क्रांति स्वर 89 वर्ष बाद भारतीय कम्युनिस ्ट पार्टी — विजय राजबली माथुर


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स्थापना दिवस 26 दिसंबर पर विशेष :
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी :
इस दल की स्थापना तो 1924 ई में विदेश में हुई थी। किन्तु 25 दिसंबर 1925 ई को कानपुर में एक सम्मेलन बुलाया गया था जिसके स्वागताध्यक्ष गणेश शंकर विद्यार्थी जी थे। 26 दिसंबर 1925 ई को एक प्रस्ताव पास करके ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’ की स्थापना की विधिवत घोषणा की गई थी। 1931 ई में इसके संविधान का प्रारूप तैयार किया गया था किन्तु उसे 1943 ई में पार्टी कांग्रेस के खुले अधिवेन्शन में स्वीकार किया जा सका क्योंकि तब तक ब्रिटिश सरकार ने इसे ‘अवैध’घोषित कर रखा था और इसके कार्यकर्ता ‘कांग्रेस’ में रह कर अपनी गतिविधियेँ चलाते थे।

वस्तुतः क्रांतिकारी कांग्रेसी ही इस दल के संस्थापक थे। 1857 ई की क्रांति के विफल होने व निर्ममता पूर्वक कुचल दिये जाने के बाद स्वाधीनता संघर्ष चलाने हेतु स्वामी दयानन्द सरस्वती (जो उस क्रांति में सक्रिय भाग ले चुके थे)ने 07 अप्रैल 1875 ई (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा-नव संवत्सर)को ‘आर्यसमाज’ की स्थापना की थी। इसकी शाखाएँ शुरू-शुरू में ब्रिटिश छावनी वाले शहरों में ही खोली गईं थीं। ब्रिटिश सरकार उनको क्रांतिकारी सन्यासी (REVOLUTIONARY SAINT) मानती थी। उनके आंदोलन को विफल करने हेतु वाईस राय लार्ड डफरिन के आशीर्वाद से एक रिटायर्ड ICS एलेन आकटावियन (A.O.)हयूम ने 1885 ई में वोमेश चंद (W.C.) बैनर्जी की अध्यक्षता में ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ की स्थापना करवाई जिसका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रक्षा करना था। दादा भाई नैरोजी तब कहा करते थे -”हम नस-नस में राज-भक्त हैं”।

स्वामी दयानन्द के निर्देश पर आर्यसमाजी कांग्रेस में शामिल हो गए और उसे स्वाधीनता संघर्ष की ओर मोड दिया। ‘कांग्रेस का इतिहास’ में डॉ पट्टाभि सीता रमइय्या ने लिखा है कि गांधी जी के सत्याग्रह में जेल जाने वाले कांग्रेसियों में 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे। अतः ब्रिटिश सरकार ने 1906 में ‘मुस्लिम लीग’फिर 1916 में ‘हिंदूमहासभा’ का गठन भारत में सांप्रदायिक विभाजन कराने हेतु करवाया। किन्तु आर्यसमाजियों व गांधी जी के प्रभाव से सफलता नहीं मिल सकी। तदुपरान्त कांग्रेसी डॉ हेद्गेवार तथा क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर को ब्रिटिश सरकार ने अपनी ओर मिला कर RSS की स्थापना करवाई जो मुस्लिम लीग के समानान्तर सांप्रदायिक वैमनस्य भड़काने में सफल रहा।

इन परिस्थितियों में कांग्रेसमें रह कर क्रांतिकारी आंदोलन चलाने वालों को एक क्रांतिकारी पार्टी कीस्थापना की आवश्यकता महसूस हुई जिसका प्रतिफल ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’केरूप में सामने आया। ब्रिटिश दासता के काल में इस दल के कुछ कार्यकर्ता पार्टी के निर्देश पर कांग्रेस में रह कर स्वाधीनता संघर्ष में सक्रिय भाग लेते थे तो कुछ क्रांतिकारी गतिविधियों में भी संलग्न रहे। उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्यवाद से देश को मुक्त कराना था। किन्तु 1951-52 के आम निर्वाचनों से पूर्व इस दल ने संसदीय लोकतन्त्र की व्यवस्थाको अपना लिया था। इन चुनावों में 04.4 प्रतिशत मत पा कर इसने लोकसभा में 23 स्थान प्राप्त किए और मुख्य विपक्षी दल बना। दूसरे आम चुनावों में 1957 में केरल में बहुमत प्राप्त करके इसने सरकार बनाई और विश्व की पहलीनिर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार बनाने का गौरव प्राप्त किया। 1957 व 1962 मेंलोकसभा में साम्यवादी दल के 27 सदस्य थे।

1925 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना से ब्रिटिश सरकार हिल गई थी अतः उसकी चालों के परिणाम स्वरूप ‘कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ की स्थापना डॉ राम मनोहर लोहिया,आचार्य नरेंद्र देव आदि द्वारा की गई। इस दल का उद्देश्य भाकपा की गतिविधियों को बाधित करना तथा जनता को इससे दूर करना था। इस दल ने धर्म का विरोधी,तानाशाही आदि का समर्थक कह कर जनता को दिग्भ्रमित किया। जयप्रकाश नारायण ने तो एक खुले पत्र द्वारा ‘हंगरी’ के प्रश्न पर साम्यवादी नेताओं से जवाब भी मांगा था जिसके उत्तर में तत्कालीन महामंत्री कामरेड अजय घोष ने कहा था कि वे स्वतन्त्रता को अधिक पसंद करते हैं किन्तु उन्होने विश्व समाजवाद के हित में सोवियत संघ की कार्यवाही को उचित बताया। – See more at: http://krantiswar.blogspot.in/2013/12/bharat-ke-rajnitik-dal-3.html#sthash.FNXwI8i2.dpuf
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आज की व्यवहारिक स्थिति :
सांप्रदायिकता विरोध के नाम पर एक लंबे अरसे से (1989 से ही ) भाकपा ने उसी गुट का समर्थन करना जारी रखा हुआ है जो कि उसी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का अवशिष्ट है। 20 वर्ष पूर्व सपा में भाकपा,उत्तर प्रदेश का एक गुट विलय कर गया था फिर उसके बाद लखनऊ ज़िले में एक गुट ने राष्ट्रवादी कम्युनिस्ट पार्टी का गठन कर लिया था जो 2014 के लोकसभा चुनावों से पूर्व भाजपा में विलय हो गई। जिन साहब की नीतियों और कार्य व्यवहार की वजह से प्रदेश में भाकपा का दो-दो बार विभाजन हुआ है वह खुद को KING MAKER मानते हैं और उनके परम शिष्य तो यहाँ तक दावा करते हैं कि वह अकेले ही पूरी प्रदेश पार्टी चला रहे हैं। सर्वे सर्वा मानने वाले साहब लखनऊ के ज़िला इंचार्ज और किंग मेकर साहब सम्मेलन के पर्यवेक्षक बन कर सिर्फ अपने निजी हित में सहायक लोगों को आगे रखते हैं व केवल पार्टी हित मानने वाले लोगों को पीछे धकेल देते हैं।
लखनऊ का 22वा ज़िला सम्मेलन :23 नवंबर 2014

("– पार्टी संविधान की धारा 22 की उप धारा 9 (घ ) के अंतर्गत राज्य सम्मेलन के लिए प्रतिनिधियों का चुनाव करना था जो वास्तव में नहीं हुआ।
-उप धारा 9 (ड़.) ज़िला हिसाब जांच आयोग की रिपोर्ट पर विचार करना और उसके संबंध में फैसले करना चाहिए था जो नहीं हुआ। कोई आय-व्यय विवरण प्रस्तुत ही नहीं किया गया था। 27 नवंबर 2011 के 21 वे सम्मेलन के समय रिपोर्ट न पेश करने के साथ आश्वासन दिया गया था कि बाद में ज़िला काउंसिल में पेश की जाएगी जो कि विगत तीन वर्षों में कभी भी नहीं प्रस्तुत की गई। इस बार न तो ऐसा कुछ भी बताया गया था न ही न बताने का कारण दिया गया था।
-ज़िला काउंसिल के निर्वाचन हेतु संविधान की धारा 16 की उप धारा (च) में वर्णित " गुप्त मतदान द्वारा तथा एक-एक वित्तरणशील वोट के तरीके से मत लिया जाएगा " की प्रक्रिया का अनुपालन न करके ज़िला काउंसिल के लिए प्रस्तवित 21 की संख्या को बढ़ा कर 23 कर के दो बढ़ाए हुये नामों को शामिल किया गया। एक स्थान रिक्त भी रखा गया।
-पार्टी संविधान की धारा 24 की उप धारा 3 (च ) का पिछली ज़िला काउंसिल में कभी भी पालन नहीं किया गया था-"ज़िले के आय-व्यय पर नियंत्रण रखना ")
इन साहब की मेहरबानी से लखनऊ में तीन वर्षों के दौरान 168 सदस्य पार्टी से अलग हो चुके हैं और अब भाजपा समर्थकों को भाकपा में भर कर यह जनाब भाकपा को ध्वस्त करने की प्रक्रिया को तेज़ करने लगे हैं। इनको व इनके गुरु को यदि उत्तर प्रदेश में ऐसी ही मनमानी छूट मिली रही तो ये लोग अपने मंसूबों में कामयाब भी हो सकते हैं।
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http://krantiswar.blogspot.in/2014/11/blog-post_26.html

पर्यवेक्षक महोदय द्वारा किसानसभा नेताओं के रोटियाँ तोड़ने के अनर्गल बयान का भी यह असर हो सकता है :

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https://www.facebook.com/ram.prataptripathi.90/posts/1524894287774594?pnref=story

लगभग 10 वर्ष पूर्व कमला नगर,आगरा आर्यसमाज के पूर्व प्रधान एस पी कुमार साहब की इसी प्रकार निरर्थक आलोचना एक और पूर्व प्रधान वाधवा साहब द्वारा करने पर कुमार साहब को हार्ट अटेक पड़ने पर बेनी सिंह इंटर कालेज के अध्यापक तीर्थराम शास्त्री जी द्वारा कहा गया था कि कुमार साहब को यह अटेक राजनीतिक प्रहार है।ठीक होने के थोड़े समय बाद कुमार साहब अपना मकान व दुकान बेच कर आगरा से बंगलौर शिफ्ट हो गए थे तथा उनके जाने के बाद आर्यसमाज, कमलानगर में RSS के लोग प्रभावी हो गए थे। प्रत्येक संगठन में RSS समर्थक RSS विरोधियों पर इसी प्रकार अनर्गल बयानबाजी करते हैं। उस आधार पर ज़िला – सम्मेलन पर्यवेक्षक के राजनीतिक बयान को भी कर्मठ किसान नेताओं पर सम्मेलन में किए गए राजनीतिक प्रहार के रूप में इस रोग से संबन्धित माना जा सकता है। किन्तु ऐसी बातें संगठन को कमजोर करने वाली होती हैं मजबूत करने वाली नहीं।साम्राज्यवादियों ने मनमोहन सिंह की उपयोगिता समाप्त होने पर एक साथ नरेंद्र मोदी व अरविंद केजरीवाल को उनके विकल्प के रूप में पेश किया था किन्तु तमाम साम्यवादी व वामपंथी केजरीवाल के गुणगान करने लगे। यहाँ तक हद हो गई कि, पार्टी स्थापना दिवस की गोष्ठी में 2010 में प्रदेश पार्टी कार्यालय में ही राष्ट्रीय सचिव के मुख्य वक्ता के रूप में बोल चुकने के बाद केजरीवाल को बुलवाया गया। 2013 में भी ऐसी ही गोष्ठी में जिम्मेदार पदाधिकारी द्वारा केजरीवाल के दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने का स्वागत किया गया।

कभी विश्व की प्रथम निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार की स्थापना केरल में करवा चुकी भाकपा गलत लोगों का साथ देने व पार्टी में गलत लोगों को प्रश्रय देने से निरंतर संकुचित होती जा रही है। नवीनतम चुनाव परिणाम :
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जो कभी कामरेड बी टी रणदिवे व कामरेड ए के गोपालन द्वारा कहा गया था कि हम संविधान में घुस कर संविधान को तोड़ देंगे अब उस पर RSS नियंत्रित सांप्रदायिक/साम्राज्यवाद समर्थक सरकार अमल करने जा रही है। एक-एक करके राज्यों में येन-केन-प्रकारेंण अपनी सरकारे स्थापित करके जब वह संविधान संशोधन करने में सक्षम हो जाएगी तो वर्तमान संविधान की जगह अपना अर्द्ध-सैनिक तानाशाही वाला संविधान थोप देगी। क्योंकि भाकपा ‘संसदीय लोकतन्त्र’ को अपनाने के बावजूद न तो चुनावों में सही ढंग से भाग ले रही है और न ही सही साथी का चुनाव कर रही है अतः जनता कम्युनिस्टों के नाम पर नक्सलवादियों को ही जानती है जिनको न तो व्यापक जन-समर्थन मिल सकता है न ही वे सरकार सशस्त्र विद्रोह के जरिये गठित कर सकते हैं। देश की हृदय-स्थली उत्तर प्रदेश में भाकपा को अकेले दम पर चलाने का ऐलान करने वाला मोदी की छाया और RSS/USA समर्थित केजरीवाल का अंध – भक्त है।

आज पार्टी स्थापना के 89 वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद जबकि केंद्र में सत्तारूढ़ सांप्रदायिक सरकार राज्यों में भी मजबूत होती जा रही है और समाजवाद के नाम पर भाकपा को पीछे धकेलने वाले दल एकजुट हो रहे हैं भाकपा के भीतर भाजपा के हितैषी मोदी-मुलायम भक्त उन दोनों महानुभावों से छुटकारा पाने की नितांत आवश्यकता है तभी पार्टी का विस्तार व लोकप्रियता प्राप्ति हो सकेगी।

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