क्रांति स्वर नेता की कथनी और करनी एक जैस ी होनी चाहिए —— अनुराधा बेनीवाल

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ये सवाल सब सरकारों से है। इस से या उससे नहीं। सब कुर्सी वालो से हैं।
सवाल ही सवाल हैं और जवाब में हमे सिर्फ सुनाई देता है, "भारत माता की जय!" किसानों की बात करो तो "फौजियों की जय!" फौजियों की बात करो तो, "किसानों की जय!"

इस कोरी जय से क्या मिलेगा! कैसे बोलदे जय! जब है ही नहीं जय!
Anuradha Saroj
03-04-2016 at 1:29pm ·
पूरा स्पीच।

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क्रांति स्वर जनता बाजरवाद में मस्त और प ुरोहितवाद देश को खंड-खंड करने पर आमादा

जन-संस्कृति मंच के तत्वावधान में 23 जूलाई 2015 को सम्पन्न गोष्ठी :प्रो .डॉ मेनेजर पांडे

क्रांति स्वर ज्योतिष को विकृत व बदनाम क िया है ब्राह्मण पुजारियों ने —— विजय राजबली म ाथुर

ज्योतिष वह विज्ञान है जो मानव जीवन को सुंदर, सुखद व समृद्ध बनाने

हेतु चेतावनी व उपाय बताता है। लेकिन आज इस विज्ञान को स्वार्थी व

धूर्त लोगों ने पेट-पूजा का औज़ार बना कर इसकी उपादेयता को गौड़ कर

दिया व इसे आलोचना का शिकार बना दिया है।
http://krantiswar.blogspot.in/2016/01/blog-post_31.html

हिंदुस्तान, लखनऊ , दिनांक 11 फरवरी, 2016 में विभिन्न कर्मकांडी पुजारियों ने ज्योतिषी होने का दावा करते हुये ‘बसंत पंचमी’ पर्व 12 व 13 फरवरी दो दिन होने की घोषणा की है। कुछ ने तो 13 फरवरी 2016 की प्रातः 10 : 20 तक पंचमी घोषित कर दी है।
प्रस्तुत स्कैन से स्पष्ट हो जाएगा कि, 12 फरवरी 2016 की प्रातः 09 : 16 तक ही चतुर्थी तिथि है और उसी दिन रात्रि 30 :29 अर्थात घड़ी के हिसाब से 13 तारीख की सुबह 06 : 29 पर पंचमी तिथि समाप्त होकर षष्ठी तिथि प्रारम्भ हो जाएगी अर्थात सूर्योदय समय 07 : 20 पर षष्ठी तिथि लग चुकी होगी। अतः बसंत पंचमी केवल 12 फरवरी 2016 को ही है लेकिन धंधेबाजों ने जनता को गुमराह करके अपनी पेट पूजा के लिए गलत घोषणाएँ की हैं जिनको प्रतिष्ठित अखबार ने अपने विज्ञापनीय कारोबार के लिहाज से प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया है। इन सबका उद्देश्य अधिकाधिक धनोपार्जन है ‘जन -कल्याण ‘ नहीं। इसी कारण जनता व सरकारें गुमराह होती हैं और मानवता को अनर्थ का सामना करना पड़ता है, ज्योतिष विज्ञान नाहक बदनाम होता है जिसके लिए ये ब्राह्मण पुजारी शत-प्रतिशत उत्तरदाई हैं।

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चंड – मार्तण्ड पंचांग, नीमच , पृष्ठ-53

गुमराह करती अखबारी सूचना :

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चंड – मार्तण्ड पंचांग, नीमच की ये पूर्व घोषणाएँ घटित हो चुकी हैं :
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पृष्ठ 52 पर वर्णित स्थिति 23-01-2016 से 22-02-2016 तक के लिए है और इसी दौरान ही सियाचिन का ग्लेशियर कांड घटित हुआ जिसमें दस सैनिकों का जीवन बलिदान हो गया। यह सब कुछ ग्रहों की स्थिति के कारण ही घटित हुआ परंतु सावधानी न बरती गई क्योंकि जनता व सरकार इन ब्राह्मण पुजारियों की गलत व्याख्याओं में ही उलझे रहते हैं। यदि चेतावनी पर ध्यान देते हुये अग्रिम सावधानी बरती जाती तो जन-क्षति को बचाया जा सकता था।

लखनऊ में ही कल 10 फरवरी का वकील-तांडव और उसके जरिये हुये नुकसान से भी बचा जा सकता था यदि सावधानी बरतते तो।
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इसी प्रकार सरस्वती को ब्रह्मा की पुत्री बताना और पौराणिक गलत आख्यानों के आधार पर पूजा करवाना एक ऐसा घिनौना खेल है जिसने भारत में चारित्रिक पतन ला दिया है। ‘वेदों’ में ‘सरस्वती’, ‘गोमती’ आदि शब्दों के व्यापक अर्थ हैं न कि संकुचित जैसा कि इन ब्राह्मणों ने पुरानों में लिख डाला है और पुरानों को वेद आधारित बताने का कुचक्र रच रखा है। वस्तुतः पुराण वेदों में निहित उद्देश्यों से जनता को भटकाने हेतु ब्राह्मणों ने बड़ी चालाकी से गढ़े हैं। ‘नास्तिक’ संप्रदाय अपने गलत कदमों से इन ढ़ोंगी ब्राह्मणों की चालों को और मजबूत करता रहता है। जनता के सामने बचाव के बजाए भुगतने का ही विकल्प इस प्रकार बचा रह जाता है। इसी वजह से अब भी कोई एहतियात नहीं बरती जाएगी और आपको आगे भी दुखद घटनाओं के समाचार सुनने-पढ़ने को मिलते रहेंगे।

क्रांति स्वर लोकतन्त्र, राजनीति,आस्था, अध्यात्म,धर्म : सत्यार्थ का आभाव —— विजय राजब ली माथुर

*****’डार्विन वाद ‘ ने मतस्य से मनुष्य तक की विकास -गाथा को रचा व माना है। इस सिद्धान्त में ‘पहले अंडा ‘ या ‘पहले मुर्गी’ वाला विवाद चलता रहता है और उसका व्यावहारिक समाधान नहीं हो पाने के बावजूद उसी के अनुसार सारी व्याख्याएँ की जाती हैं। ‘युवा – पुरुष ‘ और ‘युवा – स्त्री ‘ वाला सिद्धान्त ‘तर्कसंगत’ व ‘व्यावहारिक’ है किन्तु इसका मखौल इसलिए उड़ाया जाता है कि, इससे सफ़ेद जाति के मध्य – यूरोपीय मनुष्यों की श्रेष्ठता का सिद्धान्त और उनका ‘डार्विन वाद ‘ थोथा सिद्ध हो जाता है।
‘डार्विन वाद ‘ के अनुसार जब मानव विकास माना जाता है तब यह जवाब नहीं दिया जाता है कि शिशु मानव का पालन और विकास कैसे संभव हुआ था ? जबकि ‘युवा – पुरुष ‘ और ‘युवा – स्त्री ‘ वाला सिद्धान्त इसलिए ‘तर्कसंगत’ व ‘व्यावहारिक’ है क्योंकि युवा नर- व नारी न केवल अपना खुद का अस्तित्व बचाने में बल्कि ‘प्रजनन’ में भी सक्षम हैं और नई संतान का पालन -पोषण करने में भी।
मध्य -यूरोपीय सफ़ेद मनुष्यों की जाति शोषण पर चल कर ही सफल हुई है और उस शोषण को निरंतर मजबूत बनाने के लिए नित्य नए-नए अनुसंधान करके नई-नई कहानियाँ गढ़ती रहती है। उसी में एक कहानी है भारत पर ‘आर्यों के आक्रमण ‘ की जबकि आर्य कोई जाति या धर्म नहीं है। श्रेष्ठता का प्रतीक है ‘आर्ष ‘ जिसका अपभ्रंश है -‘आर्य’ अर्थात कोई भी मनुष्य जो श्रेष्ठ कर्म करता है वह आर्ष अर्थात आर्य है चाहे वह किसी भी क्षेत्र का हो या किसी भी नस्ल का चाहे किसी भी आस्था को अपनाने वाला।***** मानव जीवन को सुंदर- सुखद- समृद्ध बनाने की धारणा वालों ने खुद को धर्म-निरपेक्ष अर्थात सद्गुणों से रहित घोषित कर रखा है और नास्तिक भी ; साथ ही डॉ अंबेडकर के अनुयाई कहलाने वालों ने खुद को सफ़ेद जाति के षड्यंत्र में फंस कर मूल निवासी घोषित कर रखा है। स्पष्ट है इन परिस्थितियों का पूरा-पूरा लाभ शोषणकारी – साम्राज्यवादी /सांप्रदायिक – ब्राह्मण वादी शक्तियाँ उठा कर खुद को मजबूत व शोषितों को विभक्त करने में उठाती हैं। यदि हम शब्दों के खेल में न फंस कर उनके सत्य अर्थ को समझें व समझाएँ तो सफल हो सकते हैं अन्यथा भारत का संविधान व लोकतन्त्र नष्ट हुये बगैर नहीं रह सकता। *****
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डॉ अंबेडकर द्वारा संविधान सभा में दिये गए समापन भाषण का जो अंश इस वर्ष गणतंत्र दिवस पर प्रकाशित हुआ है उससे साफ झलकता है कि, आज जो कुछ संविधान को नष्ट किया जा रहा है उसका उनको पूर्वानुमान था और उन्होने तभी सचेत भी कर दिया था। किन्तु निहित स्वार्थी तत्वों ने जान-बूझ कर उस चेतावनी को नज़रअंदाज़ किया जिससे मुट्ठी भर लोगों के लाभ के लिए असंख्य लोगों का अबाध शोषण व उत्पीड़न किया जा सके।इसके लिए लोकतन्त्र, राजनीति,आस्था,अध्यात्म,धर्म सबकी मनमानी झूठी व्याख्याएँ गढ़ी गईं । विरोध व प्रतिक्रिया स्वरूप जो तथ्य सामने लाये गए स्व्भाविक तौर पर वे भी गलत ही हुये क्योंकि वे गलत व्याख्याओं पर ही तो आधारित थे। महर्षि कार्ल मार्क्स, शहीद भगत सिंह व डॉ अंबेडकर ने इसी कारण धर्म का गलत आधार पर विरोध किया है जिसके परिणाम स्वरूप पोंगापंथी, शोषण वादी पुरोहितों की गलत व्याख्याएँ और भी ज़्यादा मजबूत हो गईं हैं। हम मनुष्य तभी हैं जब ‘मनन’ करें किन्तु आज मनन के बजाए ‘आस्था’ पर ज़्यादा ज़ोर दिया जा रहा है और अदालतों तक से आस्था के आधार पर निर्णय दिये जा रहे हैं। आज 08 फरवरी, 2016 के हिंदुस्तान का जो सम्पादकीय प्रस्तुत किया गया है उसमें भी आस्था को अक्ल (मनन ) से ज़्यादा तरजीह दी गई है।

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अबसे दस लाख वर्ष पूर्व पृथ्वी पर जब ‘मनुष्य की उत्पति ‘ हुई तो वह ‘युवा – पुरुष ‘ और ‘युवा – स्त्री ‘ के रूप तीन क्षेत्रों – अफ्रीका, मध्य – यूरोप व ‘त्रि वृष्टि’ (तिब्बत ) में एक साथ हुई थी। भौगोलिक प्रभाव से तीनों क्षेत्रों के मनुष्यों के रंग क्रमशः काला, सफ़ेद व गेंहुआ हुये। प्रारम्भ में तीनों क्षेत्रों की मानव – जाति का विकास प्रकृति द्वारा उपलब्ध सुविधाओं पर निर्भर था। किन्तु कालांतर में सफ़ेद रंग के मध्य यूरोपीय मनुष्यों ने खुद को सर्व- श्रेष्ठ घोषित करते हुये तरह- तरह की कहानियाँ गढ़ डालीं और उनकी पुष्टि के लिए मानव-विकास के क्रम को अपने अनुसार लिख डाला।
‘डार्विन वाद ‘ ने मतस्य से मनुष्य तक की विकास -गाथा को रचा व माना है। इस सिद्धान्त में ‘पहले अंडा ‘ या ‘पहले मुर्गी’ वाला विवाद चलता रहता है और उसका व्यावहारिक समाधान नहीं हो पाने के बावजूद उसी के अनुसार सारी व्याख्याएँ की जाती हैं। ‘युवा – पुरुष ‘ और ‘युवा – स्त्री ‘ वाला सिद्धान्त ‘तर्कसंगत’ व ‘व्यावहारिक’ है किन्तु इसका मखौल इसलिए उड़ाया जाता है कि, इससे सफ़ेद जाति के मध्य – यूरोपीय मनुष्यों की श्रेष्ठता का सिद्धान्त और उनका ‘डार्विन वाद ‘ थोथा सिद्ध हो जाता है।
‘डार्विन वाद ‘ के अनुसार जब मानव विकास माना जाता है तब यह जवाब नहीं दिया जाता है कि शिशु मानव का पालन और विकास कैसे संभव हुआ था ? जबकि ‘युवा – पुरुष ‘ और ‘युवा – स्त्री ‘ वाला सिद्धान्त इसलिए ‘तर्कसंगत’ व ‘व्यावहारिक’ है क्योंकि युवा नर- व नारी न केवल अपना खुद का अस्तित्व बचाने में बल्कि ‘प्रजनन’ में भी सक्षम हैं और नई संतान का पालन -पोषण करने में भी।
मध्य -यूरोपीय सफ़ेद मनुष्यों की जाति शोषण पर चल कर ही सफल हुई है और उस शोषण को निरंतर मजबूत बनाने के लिए नित्य नए-नए अनुसंधान करके नई-नई कहानियाँ गढ़ती रहती है। उसी में एक कहानी है भारत पर ‘आर्यों के आक्रमण ‘ की जबकि आर्य कोई जाति या धर्म नहीं है। श्रेष्ठता का प्रतीक है ‘आर्ष ‘ जिसका अपभ्रंश है -‘आर्य’ अर्थात कोई भी मनुष्य जो श्रेष्ठ कर्म करता है वह आर्ष अर्थात आर्य है चाहे वह किसी भी क्षेत्र का हो या किसी भी नस्ल का चाहे किसी भी आस्था को अपनाने वाला।
किन्तु आर्य को एक जाति और भारत में आक्रांता घोषित करने वाले सिद्धान्त ने यहाँ के निवासियों को अंत हींन विवादों व संघर्षों में उलझा कर रख दिया है ‘मूल निवासी आंदोलन ‘ भी उसी की एक कड़ी है। ‘ नास्तिक वाद’ भी उसी थोथे सिद्धान्त का खड़ा हुआ विभ्रम है। वस्तुतः शब्दों के खेल को समझ कर ‘मनन’ करने व सच्चा मनुष्य बनने की ज़रूरत है और मानव-मानव में विभेद करने वालों को बेनकाब करने की ।
मनुष्य = जो मनन कर सके। अन्यथा ‘नर-तन’ धारी पशु।
आस्तिक = जिसका स्वम्य अपने ऊपर विश्वास हो।
नास्तिक = जिसका अपने ऊपर विश्वास न हो।
अध्यात्म = अध्यन अपनी आत्मा का । न कि अपनी आत्मा से परे।
धर्म = जो मनुष्य तन व समाज को धारण करने हेतु आवश्यक है , यथा — सत्य, अहिंसा (मनसा – वाचा – कर्मणा ), अस्तेय, अपरिग्रह व ब्रह्मचर्य।
भगवान = भ (भूमि-पृथ्वी )+ ग (गगन -आकाश )+ व (वायु – हवा )+I ( अनल – अग्नि ) + न (नीर – जल )।
खुदा = चूंकि ये पांचों तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी मनुष्य ने नहीं बनाया है इसलिए ये ही ‘खुदा’ हैं।
GOD = G (जेनरेट )+ O (आपरेट ) + D (डेसट्राय )। इन तत्वों का कार्य उत्पति – पालन – संहार = GOD है।
मानव जीवन को सुंदर- सुखद- समृद्ध बनाने की धारणा वालों ने खुद को धर्म-निरपेक्ष अर्थात सद्गुणों से रहित घोषित कर रखा है और नास्तिक भी ; साथ ही डॉ अंबेडकर के अनुयाई कहलाने वालों ने खुद को सफ़ेद जाति के षड्यंत्र में फंस कर मूल निवासी घोषित कर रखा है। स्पष्ट है इन परिस्थितियों का पूरा-पूरा लाभ शोषणकारी – साम्राज्यवादी /सांप्रदायिक – ब्राह्मण वादी शक्तियाँ उठा कर खुद को मजबूत व शोषितों को विभक्त करने में उठाती हैं। यदि हम शब्दों के खेल में न फंस कर उनके सत्य अर्थ को समझें व समझाएँ तो सफल हो सकते हैं अन्यथा भारत का संविधान व लोकतन्त्र नष्ट हुये बगैर नहीं रह सकता।

क्रांति स्वर सिनेमा और सामाजिक सरोकार : एम . एस . सथ्यू से एक संवाद

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एम एस सथ्यू साहब से संवाद करते प्रदीप घोष साहब
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प्रथम पंक्ति में राकेश जी, विजय राजबली माथुर, के के वत्स

लखनऊ, दिनांक 04 फरवरी, 2016 को कैफी आज़मी एकेडमी , निशांतगंज के हाल में सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक मैसूर श्रीनिवास सथ्यू साहब के साथ ‘सिनेमा और सामाजिक सरोकार’ विषय पर एक संवाद परिचर्चा का आयोजन कैफी आज़मी एकेडमी और इप्टा के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। प्रारम्भ में कैफी आज़मी एकेडमी के सचिव सैयद सईद मेंहदी साहब ने एकेडमी व इप्टा की ओर से बुके देकर सथ्यू साहब का स्वागत किया व उनका संक्षिप्त परिचय देते हुये उनको महान एवं जागरूक फ़िल्मकार बताया। उन्होने इस बात को ज़ोर देकर कहा कि, पैसे को महत्व न देते हुये सथ्यू साहब ने फिल्म की अपेक्षा थियेटर को ज़्यादा अपना समय दिया और समाज को जागरूक करने का बीड़ा आज 85 वर्ष की आयु में भी बुलंदगी के साथ उठाए हुये हैं।
मेंहदी साहब के बाद इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश जी ने भी सथ्यू साहब की सादगी व इप्टा के प्रति उनके समर्पण की चर्चा की। इप्टा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष की हैसियत से इप्टा की मजबूती में सथ्यू साहब के योगदान को उन्होने प्रेरक बताया। राकेश जी ने यह भी बताया कि सथ्यू साहब की लोकप्रियता पाकिस्तानी जनता के बीच भी है। उन्होने पाकिस्तान यात्रा के संस्मरण सुनाते हुये बताया कि ‘मोहन जो देड़ो ‘ की ओर अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए जो बोर्ड लगाया गया है उस पर अंकित है- YOU ARE VIEWING ANCIENT INDIA- तात्पर्य यह है कि भारत और पाकिस्तान सांस्कृतिक रूप से एक ही हैं और इसी बात को सथ्यू साहब ने फिल्म ‘गर्म हवा’ में बड़े अच्छे ढंग से रखा है।
सथ्यू साहब ने शुरुआत में कहा कि वह मूल रूप से कन्नड़ भाषी होने के कारण हिन्दी-उर्दू पर अच्छी पकड़ तो नहीं रखते हैं लेकिन लखनऊ की तहज़ीब से पूरे वाकिफ हैं। काफी अर्सा पहले कन्नड़ लेखक बी सुरेशा लिखित नाटक-‘गिरिजा कल्याणम’ के हिन्दी रूपातंरण ‘गिरिजा के सपने’ के मंचन के सिलसिले में लखनऊ आने की उन्होने संक्षिप्त चर्चा की। उन्होने बताया कि इस नाटक की नायिका इंगलिश व गणित में कमजोर होने के कारण ‘मेट्रिक फेल’ हो गई और इसी ‘मेट्रिक फेल’ नाम से वह लोकप्रिय भी हुई। नाटक में बैंकों द्वारा आम जनता के शोषण का ज़िक्र करते हुये वह नायिका ICICI का उच्चारण कुछ इस प्रकार करती है – आई सी – आई सी – आई कि बरबस ही दर्शक उसकी बात की ओर आकर्षित हो जाते हैं।
एक युवती रेखा द्वारा युवाओं के लिए संदेश देने का सथ्यू साहब से आग्रह करने पर उन्होने कहा कि सफलता कोई बड़ी बात नहीं होती है। असफल होने पर सीखने का अवसर मिलता है और उसके बाद जो सफलता मिलती है वह पूर्ण परिपक्व होती है। उन्होने खुद अपना दृष्टांत प्रस्तुत करते हुये कहा कि इंजीनियर पिता, चाचा और भाइयों के परिवार से होने व साईन्स विद्यार्थी होने के बावजूद उनका रुझान कला की ओर था। उन्होने एक गुरु से सरोद वादन सीखा और खुद महसूस किया कि वह सफल नहीं हैं तब तीन वर्षों तक ‘कत्थक कली’ नृत्य सीखा और उसके लिए भी अपने को अनुकूल नहीं पाया तब पिताजी से कह दिया कि बी एस सी की परीक्षा नहीं देंगे उनको बंबई भिजवा दें और छह माह तक रु 50/- की मदद कर दें । उनको रु 13/- का टिकट दिला कर मैसूर से बंबई भेज दिया गया जहां उनका संपर्क इप्टा से हुआ , वह पहले से ही नाटकों में भाग लेते रहे थे अतः हबीब तनवीर व के ए अब्बास के सहयोग से थियेटर में भाग लेने लगे । लेकिन तब तक सिर्फ कन्नड़ और अङ्ग्रेज़ी ही जानते थे इसलिए बंबई में उन्होने पर्दे के पीछे के मंच- सज्जा, ध्वनि, रोशनी आदि के ही कार्य लिए।
के आसिफ ने एक नाटक के सेट की ज़िम्मेदारी उनको दी थी , उस नाटक को देखने चेतन आनंद भी आए थे उन्होने सेट से प्रभावित होकर सज्जा करने वाले से मिलने की इच्छा व्यक्त की और इस प्रकार सथ्यू साहब उनके संपर्क में आए। चेतन आनंद ने सथ्यू साहब को मिलने को बुलाया और उनको अपने साथ असिस्टेंट डाइरेक्टर के रूप में काम करने को कहा। सथ्यू साहब ने कहा कि उनको हिन्दी नहीं आती है वह कैसे करेंगे ?आनंद साहब ने उनको रोमन का सहारा लेने को कहा , उनके द्वारा प्रस्तावित रु 250/- प्रतिमाह वेतन को अपर्याप्त बताने पर सथ्यू साहब की इच्छानुसार रु 275/- प्रतिमाह पर नियुक्त कर लिया।
सथ्यू साहब ने 1956 में अपने पहले निर्देशन की चर्चा करते हुये कहा कि, पहली बार में ही उनको अपने निर्देशक चेतन आनंद साहब को भी निर्देशित करना पड़ा क्योंकि वह अभिनय भी कर रहे थे। फिल्म टैगोर के नाटक ‘चंडालिका’ पर आधारित थी जिसमें सितारा देवी और आगरा की निम्मी भी थीं। सथ्यू साहब ने एक दृश्य पर जैसे ही ‘कट’ कहा चेतन आनंद साहब चौंक पड़े कि जो साहायक बनने से इंकार कर रहा था उसकी दृश्यों पर इतनी बारीक पकड़ है कि वह उनको भी कमियाँ बता कर रीटेक के लिए कह रहा है। वह सथ्यू साहब से प्रसन्न हुये और यह जान कर और भी कि वह मूलतः थियेटर से ही संबन्धित हैं। एक अन्य प्रश्न के उत्तर में उन्होने कहा कि वह बंबई पैसा या नाम कमाने नहीं, बल्कि ‘काम सीखने’ के लिए आए थे।
अपनी सुप्रसिद्ध फिल्म ‘गर्म हवा’ का ज़िक्र करते हुये सथ्यू साहब ने बताया कि यह इस्मत चुगताई की कहानी पर आधारित है किन्तु इसके अंतिम दृश्य में जिसको प्रारम्भ में पर्दे पर दिखाया गया था – राजेन्द्र सिंह बेदी की कहानी के कुछ अंशों को जोड़ लिया गया था। इस दृश्य में यह दिखाया गया था कि किस प्रकार मिर्ज़ा साहब (बलराज साहनी ) जब पाकिस्तान जाने के ख्याल से तांगे पर बैठ कर परिवार के साथ निकलते हैं तब मार्ग में रोज़ी-रोटी, बेरोजगारी, भुखमरी के प्रश्नों पर एक प्रदर्शन मिलता है जिसमें भाग लेने के लिए उनका बेटा (फारूख शेख जिनकी यह पहली फिल्म थी ) तांगे से उतर जाता है बाद में अंततः मिर्ज़ा साहब तांगे पर अपनी बेगम को वापिस हवेली भेज देते हैं और खुद भी आंदोलन में शामिल हो जाते हैं।
एक प्रश्न के उत्तर में सथ्यू साहब ने बताया कि 1973 में 42 दिनों में ‘गर्म हवा’ बन कर तैयार हो गई थी। इसमें इप्टा आगरा के राजेन्द्र रघुवंशी और उनके पुत्र जितेंद्र रघुवंशी (जितेंद्र जी के साथ आगरा भाकपा में कार्य करने व आदरणीय राजेन्द्र रघुवंशी जी को सुनने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ है ) आदि तथा दिल्ली इप्टा के कलाकारों ने भाग लिया था। ताजमहल व फ़तहपुर सीकरी पर भी शूटिंग की गई थी। इप्टा कलाकारों का योगदान कला के प्रति समर्पित था। बलराज साहनी साहब का निधन हो जाने के कारण उनको कुछ भी न दिया जा सका बाद में उनकी पत्नी को मात्र रु 5000/- ही दिये तथा फारूख शेख को भी सिर्फ रु 750/- ही दिये जा सके थे। किन्तु कलाकारों ने लगन से कार्य किया था। सथ्यू साहब ने एक अन्य प्रश्न के उत्तर में बताया कि, ‘निशा नगर’, ‘धरती के लाल’ व ‘दो बीघा ज़मीन’ फिल्में भी इप्टा कलाकारों के सहयोग से बनीं थीं उनका उद्देश्य सामाजिक-राजनीतिक चेतना को जाग्रत करना था।
चर्चा में भाग लेने वाले लोगों में वीरेंद्र यादव, भगवान स्वरूप कटियार, मेंहदी अब्बास रिजवी, प्रदीप घोष आदि के नाम प्रमुख हैं।
कुछ प्रश्नों के उत्तर में सथ्यू साहब ने रहस्योद्घाटन किया कि, यद्यपि ‘गर्म हवा’ 1973 में ही पूर्ण बन गई थी किन्तु ‘सेंसर बोर्ड’ ने पास नहीं किया था तब उनको प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी से संपर्क करना पड़ा था जिनके पुत्रों राजीव व संजय को वह पूर्व में ‘क्राफ्ट’ पढ़ा चुके थे। उन्होने बताया कि इंदिराजी अक्सर इन्स्टीच्यूट घूमने आ जाती थीं उनके साथ वी के कृष्णा मेनन भी आ जाते थे। वे लोग वहाँ चाय पीते थे, कभी-कभी वे कनाट प्लेस से खाना खा कर तीन मूर्ती भवन तक पैदल जाते थे तब तक सिक्योरिटी के ताम -झाम नहीं होते थे और राजनेता जन-संपर्क में रहते थे। काफी हाउस में उन्होने भी इंदर गुजराल व इंदिरा गांधी के साथ चर्चा में भाग लिया था। अतः सथ्यू साहब की सूचना पर इंदिराजी ने फिल्म देखने की इच्छा व्यक्त की जिसे तमाम झंझटों के बावजूद उन्होने दिल्ली ले जाकर दिखाया। इंदिराजी के अनुरोध पर सत्ता व विपक्ष के सांसदों को भी दिखाया और इस प्रकार सूचना-प्रसारण मंत्री गुजराल के कहने पर सेंसर सर्टिफिकेट तो मिल गया किन्तु बाल ठाकरे ने अड़ंगा खड़ा कर दिया अतः प्रीमियर स्थल ‘रीगल थियेटर’ के सामने स्थित ‘पृथ्वी थियेटर’ में शिव सेना वालों को भी मुफ्त फिल्म शो दिखाया जिससे वे सहमत हो सके। 1974 में यह फ्रांस के ‘कान’ में दिखाई गई और ‘आस्कर’ के लिए भी नामित हुई। इसी फिल्म के लिए 1975 में सथ्यू साहब को ‘पद्मश्री’ से भी सम्मानित किया गया और यह सम्मान स्वीकार करने के लिए गुजराल साहब ने फोन करके विशेष अनुरोध किया था अतः उनको इसे लेना पड़ा।
सथ्यू साहब ने बताया कि मई माह में तीन नाटकों का एक फेस्टिवल कराने वह फिर लखनऊ आएंगे जिसमें नादिरा बब्बर के नाटक को भी शामिल किया जाएगा। अंत में इप्टा के प्रदीप घोष साहब ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों में रिशी श्रीवास्तव, दीपक कबीर, के के वत्स, ओ पी अवस्थी, प्रोफेसर ए के सेठ व विजय राजबली माथुर भी शामिल थे।

विद्रोही स्व-स्वर में डॉ नरेंद्र राजबल ी : एक और बुजुर्ग का कम होना —— विजय राजबली माथ ुर

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Late Dr. N.R.B. Mathur

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आज प्रातः वीरेंद्र चाचा के ई-मेल से नरेंद्र चाचा के यह दुनिया छोड़ जाने का समाचार ज्ञात होकर असीम वेदना व दुख हुआ। चाचा हमारे बाबूजी के चचेरे भाई थे , लेकिन हमारे बाबाजी स्व.धनराज बली साहब व चाचा के पिताजी स्व . धर्मराज बली साहब में काफी घनिष्ठता थी। बाबूजी की भी दिवंगत चाचा से घनिष्ठता रही । एक बार हमारे बाबूजी चार-पाँच माह के लिए फरीदाबाद हमारे छोटे भाई के पास गए हुये थे, और हम आगरा में थे । मथुरा चाचा के पास मिलने गए थे तब उन्होने कहा था – " विजय तुम यह न समझना कि, दरियाबाद 400 km दूर है और तुम्हारे बाबूजी भी 200 km दूर हैं लेकिन हम तुम्हारे पास ही 50 km हैं। जब ज़रूरत हो तुरंत हमारे पास बेझिझक आ जाना। " ऐसे आत्मीय नरेंद्र चाचा का न रहना किसी झटके से कम नहीं है। इसलिए भाई धीरेन्द्र से फोन पर ज़्यादा देर बात नहीं कर सका।
आदरणीय नरेंद्र चाचा मथुरा में वरिष्ठ दन्त चिकित्सक थे।
लखनऊ आने के बाद से मथुरा न जा सका और चाचा से एक लंबे अरसे से व्यक्तिगत मुलाक़ात न हो सकी थी। पिछले वर्ष जब उनसे फोन पर बात हुई थी तब उन्होने मथुरा आने को कहा था। वैसे वह अभी भी सक्रिय रहते थे , ज़्यादा दिन बीमार भी नहीं रहे थे। हम उनकी पुण्य आत्मा की शांति के लिए परम-पिता परमात्मा से प्रार्थना करते हैं। उन की यादें सदा मन में बसी रहेंगी।

क्रांति स्वर पूंजी,पूजा,धर्म और विभ्रम – —– विजय राजबली माथुर

पूजा और धर्म मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध बनाने के लिए थे लेकिन आज पूंजी -वाद के युग में इनको विकृत करके विभेद व विभ्रम का सृजक बना दिया गया है। क्या पढे-लिखे और क्या अनपढ़ सभी विभ्रम का शिकार हैं ; कुछ अनजाने में तो कुछ जान-बूझ कर भी।
धर्म शब्द की उत्पत्ति धृति धातु से हुई है जिसका अर्थ है धारण करना अर्थात मानव जीवन व समाज को धारण करने हेतु आवश्यक तत्व ही धर्म हैं अन्य कुछ नहीं, यथा—-
सत्य, अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ), अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।
आज इन तत्वों/लक्षणों का पालन न करने वाले ही खुद को धर्म का ठेकेदार घोषित किए हुये हैं।
पूजा भगवान की करनी थी जड़ पदार्थों की नहीं, लेकिन आज जड़-पूजक ही खुद को भगवान-भक्त घोषित करके मानवता को कुचलने पर आमादा हैं।
भगवान/खुदा/गाड को समझते नहीं और इनके नाम पर झगड़ा खड़ा करने को तैयार रहते हैं।
भगवान = भ (भूमि-पृथ्वी ) +ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा ) +I (अनल-अग्नि ) + न (नीर-जल )=भगवान ।
खुदा = चूंकि ये पाँच तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी मानव ने बनाया नहीं है अर्थात ये ही खुदा हैं।
गाड = चूंकि इन तत्वों का कार्य G (जेनरेट )+ O (आपरेट ) + D (डेसट्राय ) है इसलिए ये ही GOD हैं।
इनकी पूजा का अर्थ है इन तत्वों का संरक्षण व संवर्धन अर्थात प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह भगवान/खुदा/गाड तत्वों की रक्षा करे व उन्हें नष्ट होने से बचाए। लेकिन आज हो क्या रहा है? अलग-अलग नाम पर इनको नष्ट करने का मानवीय दुष्चक्र चल रहा है वह भी धर्म के नाम पर।
ज्योतिष वह विज्ञान है जो मानव जीवन को सुंदर, सुखद व समृद्ध बनाने हेतु चेतावनी व उपाय बताता है। लेकिन आज इस विज्ञान को स्वार्थी व धूर्त लोगों ने पेट-पूजा का औज़ार बना कर इसकी उपादेयता को गौड़ कर दिया व इसे आलोचना का शिकार बना दिया है। एक सप्ताह की ये अखबारी कटिंग्स जो बताती हैं ज्योतिष ने उनका पूर्वानुमान पहले ही कर दिया था किन्तु उस पूर्वानुमान को चेतावनी के रूप में बचाव के उपाय करने की किसी ने भी ज़रूरत नहीं समझी, क्यों ?
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नीमच से प्रकाशित ‘चंड-मार्तंड ‘पंचांग के पृष्ठ 50 पर 26-12-2015 से 23-01-2016 की ग्रह-स्थिति का वर्णन था :
दिवद्वादश मंगल शनि भृगु भौम प्रस्तार।
हिम प्रपात पर्वत पतन,मार्ग रोग विस्तार। ।
मेघ गाज वर्षा गति, लहर शीत अभिसार।
यान खान घटना विविध,शासन पक्ष विकार। ।
इस दौरान आकाश में ‘मंगल’ तुला राशि में होकर वृश्चिक के ‘शनि’ के साथ दो-बारह के संबंध में रहा जिससे पृथ्वी के पश्चिमी व पूर्वी गोलार्द्ध में शीत व हिम का प्रकोप रहा परंतु न भारत न ही यू एस ए की सरकारों ने कोई सुरक्षात्मक कदम उठाए ।
पृष्ठ 52 पर मंगल-शनि की इसी युति के साथ-साथ ‘बुध’, ‘शुक्र’ दोनों के एक साथ धनु राशि में स्थिति का परिणाम इस प्रकार पहले से ही वर्णित है जिस संबंध में मौसम विभाग अब आगाह कर रहा है :
युति योग शनि भौम का, नहीं सुखद प्रस्तार।
विस्फोटक भय आपदा, भू-क्रंदन प्रतिचार। ।
क्षति विश्व, सुख संपदा जन धन क्षति प्रहार।
यान खान घटना विविध, हरण करण विस्तार। ।
आतंक द्वंद रचना मही, अस्त्र शस्त्र प्रस्तार।
व्यय विशेष रचना गति, सांसारिक प्रतिभार। । ।
युति योग बुध शुक्र का, ऋतु विषम प्रतिचार।
हिम तुषार पर्वत क्षति, फसल कोप प्रतिचार। ।
लहर शीत महिमा गति, ग्रह गोचर संचार।
तट समुद्र पर आपदा, जन धन क्षति विचार । ।
यदि अफगानिस्तान में भूकंप आया तो दक्षिण-पूर्व एशिया में भी। भारत के पठानकोट में आतंकवादी हमला हुआ तो पाकिस्तान के स्कूली बच्चों पर भी । पश्चिम एशिया तो युद्ध का अखाडा बना ही हुआ है।
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और अब देखिये एक बड़े कारपोरेट घराने के बड़े अखबार के बड़े संपादक महोदय के पूजा, धर्म और ज्योतिष पर विचार जिनको पढ़ कर कैसे कहा जा सकता है कि ये एक विद्वान के विचार हैं? :
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बताइये भला जड़ पदार्थ (संपादक जी खुद ही लिखते हैं वहाँ एक पत्थर का टुकड़ा है ) को क्या पूजना ? फिर इतनी मूर्खता सिर्फ पुरुषों तक ही नहीं सीमित रहनी चाहिए उसका विस्तार महिलाओं तक भी होना चाहिए और महिलाएं खुद भी ऐसी मूर्खता करने के लिए लालायित हैं। संपादक पंडित जी ने ही लिखा है कि पहले वहाँ वीरान सा था अब भव्य मंदिर व दुकानें हैं। स्पष्ट है यह पूंजी का खेल है जिसमें अबोध जनता सिर्फ इसलिए पिस रही है क्योंकि बुद्धिमान लोग व संपादक जी-पंडित जी उसे ऐसा ही करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। धर्म,पूजा व ज्योतिष की इन अनर्थकारी परिभाषाओं-व्याख्याओं ने सम्पूर्ण मानव जाति के अस्तित्व के लिए खतरा नजदीक ला दिया है।