वैज्ञानिक परम्पराएँ-वेद और हवन

हमारे देश मे एक फैशन चलता है कि हमारा देश एक पिछड़ा हुआ देश है और यहाँ ज्ञान,विज्ञान जो आया वह पश्चिम की देंन है। आज़ादी के एक लंबे अरसे बाद भी गुलामी की बू लोगों के दिलों से अभी निकली नहीं है। ऊपर जो स्कैन आप देख रहे हैं उसमे आधुनिक अनुसंधान के आधार पर देश मे प्रचलित कुछ प्राचीन  परम्पराओं को विज्ञान -सम्मत बताया गया है।

मैक्स मूलर साहब जर्मनी से भारत आकर यहाँ 30 वर्ष रहे और संस्कृत सीख कर  मूल पांडुलिपियाँ लेकर जर्मनी रवाना हो गए। जर्मनी भाषा मे उनके अनुवादों को पढ़ कर वहाँ अनुसंधान हुये *-होमियोपैथी,बायोकेमिक चिकित्सा पद्धतियों को वहाँ ईजाद किया गया जो एलोपेथी  से श्रेष्ठ हैं। परमाणु तथा दूसरे आयुधों का आविष्कार भी वेदोक्त ज्ञान से वहाँ हुआ। जर्मनी की द्वितीय विश्व युद्ध मे पराजय के बाद अमेरिका और रूस ने इन परमाणु वैज्ञानिकों को अपने-अपने देश मे लगा लिया। अमेरिका ने सबसे पहले जापान की आत्म समपर्ण की घोषणा के बाद रूस को डराने के लिए 06 और 09 अगस्त को परमाणु बमो का प्रहार किया।

जर्मनी आदि पाश्चात्य देशों ने षड्यंत्र पूर्वक भारत मे यह प्रचार किया कि,’वेद गड़रियों के गीत ‘के सिवा कुछ भी नहीं हैं (जबकि ये ही देश खुद वेद-ज्ञान का लाभ उठा कर खुद को विज्ञान का आविष्कारक बताते रहे)। हमारे देश के पाश्चात्य समर्थक विद्वान चाहे वे दक्षिण पंथी हों या प्रगतिशील बामपंथी दोनों ही साम्राज्यवादी इतिहासकारों के ‘भटकाव’ को ज्ञान-सूत्र मानते हैं जिसके अनुसार ‘आर्य’ मध्य यूरोप से घोड़ों पर सवार होकर भारत आए और यहाँ के ‘मूल निवासियों’ को दास बना लिया। इसी मान्यता के कारण देश मे आजकल एक साम्राज्यवाद पोषक आंदोलन ‘मूल निवासियों देश को मुक्त करो’ भी ज़ोर-शोर से चल रहा है। 

साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासकों ने( जब सेफ़्टी वाल्व के रूप मे स्थापित कांग्रेस  आर्यसमाजियों के प्रभाव से ‘राष्ट्र वादी आंदोलन चलाने लगी तब )अपने हितों की रक्षा हेतु RSS का गठन एक पूर्व क्रांतिकारी के माध्यम से कराया। RSS और मुस्लिम लीग ने देश को विभाजित करा दिया। आज भी नफरत की सांप्रदायिकता फैला कर साम्राज्यवादी अमेरिका को दोनों संप्रदायों के कुछ संगठन लाभ पहुंचा रहे हैं। RSS और इसके दूसरे सहायक संगठन ‘गर्व से हिन्दू’ की मुहिम चलाते हैं। प्रगतिशील-बामपंथी कहलाने वाले विद्वान भी हिन्दू,इस्लाम,ईसाइयत को ही धर्म मानते हैं और प्रकट मे धर्म की आलोचना तथा छिपे तौर पर उन सांप्रदायिक गतिविधियों का पालन करते हैं। 

धर्म =सत्य,अहिंसा (मनसा,वाचा,कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य के समुच्य को धर्म कहते हैं जो शरीर को धारण करने हेतु आवश्यक हैं। जो लोग ‘धर्म’ की आलोचना करते हैं वे इन सदगुणो का पालन न करने को प्रेरित करते हैं। इसी कारण 1917 मे सम्पन्न साम्यवादी क्रांति रूस मे विफल हो गई क्योंकि शासक पार्टी कार्यकर्ताओं और जनता का शोषण कर रहे थे। आज वहाँ समाज-सरकार द्वारा स्थापित उद्योग पूर्व शासकों ने अपने भ्रष्टाचार की कमाई से खरीद लिए हैं और पूंजीपति बन गए हैं। 

भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)। प्रकृति के ये पाँच तत्व ही संयुक्त रूप से ‘भगवान’ हैं चूंकि इनको किसी ने बनाया नहीं है और ये खुद ही बने हैं इसलिए ये ही ‘खुदा’ हैं।  इंनका कार्य G(जेनरेट)+O(आपरेट)+D(डेसट्राय) करना है इसलिए ये ही ‘गाड ‘ हैं। जो भगवान=खुदा=गाड को दिमागी फितूर कहते हैं वे सच से आँखें मूँद लेने को ही कहते हैं। 

भगवान या खुदा या गाड =प्रकृति के पाँच तत्व । अतः इनकी पूजा का माध्यम केवल और केवल ‘हवन’ है। ‘पदार्थ विज्ञान’ =मेटेरियल साईन्स के मुताबिक अग्नि मे यह गुण है कि उसमे डाले गए पदार्थों को ‘परमाणुओ’ -‘एटम्स’ मे विभक्त कर देती है और वायु उन परमाणुओं को पर्यावरण मे प्रसारित कर देती है। अर्थात भगवान या खुदा या गाड को वे परमाणु प्राप्त हो जाते हैं क्योंकि ये तत्व सर्वत्र व्यापक हैं-घट-घट वासी हैं। इनके अतिरिक्त नदी,समुद्र,वृक्ष,पर्वत,आकाश,नक्षत्र,ग्रह आदि देवताओं को भी हवन द्वारा प्रसारित परमाणु प्राप्त हो जाते हैं। ‘देवता’ =जो देता है ,लेता नहीं है। अतः इन प्राकृतिक संसाधनो के अतिरिक्त और कोई देवता नहीं होता है। 

विवाद तभी शुरू होता है जब हिन्दू,इस्लाम,ईसाइयत  आदि के नाम पर ‘ढोंग-पाखंड-आडंबर’ को धर्म की संज्ञा देकर पूजा जाता है। वस्तुतः व्यापारियों-उद्योगपतियों और शासकों ने मिल कर ये विभाजन अपने-अपने व्यापार को चमकाने हेतु समाज मे कर रखे हैं। प्रगतिशील-बामपंथी जनता को इन लुटेरे व्यापारियों के चंगुल से छुड़ाने हेतु ‘धर्म’ की वास्तविक व्याख्या प्रस्तुत करने के बजाए धर्म का विरोध करते हैं किन्तु पाखंड से उनको गुरेज नहीं है उसे वे भी धर्म ही पुकारते हैं। दमन जनता का होता है।

आज से 10 लाख वर्ष पूर्व जब मानव अपने वर्तमान स्वरूप मे आया तो प्रकृति के अनुरूप समाज मे पालन करने हेतु जो नियम बनाए गए वे ही ‘वेद’ हैं। वेद सभी समय के सभी मनुष्यों के लिए देश-काल के भेदभाव के बिना समान व्यवहार का मार्ग बताते हैं। शासकों और व्यापारियों ने अपने निजी स्वार्थ वश ‘कर्मगत’ वर्ण व्यवस्था को ‘जन्मगत’ जाति-व्यवस्था मे परिवर्तित करके शासितों का उत्पीड़न-शोषण किया। वेदोक्त परम्पराएँ विलुप्त हो गईं और समाज मे विषमता की खाई उत्पन्न हो गई। भारत मे विदेशी शासकों के आगमन पर उनके द्वारा यहाँ की जनता को ‘हिन्दू’ कह कर पुकारा गया जो फारसी भाषा मे एक गंदी और भद्दी गाली है। कुछ लोग अरबी भाषा के ‘स ‘ को ‘ह ‘ उच्चारण से जोड़ कर हिन्दू शब्द की हिमायत करते हैं तब भी यह विदेशियों की ही देंन साबित होता है। कुछ ‘कुतर्क करने वाले  लोग ‘ हिन्दू शब्द की प्राचीनता टटोलते फिरते हैं,किन्तु ईरानियों के आने से पूर्व बौद्ध मठों,विहारों को उजाड़ने वाले उनके ग्रन्थों को जलाने वाले हिंसक लोगों को बौद्धों ने ‘हिन्दू’ की संज्ञा दी थी। ‘हिन्दू’ शब्द विदेशी और पूरी तरह से अभारतीय है। ‘कुरान’ की तर्ज पर विदेशी शासकों ने यहाँ के विद्वानों को ‘सत्ता’ व ‘धन’ सुख देकर ‘पुराण’ लिखवाये जो वेद-विपरीत हैं। किन्तु तथा कथित गर्व से हिन्दू लोग वेद और पुराण को गड्म गड करके गुमराह करते हैं और दुखद है कि प्रगतिशील बामपंथी भी उसी झूठ को मान्यता देते हैं। 

यू एस ए की राजधानी वाशिंगटन (DC) मे अग्निहोत्र यूनिवर्सिटी मे अनवरत 24 घंटे हवन चलता रहता है जिसके परिणामस्वरूप USA के क्ष्तिज पर बना ओज़ोन का छिद्र परिपूर्ण हो गया और वह सरक कर दक्षिण-पूर्व एशिया की तरफ आ गया है। इस क्षेत्र मे प्राकृतिक प्रकोपों का कारण यह ओज़ोन छिद्र ही है जो यू एस ए आदि पाश्चात्य देशों के कुकृत्य का कुफ़ल है। किन्तु हमारे बामपंथी भाई और प्रगतिशील पत्रकार जिनमे दैनिक जागरण के चेनल IBN 7वाले प्रमुख हैं ‘हवन’ का घोर विरोध करते हैं-व्यंग्य उड़ाते हैं। 

यदि हमे अपने देश ‘भारत’ को प्रकृतिक प्रकोपों से बचाना है,अपने नागरिकों को शुद्ध पर्यावरण उपलब्ध कराना है और परस्पर भाई-चारा उत्पन्न करना है तो ‘वेदोक्त हवन’ का सहारा लेना ही चाहिए। अन्यथा तो जो चल रहा है चलता रहेगा फिर रोना-झींकना क्यों?

 —————————————- 
*वेदों के ‘समष्टिवाद’ का ही आधुनिक रूप है ‘साम्यवाद’ जिसका निरूपण किया जर्मनी के महर्षि कार्ल मार्क्स ने उन जर्मन ग्रन्थों के अवलोकन के पश्चात जो वेदों की मूल पांडु लिपियों से अनूदित थे। लेकिन भारतीय साम्यवादी विद्वान ‘साम्यवाद’ को पाश्चात्य विज्ञान मानते हैं और इसी मुगालते मे जनता से कटे रहते हैं। वस्तुतः ‘साम्यवाद’=’समष्टिवाद’ मूल रूप से भारतीय अवधारणा है और इसे लागू भी तभी किया जा सकेगा जब हकीकत को समझ लिया जाएगा।

Advertisements

साम्राज्यवाद को मजबूत करने मे ‘साम्यवाद ‘का कितना योगदान?

“MAN HAS CREATED THE GOD FOR HIS MENTAL SECURITY ONLY”—
                                                                                                               KARL  MARX

अर्थात कार्ल मार्क्स का कथन है कि,”मनुष्य ने अपनी दिमागी सुरक्षा के लिए भगवान की उत्पत्ति  की है”।

महर्षि कार्ल मार्क्स ने  किस संदर्भ और परिस्थितियों मे यह लिखा इसे समझे बगैर एयर कंडीशंड कमरों मे बैठ कर उदभट्ट विद्वान ‘धर्म’ की चर्चा को भटकाने वाला तथ्य कहते हैं और उनमे से कुछ यह भी घोषणा करते हैं कि,;हिन्दू’,’इस्लाम’,’ईसाई’आदि ही धर्म हैं एवं धर्म की अन्य कोई परिभाषा मान्य नहीं है। इसका सीधा-सादा अर्थ है कि ‘तर्क’और ज्ञान के आभाव मे ये विद्वान ढोंग-पाखंड-आडंबर जिसे साम्राज्यवादी धर्म बताते हैं उसी को धर्म स्वीकारते हैं और तभी धर्म पर प्रहार करके जनता से कटे रहते हैं। हालांकि कुछ प्रगतिशील और जागरूक साम्यवादी नेता तो धर्म को सही परिप्रेक्ष्य मे समझ कर जनता से संवाद करने लगे हैं और वे लोकप्रिय भी हैं।मुस्लिम वर्ग के एक कामरेड तो श्री कृष्ण को ‘साम्यवाद ‘ का प्रयोग करने वाला बताते हैं और उनका जनता पर अनुकूल प्रभाव भी पड़ता है।  किन्तु बुद्धिजीवी विद्वान अभी भी 18वीं सदी की सोच से साम्यवाद लाने के नाम पर नित्य ही साम्राज्यवाद के हाथ मजबूत कर रहे हैं  फेसबुक पर अपने थोथे  बयानों से।और तो और मजदूर नेता एवं विद्वान कामरेड ने तो तब हद ही कर दी जब RSS की वकालत वाला एक लेख ही शेयर कर डाला। देखें-
Shriram Tiwari shared a link.

www.pravakta.com

साम्यवाद की विचारधारा क्या भारतीय संस्कृति के अनुकूल है? या साम्यवाद का भारतीय संस्कृति, धर्म और इतिहास से भी कोई संबंध है? यदि इन जैसे प्रश्नों के उत्तर खोजे जाऐं तो ज्ञात होता है कि वास्तविक साम्यवाद भारतीय संस्कृति में ही है। संसार का कम्युनिस्ट समाज भारतीय साम्यवाद को समझ नहीं पाया है और ना ही स…

Like · · · 2 hours ago ·

    • Vijai RajBali Mathur लेख मे मुद्दो की बात उठाते-उठाते अंततः RSS का समर्थन करके गुमराह किया गया है। 1857 की क्रांति मे भाग ले चुके महर्षि दयानन्द को अंग्रेज़-REVOLUTIONARY SAINT कहते थे और उनके संगठन को क्षति पहुँचने के उद्देश्य से RSS की स्थापना कराई थी जो आज आर्यसमाज को ही नियंत्रित करता प्रतीत होता है।

तो आइये सबसे पहले आर एस एस क्यों बनवाया गया इसे जानें फिर समझें कि ‘साम्यवाद है ही भारतीय अवधारणा’। ‘महाभारत काल’के बाद भारत का सांस्कृतिक पतन तीव्र गति से हुआ और आंतरिक फूट के कारण यह विदेशियों का गुलाम बना । विदेशी सत्ता ने यहाँ के तत्कालीन विद्वानों को अपनी ओर मिलाकर ऐतिहासिक संदर्भों को संदेहास्पद बनाने हेतु ‘पुराणों’ की रचना करवाई। आम जनता ने इन विद्वानों से गुमराह होकर पुराणों को धार्मिक ग्रंथ मान लिया और आज तक वही विभ्रम पूजा जा रहा है। हमारे साम्यवादी विद्वान भी इन ग्रन्थों को ही धार्मिक ग्रंथ की संज्ञा देते हैं जो उनकी ज़िद्द और जड़ता का प्रतीक है।हवाला तो ये मार्क्स का देते हैं किन्तु ये सब महर्षि कार्ल मार्क्स के पैर के अंगूठे के नाखून की नोक के बराबर भी नहीं ठहरते ज्ञान के मामले मे।

सर्वप्रथम बौद्धों पर अत्याचार करने वाले लोगों यथा उनके मठों को उजाड़ने,विहारों और उनके ग्रन्थों को जलाने वाले लोगों को ‘हिंसा देने’ के कारण ‘हिन्दू’ की संज्ञा दी गई थी। उसके बाद फारसियों ने एक गंदी और भद्दी गाली के रूप मे यहाँ के लोगों को ‘हिन्दू’ कहा। यहाँ के लोगों ने अपने तत्कालीन पुरोहितो,पुजारियों और विदेशी सत्ता के लालच मे फंसे विद्वानों की बातों को सिर -माथे पर लिया और खुद को ‘हिन्दू’ कहलाने लगे।

अब चूंकि ईस्ट इंडिया कंपनी ने सत्ता ‘मुस्लिम शासकों’ से छीनी थी इसलिए उसने इन हिंदुओं को बढ़ावा देकर मुसलमानों को कुचला जिससे वे शिक्षा और रोजगार मे पिछड़ गए। कंपनी शासन ने मुस्लिमों और हिंदुओं मे खाई गहराने हेतु ‘बाबरी मस्जिद’ प्रकरण खड़ा कराया।

ब्रिटिश अत्याचारों और शोषण से त्रस्त होकर मुगल शासक ‘बहादुर शाह जफर’ के नेतृत्व मे 1857 मे तथाकथित हिंदुओं और मुसलमानों ने मिल कर क्रांति कर दी जो आंतरिक फूट के कारण निर्ममता से कुचल दी गई। पंजाब के सिखों,ग्वालियर के सिंधिया,भोपाल की बेगम,नेपाल के राणा ने ‘आज़ादी की प्रथम क्रान्ति’को कुचलने मे अंग्रेजों का भरपूर साथ दिया और बहादुर शाह जफर को मांडले मे कैद करके भारत से निर्वासित कर दिया गया। इस क्रांति के बाद मुसलमानों का और भी दमन किया गया क्योंकि मुगल शासक ने इसका नेतृत्व किया था।

अपनी युवावस्था मे महर्षि दयानंद ‘सरस्वती’ने भी इस क्रांति मे भाग लिया था और रानी लक्ष्मी बाई से भी उनका संपर्क था। ‘क्रांति’ के दमन की क्रूरता को देख कर दयानन्द ने ईस्वी सन 1875 की चैत्र प्रतिपदा को (क्रांति के 18 वर्ष बाद),’आर्यसमाज’का गठन किया जिसका उद्देश्य जनता को जागरूक करके देश को आज़ादी दिलाना था। प्रारम्भ मे जितने भी आर्यसमाज स्थापित हुये ब्रिटिश छावनी वाले नगरों मे ही हुये थे। ब्रिटिश सरकार ने उन पर कई मुकदमे भी चलवाये उनको REVOLUTIONARY SAINT कहा गया। महर्षि दयानंद ‘सरस्वती’ ने विदेशियों द्वारा प्रदत्त  ‘हिन्दू’ संज्ञा का प्रबल विरोध किया। उन्होने देशवासियों को ‘सनातन आर्यत्व’ पर लौटने का आहवाहन किया।

दयानन्द के प्रचार से भयभीत होकर ब्रिटिश गवर्नर जनरल ने रिटायर्ड ICS एलेन आकटावियन हयूम की मदद से वोमेश चंद्र बेनर्जी (जो ईसाई थे)की अध्यक्षता मे इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना कारवाई जो सम्पूर्ण आज़ादी नही केवल ‘डोमिनियन स्टेट’ चाहती थी। अतः दयानन्द के निर्देश पर आर्यसमाजी इस कांग्रेस के सदस्य बन गए और उन लोगों के प्रयास से कांग्रेस को ‘सम्पूर्ण’ आज़ादी को ध्येय बनाना पड़ा।डॉ पट्टाभि सीता रमय्या ने ‘कांग्रेस का इतिहास’ मे लिखा है कि स्वतन्त्रता आंदोलन मे भाग लेने वाले सत्याग्रहियों मे 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे।

अतः अब इस कांग्रेस को कमजोर बनाने हेतु मुसलमानों का सहारा लिया गया और ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन के माध्यम से 1906 मे  ‘मुस्लिम लीग’की स्थापना ब्रिटिश सरकार ने करवाई दूसरी ओर ‘मुस्लिम सांप्रदायिकता’ के जवाब मे मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व मे 1920 मे ‘हिन्दू महासभा’ का गठन करवाया गया। अभी तक महर्षि दयानन्द   के बाद भी उनका प्रभाव समाप्त नहीं हुआ था अतः आर्यसमाजियों के प्रभाव से हिंदूमहासभा ‘हिन्दू सांप्रदायिकता’ को उभाड़ने मे विफल रही। लेकिन कांग्रेस मे सांप्रदायिक आधार पर धड़ेबंदी शुरू हो गई। इन परिस्थितियों मे ‘राष्ट्र्वादी कांग्रेसियों’ ने 25/26 दिसंबर 1925 को कानपुर मे कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की। स्वामी सहजानन्द ‘सरस्वती’,क्रांतिकारी गेंदा लाल दीक्षित और महा पंडित राहुल सांस्कृत्यायन सरीखे आर्यसमाजियों ने कम्युनिस्ट पार्टी को मजबूत बनाने मे अपना अमित योगदान दिया।

आर्यसमजी और कम्युनिस्ट मिल कर कहीं ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ न फेंके इस लिए पूर्व क्रांतिकारी सावरकर साहब जो खुद को नास्तिक कहते थे के माध्यम से RSS का गठन करवाया गया। शासकों के साथ दुरभि संधि के तहत इस संगठन को नाजी हिटलर के ‘स्टार्म फोर्स’ की भांति रखा गया जिससे जनता को गुमराह किया जा सके क्योंकि हिटलर शुद्ध आर्य होने का दावा करता था और उसका वारिस यह संगठन भारत मे खुद को घोषित करने लगा। इससे यह शक नहीं पैदा हो सका कि इसके पीछे ब्रिटिश सरकार का हाथ है जबकि यह उसी के मंसूबे पूरे करने हेतु ही गठित हुआ था। RSS की जूते से टोपी तक पोशाक और परेड की गतिविधियां जर्मनी के ‘स्टार्म फोर्स’ की तर्ज पर रखी गईं। यह नस्लवादी तौर पर मुस्लिमों के विरुद्ध घृणा फैलाता था । मुस्लिम लीग -RSS के प्रयासों से देश ‘हिन्दू-मुस्लिम दंगों’की आग मे झुलसा दिया गया और अंततः ‘पाकिस्तान’ एवं ‘भारत’ दो देशों मे बाँट दिया गया। यह साम्राज्यवाद के नए मसीहा अमेरिका की नीतियों और योजनाओं का परिणाम था।

पूंजीवाद के समर्थक नेहरू जी ने बड़ी ही चालाकी से रूस से मित्रता करके भारतीय कम्युनिस्टों को प्रभाव हींन कर दिया।  आज कम्युनिस्ट आंदोलन कई पार्टियों मे विभक्त होकर पूरी तरह बिखर गया है। कांग्रेस जहां कमजोर पड़ती है वहाँ RSS समर्थित भाजपा को आगे बढ़ा देती है। दोनों साम्राज्यवादी अमेरिका समर्थक पार्टियां हैं। ऐसे मे साम्यवाद के मजबूत होकर उभरने की आवश्यकता है परंतु सबसे बड़ी बाधा वे ‘साम्यवादी विद्वान और नेता’ खड़ी करते हैं जो आज भी अनावश्यक और निराधार ज़िद्द पर अड़े हुये हैं कि ‘मार्क्स’ ने धर्म को अफीम कह कर विरोध किया है अतः साम्यवाद धर्म विरोधी  है।

‘एकला चलो रे ‘ की नीति पर चलते हुये इस ब्लाग के माध्यम से मैं सतत ‘धर्म’ की वास्तविक व्याख्या बताने का प्रयास करता रहता हूँ जो वस्तुतः ‘नक्कारखाने मे तूती की आवाज़’ की तरह है। फिर भी एक बार और-

धर्म’=जो शरीर को धरण करने के लिए आवश्यक है जैसे-‘सत्य’,’अहिंसा’,’अस्तेय’,’अपरिग्रह’और ‘ब्रह्मचर्य’।
(क्या मार्क्स ने इन सद्गुणों को अफीम बताया है?जी नहीं मार्क्स ने उस समय यूरोप मे प्रचलित ‘ईसाई पाखंडवाद’को अफीम कह कर उसका विरोध किया था। पाखंडवाद चाहे ईसाइयत का हो,इस्लाम का हो या तथाकथित हिन्दुत्व का उन सब का प्रबल विरोध करना ही चाहिए परंतु ‘विकल्प’ भी तो देते चलिये। )

‘भगवान’=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल) का समन्वय।

‘खुदा’=चूंकि ये पाँच तत्व खुद ही बने हैं इन्हे किसी ने बनाया नहीं है इसलिए इन्हे खुदा भी कहते हैं।

GOD=G(जेनेरेट)+O(आपरेट)+D(देसट्राय)। ‘भगवान’ या ‘खुदा’ सम्पूर्ण सृष्टि का सृजन,पालन और ‘संहार’ भी करते हैं इसलिए इन्हें GOD भी कहा जाता है।

क्या मार्क्स ने प्रकृति के इन पाँच तत्वों को अफीम कहा था?’साम्यवाद’ को संकुचित करने वाले वीर-विद्वान क्या जवाब देंगे?  


देवता=जो देता है और लेता नहीं है जैसे-वृक्ष ,नदी,समुद्र,वायु,अग्नि,आकाश,ग्रह-नक्षत्र आदि न कि कोई व्यक्ति विशेष। क्या मार्क्स ने प्रकृति प्रदत्त इन उपादानों का कहीं भी विरोध किया है?’साम्यवाद’ के नाम पर साम्यवाद का अवमूल्यन करने वाले दिग्गज विद्वान क्या जवाब देंगे?

जनता को सही राह दिखाना किस प्रकार ‘भटकाव’ है?जो भटकाव करते हैं उनको तो धर्म कह कर ये विद्वान सिर पर चढ़ाते हैं और उसी प्रकार मार्क्स को बदनाम करने की कोशिश करते हैं जिस प्रकार साम्राज्यवादियों के पिट्ठू विद्वान राम को बदनाम करने का साहित्य सृजन करते हैं। राम ने नौ लाख वर्ष पूर्व साम्राज्यवादी रावण को परास्त किया और उसका साम्राज्य ध्वस्त किया था। लेकिन साम्यवाद के मसीहा कहलाने वाले ये विद्वान राम-रावण युद्ध को कपोल कल्पना कह कर राम को साम्राज्यवादी RSS का खिलौना बना देते हैं। साम्राज्यवादियों ने दो धाराएँ फैला कर वास्तविकता को ढकने का स्वांग रचा है। पहले कहा गया कि वेद गड़रियों के गीत हैं और खुद ‘मेक्समूलर’ के माध्यम से यहाँ से मूल पांडुलिपियाँ ले गए। अंनुसन्धान किए और वेदों का भरपूर लाभ उठाया। दूसरे RSS,मूल निवासी,आदिवासी,आदि तमाम संगठनों के माध्यम से वेद और आर्यों के विरुद्ध दुष्प्रचार करवाया । कोई हिटलर की तर्ज पर हिन्दुत्व को नस्लवादी आर्य बताता है तो कोई आर्यों को यहाँ के मूल निवासियों का शोषक आक्रांता। दुर्भाग्य यह है कि साम्यवादी विद्वान इनमे से ही किसी न किसी बात को सही मानते हैं और अपना दिमाग लगा कर कुछ सोचना व समझना ही नहीं चाहते हैं। यदि कोई ऐसा प्रयास करता है तो तत्काल उसे प्रतिगामी घोषित कर देते हैं जबकि खुद कार्ल मार्क्स ने ‘साम्यवाद’ को देश-काल-परिस्थितियों के अनुसार लागू करने की बात कही थी। भारत मे कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना होने पर स्टालिन ने भी इसके संस्थापकों से ऐसा ही कहा था। किन्तु इन लोगों ने न तो मार्क्स के सिद्धांतों का पालन किया न ही स्टालिन के सुझाव माने और रूसी पैटर्न की नकल कर डाली। भारतीय वांगमय से मेल न खाने के कारण यहाँ की जनता के बीच साम्राज्यवादियों के सहयोग से यह प्रचारित किया गया कि साम्यवाद विदेशी विचार-धारा है और देश के अनुकूल नहीं है। डॉ राम मनोहर लोहिया और लाल बहादुर शास्त्री सरीखे नेताओं ने इसी आधार पर साम्यवाद को अत्यधिक क्षति पहुंचाई। स्टालिन ने हिटलर से समझौता  कर लिया तो ठीक था लेकिन नेताजी सुभाष बोस ने हिटलर का सहयोग लेकर जापान मे पनाह ली तो उनको ‘तोजो का कुत्ता’ कह कर इन साम्यवादी विद्वानों ने संभोधित किया और अपेक्षा करते हैं कि जनता उनको सहयोग दे । हालांकि अब यह स्वीकार कर लिया गया है कि नेताजी का विरोध करना तब गलत था।

‘रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना’ के माध्यम से मैंने बताने का प्रयास किया है कि किस प्रकार राम ने रावण के ‘साम्राज्यवाद’ को नष्ट किया था। यदि आज भी साम्यवाद को कामयाब करना है तो राम की नीतियों को अपनाना पड़ेगा ,राम की आलोचना करके या अस्तित्व को नकार के कामयाब न अभी तक हुये हैं न ही आगे भी हो सकेंगे। योगी राज श्री कृष्ण ने तो सर्वाधिकार का बचपन से ही विरोध किया था गावों की संपत्ति का शहरी उपभोग समाप्त करने के लिए उन्होने ‘मटका फोड़’ आंदोलन चलाया था और गावों का मक्खन शहर आने से रोका था। गो-संवर्द्धन पर अनुसंधान करवाया और सफलता प्राप्त की लेकिन ढ़ोंगी गोवर्धन-परिक्रमा के नाम पर इस उपलब्धि पर पलीता लगाते हैं क्योंकि उसी मे साम्राज्यवादियों का हित छिपा हुआ है। किन्तु साम्यवादी क्यों नही ‘सत्य’ को स्वीकार करते हैं? क्यों साम्यवादी विद्वान ढोंगियों के कथन पर ध्यान देते हैं और वास्तविकता से आँखें मूँद लेते हैं। 

अभी तक सभी साम्यवादी विद्वानों ने साम्राज्यवादियों के षड्यंत्र मे फंस कर ‘नकारात्मक’ सोच को सच माना है। किन्तु अब आवश्यकता है कि इस सोच को सकारात्मक बना कर ‘सच’ को स्वीकार करें और सफलता हासिल करें। अन्यथा पूर्व की भांति ‘साम्राज्यवाद को ही मजबूत’ करते रहेंगे। मार्क्स ने जिस GOD का विरोध किया वह पाखंडियों की सोच वाला था वास्तविक नहीं। हमे जनता को बताना चाहिए वास्तविक GOD,खुदा या भगवान प्रकृति के पाँच तव हैं और कुछ नहीं। जनता को धर्म का मर्म बताना पड़ेगा तब ही वह ढोंग-पाखंड-आडंबर से दूर हो पाएगी। कृपया साम्यवाद का चोला ओढ़ कर ‘मार्क्स’ को बदनाम करना और इस प्रकार ‘साम्राज्यवाद को’ मजबूत करना बंद करें।

धर्म की गलत व्याख्या और हत्याये

दोनों चित्र साभार-हिंदुस्तान-लखनऊ -14/03/2012 

पूर्व पुलिस कमिश्नर वाई पी सिंह साहब ने बहुत ही स्पष्ट ढंग से समझाया है कि किस प्रकार ईमानदार अफसरो को प्रताड़ित होना पड़ता है और भ्रष्ट अफसर,नेता व ठेकेदार मजे मे रहते हैं। सपा नेत्री शम्मी कोहली की हत्या भी ऐसे धंधे और राजनीति का घालमेल ही है। शम्मी कोहली का शराब का व्यवसाय था और उसी के बूते उन्हे सबसे पहले कांग्रेस ने आगरा संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ाया था जिसमे वह भाजपा से हार गई थी। सपा मे एक और शराब व्यवसाई नेत्री आशा खंडेलवाल थी अतः शम्मी कोहली कांग्रेस छोड़ कर बसपा मे चली गई। 2007 मे आगरा पूर्वी विधान सभा क्षेत्र से उन्होने अपने बेटे नितिन के लिए बसपा का टिकट मांगा था जो न मिलने पर ‘बसपा कांशी राम’बना कर उसने चुनाव लड़ा और हारने के बाद माँ -बेटे सपा मे शामिल हो गए क्योंकि आशा खंडेलवाल सपा से बसपा मे चली गई थी। बाद मे आशा खंडेलवाल फिर सपा मे लौट भी आई। कमलानगर मे ही नितिन का टाटा इंडिकाम का फ्रेचाईजी भी था जो झगड़ो के कारण ही टाटा ने टेक ओवर कर लिया था।

आशा खंडेलवाल के तो लड़के ही झगड़ालू थे किन्तु शम्मी कोहली खुद भी बेटो के साथ-साथ झगड़ालू थी। आशा खंडेलवाल का समर्थक भट्टा-व्यवसाई मनोज अग्रवाल कई बार शम्मी कोहली द्वारा कार से खींच-खींच कर पीटा जा चुका था। शम्मी कोहली पुलिस अधिकारियों से भी दबंग व्यवहार रखती थी। अब उनके बेटे नितिन ने अपने भाई की पत्नी के विरुद्ध उनकी हत्या मे शामिल होने का इल्जाम लगाया है। अखबार मे शम्मी कोहली की उम्र 46 वर्ष दी है। 2007 मे यदि नितिन कोहली 25 वर्ष का रहा हो तो अब 30 वर्ष का होगा इस प्रकार उसके जन्म के समय शम्मी कोहली की उम्र 16 वर्ष रही होगी। तो क्या शम्मी कोहली का बाल-विवाह हुआ था?

क्या और क्यो व कैसे हुआ कानून की समस्या है। किन्तु हमारा उद्देश्य यह बताना है कि ऐसी समस्याएँ चाहे वे ईमानदार पुलिस अधिकारी नरेंद्र जी की हत्या हों या भ्रष्ट नेत्री शम्मी कोहली की हत्या केवल और केवल गलत सामाजिक परम्पराओं एवं गलत धार्मिकता के बोलबाले के कारण घटित होती हैं। शराब व्यवसाई आशा खंडेलवाल प्रतिवर्ष भागवत,देवी भागवत,रामायण आदि के पाठ करा कर पुरोहितो को ऊंची -ऊंची रकमे दक्षिणा मे भेंट करती हैं बदले मे ये तथा कथित धार्मिक पुरोहित आशा खंडेलवाल को दयालू,सहृदय और बेहद धार्मिक महिला घोषित करते रहते हैं जबकि उनका व्यवसाय ही अनैतिक है। इसी प्रकार शम्मी कोहली भी ढोंग-पाखंड के आडंबर करते रह कर धार्मिक मानी जाती थी। व्यापारी ,बिल्डर,आदि अपने कर्मचारियो को शराब पिला-पिला कर उनकी आदत बिगाड़ देते हैं जिसका खामियाजा उनकी पत्नी और बच्चो को भुगतना पड़ता है। अनेकों परिवारों को भुखमरी और बदहाली के कगार पर पहुंचाने वाली शराब की ये व्यापारी नेत्रिया धार्मिक पुरोहितो द्वारा धर्मपरायाण घोषित होने के कारण जनता मे भी श्रद्धा से देखी जाती रही है।

मै इस ब्लाग मे अनेकों बार ‘धर्म’ को स्पष्ट कर चुका हूँ किन्तु खेद  है कि तमाम पढे-लिखे समझदार लोग भी अंध-विश्वास और ढोंग-पाखंड को ही धर्म मानते है और मेरा उपहास उड़ाते हैं। केवल दो हतयाये तो उदाहरण मात्र है सम्पूर्ण देश मे प्रतिदिन बहुत कुछ अनैतिक घटित होता रहता है और जिम्मेदार लोग खुद आत्मावलोकन करने के बजाए राजनीति और राजनेताओ को दोषी ठहरा कर अपने कर्तव्य की इति श्री कर लेते हैं। जब तक समाज मे धर्म की अधार्मिक व्याख्याए प्रचलित रहेंगी और पुरोहितो का ढोंग-पाखंड पूजा जाता रहेगा समाज व राष्ट्र मे सर्वत्र अव्यवस्था एवं अशांति व्याप्त रहेगी। सबसे पहले आडंबर को हटा कर धर्म को शुद्ध करना होगा तभी सब कुछ स्वतः शुभ होगा।

नाच न आवे आँगन टेढ़ा

आज कल बैठे ठाले कुछ लोग ‘ज्योतिष’ की आलोचना करना अपना कर्तव्य और बड़प्पन समझ रहे हैं। बे सिर पैर की बातों को लेकर आधार हींन  और अतार्किक प्रश्न उठा कर ज्योतिष को चेलेंज देना तो कोई इनसे बड़ी सरलता से सीख सकता है। वस्तुतः ‘काला अक्षर भैंस बराबर’ इंनका ज्योतिष ज्ञान है और फुटपाथ पर बैठे ‘तोता ‘वाले या सड़क पर घूमते ‘बैल’वाले को ही ये ज्योतिषी मानते हैं और ज्योतिष की ‘धुआंधार आलोचना’ करने लग जाते हैं।                                                                                                                                          

‘ढोंग पाखंड और ज्योतिष’  मे मैंने ऐसे लोगों की पोल खोल कर सावधान रहने का जनता से आह्वान किया था। परंतु भाषा और साहित्य के ये प्रचंड विद्वान मुझ जैसे अज्ञात व्यक्ति के विचारों को कैसे स्वीकार कर सकते हैं?

मैंने ‘ज्योतिष और हम’  द्वारा मानव जीवन पर पड़ने वाले ग्रह-नक्षत्रों के प्रभाव को सरलतम ढंग से स्पष्ट करने का भी प्रयास किया था। जो लोग जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ते हैं उन्हें तो सच्चाई कभी स्वीकार हो ही नहीं सकती परंतु खेद का विषय यह है कि जो लोग खुद को प्रगतिशील और जनता का हमदर्द बताते हैं वे भी झूठ को ही बल प्रदान करते हैं । अफसोसजनक ही है कि जिस ‘ज्योतिष’ का उद्देश्य ‘मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध’बनाना है उसे ही तथाकथित प्रगतिशील विद्वान त्याज्य बताते हुये भर्त्सना  करते हैं।

ज्योतिष = ज्योति अर्थात प्रकाश का ज्ञान। ‘ज्योतिष’ का विरोध करके प्रकाश और ज्ञान से जनता को वंचित करके ये विद्वान किसका हितसाधन कर रहे हैं यह स्वतः स्पष्ट है। इसी प्रकार ‘धर्म’ का विरोध भी एक प्रगतिशील फैशन के तहत किया जा रहा है। ‘धर्म’वह नहीं है जिसे पुरोहितवादी उत्पीड़न और लूट को पुख्ता बनाने के लिए घोषित करते हैं परंतु ये विद्वान उसी ढोंग को ही ‘धर्म’ माने बैठे है । वे  ढोंगियों और ढोंगवाद की तो भर्त्सना करते नहीं ,उनका विरोध करते नहीं और बिना जाने-बूझे ‘धर्म’ पर हमला करते हैं। अधर्म के अलमबरदारों और इनमे कोई मौलिक अंतर नहीं है।


‘धर्म और विज्ञान’ शीर्षक से लिखे लेख मे मैंने ‘धर्म’ का वैज्ञानिक अर्थ स्पष्ट करने की चेष्टा की है,परंतु सुधी विद्वजन उस पर कोई ध्यान ही नहीं देना चाहते और अपनी गलत धारणाओं को जबरिया सब पर थोप देना चाहते हैं। यही नहीं ‘श्रद्धा,विश्वास और ज्योतिष‘ तथा ‘ज्योतिष और अंध विश्वास’ के माध्यम से मैंने वैज्ञानिक तर्क सहित ‘ज्योतिष’ और ढोंग के अंतर को भी स्पष्ट किया है। ढोंग और पाखंड किसी भी रूप मे ज्योतिष नहीं हैं और उनका न केवल विरोध बल्कि उन्मूलन भी होना चाहिए। लेकिन थोथे  वक्तव्यों द्वारा ज्योतिष की आलोचना करने वाले कई ऐसे कामरेड्स को मै जानता हूँ जो प्रत्येक ब्रहस्पतिवार को मजार पर जाकर दीप जलाते है। धर्म और ज्योतिष की आलोचना करने वाले सी पी एम के एक नेता ने तो मुझ से अपनी पुत्री तथा पुत्र की जन्म-पत्री बनवाकर उनका भविष्य इन्टरनेट के जरिये मंगवाया था।  एक बड़बोले आर्यसमाजी ( जो अब अपने पुत्र के पास बेंगलोर चले गए हैं)ने आगरा मे अपनी पुत्री की शादी हेतु जन्म-पत्र आर्यसमाज के ही पूर्व मंत्री से बनवाकर भेजी थी। सरला बाग (दयाल बाग),आगरा मे राधास्वामी मत के अनुयायियों ने मुझसे जन्म-पत्र बनवाए और अपने बच्चों का भविष्य ज्ञात किया लेकिन प्रवचनों मे ज्योतिष की आलोचना करते रहे। जिनकी कथनी और करनी मे अंतर है ऐसे लोग जनता और समाज के शत्रु ही हैं ,हितैषी नहीं। अतः ऐसे लोगों की ‘ज्योतिष’ अथवा ‘धर्म’ संबंधी आलोचना को ‘जन-विरोधी’ समझा जाना चाहिए। 

और पाप का घड़ा छलक गया

(हिंदुस्तान,लखनऊ,09-11-2011)
उपरोक्त स्कैन पढ़ कर आपको कैसा लगा?अखबार के संवाददाता ने तो प्रशासन को जम कर कोस डाला क्या यह उचित है?इसी से मिलते -जुलते मामले मे सच्चाई बयान करने पर न्यायपालिका ने स्वामी अग्निवेश को कानूनन अपराधी मान लिया और शायद वह दंडित भी हो जाएँ। क्या जन-आस्था के नाम पर अपराध होते रहें और उस ओर ध्यान दिलाने पर -जनता को जागरूक करने के प्रयास पर लोग दंडित होते रहें तब इस प्रकार के हादसे नहीं होंगे?क्यों नहीं ऐसे कार्यक्रमों के आयोजकों को दोषी माना जाता जिनहोने बेगुनाह 20 लोगों को असमय मौत की नींद सुला दिया और 50 घायल हुये? ‘वैज्ञानिक -सत्य’ उद्घाटित करना आस्था के नाम पर तो दंडनीय अपराध मान लिया गया किन्तु संविधान-प्रदत्त ‘अभिव्यक्ति की स्वन्त्र्ता’ का संरक्षण भी स्वामी अग्निवेश को प्राप्त न हुआ। संविधान सर्वोपरि है न की जन-आस्था के नाम पर फैला आडंबर । 
हादसा कराने  वाला ‘गायत्री परिवार’ वेदिक नियमों की अवहेलना करने वाला एक व्यापारिक संगठन है । 1551 कुंडीय यज्ञशाला पूर्णत्यः वेदिक सिद्धांतों के विपरीत है। यज्ञशाला मे एक ही कुंड होना चाहिए और उसमे चारों ओर 2-2 व्यक्ति मिला कर एक बार मे 8 से अधिक व्यक्ति एक साथ आहुतियाँ नहीं दे सकते। किन्तु धनार्जन -दक्षिणा के लालच मे एक से अधिक कुंड बना लिए जाते हैं और इसी दक्षिणा के बटवारे को लेकर आचार्य श्री राम शर्मा के दामाद और पुत्र के मध्य खींच-तान तथा मुक़दमेबाज़ी भी चल रही है। 
‘सच्चे साधक धक्के खाते ,अब चमचे मजे उड़ाते हैं’-नारद नाम से ‘अमर उजाला’,आगरा मे 1975 मे एक सज्जन ने जो लिखा था वही सब जगह देखने को मिल रहा है। आज झूठ,मक्कारी, बेईमानी ,ठगी,ढोंग-पाखंड का बोल-बाला है और उन्हीं को कानूनी संरक्षण भी मिला हुआ है। ‘खराब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है’-ग्रेशम का यह अर्थशास्त्रीय सिद्धान्त आज सभी क्षेत्रों मे ‘सत्य’ सिद्ध हो रहा है। 
 नन्द लाल जी के इस ज्ञान को समझ सकें तो जनता ऐसे छली आयोजनों के भंवर -जाल मे फँसने से बच सकती है। 

यदि आचार्य श्री राम शर्मा द्वारा गायत्री परिवार के माध्यम से स्वामी दयानन्द द्वारा लायी गयी जागरूकता को समाप्त न किया जाता तो इस प्रकार के सभी दूसरे हादसों को भी रोका जा सकता था। इस संदर्भ मे यह लिंक भी देखें–http://janhitme-vijai-mathur.blogspot.com/2011/11/blog-post_09.html