क्रांति स्वर ‘युगावतार’ : भारतेंदु हरिश् चंद्र के व्यक्तित्व-कृतित्व की महानता का प्र तीक नाटक — डॉ सुधाकर अदीब


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Sudhakar Adeeb

18 agust 2015 ·

20वीं शताब्दी के एक महान साहित्यकार अमृतलाल नागर जी (सन् 1916-1990) ने 19वीं शाताब्दी के अपने पूर्वज महान साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र जी (सन् 1850-1885) के जीवन चरित्र पर एक नाटक लिखा। नागर जी की जन्मशताब्दी समारोह में वह आज सफलतापूर्वक मंचित हुआ। यह हमारा परम सौभाग्य है। इस अवसर पर नागर जी की सुपुत्री डॉ अचला नागर, उनके नाती संदीपन जी, पौत्री दीक्षा नागर आदि अनेक परिजन भी उपस्थित हुए। यह और भी प्रसन्नता का विषय है। नाट्य निर्देशक ललित सिंह पोखरिया जी ने अपने निर्देशकीय में बताया कि ~ ”नागर जी ने ‘युगावतार’ नाटक में भारतेंदु हरिश्चंद्र के व्यक्तित्व-कृतित्व की महानता का दर्शन कराया है जो कि एक महासागर के समान है। जिसके किनारों पर चारों और से पारिवारिक-सामाजिक कष्ट, क्लेश और विषमताओं के महानदों को हरिश्चंद्र अपने हृदय सागर में समाहित करते रहते हैं। उन्हें वे राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रगौरव, निजभाषा गौरव रूपी रत्न भण्डारों में बदलते रहते हैं, देश और देशवासियों के कल्याण रूपी मोतियों में बदलते रहते हैं। नागर जी ने यह नाटक सन् 1955 के आसपास लिखा था। एक विशेष आयोजन के अंतर्गत मंचन हेतु उन्हें इस नाटक के स्वरुप को छोटा करना पड़ा था। फिर भी उन्होंने इस आलेख में गागर में सागर भरने का महती कार्य किया है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मैंने नाटक के स्वरुप को कोरस के प्रयोग से थोड़ा बड़ा करने का दुस्साहस किया है। ”
मित्रो ! निर्देशक पोखरिया जी का यह प्रयोग वास्तव में बहुत प्रभावोत्पादक लगा मुझे।

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वरिष्ठ पत्रकार और रंगकर्मी ऊर्मिल कुमार थपलियाल जी ने यह भी बताया कि 1953 में नागर जी ने IPTA के लिए ‘ईदगाह’ नाटक का मंचन किया था और 1956 में एक रेडियो वार्ता के दौरान नागर जी ने कहा था कि हमारा रंग-मंच सोना है। वह फारसी रंग-मंच से बहुत प्रभावित थे। 03 अप्रैल 1968 को बनारस में रंग मण्डल के माध्यम से नागर जी ने नाटक मंचित कराया था फिर इसके बाद प्रतिवर्ष उनके पुत्र डॉ शरद नागर 03 अप्रैल को नाटक मंचित कराते रहे थे। नागर जी का कथन था कि ‘साहित्य’ ने रंग-मंच को ‘साहित्यिक विधा’ नहीं माना। नागरजी 1938 से 1960 तक उत्तर प्रदेश के रंग-मंच से सम्बद्ध रहे। थपलियाल जी द्वारा सरल सहज भाषा में प्रस्तुत जानकारी काफी शोधपरक थी ।
अमृतलाल नागर जी द्वारा लिखित नाटक ‘युगावतार’ भरतेंदू बाबू हरिश्चंद्र जी की जीवनी पर आधारित था जिसका मनमोहक व शिक्षाप्रद मंचन दर्शकों-श्रोताओं के लिए ज्ञानवर्द्धक रहा। इस नाटक के माध्यम से बताया गया कि भरतेंदू हरिश्चंद्र जी का जन्म 09 सितंबर 1850 को हुआ था। उनके जन्म के पाँच वर्षों बाद उनकी माता का तथा दस वर्षों के बाद उनके पिता का भी निधन हो गया था।
12 वर्ष की उम्र में उन्होने काशी नरेश की उपस्थिती में एक सवाल के जवाब में दोहे की रचना करके उनका मन मोह लिया था। हिन्दी भाषा और साहित्य के उत्थान के लिए उनका अमिट योगदान नाटक के माध्यम से काफी रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया था। नारी शिक्षा व स्त्री स्वातंत्र्य के भी वह प्रबल पक्षधर थे इसीलिए बंगाल की अङ्ग्रेज़ी शिक्षा में सफल छात्राओं के लिए उन्होने उपहार स्वरूप बनारसी साड़ियाँ भिजवाईं। जरूरत मन्द लोगों की सहायता करने का दृष्टांत भी प्रस्तुत किया गया जिसमें एक गरीब ब्राह्मण को कन्या की शादी हेतु पाँच सौ रुपयों की मांग किए जाने पर उन्होने मुनीम जी से सात सौ रुपए दिलवा दिये। अमीर सेठों के तानों से तंग आकर उन्होने गृह त्याग किया और बंगाल के अकाल पीड़ितों के सहायतार्थ दान की भीख भी मांगने में उन्होने शर्म न की और देश सेवा में लगे रहे। 34 वर्ष की अल्पायु में ही 1885 में उन्होने इस शरीर का परित्याग किया लेकिन फिर भी साहित्य व समाज के लिए उनका जो योगदान है वह युगों युगों तक याद किया जाएगा यही संदेश अमृतलाल नागर जी ने ‘युगावतार ‘ नाटक के माध्यम से दिया है। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने नागर जी की जन्म शती के बहाने भरतेंदू बाबू हरिश्चंद्र जी को भी जीवंत कर दिया।
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