विद्रोही स्व-स्वर में क्या व्यवसाई शिक ्षक को ‘गुरु’ का सम्मान दिया जाना चाहिए? — विजय राजबली माथुर


यों तो यह समस्त संसार ही एक पाठशाला है जहां सतत शिक्षाध्यन चलता रहता है। जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाये उसे गुरु कहते है। गु= अंधकार और रू=प्रकाश। आज ऐसे शिक्षक तो दूरबीन लेकर ढूँढने पर भी मिलना मुश्किल हैं। शिक्षा अब ज्ञान की नहीं व्यवसाय की प्रणाली है। जिस ज्ञान से धन नहीं कमाया जा सकता उसे अब शिक्षा की श्रेणी में शामिल नहीं किया जाता है। बल्कि व्यावसायिक शिक्षा पर बल दिया जाने लगा है।

पहले परिवार को ‘नागरिकता की प्रथम पाठशाला’ माना जाता था तब नागरिकों में ‘नैतिक बल’ भी होता था। अब तो दो-ढाई साल तक के बच्चों को शिक्षा की दुकानों में भेजा जाने लगा है। किताबों,कापियों से भरे बस्ते पीठ पर लादे बच्चों या उनके अभिभावकों को सहज ही देखा जा सकता है। हजारों रुपयों की फीस देकर पढे ऐसे बच्चे अहंकार में पगे व डूबे होते हैं। केवल धन कमाना ही उनका उद्देश्य होता है।आदर्श नागरिक का निर्माण न अब शिक्षक का कर्तव्य रह गया है और न ही परिवार का। क्या ऐसे व्यवसाई शिक्षकों को ‘गुरु’ का सम्मान दिया जाना चाहिए?

*पूर्व राष्ट्रपति डॉ राधा कृष्णन के जन्म दिवस को ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में एक परंपरा के रूप में तो मनाया जाता है लेकिन शिक्षकों के गुरुतर दायित्व पर ध्यान नहीं दिया जाता है। 1962 की 05 सितंबर से यह पर्व मनाया जाना शुरू हुआ है तब मैं ‘रूक्स हायर सेकंडरी स्कूल’ , बरेली कैंट (जो अब रवीन्द्र नाथ टैगोर इंटर कालेज हो गया है ) में 6ठी कक्षा का छात्र था। हमारे कक्षाध्यापक दीनानाथ जी कुछ छात्रों के साथ मुझे भी अपने साथ ले गए थे। उनको 10-10 पैसे वाले फ़्लेग्स बेचने की ज़िम्मेदारी मिली थी। स्कूल में छुट्टी कर दी गई थी और हम सब के अभिभावक इसलिए परेशान थे कि कहाँ गायब हो गए? लेकिन इसी वजह से दीनानाथ जी सब को उनके घर छोड़ कर आए थे कि अभिभावकों को निश्चिंतता हो जाये। लेकिन आज कल तो छोटे-छोटे बच्चों की भी परवाह नहीं की जाती है।

*हाईस्कूल बोर्ड परीक्षा को उच्च शिक्षा का प्रवेश द्वार बताने वाले डॉ कैलाशनाथ ओझा जी ‘कृष्ण माया मेमोरियल हाईस्कूल’, आश्रम पाड़ा, सिलीगुड़ी के हेड मास्टर थे। वह दिवतीय विश्वयुद्ध में सेना में वारंट आफ़ीसर के रूप में आगरा की वर्कशाप में पोस्टेड रहे थे और मूलतः आरा के थे। उन्होने सिलगुडी हाईस्कूल के हेड मास्टर और प्रबन्धकों से बगावत करके नेपाली भाषा के इस प्राईमरी स्कूल को हाईस्कूल में परिवर्तित करके अपने पूर्व विद्यालय से श्रेष्ठ शिक्षाध्यन उपलब्ध करवाया था। 9वीं-10वीं कक्षा में वह एक वैकल्पिक शिक्षक के रूप में पढ़ाने आते थे और विषय के मूल शिक्षक से बेहतर पढ़ाते थे। एक बार महाकवि निराला की कविता ‘वर दे वीणा वादिनी वर दे’ को उन्होने पाँच दिन सिर्फ इसलिए पढ़ाया कि छात्र कवि की मूल भावना के अनुरूप उच्चारण कर सकें। 70 छात्रों के बीच पाँच छात्र उनको उपयुक्त लगे थे जिनमें से सिर्फ तीन को ही उन्होने सफल घोषित किया जिनमें एक मैं भी था। उन्होने साईन्स अध्यापक की अनुपस्थिति में मुझे ‘विज्ञान विषय’ से पढ़ने की अनुमति नहीं दी थी जिस कारण मुझको ‘कामर्स’ पढ्ना पढ़ा जिसे इंटर में छोड़ कर मैंने ‘आर्ट्स’ विषय ले लिए। किन्तु 1965-67 की वह कामर्स की पढ़ाई ही मेरे काम आई जब 1972 में ‘एकाउंट्स ‘ विभाग में जाब मिला।

*इंटर फर्स्ट ईयर 1967-68 में शाहजहाँपुर के ‘गांधी फैज-ए-आम ‘ कालेज से किया था। सिविक्स के अध्यापक प्रो आर के इस्लाम साहब (जिंनका सिलेक्शन AMU के लिए हो चुका था ) अक्सर कोर्स से हट कर कुछ किस्से सुनाया करते थे। सबसे महत्वपूर्ण घटना सैयद्द महमूद ( सुपुत्र सर सैयद्द अहमद खाँ ) जो नामी वकील थे की उन्होने सुनाई थी। पंजाब के एक राजघराने के एक युवराज को सुप्रीम कोर्ट तक से फांसी की सजा बहाल रही थी। राजा साहब अपने बेटे की ज़िंदगी बचाने की गुहार लेकर जब महमूद साहब के पास पहुंचे तब उनका पीने का समय था और वह किसी से नहीं मिलते थे किन्तु सरदार जी ज़बरदस्ती उनके कक्ष में पहुंचे और सिर से अपनी पगड़ी उतार कर उनके चरणों में रख दी। महमूद साहब ने अपील नहीं की और फांसी की तारीख पर राजा साहब से पहुँचने को कहा। जैसे ही ‘हैंग’ आर्डर हुआ और जल्लाद ने रस्सी खींची वकील महमूद साहब ने उसे काट दिया युवराज जीवित गड्ढे में गिर गया। दुबारा फांसी पर चढ़ाना आसान नहीं था क्योंकि महमूद साहब का तर्क था कि ‘हैंग’ किया जा चुका है इसलिए सजा पूरी हो गई वह जीवित बच गया तो उसकी किस्मत है दुबारा सजा नहीं दी जा सकती।हालांकि इस घटना के लिए वकील महमूद साहब को खुद मुकदमे का सामना करना पड़ा किन्तु उनका ‘तर्क’ कुबूल किया गया और उसके बाद से जजमेंट में ‘हैंग टिल डेथ’ लिखने की परिपाटी शुरू हुई।

किताबी ज्ञान तो पुस्तकालयों से भी हासिल किया जा सकता है लेकिन एक सुयोग्य शिक्षक कोर्स से हट कर जो ज्ञान दे जाता है वह काफी प्रेरक व जीवनोपयोगी सिद्ध होता है। ऐसे सुयोग्य कुछ और शिक्षक भी हमें मिले है। उनके बारे में फिर किसी अगले ‘शिक्षक दिवस’ पर चर्चा करेंगे।

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