क्रांति स्वर प्रश्न चिन्ह लग रहा है मान व जाति के भविष्य पर ही — विजय राजबली माथुर


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पाखंड-ढोंग-आडंबर को धर्म मानने के नतीजे हैं ये सब:
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भागवाताचार्य द्वारा कृत धर्म -कृत्य सदृश्य ही एक परिघटना 8-9 वर्ष पूर्व कमलानगर, आगरा में भी घटित हो चुकी है । वहाँ चैत्र नवरात्र का पाठ करने वाला पुरोहित यजमान महिला की सास का कत्ल करने के बावजूद उससे बलात्कार करने में असफल रहने पर उसे भी घायल करके व गहने लूट कर भाग गया था।
क्या भागवाताचार्य द्वारा भागवत पाठ या उस पुरोहित द्वारा नवरात्र – पाठ कोई धार्मिक कृत्य हैं? कदापि नहीं किन्तु धनाढ्य शोषक व्यापारियों व ब्राह्मण पोंगापंथियों ने ऐसे दुष्कृत्यों को धार्मिकता का जामा पहना रखा है और साधारण जनता उनमें फंस कर उल्टे उस्तरे से मूढ़ी जाती रहती है।
मध्य-प्रदेश के एक नगर में मार्बल की दुकान में चौकीदार के पद पर कार्य रत एक दिवेदी जी को उनके मालिक ने चोरी होने के बाद चोरों से मिलीभगत के आरोप में हटा दिया तब वह आगरा के एक मंदिर के पुरोहित के रूप में स्थापित हो गए और देखते ही देखते भागवाताचार्य के रूप में विख्यात हो गए। आठवीं कक्षा में लगातार तीसरी बार फेल होने वाले उनके पुत्र के मथुरा की एक तहसील में पोस्टेड तहसीलदार साहब आगरा स्थित अपने आवास पर सुंदरकाण्ड पाठ करने के उपरांत सहर्ष चरण-स्पर्श करने लगे। हवा ही हवा में वह पंडित जी कब ज्योतिषी भी बन गए यह उनका कमाल का खेल था लेकिन इसी में फंस कर वह हमारे पास मदद हेतु आए। उनके पड़ौस में किसी के यहाँ एक कन्या का जन्म हुआ उनसे रु 200/- उन्होने जन्मपत्री बनाने के लिए ले लिए जिसमें से रु 100/- देकर नेहरूनगर स्थित एक मंदिर के पुरोहित से कहा उन पुरोहित ने रु 70/- अपने पास रख कर रु 30/- में पूर्व SBI कर्मी के ज्योतिष-केंद्र से कंपूटरीकृत जन्मपत्री बना कर दे दी। जब वह जन्मपत्री उस नवजात कन्या के घर पहुंची तो उन लोगों ने विस्तृत भविष्यफल जानना चाहा। दिवेदी जी हमारे पास भविष्यफल निशुल्क ज्ञात करने हेतु आए थे जिससे अपनी इज्ज़त बचा सकें। उनके दुष्कृत्यों-झूठ -पाखंड में मैं साझीदार क्यों बनता ?

यदि समय रहते ‘ढोंग-पाखंड-आडंबर’ अर्थात ‘अधर्म’ के विरुद्ध सकारात्मक संघर्ष छेड़ कर जनता को नहीं समझाया गया कि वह सब धर्म नहीं है और वास्तविक धर्म के मर्म को न समझा कर खालिस ‘धर्म निरपेक्षता’ की माला जपी जाती रही तो अंततः मानव जाति को ही ये ढ़ोंगी नष्ट करने में सफल हो जाएँगे।

~विजय राजबली माथुर ©

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