क्रांति स्वर सत्य को स्वीकार न करना ही स हमति-असहमति के विवाद का हेतु है—विजय राजबली माथुर


सत्य क्या है ?:

धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।
भगवान =भ (भूमि-ज़मीन )+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I(अनल-अग्नि)+न (जल-पानी) ।
चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इसलिए ये ही खुदा हैं।
इनका कार्य G(जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय) है अतः यही GOD हैं।

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मूल समस्या सत्य को नकार कर असत्य में उलझे रहने के कारण उत्पन्न हुई है। वास्तविक ‘धर्म,खुदा या भगवान या गाड’ अलग-अलग नहीं हैं परंतु अपनी-अपनी दुकान चलाने के लिए विभिन्न व्यापारियों ने अपने-अपने शो रूम जो खोले हुये हैं उनको ढ़ोंगी-पाखंडी-आडंबरधारी शोषक और लुटेरे ‘धर्म’ कह कर जनता को उल्टे उस्तरे से मूंढते हैं। परंतु दुर्भाग्य तो यह है कि तथाकथित प्रगतिशील-वामपंथी भी उन खुराफ़ातों को ही धर्म की संज्ञा देते हैं साथ ही वास्तविक धर्म का विरोध करते हैं इसलिए जनता कुचक्र में फँसने को विवश है।

सुरेश चंद्र मिश्र जी ने अथर्व-वेद पर आधारित चिकित्सा-विज्ञान के निष्कर्षों को सार्वजनिक किया था जिनको 13 अप्रैल 2008 को ‘हिंदुस्तान’,आगरा ने प्रकाशित किया था उसकी स्कैन प्रस्तुत है इसे डबल क्लिक करके पढ़ा जा सकता है। स्पष्ट है कि ऋतु-परिवर्तन के संकर्मण काल ( नौ रात्रिकाल ) में इन नौ औषधियों के सेवन-प्रयोग से मानव-मात्र नीरोग रह सकता है।

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अब इस सत्य को कोई स्वीकार नहीं कर रहा है। ढ़ोंगी-पाखंडी-आडंबरधारी शोषक और लुटेरे लोगों ने दोनों ऋतु-परिवर्तन काल का मखौल बना कर रख दिया है जिसे लोग बाग ‘अंधविश्वासी’ होकर सिरोधार्य किए हुये हैं। रात्रि जागरण के नाम पर ध्वनि-प्रदूषण फैलाना,जनता को गुमराह करके अपनी जेबें भरना तथा जनता का सतत शोषण करना निर्बाध रूप से जारी है। थोथी उदारता के नाम पर एक गलत बात के प्रतिरोध के नाम पर दूसरी गलत बात का समर्थन करके प्रगतिशील विद्वान गरिमामय वामपंथी राजनीति का फ्लेवर देकर प्रकारांतर से ‘अंधविश्वास’ का ही समर्थन कर रहे हैं। वामपंथ की एकता तो अलग बात है अपनी ही पार्टी में अपने ही कार्यकर्ताओं का शोषण करके उनको दिग्भ्रमित करके जो लोग कुरसियाँ पक्की करते हैं दूसरों को थोथे आश्वासन देकर सस्ती लोकप्रियता तो हासिल कर सकते हैं परंतु न तो अपनी पार्टी का भला कर सकते हैं न ही जनता का।
यदि चिकित्सा विज्ञान के निष्कर्षों को स्वीकार कर लिया जाता है तो न तो ‘दुर्गा’ द्वारा ‘महिषासुर-वध ‘ की झूठी कहानी गढ़नी होगी और न ही उसके विरोध में साम्राज्यवाद प्रेरित ‘महिषासुर’ महिमामंडन की। बेवजह के तनाव व संघर्ष की नौबत आने का तो प्रश्न ही नहीं है। किन्तु ‘एथीस्टवाद ‘ के नाम पर वास्तविक धर्म को नकार कर ढोंग-पाखंड-आडंबर-अंधविश्वास बढ़ाना जब लक्ष्य हो तो ‘उदारता’ का स्वांग ही किया जा सकता है। जनता को जागरूक नहीं क्योंकि परोपजीवी प्रजाति का रोजगार जो समाप्त हो जाएगा और उनको भी ‘श्रम ‘ करना पड़ जाएगा।

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