इसी तरह पुलिस की गोली से मारा जायेगा. यह अपने बच्चे के साथ जाकर नहरा में रहे. यहाँ रहेगी तो हिस्सा मांगेगी. और इस वजह से उन्होंने मुझे मेरे बच्चों के साथ उस सिनेमा के केबिन से निकलने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कभी घर में चोरी करवा देना, कभी घर का सामान उठवा कर सडक पर फिकवा देना. एक बार मेरे घर में चावल दाल था, जो मेरे भाई पंहुचा गए थे. पूरा का पूरा बोरा उठवा कर सडक पर फेंकवा दिया. सडक पर बालू ही बालू था. इस चिंता में की बच्चे क्या खायेंगे. यह तो मेरे बच्चे का अन्न है. मैं पागल की तरह उस रेत में चावल और दाल चुनने की कोशिश करने लगी. लेकिन सब बर्बाद हो चूका था कुछ भी हाथ नहीं लगा. यह सब मेरे ससुरजी को पता था लेकिन वो सब जानकर अंजान बने रहते. भट्ट जी के साथी (कामरेड) कभी-कभार हमारा हाल जानने-पूछने आ जाते हम उनसे रो रो कर पूछते की भट्ट जी कहाँ हैं? लेकिन वे कुछ नहीं बताते. सिर्फ इतना कहते कि आ जायेगे. हां. यदि भट्ट जी जेल में होते तो कभी कभी हमें जेल मिलाने ले जाते. लेकिन ज्यादातर तो क्रांति ही जाती थी क्योंकि भट्ट जी क्रांति को जेल में भी याद करते थे इसलिए क्रांति को भी डर नहीं लगता. वो आराम से उन लोगों के साथ ‘गया सेन्ट्रल जेल’ या हजारीबाग जेल चली जाती थी और शाम तक वापस भी आ जाती थी. वे लोग भी बताते थे कि कभी इसने किसी को रस्ते में तंग नहीं किया. हाँ, एक-दो बार रास्ते में जूता खोकर चली आती थी. बच्ची थी. रास्ते में थक कर सो जाती थी. और नींद में ही कहीं जूता पैर से गिर जाता था. वे लोग भी ध्यान नहीं दे पाते. पर मैंने बेचारी को कई बार बहुत मारा. गरीबी में किसी तरह सब कुछ जुटाना और एक भी चीज़ खो जाये तो इस तकलीफ़ में कि नया कहाँ से आयेगा. झुंझलाहट होती थी.
एक बार की बात है जब हम साथ रहते थे यानि घर नहीं बंटा था. मेरे ससुरजी बनारस से मेरी सास के लिए दो साड़ी लेकर आये. उन दिनों हिन्दी सिनेमा में अक्सर नूतन, मीना कुमारी और वहीदा रहमान लाल बाॅर्डर और आंचल की साड़ी पहनती थी. मुझे खूब पसंद थी. मैंने सास से कहा – ‘माय जी मुझे इसमे से लाल आंचल बाॅर्डर वाली साडी बहुत पसंद है. एक हमको दे दीजिये ना.’ वो बोली – ‘हम दोनों साड़ी में आग लगा देंगे लेकिन तुमको एको गो नहीं देंगे.’
मैं मन मार कर रही गई, जब बड़ी बेटी क्रांति पटना आज अखवार में कमाने लगी तो ठीक वैसी ही साडी मुझे उसने दुर्गा पूजा पर लाकर दिया और कहा – “माँ, तुम यही साड़ी पहनकर पूजा करोगी.”
बात तब कि है जब बड़ी बेटी क्रांति और बेटा प्रकाश (विप्लव) दोनों बाल भारती स्कूल में पढ़ते थे. क्रांति तीसरी में थी और प्रकाश दूसरी कक्षा में. दोनों के स्कूल के दो महीने की फीस बाकी हो गयी थी. मास्टर ने दोनों बच्चों को पूरे स्कूल के सामने बुरी तरह बेंत की छड़ी से मारा. दोनों भाई-बहन रोते रोते घर आये. बच्चों का हाल देखकर मैं एकदम घबरा गयी. दोनों का हाथ पकड़ा और वैसे ही दोनों को लेकर ससुरजी के घर भागी. दोनों भाई-बहन की पीठ पर बेंत के लाल गहरे निशान पड़ गए थे. दोनों बच्चों के कपड़े उतार कर ससुरजी को दिखाया, देखिये बाबूजी. आप के जीते जी सिर्फ बीस रुपए के लिए आपके पोते-पोती को कैसे जानवर की तरह पीठ फाड़ कर पीटा गया है.
तो उनका जवाब था – ‘यहाँ हमारे पास लेकर क्यूँ आयी हो, हमने कहा था बच्चा पैदा करने. बाप कुत्ते की तरह पैदा करके भाग गया तो हम क्या ठेका लिए हैं. पढ़ाई-लिखाई छोड़वा दो. पढ़ लिख कर क्या करेगा. चीनियाबादाम खरीद के दे दो. फुटपाठ पर बैठकर बेचेगा तो २ रुपया भी कमाएगा.
उस दिन के बाद से हमने कभी ससुरजी के घर पर पैर नहीं रखा और सोच लिया चाहे जो हो जाये. अपने बच्चों की पढ़ाई कभी नहीं छोड़वाउंगी. तब से और भी रात-रात भर जाग कर सिलाई-बुनाई करने लगी ताकि कभी मेरे बच्चे ना भूख से सोये और ना कभी उन्हें स्कूल की फी की वजह से मार खानी पड़े.
१९५५ के छात्र आन्दोलन में भट्ट जी सात साल की सजा में हजारीबाग जेल में थे. छह माह उन्हें बेड़ी हथकड़ी में रखा गया. जेपी आन्दोलन में पूरे दो साल ‘गया सेन्ट्रल जेल’ में बेड़ी-हथकड़ी के साथ सेल (मीसा) में रखा गया. कभी कभी उनसे जेल मिलने जाती तो, देखकर दिल दहल जाता था. मैं मुंह से कुछ नहीं कहती, उनकी हालत देखकर रोने लगती. तो हँसते हुए कहते- ‘अरे पगली, रोती काहे हो? मरे थोड़े हैं. देखो भगत सिंह को. वो कैसे देश के लिए शहीद हो गया. हम ऐसे थोड़े मरेंगे, देखना कईयों को मार के मरेंगे. और देश पर मरने वाले कई भगत सिंह पैदा करके मरेंगे.’
‘नगरपालिका कर्मचारी आन्दोलन’ में डेढ़ साल और ‘बिजली आफिस कर्मचारियों के आन्दोलन’ में करीब एक साल जेल में रहे. जेल से छूटने पर कभी कभी घर पर होते भी तो ना के बराबर. अक्सर उनके घर पर होने पर लोगों की भीड़ जमा रहती. सब अपने अपने काम की पैरवी लेकर घर पर भीड़ लगाये रहते. कभी बीडी-मजदूर, कभी रिक्शा मजदूर संघ के लोग तो कभी ईंट भठ्ठा मजदूर घर पर आ आकर दिन भर इनको घेरे रहते. और सबसे हंसकर बड़े प्यार से बात करते. लेकिन हमसे बात करने या बच्चों से बात करने की कभी फुर्सत नहीं. एक बार भी नहीं पूछा कि घर कैसे चलता है. बच्चे कैसे पढ़ते हैं.
बहुत बार रोकर, प्यार से समझाने की कोशिश की. अपने घर और बच्चों पर भी ध्यान दीजिये. इन्हें बाप की कमी महसूस होती है. यह भी आपकी जिम्मेवारी हैं. मेरा ना सही बच्चे की कुछ तो परवाह कीजिये. लेकिन उनको कभी कोई फर्क नहीं पड़ा. हँसते हुए कह्ते. ‘हाँ ठीक है., मेरा तो पूरा हिंदुस्तान ही बच्चा हैं. जिस दिन दुनिया के तमाम बच्चे पढ़ लिख जायेंगे. भर पेट खायेंगे. उस दिन मेरे बच्चे का भी भविष्य सुधर जायेगा. इनको कायर मत बनायो. सिखने दो, दुनिया की तीन तिहाई आवादी कैसे जीती है. आलिशान महलों की तरफ मत देखों. जो लोग झोपड़े में रहते है उनको देखो. उनके झोपड़े में ना चूल्हा जलाने के लिए किरासन तेल हैं ना लालटेन जलाने के लिए.’
उनके बहस और तर्क के आगे मेरा एक नहीं चलता था. कभी ना उन्होंने मेरी बात सुनी और ना समझी. हमेशा रोकर, चीख-चिल्लाकर रह जाती. और यह घर से बाहर निकल जाते. और पता चलता कि कभी मुसहर टोली में, तो कभी पासी के घर पर ताड़ी पीकर पड़े हैं. जो बच्चा घर में है, उसे भर पेट अन्न नहीं मिल रहा उपर से बाहर से किसी भी दूसरों का बच्चा ले आने को उतारू रहते. एक बार एक १० साल का बच्चा कहीं झरिया या बेतिया से अपने साथ ले आये और कहने लगे कि आज से यहीं रहेगा. मैंने पूछा तो कहा कि इसके माँ-बाप को नक्सलियों ने गोली मार दिया. अकेला बचा है. आज से यहीं रहेगा. क्रांति और विप्लव (प्रकाश का नाम उन्होंने विप्लव रखा था) के साथ पढ़ेगा. पानी-वाणी भर देगा. बाज़ार से तरकारी ला देगा. मैंने भी उसे घर में रख लिया, अब ले ही आये थे तो क्या करते. हमारे बच्चों के साथ रहने लगा लेकिन कुछ समय बाद खुद ही कहने लगा हमको चाय की दुकान पर काम मिल गया है और ५ रुपया भी मिल रहा है.
पीछे की नदी में कई बार बच्चा फेंका हुआ इनको पता चलता तो ये सबसे पहले बच्चे को बचाने पंहुच जाते. लेकिन अक्सर बच्चा मारा हुआ पाया जाता. एक बार जाडे की रात में एक छोटी सी बच्ची घर के ठीक पीछे ही नदी थी. सरकंडे की झाड में पड़ी थी. मुंह अंधेर हल्ला होने लगा कि कोई बच्चा है… कोई बच्चा फेंक गया है. यह तुरंत भागे. माचिस और नेवार लेकर. बच्ची को आग जलाकर सेंका शायद साँस चल रही थी. बच्ची को गोद में लेकर भागे हास्पिटल. वहां डाक्टर ने बताया कि रात भर की ठंढ से सिकुड़ कर बच्ची ने दम तोड़ दिया. उसके बाद उन्होंने ही अपने हाथों से बच्ची को कफन लाकर दफनाया. कई दिनों तक दुखी रहे कि बच्ची को बचा नहीं सके. अक्सर मुझसे कहते कि एकदम क्रांति जैसी थी ना . यहाँ तक कि क्रांति को भी कह दिया कि उसे उन्होंने उस्सी नदी के नाले में पड़े हुए पाया है कई दिनों तक क्रांति रोती रही. फिर मैंने ही डान्टा- ‘क्यों बच्चे को उटपाटांग बाते दिमाग में घुसाते हैं’ तो ऊपर से कहने लगे देखना एक दिन इसके ढेर सारे भाई-बहन ला देंगे. जितने भी आनाथ और बेघर बच्चे हैं सबको ले आयेंगे और एक आश्रम खोलेंगे- ‘अभय आश्रम’.
1978 की बात है, एक बड़ी बस भरकर विदेश से लोग आये थे, जिसमें मर्द-औरतों दोनों थे. सब मुझसे हाथ मिलाने के लिए बढ़ाते और मैं हाथ जोडकर सबको नमस्कार करती. औरतें गले मिलती. मुझे बड़ी शर्म आ रही थी. सिनेमा के प्रांगण में ही शाम से लेकर सुबह तक मीटिंग चली. भट्ट जी ने एक घंटे से ऊपर अंग्रेजी में ज़ोरदार भाषण दिया. उन्हें देखकर कभी ख़ुशी होती थी कभी अपनी हालत पर तकलीफ. शहर के बहुत बड़े-बड़े लोग जमा हुए थे. सबका खाना-पीना सब सिनेमा के मैदान में ही चला. सबलोग बहुत खुश लग थे. काफी लोग बंगाल और केरल से भी आये थे. सब मुझसे आकर आकर मिलते और मुझे इज्जत दे रहे थे. मुझसे कहते कि हमे सुरेश भट्ट जैसे अपने नेता पर गर्व है. आपको भी होना चाहिए. मैं हाँ-हाँ में सर हिला देती. क्या कहें, कोई मेरी बात समझने वाला नहीं था.
कई बार हमारे घर नागार्जुन, फनीश्वरनाथ रेणु, राजकमल चौधरी, लाल धुँआ, कैलाशपति मिश्र, जार्ज फर्नांडिस, जाबिर हुसैन भी आते थे. कई और भी लोग जो उस समय के बड़े-बड़े मंत्री और सांसद थे. नागार्जुन और फनीश्वरनाथ रेणु को हम नहीं जानते थे कि वो देश के इतने बड़े लेखक हैं. वो बहुत बाद में मेरी बड़ी बेटी ने बताया कि वो दोनों पूरे देश में जाने जाने वाले बड़े लेखक हैं. हमसे वे दोनों बहन की तरह मिलते थे. उन्हें मेरे साथ चौका में बैठकर मेरे काम में हाथ बटाना अच्छा लगता था. मैं रोटी बनाती तो वे लोई बनाने लगते. दोनों को मछली बड़ी पसंद थी. मेरे हाथ की बनी मछली बड़े मज़े से खाते. बिलकुल ग्रामीण औरतों की तरह पारवारिक बातें करते. गीत गाते. रेणु जी के बाल बड़े सुंदर और चमकीले थे. वे अपने बालों का पूरा ध्यान भी रखते. और भी कई बड़े-बड़े साहित्कारों का ताँता लगा ही रहता. घर में कुर्सी के आभाव में मैं ज़मींन पर ही चादर बिछा देती. मुझे शर्मिंदगी भी होती कि इतने बड़े बड़े लोग हैं और ज़मीन पर बैठेंगे?. पर वे लोग घंटों वैसे ही बैठे कहानी-कविता का पाठ करते. जोर जोर से बातें करते. हंसी-ठहाका लगाते. घर में जो बना होता वही मांग कर खा लेते. कई बार सूखी रोटी प्याज़ बड़े प्यार से खा लेते. मैं सोचती भी ऐसे कैसे खायेंगे, जल्दी कुछ बना दें पर भट्ट जी मुझे मना कर देते. –‘अरे ज्यादा कुछ मत करो. जीने के लिए खाते हैं. खाने के लिए नहीं. जो है, वही लाओ दो’. और वहीं पुराने अख़बार पर रोटी.प्याज़-नमक-मिर्च धरकर सब मिल बाँट कर खा लेते और फिर धंटों वैसे ही बहस चालू रहते.
एक बार भट्ट जी बहुत सालों बाद जेल से छूटकर घर आये थे, इसलिए उनसे मिलने उनके खास दोस्त अनंत कुमार राय आये. रात काफी हो गई थी और भट्ट जी तब तक घर नहीं पहुंचे थे. वैसे भी नवादा में रहकर भी भट्ट जी के पैर घर में नहीं टिकते थे. मैं बोलती भूकती, कि सालों बाद घर लौटते हैं तो ज़रा घर पर भी पैर टिकाईये. उनका बस एक ही जवाब होता- ‘इतना दिन बाद बाहर आये हैं तो ज़रा बाहर का भी माहौल समझने दो.’ अनंत राय भाय जी हमारी शादी में बाराती बनकर भी गये थे. हमारे घर और हमारे बाबूजी का ठाट-बाट देख चुके थे. वे जानते थे कि हम कितने बड़े ज़मींदार परिवार से आते हैं. हमारी बेटी को जमीन पर सोते देखकर बहुत भड़के. गुस्से से तमतमा कर वहीं ज़मीन पर बैठे रहे कि जब तक भट्ट जी नहीं आयेंगे, तब तक वो नहीं जायेंगे. भट्ट जी काफी देर से लौटे. आनंत भाय जी ने उन्हे बहुत डान्टा. बहुत बुरा-भला कहा लेकिन भट्ट जी बस हँसते रहे. उन्हें किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था. असल में वो इससे इतमिनान रहते थे कि मेरे नेहरा से सबकुछ आ ही जाता है. जब तक बाबुजी और दादी जिंदा रही. खेती का सारा सामान रहे भेजते रहे. दादी मुझे और बच्चों को बहुत मानती थी लेकिन ना अब दादी है ना बाबूजी. तीन भाई हैं. सब का अपना परिवार हैं. सब नाती-पोते वाले हो गए और सब वहीँ झारखंड में दुमका-गोड्डा में बसे हैं. भट्ट जी स्वतंत्रता संग्राम आंदोंलन में भी अपने कम उम्र में ही दो साल जेल में रहे लेकिन कभी अपने जीते जी ना स्वतंत्रता सेनानी का पेंशन लिया और ना ही जेपी आन्दोलन वाला पेंशन.लालू यादव, नितीश कुमार, जार्ज फर्नांडिस, सी.पी. ठाकुर, शिबू सोरेन, यह सब भट्ट जी को अपना रानजीतिक गुरु मानते थे और गुरु जी कहके बुलाते थे. उसके बावजूद नितीश कुमार कहते हैं कि –‘किसको-किसको पेंशन दें, भेड़िया से ज्यादा गरेडिया हो गया है.’ शायद नीतीश जी को पता नहीं कि भट्ट जी अगर घर छोडकर समाज सेवा में नहीं रमते तो कम से कम वो खुद २५ करोड़ सम्पत्ति के मालिक होते. जिस आदमी ने अपना सारा जीवन सामाजिक काम में होम कर दिया वैसे आदमी की विधवा को कोइ भी पेंशन ना देकर नितीश जी खुद अपने मुंहपर कालिख लगवा रहे हैं. समाज के नाम पर जिस सुरेश भट्ट ने अनेकों बार खून बहाया, गोली खायी, लाठी खायी. आज कोई समाज और प्रशासन नहीं देखने वाला कि आज मेरे साथ [1]मेरे घर में और हमारे बच्चों के साथ क्या हो रहा है. यह समाजसेवा किस काम आया. मेरा सौतेला देवर साल में १०-२० लाख रूपये सिर्फ गुंडों और पुलिस को खिलाता है. सारी सम्पत्ति हडप कर बैठा है. उसने मेरे देवर (भट्ट जी के छोटे भाई नरेश भट्ट) के दो बेटों की हत्या करवा दी. यह बात पुलिस भी जानती है और पत्रकार भी. लेकिन सब के सब रूपये की ताकत के आगे चुप हैं. एक बार मेरे बेटे प्रकाश पर जब वह सिर्फ ७ साल का था बम फेंकवा दिया. बुरी तरह जख्मी हुआ मेरे पिताजी आये और उसका इलाज करवाया. किसी तरह बच गया. फिर पिताजी उसको साथ ही ले गये. वो जानते थे कि यहाँ रहा तो फिर इस पर हमला होगा. वो १६ साल नानीघर में ही रहा और अपनी पढ़ाई पूरी करके जब वापस आया तो फिर कई बार उस पर अलग अलग तरीके से हमला करवाया गया. वो अपने रास्ते में आने वाले सबको खत्म कर देना चाहता है. भट्ट जी ने अपनी पत्नी और बच्चों को इस कगार पर लाकर खड़ा कर दिया कि आज मेरा दुःख समझने वाला कोई नहीं है.

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