क्रांति स्वर सिनेमा और सामाजिक सरोकार : एम . एस . सथ्यू से एक संवाद


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एम एस सथ्यू साहब से संवाद करते प्रदीप घोष साहब
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प्रथम पंक्ति में राकेश जी, विजय राजबली माथुर, के के वत्स

लखनऊ, दिनांक 04 फरवरी, 2016 को कैफी आज़मी एकेडमी , निशांतगंज के हाल में सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक मैसूर श्रीनिवास सथ्यू साहब के साथ ‘सिनेमा और सामाजिक सरोकार’ विषय पर एक संवाद परिचर्चा का आयोजन कैफी आज़मी एकेडमी और इप्टा के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। प्रारम्भ में कैफी आज़मी एकेडमी के सचिव सैयद सईद मेंहदी साहब ने एकेडमी व इप्टा की ओर से बुके देकर सथ्यू साहब का स्वागत किया व उनका संक्षिप्त परिचय देते हुये उनको महान एवं जागरूक फ़िल्मकार बताया। उन्होने इस बात को ज़ोर देकर कहा कि, पैसे को महत्व न देते हुये सथ्यू साहब ने फिल्म की अपेक्षा थियेटर को ज़्यादा अपना समय दिया और समाज को जागरूक करने का बीड़ा आज 85 वर्ष की आयु में भी बुलंदगी के साथ उठाए हुये हैं।
मेंहदी साहब के बाद इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश जी ने भी सथ्यू साहब की सादगी व इप्टा के प्रति उनके समर्पण की चर्चा की। इप्टा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष की हैसियत से इप्टा की मजबूती में सथ्यू साहब के योगदान को उन्होने प्रेरक बताया। राकेश जी ने यह भी बताया कि सथ्यू साहब की लोकप्रियता पाकिस्तानी जनता के बीच भी है। उन्होने पाकिस्तान यात्रा के संस्मरण सुनाते हुये बताया कि ‘मोहन जो देड़ो ‘ की ओर अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए जो बोर्ड लगाया गया है उस पर अंकित है- YOU ARE VIEWING ANCIENT INDIA- तात्पर्य यह है कि भारत और पाकिस्तान सांस्कृतिक रूप से एक ही हैं और इसी बात को सथ्यू साहब ने फिल्म ‘गर्म हवा’ में बड़े अच्छे ढंग से रखा है।
सथ्यू साहब ने शुरुआत में कहा कि वह मूल रूप से कन्नड़ भाषी होने के कारण हिन्दी-उर्दू पर अच्छी पकड़ तो नहीं रखते हैं लेकिन लखनऊ की तहज़ीब से पूरे वाकिफ हैं। काफी अर्सा पहले कन्नड़ लेखक बी सुरेशा लिखित नाटक-‘गिरिजा कल्याणम’ के हिन्दी रूपातंरण ‘गिरिजा के सपने’ के मंचन के सिलसिले में लखनऊ आने की उन्होने संक्षिप्त चर्चा की। उन्होने बताया कि इस नाटक की नायिका इंगलिश व गणित में कमजोर होने के कारण ‘मेट्रिक फेल’ हो गई और इसी ‘मेट्रिक फेल’ नाम से वह लोकप्रिय भी हुई। नाटक में बैंकों द्वारा आम जनता के शोषण का ज़िक्र करते हुये वह नायिका ICICI का उच्चारण कुछ इस प्रकार करती है – आई सी – आई सी – आई कि बरबस ही दर्शक उसकी बात की ओर आकर्षित हो जाते हैं।
एक युवती रेखा द्वारा युवाओं के लिए संदेश देने का सथ्यू साहब से आग्रह करने पर उन्होने कहा कि सफलता कोई बड़ी बात नहीं होती है। असफल होने पर सीखने का अवसर मिलता है और उसके बाद जो सफलता मिलती है वह पूर्ण परिपक्व होती है। उन्होने खुद अपना दृष्टांत प्रस्तुत करते हुये कहा कि इंजीनियर पिता, चाचा और भाइयों के परिवार से होने व साईन्स विद्यार्थी होने के बावजूद उनका रुझान कला की ओर था। उन्होने एक गुरु से सरोद वादन सीखा और खुद महसूस किया कि वह सफल नहीं हैं तब तीन वर्षों तक ‘कत्थक कली’ नृत्य सीखा और उसके लिए भी अपने को अनुकूल नहीं पाया तब पिताजी से कह दिया कि बी एस सी की परीक्षा नहीं देंगे उनको बंबई भिजवा दें और छह माह तक रु 50/- की मदद कर दें । उनको रु 13/- का टिकट दिला कर मैसूर से बंबई भेज दिया गया जहां उनका संपर्क इप्टा से हुआ , वह पहले से ही नाटकों में भाग लेते रहे थे अतः हबीब तनवीर व के ए अब्बास के सहयोग से थियेटर में भाग लेने लगे । लेकिन तब तक सिर्फ कन्नड़ और अङ्ग्रेज़ी ही जानते थे इसलिए बंबई में उन्होने पर्दे के पीछे के मंच- सज्जा, ध्वनि, रोशनी आदि के ही कार्य लिए।
के आसिफ ने एक नाटक के सेट की ज़िम्मेदारी उनको दी थी , उस नाटक को देखने चेतन आनंद भी आए थे उन्होने सेट से प्रभावित होकर सज्जा करने वाले से मिलने की इच्छा व्यक्त की और इस प्रकार सथ्यू साहब उनके संपर्क में आए। चेतन आनंद ने सथ्यू साहब को मिलने को बुलाया और उनको अपने साथ असिस्टेंट डाइरेक्टर के रूप में काम करने को कहा। सथ्यू साहब ने कहा कि उनको हिन्दी नहीं आती है वह कैसे करेंगे ?आनंद साहब ने उनको रोमन का सहारा लेने को कहा , उनके द्वारा प्रस्तावित रु 250/- प्रतिमाह वेतन को अपर्याप्त बताने पर सथ्यू साहब की इच्छानुसार रु 275/- प्रतिमाह पर नियुक्त कर लिया।
सथ्यू साहब ने 1956 में अपने पहले निर्देशन की चर्चा करते हुये कहा कि, पहली बार में ही उनको अपने निर्देशक चेतन आनंद साहब को भी निर्देशित करना पड़ा क्योंकि वह अभिनय भी कर रहे थे। फिल्म टैगोर के नाटक ‘चंडालिका’ पर आधारित थी जिसमें सितारा देवी और आगरा की निम्मी भी थीं। सथ्यू साहब ने एक दृश्य पर जैसे ही ‘कट’ कहा चेतन आनंद साहब चौंक पड़े कि जो साहायक बनने से इंकार कर रहा था उसकी दृश्यों पर इतनी बारीक पकड़ है कि वह उनको भी कमियाँ बता कर रीटेक के लिए कह रहा है। वह सथ्यू साहब से प्रसन्न हुये और यह जान कर और भी कि वह मूलतः थियेटर से ही संबन्धित हैं। एक अन्य प्रश्न के उत्तर में उन्होने कहा कि वह बंबई पैसा या नाम कमाने नहीं, बल्कि ‘काम सीखने’ के लिए आए थे।
अपनी सुप्रसिद्ध फिल्म ‘गर्म हवा’ का ज़िक्र करते हुये सथ्यू साहब ने बताया कि यह इस्मत चुगताई की कहानी पर आधारित है किन्तु इसके अंतिम दृश्य में जिसको प्रारम्भ में पर्दे पर दिखाया गया था – राजेन्द्र सिंह बेदी की कहानी के कुछ अंशों को जोड़ लिया गया था। इस दृश्य में यह दिखाया गया था कि किस प्रकार मिर्ज़ा साहब (बलराज साहनी ) जब पाकिस्तान जाने के ख्याल से तांगे पर बैठ कर परिवार के साथ निकलते हैं तब मार्ग में रोज़ी-रोटी, बेरोजगारी, भुखमरी के प्रश्नों पर एक प्रदर्शन मिलता है जिसमें भाग लेने के लिए उनका बेटा (फारूख शेख जिनकी यह पहली फिल्म थी ) तांगे से उतर जाता है बाद में अंततः मिर्ज़ा साहब तांगे पर अपनी बेगम को वापिस हवेली भेज देते हैं और खुद भी आंदोलन में शामिल हो जाते हैं।
एक प्रश्न के उत्तर में सथ्यू साहब ने बताया कि 1973 में 42 दिनों में ‘गर्म हवा’ बन कर तैयार हो गई थी। इसमें इप्टा आगरा के राजेन्द्र रघुवंशी और उनके पुत्र जितेंद्र रघुवंशी (जितेंद्र जी के साथ आगरा भाकपा में कार्य करने व आदरणीय राजेन्द्र रघुवंशी जी को सुनने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ है ) आदि तथा दिल्ली इप्टा के कलाकारों ने भाग लिया था। ताजमहल व फ़तहपुर सीकरी पर भी शूटिंग की गई थी। इप्टा कलाकारों का योगदान कला के प्रति समर्पित था। बलराज साहनी साहब का निधन हो जाने के कारण उनको कुछ भी न दिया जा सका बाद में उनकी पत्नी को मात्र रु 5000/- ही दिये तथा फारूख शेख को भी सिर्फ रु 750/- ही दिये जा सके थे। किन्तु कलाकारों ने लगन से कार्य किया था। सथ्यू साहब ने एक अन्य प्रश्न के उत्तर में बताया कि, ‘निशा नगर’, ‘धरती के लाल’ व ‘दो बीघा ज़मीन’ फिल्में भी इप्टा कलाकारों के सहयोग से बनीं थीं उनका उद्देश्य सामाजिक-राजनीतिक चेतना को जाग्रत करना था।
चर्चा में भाग लेने वाले लोगों में वीरेंद्र यादव, भगवान स्वरूप कटियार, मेंहदी अब्बास रिजवी, प्रदीप घोष आदि के नाम प्रमुख हैं।
कुछ प्रश्नों के उत्तर में सथ्यू साहब ने रहस्योद्घाटन किया कि, यद्यपि ‘गर्म हवा’ 1973 में ही पूर्ण बन गई थी किन्तु ‘सेंसर बोर्ड’ ने पास नहीं किया था तब उनको प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी से संपर्क करना पड़ा था जिनके पुत्रों राजीव व संजय को वह पूर्व में ‘क्राफ्ट’ पढ़ा चुके थे। उन्होने बताया कि इंदिराजी अक्सर इन्स्टीच्यूट घूमने आ जाती थीं उनके साथ वी के कृष्णा मेनन भी आ जाते थे। वे लोग वहाँ चाय पीते थे, कभी-कभी वे कनाट प्लेस से खाना खा कर तीन मूर्ती भवन तक पैदल जाते थे तब तक सिक्योरिटी के ताम -झाम नहीं होते थे और राजनेता जन-संपर्क में रहते थे। काफी हाउस में उन्होने भी इंदर गुजराल व इंदिरा गांधी के साथ चर्चा में भाग लिया था। अतः सथ्यू साहब की सूचना पर इंदिराजी ने फिल्म देखने की इच्छा व्यक्त की जिसे तमाम झंझटों के बावजूद उन्होने दिल्ली ले जाकर दिखाया। इंदिराजी के अनुरोध पर सत्ता व विपक्ष के सांसदों को भी दिखाया और इस प्रकार सूचना-प्रसारण मंत्री गुजराल के कहने पर सेंसर सर्टिफिकेट तो मिल गया किन्तु बाल ठाकरे ने अड़ंगा खड़ा कर दिया अतः प्रीमियर स्थल ‘रीगल थियेटर’ के सामने स्थित ‘पृथ्वी थियेटर’ में शिव सेना वालों को भी मुफ्त फिल्म शो दिखाया जिससे वे सहमत हो सके। 1974 में यह फ्रांस के ‘कान’ में दिखाई गई और ‘आस्कर’ के लिए भी नामित हुई। इसी फिल्म के लिए 1975 में सथ्यू साहब को ‘पद्मश्री’ से भी सम्मानित किया गया और यह सम्मान स्वीकार करने के लिए गुजराल साहब ने फोन करके विशेष अनुरोध किया था अतः उनको इसे लेना पड़ा।
सथ्यू साहब ने बताया कि मई माह में तीन नाटकों का एक फेस्टिवल कराने वह फिर लखनऊ आएंगे जिसमें नादिरा बब्बर के नाटक को भी शामिल किया जाएगा। अंत में इप्टा के प्रदीप घोष साहब ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों में रिशी श्रीवास्तव, दीपक कबीर, के के वत्स, ओ पी अवस्थी, प्रोफेसर ए के सेठ व विजय राजबली माथुर भी शामिल थे।

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